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Full text of "The Panchatantra, a collection of ancient Hindu tales in the recension, called Panchakhyanaka, and dated 1199 A.D"

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ए141006-8{07 600४170 प6त्‌ ‡ 
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018116-8{07.$ ९००५1 प९त्‌ 9 
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। ए12006-8{0 ए ९00 पत6त्‌ ॐ ४ < 


00 717. 76 ४1 2 {06 0108 8.06 ४06 ०7918 


ए187116-8001 : 106 21 07 116 न०क8 ४०. ४06 018 
816 1: 81108 € 9 108 
॥ प्र916 11: पथु णत्‌ शण 29 11000 


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108 
109 
111 
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118 
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118 
121 
121 
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126 
127 
127 
184 
187 
138 
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140 
147 
151 
158 
156 
159 
161 
168 
165 
167 
168 
170 


174 
180 
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अरहैम्‌ ॥ ओं नमः श्रीसरस्वत्ये ॥ 


सकलार्थशास्त्रसारं । जगति समालोक्य विष्ण॒शर्मदम्‌। 

तन्त्रैः पञ्चभिर्‌ एतच्‌ । चकार सुमनोहरं शास्त्रम्‌ ॥१॥ ढः $ 
तड्‌ यथानुश्रूयते । अस्ति दाचिणाल्थे जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम्‌ । तच सकलार्थ- 
शास्त्रविशारदः प्रवरनपसमुकुटमणिमरी चिचयचचिंतचरणः सकलकलापारं गतो ऽमर- 
शक्तिर्‌ नाम राजा बभूव । तस्य च चयः पुत्राः परमदुरमेधसः ' वसुशक्तिः । उग्मशक्तिः । 6 
अनन्तशक्तिश्‌ चेति बभूवुः । अथ ताञ्‌ शास्त्रविमुखान्‌ समालोक्य स राजा सचिवान्‌ 
आद्य प्रोवाच । भोः ' ज्ञातम्‌ एतट्‌ भवद्धिः । यन्‌ मभते पुचाः शास्त्रविमुखा विवेकर- 
हिताः । तड्‌ एतान्‌ पश्चतो मे हतकण्टकम्‌ अपि राज्यं न सौख्यम्‌ आवहति । अथवा 9 
साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 

अजातमृतमूर्खभ्यो ' मृताजातौ सुतौ वरम्‌ । 

यतस्‌ तौ खल्यदुःखाय । यावञ्जीवं जड दहेत्‌ ॥२॥ 12 
तथाच। किं तया क्रियते घेन्वा।यान सूतेन दुग्धद्‌ा। 

को ऽथः पुतेण जातेन । यो न विद्धान्‌ न भक्तिमान्‌ ॥ ३१ 
तद्‌ एषां बुद्धिप्रबोधनं यथा भवति । तथा केनाप्य उपायेनानु्ेयम्‌ । इति । अचकेकशः 15 
प्रोचुः । देव ' द्वादशभिर्‌ वर्षेस्‌ तावद्‌ व्याकरणं श्रूयते । तड्‌ यदि कथम्‌ अपि ज्ञायते । 
ततो धमांथंशास्त्राणि ज्ञायन्ते । ततो बुद्धिप्रबोधनं मवति । अथ तन्मध्यतः सुमतिनामा- 
मात्य: प्राह । देव ' अशाश्चतो ऽयं जीवविषयः । प्रभूतकालज्ञेयानि शब्द शास्त्राणि । तत्‌ 18 
संदेपमाचं किंचिद्‌ एतेषां प्रबोधनार्थं चिन्त्यताम्‌ ' इति । उक्तं च । यतः । 

अनन्तपारं किल शब्द शास्त 

स्वल्पं तथूयुर्‌ बहवश च विच्नाः । 21 

यत्‌ सारभूतं तद्‌ उपासनीयं 

हंसैर्‌ यथा चीरम्‌ इवम्बुमध्यात्‌ ॥४॥ प 
तड्‌ अचास्ि विष्णुशमौ नाम ब्राह्मणो ऽनेकशास्त्रसंसिदिलब्धकीर्तिः । तसमै समर्पयैतान्‌। 24 

1 


8.6 9:80 10199 197.0 । 


स नूनं द्राक्‌ प्रबुद्धान्‌ करिष्यति । सो ऽपि राजा तद्‌ आकण्यं विष्णुशमौणम्‌ आद्य 
प्रोवाच । भो भगवन्‌ ' मदनुग्रहाथंम्‌ एतान्‌ कृमारान्‌ अर्थशास्त्रं प्रति यथानन्यसद्शान्‌ 
विदधासि ' तथा कार्यम्‌ । अहं लां शासनशतेन नियोजयिष्यामि । अथ विष्णुशमोंत्तरं 8 
राजानम्‌ ऊचे । देव । श्रूयतां मे तथ्यवचनम्‌ । नाहं विद्याविक्रयं करोमि शासनशतेन । 
एतान्‌ पुनर्‌ मासषटड्ेन यदि नीतिशास्रज्ञान्‌ न करोमि । ततः स्वनामपरित्यागं करोमि। 
किं बना । श्रूयतां ममैष सिंहनादः । नहम्‌ अथेलिष्सुर्‌ व्रवीमि । न च मे ऽशीतिवषेस्य 
व्यावृत्तसर्वद्दि यार्थस्य किंचिड्‌ अर्थेन प्रयोजनम्‌ । किं तु त्वत्रार्थनासिद्यर्थं सरस्वती- 
विनोदं करिष्यामि । तल लिख्यताम्‌ अव्यतनो दिवसः। यद्य अहं षण्मासाभ्यन्तरे तव 
पुचान्‌ नीतिशास्त्रं प्रत्य अनन्यसदृशान्‌ न करोमि ' ततो ऽहेतिमे देवो देवमार्गं संदशं- 9 
यितुम्‌ । इति । 
एतां ब्राह्मणस्वासंमावयां प्रतिज्ञां श्रुता ससचिवो राजा विस्मयान्वितस्‌ तस्मै कुमा- 

रान्‌ सम्य परां निवतं जगाम । विष्णशमेापि तान्‌ आद्‌ाय स््नगृहं गत्वा तदर्थं 12 
भिचमेदः ' भिचसंप्रा्तिः । काकोलूकीयम्‌ ' लब्धप्रणाशम्‌ । अपरीक्षितकारिता । इति 
पञ्च तन्त्राणि रचयिता पाठितास्‌ ते राजपुचाः । ते $पि तान्य्‌ अधीत्य मासषट्धेन 
यथोक्ताः संजाताः । ततः प्रभृत्य्‌ एतत्‌ पञ्चतन्त्रकं नाम नीतिशास्त्रं बालावबोधनार्थं 15 
भूतले प्रवृत्तम्‌ । किं बङ्ञना । 

यो ऽचरैतत्‌ पठति प्रायो । नोतिशास्त्ं शृणोति वा। 

न पराभवम्‌ आमनति ' स शक्राट्‌ अपि किंचित्‌ ॥५॥ 18 


॥ कथामुखम्‌ एतत्‌ ॥ 


अथतः प्रारभ्यते भिचमेदो नाम प्रथमं तन्त्रम्‌ । यस्यायम्‌ आव्य: स्लोकः । 

वधमानो महान्‌ सेहः ' सिंहगो वृषयोर्‌ वने । 

जम्बुकेनातिलुब्धेन ' पिम्पुनेन विनाशितः ॥१॥ 3 
तद्‌ यथा श्रूयते । दाचरिणाल्येषु जनपदेषु पुरंदरपुरस्पधिं सर्वगुणसंपत्नं पुथिव्याश चूडाम- 
णिरत्नभूतं केलासशिखराकृति विविधचन््रप्रहरणचरणपरिपूर्णगोपुरा़ालकं विसंकरों- 
त्करश्ढधरि घ॑कपार॑तोरणांर्गलो पगतेनदर कीलं विपुलंद्रारं सुविहितशुङ्गाट कचतुष्पथप्रति्ठि- 5 
तानक॑देवतायतनं परिखा+^परिकरितोच्छित॑हिमगिरिसदृशणकास्प्राकारंवल्य परिवेष्टितं 
महिलारोप्यं नाम नगरम्‌ । तचरानेकगुणसमूहो जन्मान्तर धर्मो पार्जनावाप्तधनसमृहो 
वधमाननामा सार्थवाहः प्रतिवसति सख । अथ कदाचिच्‌ चिन्तयतो ऽधैराचवेलायाम्‌ 9 
ईदृशं तस्य चित्तम्‌ अभूत्‌ ' यथा । प्रभूतो ऽपि संचितो ऽर्थः प्रवेच्यमानो ऽज्ञनम्‌ इव 
चीयते । स्वल्पो ऽपि संचीयमानो वल्मीकवद्‌ वर्धते । अतः प्रभूतेनापि द्रेण तस्यैव 
वृद्धिः करणीया । अलब्धा अथां लभ्याः ' लब्धाः परिरक्णीयाः । रक्षिता विवर्धनीयाः 12 
पातै संपादनीयाश्‌ च ' इति । लोकमार्गेणपि रच्यमाणो ऽथो बह्पद्र वतया सद्यो 
विनश्येत्‌ । अप्रयुज्यमानः प्रयोजनोत्पत्तौ तुल्यो ऽप्राप्तख । दति । ततः प्राप्नस्य सतो 
रकणविवधनोपयोगादि कार्यम्‌ । उक्तं च । 15 

उपाजितानाम्‌ अर्थानां , त्याग एव हि रणम्‌ । 

तडागोदरसंस्थानां । परीवाह इवाम्भसाम्‌ ॥२॥ 

अर्थेर अथां निबध्यन्ते ' गजैर्‌ इव महागजाः । 18 

न ह्य्‌ अनर्थवता शक्यं । वाणिज्यं कतुम्‌ रेहया ॥ ३॥ 

देवव शाद्‌ उपपन्ने । सति विभवे यस्य नासि भोगेच्छा । 

न च परलोकसमीहा । स भवति घनपालको मूखैः ॥४॥ ढः 21 
एवं संप्रधायं मथुरागामीनि सारभाण्डानि समाहत्य सपरिजनः शुमे नक्ते शुभायां 
तिथौ गुरुजनानुज्ञातः स्जनेर्‌ अनुत्रज्यमानः शङ्कतू्ेनिर्घोषेणयतः क्रियमाणेन नगरान्‌ 
निःतः । उद्‌ कान्तात्‌ सुहृज्जनं निवत्यै तस्राढ्‌ अभिप्रस्ितः। | 24 

तस्य च द्रौ मङ्गलवृषभौ धूर्वोढारौ नन्द कसंजोवकनामानौ पाण्डुराभसंनिकाशौ 
सुवणंकिद्धिणीपरिवृतोरस्कौ तिष्ठतः । अथ धवखदिरपलाशशानैर मनोहराम्‌ अन्यैश्‌ 
चैष्टदशंनेः शखिभिर्‌ निरन्तरोपचिताम्‌ अनेकगजशवयमहिषशरुचमरीवराहंशादूल- 27 


5001 1. (70 2617.^ € 6 07 एस एप 08; 
78116507 : 1101 @त्‌ एषा. 


चिचक॑षभयोद्वटाम्‌ अचलनितम्बनिगगैतोदकपरिपूरितां विविधदरीगहनाम्‌ अटवीम्‌ 
आसाद्य दूरापातिंनिद्यरोदकोत्पादितकदेमभपरकचर णवेकल्याच्‌ कटस्य चातिभाराद्‌ 
अभिहतः कस्िंित्‌ प्रदेशे कथम्‌ अपि तयोर्‌ वुषभयोः संजीवको युगभङ्खं छत्वा निष- 
साद । ततस्‌ तं निपतितं दृष्टा शाकटिकः ससंभ्रमः शकटाद्‌ उन्ती तरितगतिर्‌ 
अनतिदूरे सोपचारम्‌ अज्ञलिं कता सार्थवाहम्‌ उवाच । आर्यपुचर । अध्वपरिश्रान्तः 
संजी वकः पड्क निषसाद । तच्‌ छरूता वधमानसार्थवाहः परं विषादम्‌ अगमत्‌ । पञ्चरा- 
चिकम्‌ अप्रयाणकं छत्वा यद्‌सौ न कल्यतां लमते ' तदा तस्य यवससमेतान्‌ रक्षापुरुषान्‌ 
दत्वुभिहितवान्‌ ' यथा । अयं संजीवको यदि जीवति ' तद्‌ एनं गृहीला । यदि 
न्रियते ' तदासु संस्कृत्य युष्माभिर्‌ आगन्तव्यम्‌ । एवम्‌ आदिश्च यथाभिलषितं देशान्तरं 
प्रसितः । अन्येदयुश्‌ च । बद्भपायं वनम्‌ । इति भयात्‌ तैर अपि गत्वा खाभिने मषा 
निवेदितम्‌ ' यथा । मृतो ऽसौ संजीवको ऽस्माभिश्‌ चुग्न्यादिना संस्कारेण संस्कृतः । 
इति । तच्‌ च श्रुला सार्थवाहः चणमाचं दुःखं छत्वा कछतज्नतया च प्रेतृत्यादिक्रियां 
छृत्वा मथुराम्‌ अविच्चैन संप्राप्तः। 

अथ संजीवकः स्वमाग्यानां वशाद्‌ आयुःशेषतया च निद्चं रोदककणप्रकारिर आश्ा- 
सितशरीरः शनैः शनैर यमुनाकच्छम्‌ अवतीर्णः । तस्िंश्‌ च मरकतसदृशानि शष्यपल्ल- 
वाग्राणि भक्षयन्‌ कतिपथेर अहोभिर्‌ हरवृषभ इव पीनः क्कृद्यान्‌ बलवांश च संवृत्तः । 
प्रत्यहं वल्मीकशिखराणि शुङ्गा ग्रघडुनैर उल्लिखन्‌ दन्तिवत्‌ तिष्ठति । 

अथ कदाचित्‌ सर्वमुगपरिवृतः पिङ्गलको नाम सिंह उदकग्रहणार्थं यसुनाकच्छम्‌ 
अवतीर्णैः। स च संजीवकस्य महान्तं गजिंतशब्दम्‌ अगुणोत्‌ । तं च श्रुलातीव जुमित- 
हृदयः खकोयम्‌ आकारं प्रच्छाद्य मण्डलवरस्युधस्ताच्‌ चतुर्मण्डला वस्थानेनावस्थितः। 

आह च चतुर्मण्डला वस्थाननामानि। सिंहः सिंहानुयायी काकरवगैः किंवृत्तश्‌ चेति 
मण्डलानि । तच सर्वेष्व्‌ एव नगर'पत्तनां धिष्ठानंखेरकर्वटद् ्ग्रतयन्तां यहा र॑ विहारं जन- 
स्थानेष्व्‌ एक एव सिंहस्थानीयो भवति । कतिपयाः सिंहानुयायिनस्‌ तच चराः । काक 
रवर्ग मध्यमवगेः। किवृत्ता वनान्तस्थानवासिनः। उन्तममध्यमाधमास्‌ चय इति । 

अथ पिङ्गलकः सामात्यः ससुहज्जनश्‌ कऋच्रचामरव्यजनंवाहनं विलासं विस्तार विरहि- 
तम्‌ अहृचिमसाहसरतैकान्तदर्पोद्चतम्‌ अमम्रमानमटोत्सेकम्‌ असहमानतया स्वयंग्राह- 
निरङ्कुशदितेशवर्यम्‌ अनमिज्ञम्‌ इत रजनसेवितानां छपणवचसाम्‌ अमषरोषसंर गरवभर- 
स्थानम्‌ अकातरत्वपुरूषार्थम्‌ अनुक्चिप्राज्ञलिपुटम्‌ अदीनम्‌ अभोतम्‌ अक्ृतचाटुकर्मोपायं 
व्यवसायपौ रुषामिमानावष्टम्मभासुरम्‌ अनन्यसेवि निःसङ्गम्‌ अनात्मंभरि परोपकारसुख- 
व्यक्त*पुरुषकार फलम्‌ अपरिभूतम्‌ अक्तशम्‌ अतुच्छम्‌ अपगतदुगेप्रतिसंस्कारचित्तम्‌ अग- 
णितायव्ययम्‌ अविलोमम्‌ अनायत्तम्‌ उद्वतोपाजिंतप्रतापविषमम्‌ अषाङ्गुणखसंप्रधारणम्‌ 
अप्रहरणाभरणम्‌ असाधारणविभवय्रासम्‌ अपरोकवृत्तम्‌ अनाशङ्कनीयम्‌ अनपेक्लि- 


3 


6 


9 


12 


15 


21 


24 


27 


80 


तकलचपाण्णिग्राहासाराक्रन्दम्‌ अनिन्यम्‌ अधघरिताशि्तितास््रप्रयोगम्‌ अनिच्छावि- 38 


०४, प ८ [तकि ^ प्र) (प्र एप. 2800६ 1. 


2 781116.8101.9. ¶ 216 1: 4 € 21त €०१९६९. 


घाति परिजननिरपेच्तलब्धय्रासनिवाससौदहित्यं वनान्तरे निःशङ्क निःसाध्वसम्‌ उचचैःशिरो 
राजत्वम्‌ अनुबभूव । उक्तं च । 

एकाकिनि वनवासिन्य्‌ ' अराजलच्छण्य अनीतिशास्त्रन्ने । 

सत््वोत्कटे मृगपतौ । राजेति गिरः परिणमन्ति ॥५॥ ५, 
किंच। नाभिषेको न संस्कारः ' सिंहस्य क्रियते मृगिः। 

विक्रमाजिंतविन्तस ' स्वयम्‌ एव मृगेन्द्र ता ॥ ६॥ 

सद्‌ामन्द मदस्यन्दि,मातङ्पिशिताशनः। 

असंपत्नेष्ठिताहारस्‌ ' तुणान्य्‌ अत्ति न केसरी ॥७॥ 

तस्य च करटकदमनकनामानौ द्रौ शुगालौ भ्रष्टाधिकारौ मन्तिपुचाव आस्ताम्‌ । 

तौ च परस्परं मन्त्रयितुम्‌ आरब्धौ । तत्र दमनको ऽब्रवीत्‌ । भद्र करटक । अयं तावद्‌ 
अस्मत्खामी पिङ्गलक उद कग्रहणार्थम्‌ इतः प्रवृत्तः । किंनिमित्तम्‌ इह दौर्मनस्येनाव- 
स्थितः । सो ऽब्रवीत्‌ । भद्र ' किम्‌ अनेन व्यापारेण । उक्तं च । 

अव्यापारेषु व्यापारं ' यो नरः कर्तुम्‌ इच्छति । 

स एव निधनं याति ' कीलोत्पारीव वानरः ॥८॥ 
दमनकं आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽत्रवीत्‌ । 


॥ कया १॥ 


अस्ति कस्मिंश्चित्‌ प्रदेशे नगरम्‌ । तस्य्‌ासन्नतरू*खशडमध्ये 
केनापि वणिजा देवतायतनं कायेते स्म । तच ये कमकणः 
स्थपत्यादयः ° ते मध्याहूवेत्रायाम्‌ आहारां प्रतिदिनं नगरं 
प्रविशन्ति । अथेकस्मिन्‌ टिने वानरयुथं तट्‌ अधेकृत^देवताय- 
तनम्‌ आयातम्‌ । अथेकस्य शिस्यिनो ऽधेस्फाटितो महाप्रमाणो 
ऽज्ञनस्तम्भः शिरसि निखातखादिरकीलको ऽवतिष्ठते । वानराश 
च स्वेच्छया तरूशिखरप्रासादणुङ्गदारुनिचयेषु यथेष्टं क्रीडितुम्‌ 
आरब्धाः । तच्रैकश्‌ चूसन्रविनाश्ण चापत्ाट्‌ उपविश्य स्तम्भे ' 
केनायम्‌ अस्थाने कीत्टको निखातः ' इति पाणिभ्यां संगृद्योत्पा- 
टयितुम्‌ आणख्धः । अधेस्फाटितान्तरप्रवि्टवृषणस्थानाच्‌ चलित- 
कीत्के यट्‌ वृच्चम्‌ ' तट्‌ भवतानाख्यात्तम्‌ अपि विदितम्‌ ' इति ॥ 


5 


9 


12 


15 


18 


21 


24 


27 


50०० 1, {1८ 2817124 प 6196 07 एप एप्र08 ; 


ए वा16-8॥01 ४ : 1.1071 2216 ४ पा], 


अतो ऽहं ब्रवीमि । अव्यापारः प्राज्ञैः परिहर्तव्यः ' इति । पुनश्‌ चात्रवीत्‌ । आवयोस्‌ 
तावढ्‌ भक्षितशेषाहारमाचवतेनम्‌ असत्य एव । दमनक आह । कथम्‌ आहारमाचार्थो 


कैवलं भवान्‌ प्रधानसेवां कुरूते ' न विशेषार्थितया । साधु चदम्‌ उच्यते । 


सुहृदाम्‌ उपकारकारणाद्‌ 

दिषतां चाप्य्‌ अपकारकारणात्‌ । 
नृपसंश्रय इष्यति बुधैर्‌ 

जठरं को न बिभतिं केवलम्‌ ॥ ९॥ 


अपिच। यस्मिञ्‌ जीवति जीवन्ति ' बहवः स तु जीवति। 
वयांसि किं न कुवन्ति ' चञ्चा स्वोदरपूरणम्‌ ॥ १०॥ 


यो नात्मने न गुरवे न च बन्धुवर्गे 
दीने दयां न कुरते न च भृल्यवगे । ` 
किं तसय जीवितफलं हि मनुष्यलोके 


काकोऽपि जीवति चिरं च बलिं च भुङ्कु ॥११॥ 
सखल्पस्तायुवसावशेषमलिनं निर्मासम्‌ अप्य्‌ अश्थिकं 

खा लच्छा परितोषम्‌ एति न च तत्‌ तस चुधाशान्तये । 
सिंहो जम्बुकम्‌ अद्भूम्‌ आगतम्‌ अपि त्यत्का निहन्ति द्विपं 
सर्वः कृच्छ्रगतो ऽपि वाञ्छति जनः सत्वानुरह्पं फलम्‌ ॥ १२॥ 


लाङ्गलचालनम्‌ अधश चरणावपातं 

भूमौ निपत्य बदनोदरदशंनं च । 

श्चा पिण्डदस्य कुरूते गजपुंगवस्‌ तु 

धीरं विलोकयति चाटु शतेशा च मुः ॥१३॥ 
सुपूरा वै कुनदिका ' सुपूरो मूषकाज्ञलिः । 


सुसंतोषः कापुरुषः ' सखल्यकेन]पि तुष्यति ॥ १४॥ 


अहितहितविचार ्ृन्यवुचः 
श्ुतिसमयैर्‌ बङभिर्‌ बहिष्कृतस्य । 
उदरभरणमाचम्‌ एव लिप्सोः 


पुरुषपशोश च पशोश्‌ च को विशेषः ॥ १५॥ 


अथवा। गुरुशकटधुरं धरस्‌ तृणाशी 
समविषमेषु च लाङ्गलापकर्षो । 
जगदुपकरणं पविच्रयोनिर्‌ 


नरपशुना *किम्‌ उ मीयति गवेन्द्रः ॥१६॥ 


8 


15 


888. 21 


24 


08] 27 


80 
"501 


करटकं आह । आवां तावद्‌ अप्रधानौ । किम्‌ अनेन व्यापारेण } सो ऽत्रवीत्‌ । भद्र । 


*कियतापि कालेन प्रधानो ऽग्रधानो $पि भवपि। उक्तं च। 


88 


०, व्र प् [तपि ^ प्र) प्त 8 500६ 1. प्र 


ए18116-8{0ा ङ: 11070 20 एणा. 


अप्रधानः प्रधानः स्यात्‌ । पार्थिवं यदि सेवति । 
प्रधानो ऽप्य्‌ अप्रधानः स्याद्‌ । यदि सेवाविवजिंतः ॥ १७॥ 


न कस्यचित्‌ किद्‌ इह प्रभावाद्‌ 8 

भवत्य्‌ उदारो ऽभिमतः खलो वा। 

लोके गुरुत्वं विपरीततां वा 

स्वचे्टितान्य्‌ एव नरं नयन्ति ॥१८॥ प])४ 6 
तथा च। आरोप्यते ऽश्मा शैलाग्रं ' यथा यत्नेन भूयसा । 


पात्यते सुखम्‌ एवाधस्‌ ' तथूत्मा गुणदोषयोः ॥ १९॥ 
करटक आह । अथ भवान्‌ किं वक्तुमनाः । सो ऽब्रवीत्‌ । अयं तावद्‌ अस्मत्खामी भीतो 9 
भीतपरिवारश च मूढमनाः संतिष्ठते । सो ऽब्रवीत्‌ । कथं. भवाञ्‌ जानाति । दमनक 
आह । किम्‌ अत्र ज्ञातव्यम्‌ । 


उदीरितो ऽर्थः प्युनापि गृह्यत 18 

हयाश च नागाश्‌ च वहन्ति नोदिताः । 

अनुक्तम्‌ अप्य्‌ ऊहति पण्डितो जनः 

परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥ २०॥ २०६8 15 
तथाच। आकरेर ^दङ्धितिर गत्या चेष्टया भाषणेन च। 


नेचवक्तविकारेण । गृह्यत ऽन्तगैतं मनः ॥ २१॥ 
तद्‌ एनम्‌ अदवृात्मप्रज्ञाप्रमावेण वशीकरिष्यामि । करटकं आह । अनभिन्नो भवान्‌ 18 
किल सेवाधर्मस्य । तत्‌ कथय ' कथम्‌ आत्मीकरिष्यसि । सो ऽब्रवीत्‌ । भद्र । कथम्‌ अहं 
न सेवाभिन्नः । ननु पाण्डवानां मयैव विराटनगरप्रवेशे व्यासमहर्ैः कथयतः सकलो 
ऽप्य्‌ अनुजीविधर्मो विज्ञातः । इति । उक्तं च । 21 
कोऽतिभारः समर्थानां ' किं दूरं व्यवसायिनाम्‌ । 
को विदेशः सुविद्यानां । कः परः प्रियवादिनाम्‌ ॥ २२॥ 
करटकं आह । कदाचिद्‌ अयम्‌ अनुचितस्थानप्रवेशाद्‌ भवन्तम्‌ अवमन्येत । सो ऽब्रवीत्‌ । २५ 
अस्य्‌ एवम्‌ । परम्‌ अहं देशकालविद्‌ अपि । उक्तं च । 
अप्राप्तकालं वचनं ' बृहस्पतिर्‌ अपि ब्रुवन्‌ । 
न केवलम्‌ असंमानं ' विप्रियत्वं च गच्छति ॥ २३॥ श 
तथाच। अभ्यक्तं रहसि गतं ' विचित्तम्‌ अन्येन मन्त्रयन्तं वा । 
उचितप्रणयम्‌ अपि नृपं ' सहसूाया नोपसर्पन्ति ॥ २४॥ ढः 
अपिच। इंदालापसभेषज'भोजननारीसनाथसमयेषु । 80 
अनिवारितो ऽपि न विशन्‌ ' नापितसमये च नागरिकंः॥२५॥ ठ 
नित्यं नरेद्रभवने परिशङ्नीयं 
विव्यार्थिना गुरुगृहे निभृतेन भाव्यम्‌ । 83 


5001 1. (1 571^ अलवल 07 एय ्)8 ; 


एद716-807 ङ : 1107 290 एषा. 


किं च। 


अन्यच्‌ च। 


अपिच) 


किंच। 


ज्लिप्रं विनाशम्‌ उपयान्ति हि दुर्विनीताः 

प्रारोषिका इव द्‌रिद्रगृहेषु दीपाः ।॥२६॥ 

काले यथावद्‌ धिगतानरपतिकोपाव्यशेषवृत्तान्तः । 
नुपभवने नतमूरतिः ' संयतवस्त्रः शनैः प्रविशेत्‌ ॥ २७॥ 
आसन्नम्‌ एव नुपतिर्‌ भजते मनुष्यं 

विद्याविहीनम्‌ अकुलीनम्‌ असंस्तुतं वा । 

प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्‌ च 

यत्‌ पाश्च॑तो भवति तत्‌ परिवेष्टयन्ति ॥ २८॥ 

कोपग्रसाद्‌ वस्तूनि । विचिन्वन्तः समीपगाः । 

आ रोहन्ति शनैर भृत्या ' धुन्वन्तम्‌ अपि पार्थिवम्‌ ॥ २९॥ 
सुवणेपुष्यां पृथिवीं । चिन्वन्ति पुरुषास्‌ चयः। 

म्यूरश्‌ च छतविव्यश च ' यश्‌ च जानाति सेवितुम्‌ ॥ ३७॥ 


सा च सेवा यथा क्रियते ' तथा अ्ूयताम्‌। 


प्रिया हिताश चये राज्ञां ग्राह्यवाक्या विशेषतः! 
आश्रयेत्‌ पार्थिवं विद्वांस्‌ ' * तद्वारेणैव नन्यथा ॥३१॥ 
यो न वेत्ति गुणान्‌ यस्य । न तं सेवन्ति पण्डिताः 

न हि तस्मात्‌ फलं किंचित्‌ ' सुरृष्टाद्‌ ऊषराद्‌ इव ॥ ३२॥ 
द्र व्यप्रकृतिहीनो ऽपि । सेव्यः सेव्यगुणन्वितः । 

भवत्य्‌ आजीवनं तस्पात्‌ ' फलं कालान्तराद्‌ अपि ॥ ३३५ 
सेवकः स्वामिनं द्े्टि । सेवकाधम इत्य असौ । 

आत्मानं स न किं देटि ' सेव्यासेव्यं न वेत्ति यः ॥ ३४५ 
राजमातरि देव्यां च ' कुमारे मुख्यमन्त्रिणि । 

पुरोहिते प्रतीहारे । कर्तव्यं राजवत्‌ सद्‌ा ॥ ३५॥ 
युद्धकाले ऽग्रगो यः स्यात्‌ ' सद्‌ पुष्ठानुगः पुरे । 
प्रमुद्धाराथितो हर्म्ये । स भवेद्‌ राजवल्लभः ॥ ३६॥ 
जीवेति प्रब्रुवन्‌ प्रोक्तः ' छत्याकृत्यविचत्षणः । 

करोति निर्विंकल्यं यः । स भवेद्‌ राजवल्लभः ॥ ३७५ 
प्रभुप्रसादजं वित्तं ' सत्पाचै यो नियोजयेत्‌ । 

वस्त्राद्यं च द्‌ घात्य्‌ अङ्के ' स भवेद्‌ राजवल्लभः ॥ ३८५ 
प्रोक्तः प्रत्युत्तरं नूह ' विरुद्धं प्रसुणा च यत्‌ । 

न समपि हसत्य उच्चैः , स भवेद्‌ राजवल्लभः ॥ ३९॥ 
अन्तःपुरचरैः सार्ध, यो न मन्त्रं समाचरेत्‌ । 

न कलतरैर्‌ नरेन्द्र स्य । स भवेद्‌ राजवल्लभः ॥ ४०॥ 


$ 8६8, 


३8४8. 


12 


15 


18 


21 


24 


27 


80 


(71 


०, (प्र 1.10क्रि ^) प्त ए. 800र क. 


ए क्ष116-507 ए : 00 271 एषा. 


करटक आह । 
सो ऽब्रवीत्‌ । 


अपिच। 


क्तं च । 


करटक आह्‌) 


संमतो ऽहं विभोर्‌ नित्यम्‌ । इति मला व्यतित्रजेत्‌ । 

न छच्छ्रेष्व अपि मयादा ' स भवेद्‌ राजवल्लभः ॥ ४१॥ 
>दिषद्भषपरो नित्यम्‌ । इष्टानाम्‌ इष्टकर्मकत्‌। 

यो नरो नरनाथस्य ' स भवेद्‌ राजवल्लभः ॥ ४२॥ 

न कुर्यान्‌ नरनाथस्य ' यो ऽरिभिः सह संगतिम्‌ । 

न निन्दां न विवादं च ' स भवेद्‌ राजवल्लभः ॥ ४३॥ 
यो रणं शरणं यद्वन्‌ । मन्यते भयवजिंतः । 

प्रवासं स्वपुरावासं । स भवेद्‌ राजवल्लभः ॥ ४४॥ 

द्यूतं यो यमदूताभं ' मयं हालाहलो पमम्‌ । 

पश्येद्‌ दारान्‌ यथाकारान्‌ । स भवेद्‌ राजवल्लभः ॥ ४५॥ 


अथ भवांस्‌ तच गत्वा प्रथमम्‌ एव किं वच्यति । तत्‌ तावद्‌ उच्यताम्‌ । 


उत्तराद्‌ उत्तरं वाक्यम्‌ ' उत्तराद्‌ एव जायते । 
सुवृष्टिगुणसंपन्नाद्‌ । बीजाद्‌ बीजम्‌ इवा]परम्‌ ॥ ४६॥ 
अपायसंद शंनजां विपत्तिम्‌ 

उपायसंद शंनजां च सिद्धिम्‌। 

मेधाविनो नीतिगुणप्रयुक्तां 

पुरः स्फ़रन्तीम्‌ इव द्‌ शयन्ति ॥४७॥ 

कल्पयति येन वृत्तिं ' सदसि च सद्धिः प्रशस्यते येन । 
स गणस्‌ तेन गुणवता ' विवर्धनीयश्‌ च रच्यश्‌ च ॥४८॥ 
अपुष्टस्‌ तस्य तद्‌ ब्रूयाद्‌ ' यख नेच्छेत्‌ पराभवम्‌। 
एष एव सतां धर्मो । विपरीतस्‌ ततो ऽन्यथा ॥४९॥ 
दुराराध्या हि राजानः। उक्तं च। 

भोगिनः कञ्चुकासक्ताः । क्रूराः कुटिलगामिनः। 
सुरौद्रा मन्त्रसाध्याश्‌ च ' राजानः पन्नगा इव ॥ ५०॥ 
विषमाः कठिनात्मानो  +ऽनीचा *नीचजनाश्रयाः । 
हिंतैर अनुगता नित्यं ' राजानः पर्व॑ता इव ॥ ५१॥ 
नखिनां च नदीनां च । श्ुङ्किणां शस्त्रधारिणाम्‌ । | 
विश्वासो नोपगन्तव्यः । स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥५२॥ / 


सो ऽब्रवोत्‌ । सत्यम्‌ एतत्‌ । किं तु । 


यस्य यस्य हि यो भावस्‌ । तस्य तस्य हि तं नरः। 
अनुप्रविश्य मेधावी । िप्रम्‌ आत्मवशं नयेत्‌ ॥ ५३॥ 


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5001 7. (1 ए £816.^ 617 0 एय ए 78); 10 
ए2116-8101 9 : 11010 200 एप. 


सरुषि नतिस्तुतिवचनं । तदभिमते प्रेम +*तद्भिषि देषः । 


>दान उपकारकीर्तनम्‌ ' अमन््रमूलं वशी कर णम्‌ ॥ ५४॥ । 
किंतु। क्रियाधिकं वा वचनाधिकं वा ४ 

ज्ञानाधिकं वुपिनरं विदिला। 

तं ताख अवस्था अनुसंदधीत 

ज्ञात्ाबलं तं परि वजये च्‌ च ॥५५॥ प 6 


वचस्‌ तच प्रयोक्तव्यं । यचोक्तं लभते फलम्‌ । 

स्थायीभवति चत्यन्तं ' रागः शुक्लपटे यथा ॥५६॥ 

नज्ञातबलवीर्येषु । पुमान्‌ किंचित्‌ प्रयोजयेत्‌ । 9 

न भाजते प्रयुक्तापि  ज्योत्लञा हिमगिरौ यथा ॥५७॥ 
करटक आह । यद्य एवम्‌ अभिमतम्‌ ' तद्‌ गच्छं राजपादान्िकम्‌ । शिवास्‌ ते पन्थानः 
सन्तु । यथाभिप्रेतम्‌ अनुष्ठीयताम्‌ । 12 

अप्रमादश्‌ च कर्तव्यस्‌ । त्वया राज्ञः समाश्रये । 

तदीयस्य शरीरस्य ' वयं भाग्योपजीविनः ॥५८॥ 
सोऽपितं प्रणम्य पिङ्गलकाभिमुखं प्रस्ितः। 15 

अथागच्छन्तं दमनकम्‌ अवलोक्य पिङ्गलको द्वाःस्थम्‌ अत्रवीत्‌। अपसार्यतां वेचलता। 

अखम्‌ अस्माकं चिरंतनो मन्त्रिपुचो दमनको ऽव्याहतप्रवेशः। तत्‌ प्रविश एष । दिती- 
यमण्डलमभागीति । अथ प्रविश्य दमनको नि्दिं्टे चूसने पिङ्गलकं प्रणम्योपविष्टः । स तु 18 
तस्य नखकुलिशालंछृतं दकिणपाणिम्‌ उपरि दत्ता मानपुरःसरम्‌ उवाच । अपि भवतः 
शिवम्‌ । कस्माच्‌ चिराद्‌ दृष्टो ऽसि। दमनक आह । यद्य अपि न किंचित्‌ प्रयोजनं 
दे वपाद्‌ानाम्‌ अस्माभिः ' तट्‌ अपि प्राप्तकालं च वक्तव्यम्‌ '। यतो नखलु राज्ञाम्‌ 
उपयोयकारणं किंचिन्‌ न भवति । उक्तं च । 

दन्तस्य निष्कोषणकेन राजन्‌ 

कणस्य कण्डूयनकेन चापि । २५ 

तृणेन कार्यं भवतीश्वराणां 

किं नाम वाक्याङ्गवता नरेण ॥५९॥ णा 
तथा च । यतो वयं देवपादानाम्‌ अन्वयागता भृत्या आपत्सख अप्य्‌ अनुगामिनः । नास्ा- 
कम्‌ अन्या गतिर्‌ असि । उक्तं च। 

स्थनेष्व एव नियोज्यानि भृत्याश्‌ चाभरणानि च । 

न हि चूडामणिः पादे प्रभवामीति बध्यते ॥ ६०॥ 80 

अनभिज्ञो गुणानां यो ' न भयैः सो ऽनुगम्यति। 

धनाद्यो ऽपि कुलीनो ऽपि । क्रमायातो ऽपि भूपतिः ॥ ६१॥ 


०४, ¶ प्र 1.0 ^ प्रा) वप्त एता, 800६ 1. 11 
ए78716.8001 ङ : 1109 276 एषणा. 


अपिच) 


असमैः समीयमानः ' समश्‌ च परिहीयमाणसत्कारः । 

धुरि *+चानियुज्यमानस्‌ । चिमिर्‌ अर्थपतिं त्यजति भृत्यः ॥ ६२॥ तर 
कनकभूषणसंग्रहणोचितो 8 
यदि मणिस्‌ चपुणि प्रतिबध्यते। 

नसविरौतिन चापि न शोभति 

मवति योजयितुर्‌ वचनीयता ॥ ६३॥ वण॑ 6 
बुद्धिमान्‌ अनुरक्तो ऽयम्‌ । अभक्तो ऽयम्‌ अयं जडः । 

इति भृत्यविचार ज्ञो ' भत्येर आपूर्ति नृपः ॥ ६४॥ 


यद्‌ अपि खाम्य्‌ एवं वदति ' चिराद्‌ दृश्यसे ' तचापि श्रूयतां कारणम्‌ । 9 


सव्यदक्िणयोर्‌ यत्र ' विशेषो नोपलभ्यते । 

न तच क्षणम्‌ अप्य्‌ आयो ' विद्यमानगतिर्‌ वसेत्‌ ॥ ६५॥ 

निर्विशेषं यदा सवामी । समं भूल्येषु वर्तते । 12 
तच्रोदयमसमर्थांनाम्‌ ' उत्साहः परिह यति ॥ ६६ ॥ 

*लोहिताच्षस्य च मणेः ' पद्यरागस्य चान्तरम्‌ । 

यच्र नासि कथं तच्र । क्रियते रतविक्रयः ॥ ६७॥ 18 
न विना पार्थिवो भृलयेर्‌ । न भृत्याः पार्थिवं विना। 

तिषां च व्यवहारो ऽयं ' परस्परनिबन्धनः ॥ ६८॥ 


तट्‌ अपि खामिगुणाद्‌ एव भत्यविशेषः । उक्तं च । 18 


अश्वः शस्त्रं शास्त्रं ' वीणा वाणी नरश चनारीच। 
पुरुषविशेषं प्राप्ता ' भवन्त्य अयोम्याश्‌ च योग्याश्‌ च ॥ ६९॥ र 


यच्‌ च । श्युगालो ऽयम्‌ । इति ममोपय अवज्ञा क्रियते । तद्‌ अप्य्‌ अयुक्तम्‌ । यतः। 


तया च। 


अन्यच्‌ च। 


कौशेयं कृमिजं सुवणम्‌ उपलाद्‌ दू वापि गोलोमतः 
पङ्कात्‌ तामरसं *शशाङ्क उद धेर इन्दीवरं गोमयात्‌ । 


काष्ठाद्‌ अन्निर्‌ अहेः फणाद्‌ अपि मणिर्‌ गोपित्ततो रोचना 24 
प्राकाश्यं सखगणोदयेन गुणिनो गच्छन्ति किं जन्मना ॥ ७0॥ इद्वापत 
मूषिको गृहजातापि ' हन्तव्या सुपकारिणी । 

उपप्रदानैर माजांरो । हितकृत्‌ प्रार्थ्यते ऽन्यतः ॥७१॥ 27 


किं भक्तेनुसमर्थेन । किं शक्तेनुपकारिणा । 

शक्तं भक्तं च मां राजन्‌ । नावन्नातुं लम्‌ अर्हसि ॥७२॥ 

अधिगतपरमार्थान्‌ पण्डितान्‌ मावमंस्थास्‌ 80 
तुणम्‌ इव लघु लच्मीर नैव तान्‌ सा रुणद्धि । 
अभिनवमदशोभाश्चामगण्डस्यलानां 

न भवति बिसतन्तुर्‌ वारणं वारणानाम्‌ ॥ ७३॥ | पणां 88 


5001 1. पए 61774 परल 07 . ण्य ए प्085; 12 


ए18716-8407 ङ : 1.101 200 एषा. 


पिङ्गलक आह । मा मैवम्‌ उच्यताम्‌ । चिरंतनस्‌ त्वम्‌ अस्माकं मन्तरिपुच्ः । दमनक आह । 
देव । किम्‌ अपि वक्तव्यम्‌ अस्ति । सो ऽब्रवीत्‌ । भद्र । यत्‌ ते हदयख्धम्‌ । तद्‌ ब्रूहि । सो 
$त्रवोत्‌। उद कग्रहणाय प्रवृत्तस्य स्वामिनः किम्‌ इह निवुत्यावस्थानम्‌ । पिङ्गलक आकारं 8 
प्रच्छादयन्न आह । दमनक ' किंचिन्‌ न । सो ऽब्रवीत्‌ । देव ' यदि नाख्येयम्‌ । तदा 
तिष्ठतु । 


दारेषु किंचित्‌ पुरषस्य वाच्यं ¢ 
किंचिद्‌ वयस्येषु सुतेषु किंचित्‌ । 

स्वे ऽपितिप्रत्ययिनो भवन्ति 

सर्वे न सर्वस्य च संप्रकाश्यम्‌ ॥ ७४॥ 10त्‌79 9 


एवम्‌ उक्ते पिङ्गलकश चिन्तयाम्‌ आस । योग्यो ऽयं दृश्यते । तत्‌ कथयाम्य्‌ एतस्यात्मनो 
ऽभिप्रायम्‌ । उक्तं च । 
सुहृदि निरन्तर चित्ते । गुणवति भूतये ऽनुवर्तिनि कलते । ह 12 
स्वामिनि शक्तिसमेते ' निवेद्य दुःखं सुखी भवति ॥७५॥ 
मो दमनकं ' गृणोषि महाशब्दं दूरात्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । स्वामिन्‌ ' गुणोमि। तत्‌ किम्‌। 
पिङ्गलक आह । भद्र ' अस्माद्‌ वनाद्‌ गन्तुम्‌ इ च्छामि । दमनक आह । कस्मात्‌ । पिङ्गलक 15 
आह । यतो ऽस्मद्रने ऽपूर्वं सत्वं किंचित्‌ प्रविष्टम्‌ ' यस्युयं महाञ्‌ शब्दः श्रूयते । तद्‌ 
अस्य शब्द स्यानुूपेण सत्त्वेन भाव्यम्‌ ' सत्त्वानुरूपेण च पराक्रमेण । इति । दमनक आह । 
किं शब्द माचा एव सखामी भयम्‌ उपेति । उक्तं च । 18 
अम्भसा भिद्यते सेतुस्‌ ' तथा मन्त्रो ऽप्य्‌ अरक्तितः। 
पैशुन्याद्‌ भिद्यते सेहो ' वाग्भिर भिदेत कातरः ॥ ७६॥ 
तन्‌ न युक्तं स्वामिनः पूर्वपुरुषोपात्तं कुलक्रमागतं वनम्‌ एकपद एव परित्यक्तुम्‌ । यतः। 1 
चलत्य्‌ एकेन पादेन ' तिष्ठत्य एकेन पण्डितः । 
नुसमीच्य परं स्थानं  पूर्वेम्‌ आयतनं त्यजेत्‌ ॥ ७७॥ 
अन्यच्‌ च । इह शब्दा अनेकप्रकाराः श्रूयन्ते । ते तु शब्दमाचाणय्‌ एव ' न तु भयकारणम्‌ । २4 
तद्‌ यथा  मेघस्तनिर्तवेशुवीणापणवमदङ्गशङ्घण्टाशकरकपारयन्त्र दीनां शब्दाः श्रूयन्ते । 
न च तेभ्यो भेतव्यम्‌ । उक्तं च । 
अप्य्‌ उत्कटे च रौद्रे च । शौ यस्य न हीयते । 7 
धर्यं प्रात्र महीपस्य ' न स याति पराभवम्‌ ॥७८॥ 
तथाच। दशिितभये ऽपि धातरि ' धीरत्व नैव चलति धीराणाम्‌। 
शोषितसरसि निदाघे ' नितराम्‌ एवोब्गतः सिन्धुः ॥७९॥ 2" 80 
तथाच। यस्य न विपदि विषादः ' संपदि हषो रणे च धीरत्वम्‌ । 
तं भुवनचरयतिलकं । जनयति जननी सुतं विरलम्‌ ॥ ८०॥ ब 


०६, ¶ प्र 1.0 ^+ का वप्त एता. 800ह 1. 13 


212116*807 ए. ¶ 8216 +: 1261281 27 तकण. 


तथा च। शक्तिवैकल्यनम्रस्य ' निःसारत्वाल्‌ लघोयसः । 
जन्मिनो मानहीनस्य ' तृणस्य च समा गतिः ॥८१॥ 
तड्‌ एवं ज्ञाता खामिना धैर्यावष्टम्भः कार्यः । न शब्दमाचाद्‌ भेतव्यम्‌ । उक्तं च । 8 


पूर्वम्‌ एव मया ज्ञातं ' पृणेम्‌ एतद्‌ धि मेदसा । 
अनुप्रविश्य विज्ञातं ' यावच्‌ च्म च दार च ॥८२॥ 


पिङ्गलको ऽब्रवीत्‌ । कथम्‌ एतत्‌ । दमनक आह्‌ । 6 


॥ कया २॥ 


अस्ति ' कस्मिं्ित्‌ प्रदेशे गोमायुः सत्छामक्णट आहारक्रियाथं 
परिभमन्‌ अरण्यमध्ये नुपस्यायोधनभूमिम्‌ अ पश्यत्‌ । अथ सुहूतं ° 
यावत्‌ तिष्ठति ' तावन्‌ महान्तं शब्टम्‌ अभृणोत्‌ । तच्‌ छवातीव 
शछुभितहृदयः परं विषादम्‌ अगमत्‌ ' आह च । अहो ' कटम्‌ 
आपतितम्‌ । इदानीं विनष्टो ऽस्मि । कस्यायं शब्द्‌: । कीदृशं “ 
सखम्‌ ' इति । यावट्‌ अन्वेषयति ' तावट्‌ गिरिशिखिराकारां भेरीं 
दृष्चिन्तयत्‌ । किम्‌ अयं शब्द्‌; स्यात्‌ स्वभावजः ' उतत परप्र- 
णतः " इति । अथ यदा भेरी वायुना प्रेरितेस्‌ तृणयेः स्पृश्यत ' "5 
तदा शब्द्‌ करोति ' अन्यथा तूष्णीम्‌ आस्ते । स च तस्या +असारतां 
ज्ञात्वा समीपम्‌ उपश्िष्टः ' स्वयं च कोतुकाट्‌ उभयमुखयोर 
अताडयत्‌ । हषाट्‌ इत्य्‌ अचिन्तयत्‌ । अहो ' चिराट्‌ एबास्माकम्‌ "ऽ 
अपि भोजनम्‌ आपतितम्‌ । तन्‌ नूनम्‌ एतन्‌ मांसमेदोभिः 
पूरितं भविष्यति ' इति । एवम्‌ अवधाय कस्मिंधित्‌ प्रदेशे विदा- 
यन्तः प्रविष्टः । तच्‌ च परूषचम वगुख्ठितम्‌ । ततः कथम्‌ 
अपि न देष्टाभङ्खः संजातः । अतो निराशीभूतस्‌ तट्‌ दारुचमोा- 
वशेषम्‌ अवत्टोक्य छ्रोकम्‌ अपठत्‌ । 


5001 1. प 6714 पला प्र 07 एय एप)8; 14 


श्रुत्वैवं भेरवं शब्दं ' मन्ये ऽहं मेदसां निधिम्‌ । 
अनुप्रविश्य विज्ञातं ' यावच्‌ चमे च दारु च ॥४३॥ 


प्रतिनिगैत्यान्तरदीनिम्‌ अवहस्याव्रवीत्‌ । पू वेम्‌ एव मया ज्ञातम्‌ ' 
इति ॥ 


अतो ऽहं व्रवीमि । न शब्दमाचाद्‌ एव च्षोभः कार्यः । पिङ्गलक आह । भोः ' ममायं 
परिग्रहो भयव्याकुलितमनाः पलायितुम्‌ एव वाञ्छति । तत्‌ कथम्‌ अहं धैर्यावष्टम्भं 5 
करोमि । सो ऽब्रवीत्‌ सखामिन्‌ । नँतेषां दोषः । यतः स्वामिसदृशा भृत्या भवन्ति । उक्तं च। 

अश्वः शस्त्रं शास्रं ' वीणा वाणी नरश चनारीच। 

पुरुषविशेषं प्राप्ता ' मवन्त्य अयोग्याश्‌ च योग्या श्‌ च ॥ ८४॥ होः 9 
पौरुषावष्टम्मं छता तत्‌ तावद्‌ अत्रैव परिपालय ' यावद्‌ अहम्‌ एतत्खरूपं विन्ञायूा- 
गच्छामि । ततश्‌ च यथोचितं करतव्यम्‌ । इति । पिङ्गलक आह । किं तत्र गन्तुम्‌ उत्सहति 
भवान्‌ । दमनक आह । किं खाम्यादे शात्‌ सुभृत्यस्य छत्याछत्यम्‌ अस्ति किंचित्‌ । उक्तं च । 12 
यतः। स्वाम्यादे शात्‌ सुभृत्यस्य ' न भीः संजायते कचित्‌। 

प्रविशेद्‌ धव्यवाहे ऽपि ' दुस्तरे च महाणैवे ॥ ८५ 

सवाम्यादिष्टस्‌ तु यो भत्यः । समं विषमम्‌ एव वा । 18 

मन्यति *+*सचिवो धार्यो ' न स भूपः कथंचन ॥ ८६॥ 
पिङ्गलक आह । भद्र । यद्य एवम्‌ । तट्‌ गच्छ । शिवास्‌ ते सन्तु पन्थानः । 

दमनको ऽपि तं प्रणम्य संजी वकशब्दानुसारी प्रतस्ये । अथ दमनके गते भयव्याकृलि- 18 

तहदयः पिङ्गलकंश्‌ चिन्तयाम्‌ आस । अहो । न शोभनं कतं मया ' यत्‌ तसय विश्वासं 
गत्वात्मामिप्रायो निवेदितः । कदाचिद्‌ दमनको ऽयम्‌ उभयवेतनल्वान्‌ ममोपरि दुष्टः 
स्यात्‌ । रष्टाधिकारत्वाट्‌ वा । उक्तं च। 9 

ये भवन्ति महीपस्य ' संमानितविमानितः । 

भवन्ति तस्य नाशाय ' कृलोत्था अपि सर्वद्‌ा ॥ ८७॥ 
तड्‌ यावद्‌ अस्य चिकीर्षितं वेत्तुं स्थानान्तरं गत्वा प्रतिपालयामि । कद्‌ चिद्‌ दमनको 24 
$पि तम्‌ आद्‌य मां व्यापादयितुम्‌ आगच्छेत्‌ । उक्तं च । 

न बध्यन्ते ह्य्‌ अविश्वस्ता ' बलिष्ठिर्‌ अपि दुबेलाः। 

विश्वस्तास्‌ तु प्रबध्यन्ते । दुर्बलेर्‌ बलिनो ऽपि हि ॥८८॥ 27 
इत्य अवधाय स्थानान्तरं गत्वा दमनकमागेम्‌ अवलोकयत्न एकाक्य एवावतस्ये । दमनको 
$पि संजीवकसकाशं गत्वा ' वृषभो ऽयम्‌ । इति परिज्ञाय हृष्टमना व्यचिन्तयत्‌ । अहो । 
शोभनम्‌ आपतितम्‌ । अनेनखख संधिविग्रहद्वारेण मम पिङ्गलको वशे भविष्यति । उक्तं च । 3 


०२, गप्र 0 ^ प्र? व्प्ष्ट एणा, एन्नः 7. 15 


ए 7व16-8001 9 : 11070 21 एप. 


सदैवापत्रतो राजा ' भोग्यो भवति मन्िणाम्‌ । 

अत एव हि वाञ्छन्ति, मन्त्रिणः सापदं नृपम्‌ ॥ ८९॥ 

यथा वाच्छति नीरोगः ' कदाचिन्‌ न चिकित्सकम्‌ । 8 

तथापद्रहितो राजा ' सचिवं नाभिकाङ्कति ॥ ९०॥ 
एवं चिन्तयन्‌ पिङ्गलकाभिसुखः प्रतस्ये । पिङ्गलको ऽपि तम्‌ आयान्तम्‌ अवलोक्वाका- 
रसंवर णार्थं यथापूर्वम्‌ अवतस्धे । दमनको ऽपि पिङ्गलकसकाशम्‌ आगत्य प्रणम्योपविष्टः । 6 
पिङ्गलकः प्राह । भद्र ' किं दृष्टं भवता तत्‌ सत्वम्‌ । दमनक आह । दृष्टं स्वामिप्रसादात्‌ । 
पिङ्गलक आह । अपि सत्यम्‌ । दमनक आह । किं स्वामिपाद्‌ानाम्‌ अन्यथा विज्ञप्यते । 
उक्त च। अपि स्वल्पम्‌ असत्यं यः । पुरो वदति भूभुजाम्‌ । 9 

देवानां च विनाशः स्याड्‌ । धुवं तस्य गुरोर्‌ अपि ॥९१। 
तथा च। सर्वदेवमयो राजा । मुनिभिः परिगीयते । 

तस्मात्‌ तं देववत्‌ पश्चेन्‌ । न व्धलीकेन किचित्‌ ॥ ९२॥ 12 
तथा च। स्वदेवमयस्यास्य ' विशेषो भूपतेर्‌ अयम्‌ । 

ग्पुभागशुभफलं दत्ते ' सद्यो देवा भवान्तरे ॥ ९३॥ 
पिङ्गलक आह । अथवा सत्यं दृष्टं भविष्यति भवता । न दोनोपरि महान्तः प्रकृष्यन्ति । 15 
उक्ते च। तुणानि नोन्मूलयति प्रभज्ञनो 

म॒दूनि नीचैः प्रणतानि सर्वेतः। 

#*समुच्छि तान्‌ एव तरून्‌ विबाधते | 18 

महान्‌ महत्सख एव करोति विक्रमम्‌ ॥ ९४॥ | 
दमनक आह । मया पूर्वेम एवैतद्‌ विज्ञातम्‌ । यथैवं स्वामी वच्यति । तत्‌ किं बना । 
तम्‌ एवाहं देवपादानां सकाशम्‌ आनयामि । तच्‌ च शरुता पिङ्गलको हृष्टवद्‌ नकमलः 21 
परां मनसस्‌ तुष्टिम्‌ उपागतः । 

दमनको ऽपि पुनर गत्वा संजीवकं साक्तेपम्‌ आद्तवान्‌ । एह्य एहि । दुष्टवुषम । 

स्वामी पिङ्गलकस्‌ लां व्याहरति । किं निर्भोको भूत्वा मुङ्गर मुज्ञर व्यर्थं नदसि। इति । 24 
तच्‌ कूला संजीवको ऽब्रवीत्‌ । भद्र । क एष पिङ्गलको नाम । तच्‌ कूत्वा सविस्मयं 
दमनको ऽब्रवीत्‌ । कथं सखामिनं पिङ्गलकम्‌ अपि न जानासि । पुनश्‌ च सामर्षम्‌ 
उक्तवान्‌ । फलेन ज्ञास्यति भवान्‌ । नन्व अयं स्वेमृगपरिवृतो मण्डलवटाभ्याशे मानोन्न- 27 
तचित्तः सतत्वधनस्वामो पिङ्गलकामिधानो महा सिंहस्‌ तिष्ठति । तच्‌ छरूला गतासुम्‌ 
इवात्मानं मन्यमानः संजोवकः परं विषादम्‌ अगमत्‌ । आह च । भद्र । भवान्‌ साघुसमा- 
चारो वचनपटुश्‌ च दृश्यते । तद्‌ यदि माम्‌ अवश्यं तत्र नयसि ! ततो ऽभयप्रसादः 3 
स्वामिनः सकाशाद्‌ दापयितव्यः । दमनक आह । भोः ' सत्यम्‌ अभिहितं भवता । नीतिर्‌ 
एषा । यतः 


500 1. (12 8172.^ वव प& 07 एय ्र08; 16 
ए1816-8001 र : 1.1071 20 एषा. 


पर्यन्तो लभ्यते भूमेः ' समुद्रस्य गिरेर अपि। 
न कथंचिन्‌ महीपस्य \ चित्तान्तः केनचित्‌ कचित्‌ ॥ ९५॥ 
तत्‌ त्वम्‌ अच तिष्ठ ' यावद्‌ अहं तं समये धुला तच पश्चान्‌ नयामि तवाम्‌ । 8 
ततो दमनकः पिङ्गलकसकाशं गतेदम्‌ आह । स्वामिन्‌ । न तत्‌ प्राकृतं सत्वम्‌ । स 
हि भगवतो महेश्वरस्य वाहनभूतः। मया पुष्ट इदम्‌ आह । महेश्वरेण तुष्टेन कालिन्दी 
परिसरे शष्पाग्राणि भक्षयितुं समादिष्टो खि । किं बज्ञना। मम प्रदत्तं भगवता क्रोडार्थं 
वनम्‌ इदम्‌ । पिङ्गलक आह सभयम्‌ । ज्ञातम्‌ अधुना मया। न देवताप्रसादं विना 
शष्यभोजना निःशङ्का निजने वन एवं नदन्तो मन्ति । ततस्‌ तया किम्‌ अभिहितम्‌ । 
दमनक आह । खामिन्‌ । मयतद्‌ अभिहितम्‌ । एतद्‌ वनं चण्डिका वाहनस्य पिङ्गलकस्य 9 
विषयीभूतम्‌ । तड्‌ भवान्‌ अभ्यागतः । ततस्‌ तस्य सकाशं गत्वासौ भातुलंहेनैकच च 
खादनपानक्रियाविहरिकस्थानाश्रथेण कालं नयतु ' इति । तेनापि सर्वम्‌ एतत्‌ प्रतिपन्नम्‌ । 
उक्तं च । स्वामिनः सकाशाद्‌ अभयदक्तिणा द्‌ापनीया । तद्‌ अचर खामी प्रमाणम्‌। 12 
तच्‌ छता पिङ्गलकः सहषेम्‌ इदम्‌ आह । साधु ' सुमते ' साधु । मम हदयेन सह॒ 
मन््रयिल वुभिहितम्‌ । तद्‌ दत्ता मया तस्याभयदक्षिणा । परं सो ऽपि ममार्थे शपथपु- 
रःसरं द्रततरम्‌ आनेतव्यः । तथा साधु चदम्‌ उच्यते । 15 
अन्तःसरिर अकुरिलैः ' सुलिग्धैः सुपरीचितिः। 
मन्त्रिभिर धायते राज्यं ' सुस्तभ्भेर इव मन्दि रम्‌ ॥ ९६॥ 
तथा । मन्त्रिणां मिन्नसंघाने ' भिषजां सांनिपातिके । 18 
कमणि व्यज्यते प्रज्ञा ' स्वस्थे कोवा न पण्डितः ॥९७॥ 
दमनको ऽपि संजोवकम्‌ उदिश्च प्रसितो ऽचिन्तयत्‌ । अहो ' प्रसादसमुखो नः 
स्वामी वचनवशगश च संवृत्तः । तन्‌ नासि धन्यतरो मया समः । यतः । 21 
अमृतं शिशिरे वद्धिर्‌ ' अमृतं प्रियदशंनम्‌ । 
अमृतं राजसंमानम्‌ ' अमृतं चीरभोजनम्‌ ॥ ९८॥ 
अथ संजीवकम्‌ आसाद्य सप्रश्रयम्‌ उवाच । भो भिच ' प्रसादितो ऽसौ मया भवदे 
स्वाम्य अभयप्रदानं च द्‌ापितः। तद्‌ विश्रब्धं गम्यताम्‌ इति । परं राजप्रसादम्‌ आसाद्य 
मया सह समयधर्मेण वर्तितव्यम्‌ ' न प्रसुत्वम्‌ आसाद्य सगर्व॑तया । अहम्‌ अपि तव 
संकेतेन सर्वा राज्यघुरम्‌ अमात्यपदरवीम्‌ आश्रित्योदहिष्यामि । ततो इयोर्‌ अपि राज्य- 2 
लच्छीर भोग्या भविष्यति । इति । यतः। 
पापर्चिंवट्‌ अधमण । विभवाः स्युर वशे नृणाम्‌ । 
नुपजान्‌ प्रेरयत्य एको । हन्त्य्‌ अन्यो $च मृगान्‌ इव ॥ ९९॥ 80 
तथाच। न पूजयति यो गवांद्‌ ' यथौचिल्यं नृपा्चितान्‌ । 
स प्राभ्रोति पदथंशं ' भूपतेर दन्तिलो यथा ॥ १००॥ 
संजीवक आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽत्रवीत्‌ । 38 


०६, वृष्ट [नठप् ^ प्त) (प्र एए, ण्न 1. | 17 


216 1: लाह 20 1188 50667. 


॥ कया 3३ ॥ 


अस्त्य्‌ अचर धरातले वधेमानं नाम नगरम्‌ । तच दन्तिलो नाम 
भार्डपतिः सकत्ठपुरनायकः प्रतिवसति स्म । तेन पुरकायं नृप- ° 
काये च कुवेता तुष्टिं नीताः सर्वे तत्पुरवासिनो लोकाः । किं 
बहुना ' न कोऽपि तादृक्‌ केनापि दृष्टः श्युतो वा चतुरः । 
अथवा साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । ¢ 
नरपत्तिहितकता देष्यतां याति लोके 
जनपट्हितकतां त्यज्यते पाथिवन्दरः । 
इति महति विरोधे वतेमाने समाने 9 
नृपतिजनपदानां दुत्ेभः कायेकतो ॥१०१॥ णो 
अथे वं वतेमानस्य तस्य कदाचित्‌ कन्या विवाहः संजातः । तच तेन 
समस्तास्‌ त्त्पुरनिवासिनो राजसंनिधिलोकाश च संमानपूवेम्‌ 
आमन्त्य भोजिता वस््रादिभिश्‌ च सत्कृताः । ततो विवाहानन्तरं 
सान्तःपुरो राजा गृहम्‌ आनीयाभ्यचितः । 
अथ तस्य नरपतेर गृहमाजेन कती गोरभनामा । स तेन " 
गृहम्‌ आयातो ऽपि राजगुरूपुरतो ऽनुचितस्थाने समुपविष्टो 
दृ्टाधेचन्दर दला निःसारितः । सो ऽपि तत्मभृत्य्‌ अपमानकलु- 
षितान्तःकरणो राचाव्‌ अपिन शते" कथं मया तस्य भार्डपते "8 
राजप्रसादहानिः कतेव्या ' इति । अचिन्तयच्‌ च । अथवा किं 
ममेतेन वृथा शरीरशेषेण ' यतो न किंचिन्‌ मया तस्यापकतु 
शक्यते । अथवा साध्व्‌ इट्म्‌ उच्यते । श 
यो ह्य्‌ अपकतुंम्‌ अशक्तः ' कुष्यति किम्‌ असो स तस्य निलेज्नः। 
उत्पतितो ऽपि हि चणकः ' शक्तः किं भाष्टकं भङ्कम्‌ ॥१०२॥ * 


7 


500४ 17. वप 28714 पलप 07 णम ए ्र08; 18 
216 7: एलालाश्षा६ त 118"5 86670. 


अथ कदाचित्‌ प्रत्यूषे योगनिद्रां गतस्य राज्ञः शय्यान्ते संमा- 

जेनं कुवेन्न इदम्‌ आह । अहो दन्तितस्य धृष्टत्म्‌ ' यट्‌ राज- 
महिषीम्‌ आलिङ्गति । तच्‌ छता राजा ससंभ्रमम्‌ उत्थाय तम्‌ » 
उवाच । भो भो गोरभ ' सत्यम्‌ एतत्‌ " यत्‌ त्वया जस्यितम्‌ । 
किं देवी दन्तिलेन समालिद्धिता । गोरभ आह । देव ' राचरिजा- 
गरणेन द्यूतासक्ततया *+माजेनकमेरतस्यापि मे बलान्‌ निद्रा ° 
समायाता । तन्‌ न वद्धि ' यद्‌ अभिहितं मया । राजा सेथेम्‌ । 
एष तावन्‌ मम गुहे ऽप्रतिहतगतिः ' तथा दन्तिलो ऽपि । तत्‌ 
कदाचिद्‌ अनेन देवी तेन समालिङ्कघमाना दृष्टा भविष्यति । ° 
उक्तच ।'यतः। 

वाञ्छति यट्‌ +दिवा म्यों ' वीक्षते वा करोति वा। 

तत्‌ स्वभे ऽपि तदभ्यासात्‌ ' तथा ब्रूते करोति च ॥१०३॥ 
तथा च । 

शुभं वा यदि वा पापं ' यन्‌ नृणां हृदि संस्थितम्‌ । 

सुगृढम्‌ अपि तज्‌ ज्ञेयं ' सुप्रवाक्यात्‌ तथा मदात्‌ ॥१०४॥ 
अथवा स्त्रीणां विषये को ऽ संदेहः । 

जस्यन्ति साधम्‌ अन्येन ' पणश्यन्य्‌ अन्यं सविभ्रमाः । 

हतं चिन्तयन्त्य्‌ अन्यं ' प्रियः को नाम योषिताम्‌ ॥१०५॥ 
तथा च। 

नामभिस्‌ तृ्ति काष्ठानां ' नापगानां महोदधिः । 

नान्तकः सवेभरूतानां ' न पुंसां वामलोचनाः ॥१०६॥ श 

रहो नास्ति सघृणो नास्ति ' नालति प्राथेयिता नरः । 

तेन नारद्‌ नारीणां ' सतीत्म्‌ उपजायते ॥१०७॥ 


~ 


1 


०, ¶प्त४ [तकि ^) वप एता, 280० 1. 19 
¶ 216 ऋ: 0676081४ त्‌ 1088 50660. 


तथा च। 
यश चेतन्‌ मन्यते मूढौ ' रक्तेयं मम कामिनी । 
स तस्या वशगो नित्यं ' भवेत्‌ करडा शकुन वत्‌ ॥१०४॥ ४ 


एवं स बहुविधं वित्य तत्मभृति दन्तिलस्य प्रसादपराङ्मुखो 
बभूव । किं बहुना । राजद्वारे प्रवेशो निवारितः । 
दन्तिलो ऽप्य्‌ अथाक्स्माट्‌ एव प्रसादपराङ्युखम्‌ अवनि- ९ 
पतिम्‌ अवलोक्य चिन्तयाम्‌ आस । अहो ' साधु चेदम्‌ उच्यते । 
को ऽन्‌ प्राण न गवितो विषयिणः कस्यापटो ऽस्तं गताः 
स्त्रीभिः कस्य न खरिडितं भुवि मनः को नाम राज्ञां प्रियः। ° 
कः कालस्य न गोचरान्तरगतः को ऽर्थी गतो गोर वं 
को वा टुजेन वागुरासु पतितः सेमेण यातः पुमान्‌ ॥१०९॥ «० 
तथा च । 19 
काके शो चं द्यूतकारेषु सत्यं 
सपं छषान्तिः स्त्रीषु कामो पशशन्तिः । 
क्ीवे धेय मद्यपे तच्चिन्ता 18 
राजा मिचरं केन दृष्टं शरुतं वा ॥११०॥ य 
अपरम्‌ ' मयास्य भूपतेर अन्यस्य वा कस्यचित्‌ स्वप्ने ऽपि वा- 
डया चेणापि न कृतम्‌ अहितम्‌ । तत्‌ किम्‌ इति पराङ्ुखो मां ७ 
प्रति भूपतिः ' इति । 
एकदा च कदाचिट्‌ टन्तित्ठकं राजडारे विष्कम्भितम्‌ अव- 
लोक्य संमाजेनकतां गोरभको इारपालान्‌ विहस्येदम्‌ उवाच। भो 
भो ारपात्राः ' राजप्रसादटुलेलितो ऽयं टन्तितकः स्वयं नि- 
सहानुमहकता च । तद्‌ अनेन निवारितेन यथाहम्‌ ' तथा यूयम्‌ 


5001 1. (प ए817.^ पलाल 07 एय 08; 20 


216 1: कलालक्ा६ 27त्‌ 1&*8 5066 


अष्‌ अधेचन्द्रभागिनो भविष्यथ ' इति । तच्‌ छत्वा टन्तिलेकश 
चिन्तयाम्‌ आस । नूनम्‌ अस्य गोरभकस्य चेशटितम्‌ । अथवा 
साध्व्‌ इटम्‌ उच्यते । ४ 

अकु्ट़रीनो ऽपि मूर्खो ऽपि ' भूपाले यो ऽ सेवते । 

अपि संमानहीनो ऽपि ' स सवे प्रपूज्यते ॥१११॥ 

अपि कापुरुषो भीतः ' स्याच्‌ चेन्‌ नृपतिसेवकः । ॥ 

तथापि न पराभूतिं ' जनाट्‌ आघ्नोति मानवः ॥११२॥ 

एवं विक्रय स वि्ठक्षमनाः सो्ेगः स्वगृहं गत्वा गोरभम्‌ 

आहूय निशसुखे वस्युगल्रेन संमान्येदम्‌ उवाच । भदू ' मया त्वं ° 
रागवश्णन्‌ न निःसारितः । यतस्‌ त्वं पुरोहितस्य पुरो ऽनुचित- 
स्थाने समुपविष्टो दृष्टो ऽसि ' इत्य्‌ अपमानितः । सो ऽपि 
स्वराज्यम्‌ इव तट्‌ वस्रयुगल्म्‌ आसाद्य परं परितोषं गत्वा तम्‌ " 
उवाच । भोः च्रेष्ठिन्‌ ' छषान्तं मया तत्‌ । अस्य संमानस्याचिराट्‌ 
एव द्रष्यसि राजप्रसादादि फलम्‌ । एवम्‌ उक्ला सपरितोषं 
विनिगेतः। साधु चेदम्‌ उच्यते । = 

स्तोकेनोन्रतिम्‌ आयाति ' स्तोकेनूायात्य्‌ अधोगतिम्‌ । 

अहो सुसद शौ चेष्टा ' तुत्कायष्टः खल्दस्य च ॥११३॥ 

ततश चान्येद्युः स गोरभो राजकुले गत्वा योगनिद्रां गतस्य 5 

भूपतेः संमाजेनक्रियां कुवेन्‌ इटम्‌ आह । अहो विवेको ऽस्मद्ग- 
पतेः ' यः पुरीषोत्सगेम्‌ आचरंश चिभिटीभक्षणं कुरूते । तच्‌ छूत्वा 
सविस्मयम्‌ उत्याय तम्‌ उवाच । रे रे गोरभ ' किम्‌ अप्रस्तुतं ५ 
वदसि । गृहकमेकरं मत्वा न त्वां व्यापादयामि । किं चया कदा- 
चिद्‌ अहम्‌ एवंविधं कमे समाचरन्‌ दृष्टः । सो ऽब्रवीत्‌ । देव ' 
दयूतासक्ततया राचरिजागरणेन मम संमाजेनं कुवेतो ऽपि बलान्‌ ५ 


०, (प्न ए [0 ^ प्रा) पए ठा. 800 7, 21 
7216 14; कल€ालक्षा६ 210 "5 5662. 01811680. 


निद्रा समुपागता । तट्‌ यज्‌ जस्यित्तम्‌ ' तन्‌ न वद्धि । तत्‌ 
प्रसादं करोतु स्वामी मम निद्रापरवशस्य । 

राजा। मया तावद्‌ आ जन्मतो ऽप्य्‌ एवंविधं कमे कुवेता ४ 
चिभिटिका न भधिता । तट्‌ यथा ममायं व्यतिकरो ऽनेन 
मूढेनासंभाव्यो व्याहृतः ' तथा दन्तित्ठस्यापि ' इति निश्वयः। तन्‌ 
मया न युक्तम्‌ आचरितम्‌ ' यत्‌ स वराको संमानेन वियोजितः । १ 
न तादुक्युरुषाणाम्‌ एवंविधं संभाव्यते । तदभावेन राजकृत्यानि 
पोर कृत्यानि च स्वांणि शिथित्छतां व्रजन्ति । 

एवम्‌ अनेकधा विनिश्चित्य टन्तिले समाहूय निजाङ्गाभर- ° 
णानि वस््राणि च संयोज्य स्वाधिकारे नियोजयाम्‌ आस ॥ 


अतो ऽहं व्रवीमि । न पूजयति यो गर्वात्‌ ' इति । संजीवक आह । भद्र ' सत्यम्‌ 
एतद्‌ भवतामिहितम्‌ । तद्‌ एतत्‌ कर्तव्यम्‌ । इति । 12 
एवम्‌ अभिहिते दमनकस तं समादाय पिङ्गलकसकाशम्‌ आगच्छत्‌ । आह च । देव । 
स मया समानीतः संजीवकः । अधुना देवः प्रमाणम्‌ । संजीवको ऽपि तं सादरं प्रणम्या- 
रतः सविनयं श्ितः। पिङ्गलको ऽपि तस्य पीनवृत्तायतं नखकुलिशालंकृतं दक्षिणपाणिम्‌ 15 
उपरि दत्वा संमानपुरःसरम्‌ अव्रवीत्‌ । अपि भवतः शिवम्‌ । कुतस्‌ त्वम्‌ अस्मिन्‌ विजने 
वने निवससि । इति । एवं पुष्टे संजीवको यथावृत्तम्‌ एवात्मनः सार्थवाहवधमानादिवियोगं 
समाख्यातवान्‌ । एतच्‌ च श्रुता पिङ्गलकेनाभिहितः । वयस्य ' न भेतव्यम्‌ । मद्भुजपरि- 18 
ररते ऽस्मिन्‌ वने यथेष्ितम्‌ उष्यताम्‌ । अन्यच्‌ च । भवता मत्समोपविहारिणजस्ं 
भवितव्यम्‌ । यत्कारणम्‌ । बड्भपायम्‌ इदं वनम्‌ अनेकरौ द्र सत्त्वसंकृलत्वात्‌ ' इति । संजी- 
वकेनामिहितम्‌ । यथा देव आज्ञापयति । ध 
एवम्‌ उत्का स मृगाधिपो यसुनाकच्छम्‌ अवतो्यं प्रकामम्‌ उद कपानावगाहनं कत्वा 
सखैरप्रचारं पुनर्‌ वनं प्रविष्टः । 
एवं तयोः प्रतिदिनं परस्परप्रीतिपरयोः कालो ऽतिवर्तते । संजी वंकेन]ष्य्‌ अनेकशा- 24 
स््राधिगतवुचधि प्राग्भ्येन स्तोकैर एवहोभिर्‌ मूढमतिर्‌ अपि पिङ्गलको धीमान्‌ कृतः । 
अरण्यधमांट्‌ वियोज्य य्रामधमेषु नियोजितः ' किं बहना प्रत्यहं संजीवकपिङ्कलकौ 
केवलं रहस्यं मिथो मन्त्रयेते । भ 
शेषः सर्वो ऽपि मृगपरिजनो दूरीभूतस्‌ तिष्ठति । तौ च शृगालौ प्रवेशम्‌ अपिन 


5001 1. प्र 87. 96 प& 07 एय ए प्08; 0. 


ए1व116-8 गाङ: 1.10 270 एषा. 


लभेते । अन्यच च  सिंहपराक्रमाभावात्‌ सवो ऽपि मृगजनस तौ च गुगालौ चुधाव्याधि- 
बाधिता एकां दिशम्‌ आथित्य खिताः । उक्तं च ' यतः। 


फलहीनं नुपं भृत्याः ' कुलीनम्‌ अथवोन्नतम्‌ । 8 
संत्यज्युन्य्च गच्छन्ति । गुष्कं वृन्तम्‌ इव] ण्डजाः ॥ ११४॥ 

तथा च। अपि संमानसंयुक्ताः ' कुलीना भक्तितत्पराः । 
वृत्तिभङ्गान्‌ महीपालं । त्यजन्त्य्‌ एव हि सेवकाः ॥ ११५॥ 6 


अनु च। कालातिक्रमणं वृत्तेर । यो न कुर्वोत भूपतिः। 

कदाचित्‌ तं न मुञ्चन्ति ' भर्त्सिता अपि सेवकाः ॥ ११६॥ 
यावत्‌ समस्तम्‌ अप्य्‌ एतत्‌ परस्परं भक्षणार्थं सामादि भिर्‌ उपायैस्‌ तिष्ठति । तद्‌ यथा । 9 

देशानाम्‌ उपरि च्मापा ' आतुराणां चिकित्सकाः । । 

वणिजो याहकाणां च मूढानाम्‌ अपि पण्डिताः ॥ ११७॥ 

प्रमादिनां तथा चौरा ' मिन्ुका गृहमेधिनाम्‌ । 12 

भ्गणिकाः कामिनां चैव ' सर्वलोकस्य शिल्पिनः ॥ ११८॥ 

सामाथैः सज्जितैः पाशैः ' प्रती्तन्ते दिवानिशम्‌ । 

उपजी वन्ति शक्या हि ' जलजा जलजान्‌ इव ॥ ११९॥ 15 

तौ च करटकदमनकौ स्वामिप्रसादरहितौ चुत्तामकण्टौ परस्परं मन्त्रयेते । तच 

दमनको ऽब्रवीत्‌ । आर्यं करटक । आवां तावद्‌ अप्रधानतां गतौ । एष पिङ्गलकः संजी- 
वकवचनानुरक्तः स्वव्यापारपराङ्मुखः संजातः । सर्वो ऽपि परिजनः को ऽपि कु्रपि 18 
गतः। तस्मात्‌ किं क्रियति। करटक आह । यद्य अपि त्वदीयवचनं न करोति सखामो। 
तद्‌ अपि स्वदोषनाशाय वाच्य एषः । उक्तं च ' यतः। 


अग्रुणखन्न अपि बोद्धव्यो । मन्त्रिभिः पुथिवीपतिः। 21 
यथा सखदोषनाशाय ' विदुरेणुम्बिकासुतः ॥ १२०॥ 

तथा च। मदोन्मत्तस्य भूपस्य ' कुज रस्य च गच्छतः । 
उन्मागंवाच्यतां यान्ति । महामाचाः समोपगाः ॥ १२१॥ 24 


यत्‌ तु त्वयेष शष्पभोजी स्वामिना सह संयोजितः ' तत्‌ खहस्तेनाङ्गा राः कर्षिताः । दमनक 
आह । सत्यम्‌ एतत्‌ । ममायं दोषः । न स्वामिनः । उक्तं च । यतः । 
जम्बुको ऊ डयुद्धेन ' वयं चाषाढभूतिना । 27 
दूतिका परकार्येण । चयो दोषाः खयंकृताः ॥ १२२॥ 
करटक आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 


०, प्र 1.0 ^) वप्त एत 800 क. 
216 1४ 2: 001६ 21 80167, 


॥ क्या ४॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिट्‌ देशे विविक्तप्रदेशे मठायतनम्‌ । तच परिव्राजको 
देवशमां नाम प्रतिवसति स्म । तस्यानेकयजमानप्रद्तसूष्वस्तर- 
विक्रयवशात्‌ कातेन महती वित्तमाचा संजाता । ततः सन 
कस्यचिट्‌ विश्वसति ' नक्तं दिनं कक्षान्तरात्‌ तां न सुज्वति । 
अथवा साधु चेदम्‌ उच्यते । 

अनाम्‌ अजेने दुःखम्‌ ' अजितानां च रशछणे । 

नाशे दुःखं व्यये दुःखं ' धिग्‌ अथाः कष्टसंश्रयाः ॥१२३॥ 
अथाषाढभूतिनामा परवित्तापहारी धतो ऽथेमाचां तस्य कछषा- 
न्तगेतां लक्षयित्वा व्यचिन्तयत्‌ । कथं मयास्येषा माचा हतेव्या ' 
इति । तट्‌ अचर मठे तावद्‌ दुढशित्ठासंचयवशाट्‌ भित्तिभेदो 
नास्ति । उच्चेस्तरत्वाच्‌ च दारे प्रवेशे नास्ति। तट्‌ एनं वचनेर्‌ 
विश्वास्याहं डाच्तां व्रजामीति ' येन विश्वस्तो मम हस्तगतो 
भवति । उक्तं च , यतः । 

निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्‌ ' नाकामी मण्डनप्रियः । 

नाविदग्धः प्रियं त्रयात्‌ ' स्फुटवक्ता न वञ्चकः ॥ १२४॥ 
एवं विनिश्चित्य तस्यान्तिकम्‌ उपगम्य ' ओं नमः शिवाय ' इति 


23 


ॐ 


12 


15 


ब्रुवाणः साष्टाङ्गं प्रणम्य सप्रश्रयम्‌ उवाच । भगवन्‌ ' असारो 


ऽयं संसारः । गिरिनदीवेगोपमं योवनम्‌ । तृणाग्निसमं जीवित- 
व्यम्‌ । अभच्छायासदृश्ण भोगाः । स्वघ्नसद्‌ शः पुचमिचभृत्यकत्ठच- 
वगेसं बन्धः । एतन्‌ मया ज्ञातं सम्यक्‌ । तत्‌ किं कुर्वतो मे संसा- 
रसमूद्रोत्तरणं भविष्यति । तच्‌ छत्रा देवश्मां सादरम्‌ आह । 


91 


३ 


500 1. (प ८61. पल तचल 07 एए ्08; 24 
¶816 4४ 2: 0107 2010 51110167, 


वत्स ' धन्यो ऽसि त्वम्‌ ' यत्‌ प्रथमे वयस्य्‌ एवं विरक्तिभावः। 
उक्तं च ' यतः । 
प्रथमे वयसि यः शन्तः ' स शन्त इति मे मतिः 9 
धातुषु क्षीयमाणेषु ' शमः कस्य न जायते ॥१२५॥ 
तथा च। 
आदो चित्ते ततः काये ' सतां संजायते जरा । ¢ 
असतां च पुनः काये ' नेव चित्ते कदाचन ॥१२६॥ 
यच्‌ च त्वं संसारसागगोत्तरणायो पायं पृच्छसि ' तच्‌ छूयताम्‌ । 
म्पद्रो वा यदि वान्यो ऽपि ' चारडात्ो वा जटाधरः । 9 
दीक्षितः शिवमन्त्रेण ' स भस्माङ्गो डिजो भवेत्‌ ॥१२७॥ 
षडषरेण मन्त्रेण ' पुष्पम्‌ एकम्‌ अपि स्वयम्‌ । 
लिङ्गस्य मृधि यो दद्यान्‌ ' न स भूयो ऽपि जायते ॥१२४॥ 
तच्‌ छूलाषाढभूतिस्‌ तत्ादो गृहीत्वा सप्रश्रयम्‌ इदम्‌ आह । 
भगवन्‌ ' ब्रतदानेन ' तहि ' मम प्रसादः क्रियताम्‌ ' इति । 
देवशमां प्राह । वत्स ' अनुमहं ते करिष्यामि। परं राचौ मठमध्ये 
न प्रवेष्टव्यम्‌ ' इति । यत्कारणम्‌ ' निःसङ्गता यतीनां प्रशस्यते ' 
तव ममापि च। उक्त च ' यतः। 
टुमेन्वान्‌ नृपतिर्‌ विनश्यति यत्तिः सङ्गात्‌ सुतो लालनाद्‌ 
विप्रो ऽनध्ययनात्‌ कुत्टं कुतनयाच्‌ छीतं खत्मोपासनात्‌ । 
मेची चप्रणयात्‌ समृद्धिर अनयात्‌ सेहः प्रवासाश्रयात्‌ 
स्री मद्याद्‌ अनवेक्षणट्‌ अपि कृषिस्‌ त्यागात्‌ प्रमादाद्‌ 
धनम्‌ ॥१२९॥ श 
तत्‌ त्वया वतमहणाट्‌ ऊध्व मटद्ारे तृणकुटीरके शयितव्यम्‌ ' 
इति । स आह । भगवन्‌ ' आदेशः प्रमाणम्‌ । परत्र हि तेन मे 


०१, रप 1.10 ^ पा) प्त एणा, 2800 7. 25 
पनन ््् 

प्रयोजनम्‌ । अथ तं शयनसमये देवश्मां दीस्ानुयहं दा श्षि- 
ताम्‌ अनयत्‌ । सो ऽपि हस्तपादावमटेनेन पन्िकानयनादिकया 
च परिचयेया तं परं परितोषम्‌ अनयत्‌ । तथापि कक्षान्तरान्‌ » 
मातां न सुञ्वति। 

अथेवं गच्छति कात आषादभूतिश्‌ चिन्तयाम्‌ आस । अहो ' 
कथचिट्‌ अष्‌ एष मे विश्वासं न गच्छति । तत्‌ किं दिवापि? 
शस्त्रेण मारयामि ' किं वा विषं प्रयद्छामि' किं वा पशुधर्मेण 
व्यापादयामि ' इति । 

एवं चिन्तयतस्‌ तस्य टेवशमेशियपुचरः कश्िट्‌ मामाट्‌ 9 
आमन्रणाथे समायातः प्राह च । भगवन्‌ ' पविचारोहणविषये 
मम गृहम्‌ आगम्यताम्‌ ' इति । तच्‌ छूत्वा देवशमूषाढभूतिना 
सह प्रस्थितः। अथेवं तस्य गच्छतो ऽये काचिन्‌ नदी समायाता । 
तां दुष्टा माचां कक्षान्तराद्‌ अवताये कन्थामध्ये गुप्रां निधाय 
देवताचेनानन्तरम्‌ आषाढभूतिम्‌ इदम्‌ आह । आषाढभूते ' यावट्‌ 
अहं पुरीषोत्सग कृत्वा समागच्छामि ' तावद्‌ एषा कन्था यागेश्वरण 
च सावधानेन रषणीयः । इत्य्‌ उक्ता गतः । आषाढभूतिर्‌ अपि 
तस्िन्‌ अदशेनीभूते मा्ाम्‌ आदाय सत्वरं प्रस्थितः । 


देवश्मापि डात्रगुणगणानुरज्ञितमनाः सुविश्वस्त उपविष्टो "5 
यावत्‌ तिष्ठति ' तावद्‌ धुडयूयमध्ये *हुडयुगत्लयुद्धम्‌ अपश्यत्‌ । 
अथ रोषवशदट्‌ धुडयुगलस्या पसरणं कृत्वा भूयो ऽपि समुपेत्य 
त्कलादपदटराभ्यां प्रहरतो भूरि रूधिरं पत्ति । तच्‌ च दष्टूाशाम्र- ५ 
तिबद्वचित्तः पिश्तित्मोत्तुपत्तया गोमायुस्‌ तयोर्‌ अन्तरे स्थिता 
रुधिरम्‌ आस्वाट्यति । देवशमापि तट्‌ आलोक्य व्यचिन्तयत्‌ । 


5001 1. गप ए 87174 पल & 07 दयप प्08; 26 
¶ 216 199: 21115 87 126181. ¶ 216 3४: तणाः 21 8111016, 216 4१ ८: @प्ला०ात क6€2 १९. 
अहो ' मन्दमतिर्‌ अयं जबुकः । यदि कथम्‌ अप्य्‌ अनयोः संषटट 
पतिष्यति ' तन्‌ नूनं मृन्युम्‌ आप्स्यति ' इति वितकेयामि । अथा- 
न्यस्मिन्‌ प्रस्तावे तथेव रक्तास्वादनलौस्यान्‌ नापसृतस्‌ तयोः 9 
शिरःसंपाते पतित्तो मृतश्च । ततो देवशमां प्राह । जग्ुको हड- 
युद्धेन ' इति । देवशम पि तं *शे चमानो माचाम्‌ उदिश्य प्रस्थितः। 


शनेः शनैर यावट्‌ आगच्छति " तावद्‌ आषाढभूतिं न ° 
पश्यति । ततश चौत्सुक्याच्‌ छो चं विधाय यावत्‌ कन्याम्‌ आल्ो- 
कयति ' तावन्‌ माचां न पश्यति । ततश च, हा हा मुषितो 
ऽस्मि ' इति जल्पन्‌ भूतले मृषेया निपपात । ततश्‌ च सणाच्‌ ° 
चेतनां त्छग्ध्वा भूयो ऽपि समुत्याय फूत्कतुम्‌ आरब्धः । भो भो 
आषाढभूते ' क मां वञ्चयित्वा गतो ऽसि । देहि मे प्रतिवचनम्‌ । 
एवं बहुविधं विलय तस्य पदपद्धतिम्‌ अन्वेषयन्‌ ' वयं चाषा- 
ठभूतिना ' इति प्रजस्यञ्‌ शनेः शनेः प्रस्थितः । 


अथ गच्छन्‌ देवशमां सभाये कोल्विकम्‌ एकं मद्यपानकृते 
समीपवतिनि नगरे प्रचितम्‌ अवल्रोक्य प्रोवाच । भो भद्‌ ' 
वयं सूर्योढा अतिथयस्‌ तवान्तिकं प्राघ्राः । अचर मामे कम्‌ अपि 
न जानीमः । तट्‌ गृह्यताम्‌ अतिथिधमेः । उक्तं च ' यतः । 
अप्रणाय्यो ऽतिथिः सायं ' सूर्योढो गृहमेधिनाम्‌ । 18 
पूजया तस्य देवत्वं ' प्रयान्ति गृहमेधिनः ॥१३०॥ 
तथा च । 
तृणानि भूमिर्‌ उदकं ' वाक्‌ चतुर्थी च सूनृता । भ 
सताम्‌ एतानि हर्म्येषु ' नोच्छिद्यन्ते कट्‌ा चन ॥१३१॥ 


0 प्त [तपि ^ प्रा) ¶्प् एषा. 280० क. 2१ 


¶ 216 1*८; @प्जात्‌ स€वण््ाः, 


तथा च। 

स्वागतेनाम्रयः प्रीता ' आसनेन शतक्रतुः । 

पादशौचेन गो विन्दो ' अन्नाद्येन प्रजापतिः ॥१३२॥ 8 
कीलको ऽपि तच्‌ छवा भायाम्‌ आह । प्रिये " गच्छ तवम्‌ एनम्‌ 
अतिथिम्‌ आदाय गृहं प्रति । चरणश चभोजनशयनादिभिः सत्कृत्य 
तनैव तिष्ठ । अहं तव कृते प्रभूतं मद्यमांसम्‌ आनेषामि " इति । १ 
एवम्‌ उक्घा प्रस्थितः । 

सापि भाय पुंश्वत्टी तम्‌ आदाय प्रहसितवदना देवद 

मनसि चिन्तयन्ती गृहं प्रति प्रतस्थे । अथवा साध्व्‌ इटम्‌ उच्यते । 9 

टुदिवसे ऽसितपक्षे ' दुःसंचारासु नगरवीथीषु । 

पत्युर्‌ विदेशगमने ' परमसुखं जघनचपत्छरायाः ॥१३३॥ ग 

पयेडःष्व्‌ आस्तरणं ' पतिम्‌ अनुक्तं मनोहरं शयनम्‌ । 

तृणम्‌ इव तषु मन्यन्ते ' कामिन्यश चो येरत्टुग्धाः ॥१३४॥ =" 
ततथा च । 

कुतपतनं जनगही ' बन्धनम्‌ अपि जीवितव्यसंदेहम्‌ । 13 

अङ्गीकरोति कुल्टा ' सततं परपुरुषसंसक्ता ॥१३५॥ र 
अथ गृहं गत्वा देवशमेणे भम्रदां समर्णृदम्‌ आह । भो भो 
भगवन्‌ ' यावद्‌ अहं स्वससीं मामाट्‌ अभ्यागतां संभाय दुतम्‌ 
आगच्छामि " तावत्‌ त्यास्मत्हे ऽप्रमच्तेन भाव्यम्‌ । एवम्‌ उक्ता 
ङ्गां विधाय यावद्‌ देवदतम्‌ उदिश्य व्रजति ' तावत्‌ तद्भता 
संमुखो मटविद्धलाङ्गो मुक्तकेशः पदे पदे प्रस्वतन्‌ गृहीतमद्य- 
भार्डः समभ्येति । तं च दुष्टा सा दततरं व्याघुट्य स्वगृहं प्रविश्य 
सुक्तुङ्गार यथापूवेम्‌ अभवत्‌ । कोलिकस्‌ तां पत्रायमानां 
कृतृङ्खाराम्‌ अवलोक्य प्राग्‌ एव कणेपरंपरया तस्याः परवाद्‌- 


50०1 7. (02 ए871.^ 678 07 एम ए प्)8 ; 28 
वणात्‌ स्सुभितहदयः कोधवश्तो गृहे प्रविश्य ताम्‌ उवाच । आः 
पापे ' पुंल ' कर प्रस्थितासि । सा प्रोवाच । अहं त्त्सकाशट्‌ 
आगता न कुचचिट्‌ अपि निगेता । तत्‌ कथं मदयपानवश्णट्‌ ४ 
अप्रस्तुतं वदसि । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 

वेकस्यं धरणीपातं ' नित्यानुचितजस्यनम्‌ । 

संनिपातस्य चिह्ानि ' मद्यं सवांणि टश्येत्‌ ॥१३६॥ ° 
तथा च। करसादो ऽश्रत्यागस्‌ ' तेजोहानिः सरागता । 

वारुणीसङ्गजावस्था ' भानुनापण्‌ अनुभूयते ॥ १३७॥ 
सो ऽपि तच्‌ कत्वा प्रतिर्त वचनं वेषविपयेयम्‌ अ वत्रोक्य ताम्‌ ° 
आह । पुंश्चलि ' चिरकालं मे शृखतस्‌ *तवापवादट्‌ः । तट्‌ अद्य 
स्वयं संजातप्रत्ययः । तवापि यथोचितं निमहं करोमि । एवम्‌ 
अभिधाय लठ्रगुडप्रहिस्‌ तां जजेरितदेहां विधाय स्थूणया सह 
दृढबन्धनेन बद्खा मट्विद्धलाङ्गो निद्रावशम्‌ अगमत्‌ । 

एतस्मिन्‌ अन्तरे तस्याः ससी नापिती कोल्तिकं निद्रावशं 

विज्ञायागत्य चेदम्‌ आह । सखि " स देवट्चस्‌ त्तस्मिन्‌ स्थाने " 
प्रतीते । तच्‌ छी गम्यताम्‌ । सा प्राह । पश्य ममावस्थाम्‌ । 
तत्‌ कथं गच्छामि । ब्रूहि गत्वा तं कामिनम्‌ ' यद्‌ अच्रास्मिन्‌ 
अवसरे त्या सह कथं समागमः ' इति । नापिती प्राह । सखि ' "5 
मा मेवं वद्‌ । नायं कुलटाधमेः । उक्तं च ' यततः 

विषमस्यस्वादुफत्कष्हणव्यवसायनिश्चयो येषाम्‌ । 

उष्ट्राणाम्‌ इव तेषां ' तन्‌ मन्ये शंसितं जन्म ॥१३४॥ = 
तथा च। 

संदिग्धे परल्लोके ' जनापवादे च जगति बहुच । 

स्वाधीने पररमणे ' धन्यास्‌ तारुण्यफत्भाजः॥१३९॥ = 


०४, प्ट [ति ^ ण) (प ठा. 800 1. 29 


¶ 216 1४ ९; &पला०1त € 8४९. 


अनु च। 
यद्य्‌ अपि न भवति देवात्‌ ' पुमान्‌ विरूपो ऽपि बन्धुकी रहसि । 
भव्यम्‌ अपि तट्‌ अपि कष्टान्‌ ' निजकान्तं सा भजत्य्‌ एव ॥१४०॥ २ » 
साब्रवीत्‌ । यद्य्‌ एवम्‌ ' तत्‌ कथय ' कथं गच्छामि दृढबन्धनबद्धा 
सती । संनिहितश चायं पापात्मा पतिः । नापिती प्रोवाच । 
सखि ' मटविद्वत्टो ऽयं सूयेकरस्पृषटः प्रबोधं यास्यति । तट्‌ अहम्‌ १ 
आत्मानं तव स्थाने निधाय लां मुञ्चामि । ततस्‌ त्वं देवटन्तं 
संभाव्य दुततरम्‌ आगच्छ ' इति । तथेव *तयानुष्ठिते कोत्किकः 
कस्मिंश्चित्‌ छे किंचिद्रतकोपः समुत्याय मट्वशात्‌ ताम्‌ आह । ° 
हे परुषवादिनि ' यद्य्‌ अद्यप्रभृति गृहान्‌ निष्कमणं न करोषि 
परूषं च न वट्सि ' तत्‌ त्वां मुञ्चामि । ततो नापित्ती स्वरभेद्‌- 
भयान्‌ न किंचिद्‌ उचे। सो ऽपि भूयस्‌ तां तट्‌ एवाह । अथ ४ 
सा प्रत्युत्तरं यावन्‌ न प्रयच्छति ' तावत्‌ स प्रकुपित्तस्‌ तीण 
शस्वम्‌ आदाय तस्या नासिकाम्‌ अच्छिनत्‌ ' आह च । पुंश्चलि ' 
तिषेदानीम्‌ । न वां भूयस्‌ तोषयिष्यामि । इति जस्यन्‌ पुनर्‌ " 
निद्रावशम्‌ उपगतः । देवमा पि वित्तनाश्त्‌ श्युत्कषामकण्ठो 
न्टनिदरस्‌ तत्‌ सवे स्लीचरिबम्‌ अपश्यत्‌ । 

सापि कोलिकभायां यथेच्छं देवदच्तेन सह मुरतसोख्यम्‌ 
अनुभूय कस्मिंश्चित्‌ षणे स्वगृहम्‌ अभ्येत्य तां नापितीम्‌ इटम्‌ 
आह । अयि ' शिवं भवत्याः । नायं पापात्मा मम गताया उत्थित 
आसीत्‌ । नापिती प्राह । शिवं नासिकां विना शेषशरीरस्य । 
तट्‌ दुतं मुञ्च मां बन्धनात्‌ ' यावन्‌ नायं प्रतिबुध्यते ' येन 
स्वगृहं गच्छामि । अन्या भूयो ऽप॒ एष दुष्टतरं कणंच्छेदाटिनिमहं 
करिष्यति । २५ 


5007 1. प ^ परलाप्रल 07 एएप्08; 30 


216 19 6८: &प1०1त स €8र्€ा. 


अथ बन्धुकी नापितीं बन्धनान्‌ मुक्ता यथापूव भूत्वा सासे 

पम्‌ इदम्‌ आह । धिग्‌ धिग्‌ महाम्‌ढ ' को मां महासतीं पति- 
व्रतां धषेयितुं व्यङ्गयितुं वा समथेः। ततः शृखन्तु लोकपालाः। ° 

आदित्यचन्द्राव्‌ अनिलो ऽनल्श च 

द्योर्‌ भूमिर आपो हृदयं यमश्‌ च । 

अहश च राश च उभे च संथ्ये 6 

धमों विजानाति नरस्य वृत्चम्‌ ॥१४१॥ पा 
तट्‌ यदि मम सतीत्वम्‌ अस्ति ' तट्‌ एते देवा भूयो ऽपि ताद्‌- 
यूपं नासिकां कुवेन्तु । अथवा मनसापि यदि. परपुरुषो ऽभित्- ° 
षितः ' तन्‌ मां भस्मसान्‌ नयन्तु ' इति । एवम्‌ उक्ता भूयो 
ऽपि तम्‌ आह । भो दुरात्मन्‌ ' पश्य । मे सतीत्वप्रभावेण तादृग्‌ 
एव नासिका संजाता । अयोल्मुकम्‌ आदाय यावत्‌ पश्यति ! ५ 
तावत्‌ तादृग्‌ एव नासिका रक्तप्रवाहणश्‌ च भूतत्े महान्‌ दृष्टः । 
तततः स विस्मयमनास्‌ ताम्‌ उन्मुच्य बन्धनाच्‌ चाटुशतैः परितो- 
षितवान्‌ । 15 
देवशमोपि तत्‌ सवेम्‌ अवलोक्य विस्मितमना इदम्‌ आह । 

उश्ना वेट्‌ यच्‌ छास्त्रं ' यच्‌ च वेद्‌ वृहस्पतिः । 

स्तीवुद्धा न विशेत ' तस्माद्‌ रघ्याः कथं हि ताः ॥१४२॥ 

अनृतं साहसं माया ' मूखेत्वम्‌ अतित्ोभता । 

अशेचं निदेयत्वं च ' स्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥१४३॥ 

नातिप्रसङ्कः प्रमदासु कायों ५ 

नेच्छेद्‌ बत्टं स्त्रीषु विवधेमानम्‌ । 

अतिप्रसक्तैः पुरूषेर यतस्‌ ताः 

जीडन्ति काकेर इव त्टून पक्षैः ॥ १४४॥ ०५ २५ 


०४, (प्र [0 ^ प्रा) (प्र एषा. 80० क. 31 


¶ 216 1१ €: ९०1 €> ण्€ा, 


सधु तिष्ठति वाचि योषितां 
हदये हात्हल्ं महट्‌ विषम्‌ । 


अत एव निपीयते ऽधरो ४ 
हृदयं मुष्टिभिर एव ताड्यते ॥१४५॥ "० 

आवतैः संशयानाम्‌ अविनयभवनं पत्तनं साहसानां 

दोषाणां संनिधानं कपटश्तगृहं सेचम्‌ अप्रत्ययानाम्‌ । ५ 


टुमाद्यं यन्‌ महद्खिर्‌ नरवर वृषभेः सवेमायाकरणड 
स्त्रीयन्त्रं केन त्रो विषम्‌ अमृतयुतं धमेनाश्णय सृष्टम्‌ ॥१४६॥ ० 
काकेश्यं स्तनयोर्‌ दृशोस्‌ तरल्तालीकं सुखे छाध्यते 9 
कौटिस्यं कचसंचये च वचने मान्द्यं चिके स्थृत्ता । 
भीरूतं हदये संटेव कथितं मायाप्रयोगः प्रिये 
यासां दोषगणो गुणो मृगदृशां ताः स्युः पशूनां प्रियाः॥१४७॥ ० 
एता हसन्ति च रुटन्ति च कायेहेतोर्‌ 
विश्वासयन्ति च परं न च विश्वसन्ति । 
तस्मान्‌ नरेण कुलशीलसमन्वितेन 18 
नायेः श्मशानघटिका इव वजेनीयाः ॥ १४४॥ १०८९ 
व्याकीणेकेसरकरात्मुखा मृगेन्द्रा 
नागाश च भूरिमदराजिविराजमानाः । 18 
मेधाविनश्‌ च पुरुषाः समरेषु भूराः 
स्तरीसंनिधो परमकापुरूषा भवन्ति ॥१४९॥ १००५ 
तया च । 21 
अन्तर विषमया ह्य्‌ एता ' बहिश्‌ चेव मनोरमाः । 
गुज्ञाफतसमाकारा ' योषितः केन निभिंताः ॥१५०॥ 
एवं तस्य परिव्राजकस्य चिन्तयतो निश महता कृच्छूणएातिच- 


500४ 1. (प्र 2 8114 मअल 07 एए क्8 ; 32 


¶ 216 17 ८; €प्ागात सल्दण्लाः. 


काम । सा च टृतिका किननासिका स्वगृहं गत्वा चिन्तयाम्‌ 
आस । किम्‌ इदानीं कतेव्यम्‌ । कथम्‌ एतन्‌ महच्‌ दिद्रम्‌ 
आवरणीयम्‌ । २ 
अथेवं चिन्तयन्यास्‌ तस्या भत राजकु कायेवश्त्‌ पयु- 
षित्त: । प्रत्यूषे च गृहम्‌ अभ्येत्य यारि स्थितो ऽपि विविधपोरकृ- 
त्योत्सुकतया ताम्‌ आह । भद्रे ' शीघ्रम्‌ आनी यतां ्षुरभारडम्‌ ' ५ 
येन पौरकमेकरणाय गच्छामि । सापि च्छिन्ननासिका प्रव्युत्पन्न- 
मतिर्‌ गृहाभ्यन्तरस्थितेव तदभिमुखं क्षुरम्‌ एकं प्रेषयाम्‌ आस । 
नापितो ऽपि समस्तकषुरभारडास्मपेणात्‌ कोधाविष्टस्‌ तस्याः ° 
संमुखम्‌ एव छुरं प्रदिघ्रवान्‌ । अथास्मिन्‌ व्यतिकरे सा दुर्ध 
बाहू विधाय *पूत्कतुमना गृहान्‌ निश्चक्राम । अहो ' पापेनानेन 
मम सदाचारवतिन्याः ' पश्यत ' नासिकाङ्धेदो विहितः । तत्‌ 
परिचायध्वम्‌ । 
एतस्मिन्‌ अन्तरे राजपुरुषाः समभ्येत्य तं नापितं दृढग्रहरिर्‌ 

जजेरीकृत्य दृढबन्धनेन वद्धा तया छितरनासिकया सह धमीधिकं- "° 
रणस्थानं नीतवन्तः । ततः स पृष्टश्ू चाधिकरणिकेः । किम्‌ इदं 
वैशसं स्वदारेषु कृतम्‌ । अथासौ विस्मयमूढमतिर्‌ यदा नोत्तरं 
प्रयच्छति ' तदा ते सभासदः शस्त्रानुगतम्‌ ऊचुः । 18 

भिन्नस्वरसुखवणेः । शङ्कितदृष्टिः समुत्पतिततेजाः । 

भवति हि पापं कृत्वा ' स्वकमेसं चासितः पुरुषः ॥१५१॥ ° 
तथा च। आयाति स्वत्वितेः पादेर्‌ ' मुखवेवण्येसंयुतः । न 

ललारस्वेद्भाग्‌ भूरिगद्गदं भाषते वचः ॥ १५२॥ 

#्कम्पमानम्‌ अघो ऽवेक्षी ' पापं प्राघ्नः सदा नरः । 

तस्माट्‌ यत्नात्‌ परि ज्ञेय ' चिर एतैर वि चश्षणेः ॥१५३॥ ५ 


0, ¶प्र 10 ^ प्ण) (प्त एता, 2500 1. 33 


¶816 19 €: &प्लगत स€दण्€ा. ए01क716-8101. 


अनु च। 
प्रसन्नवदनो हृष्टः ' स्यष्टो वाचा सरोषदर्‌ । 
सभायां वक्ति सामषेः ' सावष्टम्भो नरः शुचिः ॥१५४॥ ४ 


तद्‌ रष दु्टचारि्ो दृश्यते । स््रीधषेणाट्‌ वध्य इति भूल्ायाम्‌ 
आरोणताम्‌ " इति । 
अथ तं वध्यस्थानं नीयमानम्‌ आलोक्य देवशमौ तान्‌ १ 
धमांधिकृतान्‌ गत्वा प्रोवाच । भोः ' अन्या्येनेष वराको नापितो 
वध्यते साधुसमाचारः । तच्‌ छूयतां मम वाक्यम्‌ । 
जखुको हडयुद्धेन ' वयं चाषाढभूतिना । 9 
दूतिका पर कार्येण ' चयो दोषाः स्वयंकृताः ॥१५५॥ 
अथ ते सभ्यास्‌ तम्‌ ऊचुः । भो भगवन्‌ ' कथम्‌ एतत्‌ । ततश 
च देवशमौ तेषां *वृक्लान्तचयम्‌ अपि सविस्तरं न्यवेदयत्‌ । अथ 
तच्‌ छत्वा ते सवे विस्मितमनसो नापितं विमु्येवं प्रोचुः । 
अवध्यो ब्राह्मणो बात्रः ' स्त्री तपस्वी *च रोगभाक्‌ । 
विहिता व्यङ्धिता तेषाम्‌ ' अपराघे गरीयसि ॥ १५६॥ 15 
तद्‌ अस्याः स्वकमेवशट्‌ एव नासिकाङेदः संवृत्तः । ततो राज- 
नियहः कणेच्धेट्‌ः कायेः । तथानुष्ठिते देवशमौपि दृष्टान्तहयेन 
स्वहृदय संस्याण स्वकीयमटायतनम्‌ अगमत्‌ ॥ 18 
अतो ऽहं त्रवीमि। जम्बुको जडयुद्धेन । इत्यादि । करटक आह । अधवंविधे व्यतिकरे किं 
कतेव्यम्‌ आवयोः । दमनको ऽत्रवीत्‌ । एवंविधे ऽपि समये मम बुद्धिस्फुरणं भविष्यति । 
येन संजीवकं प्रभोर्‌ विश्चैषयिष्यामि । अपरं च । अस्मत्खामी महति व्यसने वर्त॑ते 21 
पिङ्गलकः । यतः । 
व्यसनं हि महाराज्ञो ' मोहात्‌ संप्रतिपद्यते । 
विधिना शास्त्रदृष्टेन । भृवयेर्‌ वायः प्रयत्नतः ॥ १५७॥ 24 


करटक आह । कस्मिन्‌ व्यसने वतेते स्वामी पिङ्गलकः । दमनक आह । इह हि सप्त 


व्यसनानि भवन्ति । तथा हि । 
॥ 


500 1. गत्र ए671^ प्रलाप 07 एप एप्न08 ; 34 


ए78716-5107 ४ : 11010 20 एषणा. 


स्रियो ऽक्षा मृगया पानं ' वाक्पारुष्यं च पञ्चमम्‌ । 
महच्‌ च दण्डपारुष्यम्‌ ' अथंदूषणम्‌ एव च ॥ १५८॥ 
एकम्‌ एवेदं व्यसनं प्रसङ्गाख्यं सप्ताङ्गम्‌ । इति । करटकः पृच्छति । किम्‌ एकम्‌ एवैदं 8 
व्यसनम्‌ ' आहो +*खिद्‌ अन्यान्य अपि भवन्ति । 
दमनकः कथयति । नन्व्‌ इह पञ्च मूलव्यसनानि । करटक आह । कस्‌ तेषां विशेषः । 
सो ऽब्रवीत्‌। अभावः प्रदोषः प्रसङ्कः पीडनं गृणप्रतिलोमकं चति । तच प्रथमं तावत्‌ 6 
स्ाम्यमात्यजनपददु्गकोशदण्डमिचाणाम्‌ एकतमस्य अभावे ऽभावाख्यम्‌ अवगन्तव्यम्‌ । 
यदा तु बाह्यप्रकृतयो ऽन्तःप्रकृतयो वा प्रत्येकशो युगपद्‌ वा प्रकृष्यन्ति ' तद्‌ व्यसनं 
प्रदोष इति । प्रसङ्गः पूर्वम्‌ उक्त एव । स्त्रियो ऽ्ञा मृगया पानम्‌ । इत्यादि । तच ' स्रियो 9 
ऽत्ञा मृगया पानम्‌ ' इति कामजो वैः । वाक्पारष्यादिः कोपजो वगैः । तत्र कामजैर्‌ 
व्यवहितः कोपजेषु प्रवतेते । सुबोध एव कामजो वर्गैः । कोपजस्‌ तु चिविधो ऽपि 
विशेषवचनेन च्यते । परामिद्रोहबुच्ैर असमीकितम्‌ असदोषश्रावणं वाक्पारुष्यम्‌ । 1४ 
निदयो *वधबन्धच्छेद विधिर्‌ अनुचितो दण्डपारुष्यम्‌ । निरनुक्रोश्तो वित्तलोभो 
ऽथंपारुष्यम्‌ । एवं सप्तधा प्रसङ्गव्यसनं भवति । पीडनं पुनर्‌ अष्टधा दै वाग्नयुंदक॑व्या- 
धिमरकविद्र्‌ वदुर्भित्तासुरीवृष्टिमिर्‌ भवति । अतिवृष्टिर्‌ एवाुसुरीवृष्टिर्‌ उच्यते। तट्‌ एतद्‌ 15 
व्यसनं पीडनं नाम मन्तव्यम्‌ । अथ गुणप्रतिलोमकम्‌ उच्यते ' यद्‌ संधिवियरहयानौ- 
सनसं्यंदेघीभावानां षलां गुणानां प्रातिलोम्येन वर्त॑ते ' संघौ प्रापे विग्रहम्‌ । वियहे 
च संधिं करोति ' एवं शेषेष्व्‌ अपि गुणेषु प्रातिलोम्येन यदा वर्तते ' तद्‌ व्यसनं प्रतिलो- 18 
मकम्‌ इति। 
तद्‌ अयम्‌ अस्त्खामी पिङ्गलको मुख्यतमे ऽ भावव्यसने वतेते \ यतः संजी वंकेन 
वशीकृतः सन्न अमात्यादिषु षटसु गुणेषु चैकतमस्यापि चिन्तां न करोति । शष्यभोजि- 
ध्मकमेस्व एव प्रायेण वर्तेते । तत्‌ किं वज्ञना प्रलपितेन ' सर्वथा पिङ्गलकः संजीवकाद्‌ 
वियोज्य एव । इति । यतः प्रदीपाभावात्‌ प्रकाशाभावः। 
करटक आह \ असमर्थो भवान्‌ । तत्‌ कथं वियोजयिष्यति । सो ऽत्रवीत्‌ । भद्र । २५ 
युक्तम्‌ इदम्‌ । 
उपायेन हि तत्‌ कुयांड्‌ ' यन्‌ न शक्यं पराक्रमेः । 
काक्या कनकसूत्रेण । कृष्णसर्पो निपातितः ॥ १५९॥ शा 
करटकं आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽत्रवीत्‌ । 


०४, प्रप्त [ततरि ^ प्रा) ब्त ए, 500 1. 35 


¶21& णः @©70ङ 200 567 €६, 


॥ क्या ५॥ 


अस्ति कस्मिंश्चित्‌ प्रदेशे महान्‌ न्यौ धपादटपः । तच वायसंदेपती 
कृतां रयो प्रतिवसतः । तर्दपत्यानि च जातानि तदवि वरांनु- 
सारी कृष्ण॑सपों ऽ संजात॑क्रियाणय्‌ एव भ्यति । अयासो वायसो 
ऽपि तेनापकार+निर्वेदेनापि चिरपरिचितं न्ययौध॑तरः परित्यज्य 
वृष्छान्तरं गन्तुं न शक्रोति । कुतः । ९ 
चयः स्थानं न मुञ्चन्ति ' काकाः कापुरुषा मृगाः । 
अपमाने चयो यान्ति ' सिंहाः सत्पुरुषा गजाः ॥ १६०॥ 
अथान्यदा सा काकी भतुः पादयोर्‌ निपत्यात्रवीत्‌ । स्वामिन्‌ ' ° 
बहून्य्‌ अपत्यानि ममानेन दुष्टसर्पेण भषितानि । तद्‌ इदानीम्‌ 
अपत्यदुःखन पीडिता जानाम्य्‌ एव ' क्रापि गच्छामि । तट्‌ 
अन्यवृक्षान्तरम्‌ आश्रयावः । कुतः । 19 
नास्त्य्‌ आरोग्य॑समं मिचं ' नास्ति व्याधिसमो रिपुः । 
न चापत्यसमः लेहो ' न च दुःखं छुधांसमम्‌ ॥१६१॥ 
अन्यच्‌ च । 15 
यस्य सच नदीतीरे ' भाया च पर॑संगता । 
गृहे सपौश्यस्‌ तस्य ' कथं स्याच्‌ चित्तनिवतिः ॥१६२॥ 
तट्‌ आवां प्राणसंशये वतां वहे । अय काको भृशं *+दुःखंपरीतांङ्खो "® 
ऽवदत्‌ । भद्रे  चिरोंषिता वयम्‌ अस्मिन्‌ वृक्ते । तन्‌ न शक्रुमः 
परित्यक्तम्‌ । यतः । 
क्र गतो मृगो न जीवति ' पाथश्चुलुकेन घासंसुच्या वा । 
मुञ्चति चिरो षित्तत्वाज्‌ ' जन्म॑वनं नापमाने ऽपि ॥१६३॥ > 
किं पुनर्‌ अस्य दुरात्मनो महाश्बोर्‌ उपयिन वधं करिष्यामि । 


50०1 1. (1 ए ए8717^ 6 पल 07 एप पप्08; 86 

¶,416 %: © 8 20त्‌ 5676६. ¶216 एं : प्लत, 881168, 270 6729. 
काक्याभिहितम्‌ । महाविषो ऽयं सपे: । तत्‌ कथम्‌ अस्यापकरि- 
ष्यसि । सो ऽब्रवीत्‌ । भद्र ' यद्य्‌ अण्‌ अहम्‌ असमर्थो ऽ स्यापका- 
र॑करणे ' तथापि मम सुहृदो विद्वांसो नीतिशस्वकुशत्छा विद्यन्ते । 9 
तेषां सकाशं गत्व पायम्‌ उपलभ्य तथा करिथे ' यथाचिराट्‌ 
एव दुष्टबुद्धिर असो विनश्यति । इति सांमषेम्‌ अभिधाय ततो 
वृक्षान्तरं गतः । तर्दधो निवासिनं प्रियसुहृदं गोमायुं सविनयम्‌ ९ 
आहय सवे तट्‌ आत्म॑दुः खं न्यवेदयत्‌ ' उक्तवांश्‌ च । भद " किम्‌ 
एवं सति प्राप्रकालं मन्यसे । अपत्यघाताट्‌ आवयोर्‌ दंपत्योर 
विघात एव । भृगाल आह । भद्र ' परिभावितं मया । अच ° 
नासुखं त्वया कायेम्‌ । आसन्नमृत्युर दुरात्मा नृशुसत्वात्‌ स खल्तु 
कृष्णं सपः । यतः । 

अपकारिषु मा पापं ' चिन्तय लवं कदचन । . 

स्वयम्‌ एव पतिष्यन्ति ' कूत्ठजाता इव दुमाः ॥ १६४॥ 
श्रूयते च । 

भ्एयित्वा बहून्‌ मत्स्यान्‌ ' उ्नमांधम॑मध्यमान्‌ । 16 

अतिंलोस्याट्‌ बकः कश्चिन्‌ ' मृतः ककटकथहात्‌ ॥ १६५॥ 
वायसः पृच्छति । क्यम्‌ एतत्‌ । णुगात्ठः कथयति । 


॥ क्या ६ ॥ 18 


अल्ति कस्मिंध्ित्‌ सरस्तीरेकदेशे वकः । स वृद्धभावात्‌ सुखोपायं 
मत्स्यभसणवृत्तिम्‌ आकाङ्कस्‌ तस्यैव *सरसस्‌ तीरे ऽधुतिंपरीतम्‌ 
आत्मानं दशेयन्‌ समीपतरान्‌ अपि मलस्यान्‌ अभश्यन्‌ अ वस्थितः। " 
तत्र च मत्स्यानां मध्य एकः कुत्दीरकः प्रतिवसति । स आसन्नो 
भूत्वा्रवीत्‌ । माम ' किम्‌ अद्याहारविहार॑क्रिया न क्रियते ' यथा 


0४, वप्त तकि ^ का) वप्त एता, 800 1. 37 
प्रथमम्‌ ' इति । सो ऽब्रवीत्‌ । यावद्‌ अहं मल्सादनेन पुष्टः 
सुहितणश च ' इयान्‌ कात्टो मया युष्मान्‌ आस्वादयत्ता सुखेन 
नीतः । अतः परं युष्माकम्‌ अत्याहितम्‌ एष्यति ' इति कारणान्‌ २ 
मम वृद्धभावे सुखजी वनवृत्तेर अस्या छेदो भविष्यति । इत्य्‌ अहं 
विमनाः । सो ऽज वीत्‌ । माम ' कीदृशम्‌ *अत्याहितं तत्‌ ' इति । 
बकं आह । अद्य मया बहूनां मत्यं बन्धानां सरःसमीपेनातिक्रमतां ° 
व्याहारः श्चुतः ' यथा । बहुमत्यम्‌ इदं महासरः । तच श्वः परश्वो 
वा जाले प्रक्षिप्यते । अद्य पुनर्‌ नगरसमीपे "यो हृदः ' तस्मिन्‌ 
एव गच्छामः । एवम्‌ अवस्थिते युष्मासु विनष्टेषु वृत्तिच्छेदाट्‌ 
अहम्‌ अपि विनष्ट एवेति शेकेनाद्याहारनिवृत्तो ऽस्मि । तच्‌ 
च दुषटभाषितं श्रुत्वा सर्वस्‌ तेर जल्द चरः प्राण॑भीतिर विक्ञघ्नो 
बकः , यथा । माम ' तात ' भातः ' सखे ' परिणत॑वुद्धे ' यत " 
एवापायः श्रूयते ' तत रएवोपायो ऽपि लभ्यते । तट्‌ अहस्य 
अस्मान्‌ अस्मान्‌ मृत्युमुखात्‌ चातुम्‌ । बक आह । अण्डजो ऽहम्‌ 
असमर्थो मानुषेः सह विरोधं कतुम्‌ । किं पुनर मम शक्तिर्‌ 
अस्त्य्‌ अस्माज्‌ जत्ाशयाट्‌ अन्यम्‌ अगाधं जलाशयं संक्म- 
यितुम्‌ । ततस्‌ तेः कृतक्वचनव्यामो हितं चित्तैर अभिहितः। माम ' 
सखे ' निष्कारणवन्धो ' माम्‌ ' मां प्रथमतरं नय " इति । किम्‌ 
इह न श्रुतं भवता । 

स्थिरहृदयनिहितरागाः ' सुजनतया संस्मरन्त इह सुकृतम्‌ । 

स्वं जीवितम्‌ अपि सन्तो ' न गतं गणयन्ति मिचारथे ॥ १६६॥ = ?' 
अथासौ "दुष्टमतिर्‌ अन्तत्गीनम्‌ अवहस्य स्वचित्तेन सह सम- 
धितवान्‌ एवम्‌ ' यद्‌ एते मया मत्या बुद्धिपू वेकं व्याः कृताः 
सुखेनेव भक्षणीयाः । इति विचिनय मत्यंगणंविज्प्रं प्रतिज्ञाय ५ 


58001 7. (71 81718.^ पल्वल 07 एय प्र0)8; 38 
¶ 216 पयं: प्ला०, 95068, 8.76 629. 


चञ्चा समुङत्यान्यच प्रदेशे श्त्व।तलस्येकदेशें परि नीत्वाभ्छयत्‌ ' 
प्रत्यहं परमंहषेसोहित्यं च गच्छति । समेत्य च तान्‌ भूयो ऽपि 
मिथ्यासंदेशेर विश्वासयति । एकदा कुत्करीरको मृत्युभयेनोदिग्रमना » 
मुहर मुहुस्‌ तम्‌ अभ्यथितवान्‌। माम ' माम्‌ अपि मृत्युमुखात्‌ 
चातुम्‌ अहेसि । ततो बकश चिन्तयाम्‌ आस । निविंखो ऽस्य्‌ 
अनेन्‌केन मत्स्यपिश्तिन। एतदीयपिश्ित्तिविशेषम्‌ अपूर्वम्‌ आस्वा- ९ 
द्यामि । इति विचिन्त्य कुत्दरीरम्‌ उत्क्षिप्य वियति गतः । सवौणय्‌ 
अम्भःस्थानानि परिहृत्य यावत्‌ तस्यां तप्रश्त्िायाम्‌ अवतार 
यितुकामः ' तावत्‌ कुत्दरीरेण पृष्टः। माम ' क्र तत्‌ सरो ऽगाधम्‌। » 
ततस्‌ तेन विहस्योक्तम्‌। पश्येमां विस्तीणौ तप्रशित्छाम्‌ । अस्यां 
सर्वे जल्ट'चराः स्वस्थाः संजाताः । तत्‌ त्वम्‌ अपि सांप्रतं स्वस्थो 
भव । ततः कुल्टीरेणुधो ऽवत्रोकयता यावद्‌ दुष्टा मल्सयांस्थिंक्‌- 
टकराल्ा महती वध्यशित्ा ' अयाचिन्तयत्‌ । अहो । 

शचुरूपाणि मिचाणि ' मिच॑रूपाश च शचवः । | 

जायन्ते कायंसिद्यये ' केचिद्द्‌ लोके विचसणाः ॥१६७॥ 
तथा । वरं विहारः सह पन्नगैः कृतः 

श्णटठात्मभिर्‌ वा रिपुभिः सहोषिततम्‌ । 

अधमैयुक्तेशए चपतेर अपरिडतेर 15 

न पाप॑मिनरैः सह वतितुं समम्‌ ॥१६४॥ ध 
तट्‌ भक्िता अनेन पूवै ख्व्‌ एते मत्स्याः ' येषाम्‌ इमे परितो 
ऽस्थिक्टाः । तत्‌ किं प्रात्नकात्टं मयाधुना कतेव्यम्‌ । अथवा किम्‌ “ 
अचर चिन्त्यते । 

गुरोर्‌ अप्य्‌ अवलिप्तस्य " कायो कायेम्‌ अजानतः । 

उत्पथप्रतिपन्नस्य ' टरो भवति शसनम्‌ ॥१६९॥ २५ 


०, प 10 ^ पा 1४ एता 20न 1. 39 


¶ 816 91: €00, 7851168, 226 €78#. ¶ 8216 भ: ©70 कऽ 871 36176०४, 


तथा । तावद्‌ भयस्य भेतव्यं ' यावट्‌ भयम्‌ अनागतम्‌ । 
आगतं तु भयं दृष्टा ' प्रहतेव्यम्‌ अ शङ्धितेः ॥१७०॥ 

अतो यावद्‌ एष माम्‌ अचर न सिपति ' तावद्‌ एव चतुभिर्‌ 9 
अपि विषाणमिर्‌ मीवायां गृहामि । अथ तथापि कृते गन्तुम्‌ 
आर्पो बकः । तथापि मोख्यात्‌ कुत्गीरसंदंश्पह णप्र्तिविधानम्‌ 
अजानजञ्‌ *शिरण्डेटम्‌ अ वाघ्रवान्‌ । 6 

कुल्दरीरो ऽपि मृणाल सदृशीं बकी वां गृहीत्वा शनेः शनेर 
मलस्यान्तिकम्‌ एव तचरैव सरस्य्‌ आगतः । तेण चाभिहितः। भातः ' 
कस्मात्‌ समागतः ' इति । अयासो तच्छिरश्चिहं टशेयन्‌ आह । 9 
सवतो ऽये नीतजलचरास्‌ तेन मि््यावादेन वज्छयित्वा नातिट्रे 
शित्छरातितरे प्रकषण भक्षिताः । तन्‌ मयायुःरेषतया ' विश्वस्तधा- 
तको ऽयम्‌ ' इति ज्ञात्वा तस्य मीवा समानीता । तट्‌ अलं 
संभ्रमेण । सवेजल चराणां सेमं भविष्यति " इति ॥ 

अतो ऽहं बरवीमि । भक्षयित्वा बहून्‌ मत्स्यान्‌ ' इति । 
वायसः प्राह । भद्‌ ' कथय ' कथं स दुटसपों वधम्‌ एष्यति ! 
इति । भ्ुगाल आह । गच्छतु भवान्‌ किंचित्‌ स्थानं मरहेश्वराधि- 
शितम्‌ । तस्मात्‌ कस्यापि धनिनः कनकसूचं हारं वा प्रमादिनो 
गृहीत्वा तच प्रिपतु ' यथा सपेस्‌ तद्रूहणेन वध्यते । 16 

अथ काकः काकी च तत्सणाट्‌ आत्मे च्छयोत्पततितो। ततश च 
काकी किंचित्‌ सरः प्राप्य यावत्‌ पश्यति ' तन्मध्ये कस्य॑चिट्‌ राज्ञो 
ऽन्तःपुरं जलासन्नन्यस्तकनकपू चसुक्ताहारवस्तरीभरणं जल्नकीडां 
करोति । अथ सा वायसी कनकसूचम्‌ एकम्‌ आदाय स्व॑वृक्षाभि- 
सुखी प्रतस्थे । ततश च कञ्चुकिनो वषेधराश च तं नीयमानम्‌ 
अवलोक्य गृहीतलगुडाः सत्वरम्‌ अनुययुः । काक्य्‌ अपि स्पे- २, 


5001 7. पप्र 2897^ प्रलाप © 07 एद्य पप्)8 ; 40 


¶ 816 9: @"0णऽ 2700 लाए €६, ए1व116-8107, ९16 ग: 1101 216 0876. 


कोटरे तत्‌ कनकपूचं निप सुटूरतरम्‌ अवस्थिता । अथ राजपु 

रुषा यावत्‌ तं वृकम्‌ आरोहन्ति ' तावत्‌ कोटरगतः कृष्णसपः 

प्रसारितभोग आस्ते । अथ तं लगुडप्रहरिर हत्वा कनकूचम्‌ » 
आदाय यथाभिलषितं स्यानं गताः । वायसंदंपती च ततः परं 

सुखेन वसतः ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि । उपायेन हि तत्‌ कुर्यात्‌ । इति । तथा च । | 6 
उपेक्षितः चीणएबलो ऽपि शचुः 
प्रमाददोषात्‌ पुरूषेर मदान्धैः। 
साध्यो ऽपि भूत्वा प्रथमं ततो ऽसाव्‌ 9 
असाध्यतां व्याधिर्‌ इव प्रयाति ॥ १७१॥ ण्‌ 
तन्‌ न किंचिद्‌ इह बुद्धिमताम्‌ असाध्यम्‌ असि । इति । उक्तं च । यतः । 
यस्य बुद्धिर बलं तस्य ' निबुद्धेस्‌ तु कुतो बलम्‌ । 12 
वने सिंहो मदोन्मत्तः ' शशकेन निपातितः ॥ १७२॥ 
करटकं आह । कथम्‌ एतत्‌ । दमनकः कथयति । 


॥ कया ७॥ 15 


अस्ति कस्मिश्चिट्‌ वनोहेशे मदोन्मतो मन्दमतिनामा सिंहः । स 
चाजसखम्‌ एव *मृगोत्साटनं कुरूते । मृगस्य दृष्टस्य न सहते । 
अथ तनजा: सवे सारद्कवराहमहिषंग वय॑ शशकाट्यो मित्तलला 8 
दीनानना महीतलावसक्रजानवः प्रणतशिरसः सविनयास्‌ तं 
मृगपति विज्ञपयितुम्‌ आरख्धाः। अलम्‌ ' देव ' परलोकविरूदेना- 
तिनृशसेन *निष्कारणसवेसचोत्सादनकमेणा कृतेन । श्रूयते च । 
एकस्य जन्मनो ऽर्थे ' मूढाः कुवन्ति यानि पापानि। 
जनयन्ति तानि टुःखं ' तेषां जन्मान्तरसहखम्‌ ॥१७३॥ 
तथा। अपवादो भवेट्‌ येन ' येन विप्रत्ययो भवेत्‌ । ५ 
नरके गम्यते येन ' तद्‌ बुधः कथम्‌ आचरेत्‌ ॥१७४॥ 


०४, (प्र [तकि ^ प्रा प्त एता, 500४ 1. 41 


¶216 11: 11070 21 876. 


पुनश्‌ च । 
सवांशुचिनिधानस्य ' कृत्नस्य विनाशिनः । 
शरीरकस्यापि कृते ' मूढाः पापानि कुवते ॥१७५॥ $ 


तट्‌ एतज्‌ ज्ञात्वा *मास्मत्कु लोत्साटनं कतुम्‌ अहेसि । यत्कारणम्‌ ' 
वयम्‌ एव स्वामिन एकेकं वनचरं वारकेण स्थानस्थितस्य वाहा- 
राथ प्रत्यहं प्रेषयिष्यामः । एवं सति देवकी यवृत्तेर अ स्मज्जातेश ® 
च विच्छेदो न भवति । तट्‌ एष राजधमों ऽनुष्ठीयताम्‌ । उक्तं च। 
शनैः शनेश च यो राषटटम्‌ ' उपभु यथावलतरम्‌ । 
रसायनम्‌ इव मापः ' स पुष्टं परमां व्रजेत्‌ ॥ १७६॥ 
अजा इव प्रजा मोहाट्‌ ' यो हन्यात्‌ पृथिवीपतिः । 
तस्थेका जायते तृच्निर्‌ ' न हडितीया कथंचन ॥१७७॥ 
फलार्थी नृपतिर्‌ त्मोकान्‌ ' पालयेद्‌ यत्नम्‌ आस्थितः । 
दानमानादितोयेन ' मालाकारो ऽङ्‌गरान्‌ इव ॥१७४॥ 
यथा गोर्‌ दुह्यते काते ' पास्यते च तथा प्रजाः । 
सिच्यते चीयते चेव ' तता पुष्पफल्छप्रदा ॥१७९॥ ५6 
नृपदीपो धनलरेहं ' प्रजाभ्यः संगृहन्र अपि । 
अन्तरस्थेर्‌ गुणेः शुभेर्‌ ' त्यते नैव केनचित्‌ ॥१४०॥ 
यथा बीजाङ्कुरः सूष्मः ' प्रयत्नेनाभिरक्ितः । 18 
फत्टप्रदो भवेत्‌ काले ' तदत्‌ तोकः सुरक्षितः ॥१४१॥ 
हिरण्यं धान्यरल्नानि ' पानानि विविधानि च। 
तथान्यद्‌ अपि यत्‌ किंचित्‌ ' प्रजाभ्यः स्यान्‌ महीपतेः ॥१४२॥ 
लोकानुपहकतीरः ' प्रवन्त महेश्वराः । 
लोकानां संक्षयाच्‌ चव ' सयं यान्ति न संशयः ॥ १४३॥ 
अथय तद्वचः समाकणये मन्दमतिर्‌ आह । अहो ' सत्यम्‌ अभिहितं 
७ 


# ५ 


5001 1. (10 28174 पाल 07 एप एप्)8; 42 


¶ 216 अ: 1107 296 276, 


भवद्भिः । परं यदि ममाचोपविष्टस्य नैकेको मृगः समेष्यति ' तन्‌ 
नूनं सवान्‌ अपि भष्टयिषयामि ' इति । अथ ' तथा ' इति 
प्रतिज्ञाय *निवृतिभाजस्‌ तत्र वने निभेयास्‌ ते पयेटन्ति ' एकश ४ 
च जातिक्रमेण वृद्धो वा वेराग्ययुक्तो वा शोकयस्तो वा पुचकल- 
चनारभीतो वा तस्याहाराथे मध्याहसमये प्रतिदिनम्‌ उपतिष्ठते ' 
इति । ¢ 
अथ कदाचिज्‌ जातिक्रमाच्‌ छश्कस्यावसरः संजातः स च 
सर्वैर मृगगणेर *आज्ञापित इति चिन्तयाम्‌ आस । कथम्‌ एष 
टुष्टसिंहो वध्यो भविष्यति । अथवा । 9 
किम्‌ अशक्यं बुद्धिमतां ' किम्‌ असाध्यं निश्चयं दृढं दधताम्‌। 
किम्‌ अवश्यं प्रियवचसां ' किम्‌ अलभ्यम्‌ +इहोद्यमस्था- 
नाम्‌ ॥१७४॥ > 
तत्‌ सिंहम्‌ रव व्यापादयामि । अथय मन्दं मन्द्‌ गत्वा कात्ात्िक्रमं 
विधाय व्याकुत्हृदयस्‌ तस्य वधोपायं चिन्तयन्‌ दिनशेषे सिंहस- 
मीपं प्रयातः । सिंहो ऽपि वेलातिक्रमेण क्ुत्छषामकण्ठः कोपाविष्टः 
सृक्रिणी परिलिहन्‌ अचिन्तयत्‌ । अहो ' मया प्रातः समस्तम्‌- 
गवधः कतेव्यः । एवं तस्य चिन्तयतः शशको ऽपि मन्दं मन्दं 
गत्वा प्रणम्याये स्थित्तः। अथ तं चिरायातम्‌ अन्यच्‌ च त्धृतरम्‌ 
अवलोक्य को पञ्चल्ठितात्मा भत्सेयमानः प्राह । रे अधम ' एकस्‌ 
तावत्‌ त्वं तृघुः ' अपर वेत्ठानिक्रमेणेह प्राघ्रः। तस्माट्‌ एतस्माद्‌ 
अपराधात्‌ त्वां व्यापाद्य प्रातः सकत्कान्य्‌ अपि मृगकुलान्य्‌ उच्छे- ५ 
दयिषयामि ' इति । अथ प्रणम्य सविनयं शशकः प्रोवाच । 
स्वामिन्‌ ' अपराधो नास्माकं न चान्यमृगाणाम्‌ । यत्‌ कारणम्‌ ' 
तच्‌ छूयताम्‌ । सिंह आह । तत्‌ सत्वरं निवेदय ' यावन्‌ मम 


०४ (प 10दि ^) प 5711. 2800 1. 43 
देषटटरागतो न भवसि । शशक आह । स्वामिन्‌ ' अद्य समस्तमृगेर्‌ 
जातिक्रमेण प्रस्तावं विज्ञाय त्छघुतरस्य मम ' ततः पञ्चशशकेः 
सहाहं प्रेषितः । ततश चान्तरले महतः क्षितिवि वरान्‌ निगेत्येकेन 9 
सिंहेनाभिहितः। कर प्रस्थिता यूयम्‌ । अभीष्टदेवतां +स्मरत । ततो 
मयाभिहितम्‌ । वयं स्वामिनो मन्दमतेः सिंहस्य भोजनाथे सम- 
यधर्मेण गच्छामः । ततस्‌ तेनाभिहितम्‌ । यद्य्‌ एवम्‌ ' तन्‌ ° 
मदीयम्‌ एतट्‌ वनम्‌ । ततो मया सह समयधर्मेण समस्तेर अपि 
मृगेर वितव्यम्‌ । स चौररूपी मन्दमतिः । ततस्‌ तम्‌ आहूय 
दुतम्‌ आगच्छ ' येन यः कश्चिद्‌ आवयोर्‌ मध्यात्‌ पराक्रमेण ° 
राजा भविष्यति ' स सवान्‌ एवेतान्‌ मृगान्‌ भक्षयिष्यति । ततो 
ऽहं तेनादिष्टः स्वामिसकाशम्‌ अभ्यागतः । एतन्‌ मम वेत्ाति- 
कमकारणम्‌ । तट्‌ अच स्वामी प्रमाणम्‌ ' इति । तच्‌ छत्रा “ 
मन्दमतिः प्राह । भद्र ' यद्य्‌ एवम्‌ ' तहिं सत्वरं देय मम तं 
चोरसिंहम्‌ ' *येनेतं मृगकोपं तस्योपरि सिप्रा स्वस्थो भवामि । 
उक्तं च। 15 

भूमिर्‌ मिं हिरण्यं वा ' वियहस्य फल्चयम्‌ । 
नास्त्य्‌ एकम्‌ अपि यद्य्‌ एषां ' तन्‌ न कुयात्‌ कथंचन ॥१४५॥ 
यत्र न स्यात्‌ फल भूरि ' यत्र च स्यात्‌ पराभवः । 18 
न तच मतिमान्‌ युद्धं ' समुत्पाद्य समाचरेत्‌ ॥१४६॥ 
शश्णक आह । स्वामिन्‌ ' सत्यम्‌ इटम्‌ । स्वभूमिहेतोः परिभवाद्‌ 
युध्यन्ते छषचियाः। स परं टुगोश्रयः। तततो दुर्गान्‌ निष्कम्य तेन वयं ° 
विष्कम्भिताः । तट्‌ दुगेस्यो दुःखसाध्यो रिपुर्‌ भवति । उक्तं च । 
न गजानां सहस्रेण ' न च लक्षेण वाजिनाम्‌ । 
तत्‌ कृत्यं साध्यते राज्ञां ' टुर्गेणेकेन यट्‌ भवेत्‌ ॥१४७॥ २५ 


5001 1. (पए 28712^ पला प्& 08 ण्य प्)8; 44 

शतम्‌ एको ऽपि संधत्ते ' प्राकारस्थो धनुधेरः । 

तस्माद्‌ दुगे प्रशसन्ति ' नीतिशस्विचक्षणाः ॥ १४४॥ 

पुरा गुरोः समादेश्णद्‌ ' *धिरण्यकशिपोर भयात्‌ । $ 

शक्रेण विहितं दुगे ' प्रभावाद्‌ विश्वकमेणः ॥१४९॥ 

तेनापि च वरो दन्नो ' यस्य दुगं स भूपतिः । 

विजयी स्यात्‌ ततो +भूमो " दुगांणि सुबहून्य्‌ अपि ॥१९०॥ ‹ 
तच्‌ छूत्वा मन्दमतिः प्राह । भद्‌ ' दुगेस्यम्‌ अपि टशेय मे तं 
चोरम्‌ ' येन व्यापाट्यामि । उक्तं च । 

जातमाचं न यः शचं ' रोगं च प्रशमं नयेत्‌ । > 

महावलत्लो ऽपि तेनेव ' वृद्धिं प्राय स हन्यते ॥१९१॥ 
तथा च। 

आत्मनः शक्तिम्‌ उद्वीष्य ' मानोत्साहौ तु यो बजेत्‌ । 12 

शचून्‌ एको ऽ पि हन्याच्‌ च ' छचियान्‌ भागेवो यथा ॥१९२॥ 
शशक आह । अस्त्य्‌ एवम्‌ । किं तु तथापि बल्रवान्‌ असौ मया 
दृष्टः । तन्‌ न युज्यते स्वामिनस्‌ तत्ामथ्येम्‌ अविदिषिव गन्तुम्‌ ' 
इति । उक्तं च । 

अविदित्वात्मनः शक्ति ' परस्य च समुत्सुकः । 

गच्छन्‌ अभिमुखो वहो ' नाशं याति पतङ्गवत्‌ ॥१९३॥ ८ 
तथा च । 

यो ऽवत्टः प्रोन्नतं याति ' विहन्तुं सबले रिपुम्‌ । 

विमदः स निर्वर्तत ' शीणैदन्तो यथा गजः ॥१९४॥ श 
मन्द्मतिर्‌ आह । किं तवानेन व्यापारेण । दशेय मे तं दुगेस्यम्‌ 
अपि । शशक आह । यद्य्‌ एवम्‌ ' तट्‌ आगच्छतु स्वामी । एवम्‌ 
उक्कामे व्यवस्थितः । ततः कंचित्‌ कूपम्‌ आसाद्य सिंहं प्रत्य्‌ आह । ५ 


०४, प तकि ^ प्रा) वप्त एता, 800 1, 45 
स्वामिन्‌ ' कस्‌ ते प्रतापं सोदुं समथः ' येन त्वां दृष दूरतो ऽपि 
चोरो ऽयं तट्‌ दुगेम्‌ अनुप्रविष्टः । तट्‌ आगच्छ ' येन दशेया- 
मि ' इति । तच्‌ छूत्वा मन्दमतिर्‌ आह । भद्र ' सत्वरं दशेय । सो » 
ऽपि तस्य तं कूपम्‌ अदणेयत्‌ । स च सिंहो ऽ तिमूखेतयूत्मन 
प्रतिविचवं जलमध्यगतं दुष्टा सिंहनादं सुमोच। ततस्‌ तत्मतिशब्देन 
िगुणतरो नादः कूपात्‌ समुत्थितः । अथासौ तं नादम्‌ आकणएयं ' ® 
शक्ततरो ऽ यम्‌ ' इति मत्वात्मानं तस्योपरि सिप्वा प्राणान्‌ 
मुमोच । शशको ऽपि हृष्टमनाः सर्वान्‌ मृगान्‌ आनन्द्य ते 
प्रशस्यमानो यथासुखं तत्र वने वसति स्म ॥ ? 


अतो ऽहं ब्रवीमि । यस्य बुद्धिर्‌ बलं तस्य । इति । करटक आह । काकतालीयम्‌ इदम्‌ । 
यद्य अपि शशकस्य सिद्धिः संजाता ' तद्‌ अपि शक्तिहीनेन पुरुषेण महता सह च्छदयना 
न च्धवहरतव्यम्‌ । दमनक आह । शक्तिमत] शक्तिमता चोद्मे निश्चयः कर्तव्यः । उक्तं च । 12 
नित्योद्यतस्य पुरुषस्य भवेद्‌ धि लच्मीर्‌ 
दिवं हि दैवम्‌ इति कापुरुषा वदन्ति । 
दैवं निहत्य कुङ्‌ पौरुषम्‌ आत्मशक्त्या 15 
यति कति यदि न सिध्यति को ऽच दोषः ॥ १९५। २४5४ 
अपरं च । सदोव्यतानां देवा अपि सहायिनो भवन्ति । उक्तं च। 
छते विनिश्चये पुंसां । देवा यान्ति सहायताम्‌ । 18 
विष्णुश्‌ चक्रं गरत्मां श्‌ च ' कौलिकस्य यथूाहवे ॥१९६॥ 
अन्यच च। सुप्रयुक्तस्य दम्भस्य  ब्रह्मप्य अन्तं न गच्छति । 
कौलिको विष्णुरूपेण । राजकन्यां निषेवति ॥ १९७॥ 21 
करटक आह । कथम्‌ एतत्‌ , दश्ेनापि निश्चयपूर्वे सुप्रयुक्तेन कार्यसिचिः ' इति । सो 
$त्रवीत्‌ । 


5001 7. (71 ए 614 लप 07 एय प्क)8; 46 


¶ 816 9111; "र €8०९॥ 28 137. 


॥ कया ४८॥ 


अस्ति गौडेषु जनपदेषु पुण्‌ बधनं नाम नगरम्‌ । तच कौलिको 
रथकार च ो सुहृदौ स्वस्वशिस्ये परं *पारम्‌ आगतौ स्वकम- 
बल्टरोपाजितवित्तताट्‌ अगणितव्ययक्रियो मृदुविचिचरवहुमूस्यनि- 
वस्नो पुष्यताबरूत्ात्ेकृतौो कपूंरागरमृगनाभिंपरिमत्द॑सुगन्धी 
प्रतिवसतः । तो च प्रहरचयं कमं कृत्वा पाश्चात्यप्रहरे दिवसस्य ९ 
*शरीर गुमरूषां च प्रत्यहं चत्वरायतनारिस्थानेषु मित्तो वि चरतः। 
प्रक्षणकगो्ठीवधांपन कोत्सवादित्ठो कमेत्केषु पयेटनं कृत्वा संध्या- 
यां स्वगुहे गच्छतः । एवं च तयोः कातो ऽ तिवतेते । अथ» 
कदाचित्‌ कस्मिंश्चित्‌ संजातमरोत्सवे सवे एव पौरजनो यथावि- 
भवभृतात्ठकारो देवतायतनादिषु स्थानेषु परिभमिततु प्रवृत्तः । ताव्‌ 
अपि कोलिकरथकारो कृताठ्ठेकारो स्थानस्थानकेषु भित्वितप्- 
ङ्गारजनमुखान्य्‌ अवत्टो कयन्तो महति धवल्गुहवातायने समुप- 
विष्टा प्रथम॑यो वनो जिन॑ककेशंस्तन॑युगत्टंतिलकितंहदर्यदेशम्‌ उप- 
चीयमाननितश्विन्ां सामीभवन्मध्यां सजत्टंजलर्दनीलमृलि- 
ग्ध॑तरङ्धितशिरसिजां स्मरविल्रासदोतसिंवार्दिश्रवणनिवेशितत- 
रतैकनक्प्रां नवविकसित्तकोमलकमलत्ठकान्तसुखीं निद्राम्‌ इव 
सकलत्लोकल्टो चनयाहिणी सखीजनपरिवृतां राजदुहितर दृष्ट- ७ 
वन्तौ । 

तां चाप्रतिरूपरूपां निरूपयन्‌ कौलिकः पञ्चभिर्‌ बाणेर 
मनसि मनसिजेन *समन्तात्‌ ताडितः कथं कथम्‌ अपि धेर्यावष्ट- 
स्भाद्‌ आकारसं वरणं कृत्वा गृहं संप्राप्तः सवां दिशे राजदुहि- 


०२, वप्र [तपि ^) ¶प्ए एए. 800 4. 47 


¶216 9111: भलद राः 28 $15प्रपाप. 


तृमयीर अपश्यत्‌ । दीघान्‌ उष्णांश च निः्ासान्‌ मुञ्चमानो 
ऽनास्तीणांयाम्‌ एव खदूायां निपत्य स्थितः । ताम्‌ एव यथा- 
दृष्टां निरूपयंश्‌ चिन्तयंश चा वतिष्ठते स्म ' छोकं चुपठत्‌। ° 
यतच्नाकृतिस्‌ तच गुणा वसन्ति 
नेतट्‌ धि सम्यक्‌ कविभिः प्रणीतम्‌ । 


येनातिचा व्क अपि मे हृदिस्था ¢ 

दुनोति गात्रं विरहे प्रियास ॥१९४॥ णा 
अथवा । 

एकम्‌ उत्कर्दया व्याघ्रम्‌ ' अन्यट्‌ ट्यितया हतम्‌ । 9 


चैतन्यम्‌ अपरं धत्ते ' कियन्ति हृदयानि मे ॥१९९॥ 
अथवा । 

यदि सवस्य लोकस्य ' गुणाः कल्याणकारिणः । 19 

तत्‌ कथं मृगश्णवाष्या ' गुणयोगो दुनोति माम्‌ ॥२००॥ 

यो यच्र नाम निवसति ' करोति परिरक्षणं स कित्क तस्य । 

मुग्धे निवससि हृदये ' दहसि च सततं नृशंसासि ॥२०१॥ > 

रागी बिश्वाधरो ऽसो स्तनकलशयुगं योवनारूढगवं 

नीचा नाभिः प्रकृत्या कुटिकम्‌ अत्कं स्वल्यकश्‌ चापि मध्यः। 

कुवेन्व्‌ एतानि नाम प्रसभम्‌ इह मनश्िन्तितान्य्‌ आण्तु खेद 

यन्‌ मां तस्याः कपोतो दहत इति मुहुः स्वच्छको तन्‌ न 
युक्तम्‌ ॥२०२॥ ५ 

मत्तेभकुम्भपरिणाहिनि कुक माद भ 

तस्याः पयोधरयुगे रतसेदखिन्नः । 

वसो निधाय भुजपज्ञरमध्यवर्ती 

स्वप्स्यामि किं छणम्‌ अहं सणत्ठन्धनिदूः ॥२०३॥ =» > 


5001 7. प ४ 28124676 07 य ए08; 48 
¶ 16 गाः च ल्ढर्लाः 28 पञ ाप, 


हन्तव्यपस्ते नि दिष्टा ' यदि नाम विधेर्‌ वयम्‌ । 

किम्‌ उपाया न सन्य्‌ अन्ये ' टशिता यन्‌ मृगेष्णा ॥२०४॥ 
टूरस्याम्‌ अपि येन पश्यसि मनः कान्तां पुरःस्यायिनीं 
तं योगं मम चक्षुषो ऽप्य्‌ उपदिश ्रान्तं यदि प्र्षणे । 
संतापाय च संगमो ऽपि नित्तराम्‌ एकाकिनस्‌ ते भुवं 

न ह्य्‌ आत्मभरयो भवन्ति सुखिनो भद परार्थेषिणाम्‌॥२०५॥ ५ ® ` 
एकं नाम जडात्मकस्य मुषितं त्ावर्यम्‌ इन्दोस्‌ तया 
नेचाभ्याम्‌ असितोत्पलस्य च रूचिः प्रायेण तन्‌ नो मृषा । 
नो जानाति हताम्‌ असो पदगतिं मन्लो वराकः करी » 
तन्वङ्कप्रा विदततो ऽपि यन्‌ मम हतं चेतस्‌ तट्‌ अत्यद्ुत म्‌॥२०६॥ 
दिषु भूमो तथाकाशे ' सवे च विभाव्यते । 

स्मयते प्राणसंदेहे ' तन्वी नारायणायते ॥२०७॥ 12 
सणिकाः सवेसंस्कारा ' वुद्धेनोक्तं मृषा वचः । 

चिन्तयन्तो यतः कान्तां ' नित्यम्‌ अक्षणिका वयम्‌ ॥ २०४॥ 
णवं तस्य विलपतो बहुप्रकारम्‌ उद्भान्तचित्तस्य कथम्‌ अपि ” 
निश्ण जगाम । अन्येदयुश्‌ च तथेवो चितवेलायां रथकारः कृतणु- 
ङ्ारः कोल्विकमवनम्‌ अगमत्‌ । पश्यति च कौलिकम्‌ अना- 
स्तृतखदा यां प्रसारितवाहुपादं दीरघोष्णनिःश्वासम्‌ आपारडुगलरम्‌ "° 
उद्रताश्रुजल्म्‌ । तं च तटूपं दष्टाबवीत्‌ । *अयि सखे ' किम्‌ 
एवंविधाद्य ते शरीरावस्था । अयासो पुनः पुनः पृच्छ्यमानो 
ऽपि व्रीडया यावन्‌ न किचित्‌ कथयति ' तावद्‌ रथकारः 
खेद्परवश्टः छोकम्‌ अपठत्‌ । 

नेतन्‌ मिं यस्य कोपाद्‌ विभेति 

यट्‌ वा मिं शङ्भितिनोपचयेम्‌ । ५५ 


0४, प्र तति ^ पण वप्त 5८ 800 1. 49 
यस्मिन्‌ मिरे विश्वसेन्‌ मातरीव 
तट्‌ वे मितं संगतानीतराणि ॥ २०९॥ क 
पुनश च तेनेद्वितज्ञेन हस्तेन हृदयादि परामृश्यो क्रम्‌ । वयस्य ' यथा 9 
तकेयामि ' तथा न ते ज्वरकृता किं तु स्मरकृतेयम्‌ अवस्था ' इति । 
यदा च तस्यानेन स्वयम्‌ एव वाक्यावसरः कृतः ' तदासाव्‌ 
उपविष्टो भूत्वा छ्ोकम्‌ अपठत्‌ । ¢ 
स्वामिनि गुणान्तरज्ञे ' गुणवति भृत्ये ऽनुवतिनि कल्के । 
मिरे चानुपच्ये ' निवेद्य दुःखं सुखी भवति ॥२१०॥ 
इत्य उक्ता सवे राजपुचीटशेनात्‌ प्रभृति स्ववृच्तान्तम्‌ आख्या- ° 
तवान्‌ । ततश च रथकारेण संचिन्याभिहितम्‌ । छ्चियो ऽसो 
राजा ' त्वं च वेश्यः सन्न्‌ अधमाट्‌ अपि न विभेषि । ततो ऽसौ 
प्राह । छ्ूचियस्य तिखो भाया धमेततो भवन्त्य्‌ एव । तट्‌ एषा 
कदाचिट्‌ *वेश्यासुता भविति । तद्‌ अनुरागो ममास्याम्‌ । 
उक्तं च । 


असंशयं सचपरिपरहशषमा ५ 
यट्‌ *आयेम्‌ अस्याम्‌ अभित्ाषि मे मनः। 

सतां हि संदेहपदेषु वस्तुषु 

प्रमाणम्‌ अन्तःकरणप्रवृत्तयः ॥२११॥ ८५ 18 


ततो रथकारस्‌ तस्य निश्चयं विज्ञाया वदत्‌ । वयस्य ' किम्‌ अधुना 
कतेव्यम्‌ । कोलकं आह । किम्‌ अहं जानामि ' त्वयि मिरे यट्‌ 
अभिहितं मया । इत्य्‌ उक्ता तूष्णीम्‌ अभूत्‌ । ततो रथकारम्‌ तम्‌ " 
आह । उत्तिष्ठ । लात्वा भ्रः । त्यज नेराश्यम्‌ । अहं ते तम्‌ उपायं 
करिष्यामि ' येन तया *सहाहीनकालं लवं संभोगसुखम्‌ अनुभवि- 
पसि ' इति । ०५ 


प्र 


500 7, ग्र ए 2871746७ 07 एय एप08; 50 
¶216 111: लद र्ना 28 915. 


अथ कौल्विकः सुहृद द्गीकारप्रत्युज्जीविताश उत्थाय सर्वं यथा- 
कृत्यम्‌ अनुष्ठितवान्‌ अन्येद्युश च रथकारः काष्टमयम्‌ अनेकवणे- 
कचिचितं कील्ठिकाप्रयोगोत्पन्नं नवत्तरघटितं गरूढयन््रम्‌ आदा- 9 
योपस्थितः कोलिकम्‌ आह । वयस्य ' एनम्‌ आरुह्य कीलिका 
दला यजरेष्यते ' तच गम्यते । यच च कीलिका पनी यते ' तच 
यन्बम्‌ इदम्‌ अवतरति । तस्माद्‌ गृहाणेतत्‌ । अधव निशि ९ 
सुपे जने कृतशरीरणशुश्रूषो *मद्िज्ञानप्रयोगसंघटितनारायणरूपम्‌ 
आस्यायेनं गरूडम्‌ आरुह्य कन्यान्तःपुरहम्येतत्ते ऽ वत्तीये तया 
राजपुष्या सह यथासमीहितं निष्पादयस्व । मयेवं निशितम्‌ ' ° 
असो राजटुहिता हम्यैतत्ठ एकाकिनी स्वपिति ' इति । 


एवम्‌ अभिधाय गते रथकारे मनोरथश्तेर दिवसशेषम्‌ 
अतिवाह्य प्रसन्नायां रजन्यां लान॑धूप॑चूणेविलेपनतागरूतमुखवासं- 
कुसुमादिभिर्‌ अतिसुरभिविचिरमात्याख्ररो सुकुटाद्याभरणाले- 
कृतः कोल्िकस्‌ तथे वानुषशठितवान्‌ ' यावद्‌ असौ *+राजकन्या 
सुधांशुकरावटाते हम्येतले शयनतत्ावस्थितेकाकिनो चन्द्रमसम्‌ 
+अवत्टोकयन्ती मनाग्‌ मदनेन *स्पृश्यमानमानसा सहसैव तं 
वेनतेयाधिरूढं नारायणाकारं कोल्किकम्‌ अवल्ोकितवती । दष्टा 
च शय्यायाः ससंभ्रमम्‌ उत्थाय पादाभिवन्दनं कृता व्यज्ञपयत्‌ । ७ 
देव ' किंनिमित्तम्‌ इहागमनेनानुगृहीतास्मि । तस्मात्‌ समादि- 
श्यताम्‌ ' किं कतेव्यम्‌ । णवं वादिन्यां राजदुहितरि कोल्ठिको 
गम्भीरश्चष्णया गिरा शनैर्‌ इदम्‌ उवाच । भद ' त्टथेम्‌ एवेदम्‌ 
` इहागमनम्‌ । साबवीत्‌ । मानुषी कन्या *वाहम्‌ । तेनाभिहितम्‌ । 
शापभ्रष्टा त्वं ममेव प्ूवेपत्नी । मया चेतावन्तं काले मा- 
नुषसं पकोट्‌ रसिता । तस्मात्‌ त्वाम्‌ अहं गान्धर्वेण वि वाहेन ५ 


०, (प [तकि ^ प्रा) वप्त ए ताज 500 1. 81 
विवाहयामि । ततस्‌ तया ' मनोरथानाम्‌ अष्‌ अगम्यम्‌ ' 
इति मत्वा ' तथा ' इति प्रतिपन्नम्‌ । तेनासौ गान्धर्वेण विवाहेन 
परिणीता । 9 

ततस्‌ तयोः प्रतिदिवसं वधेमानानुरागयोः सुरतसुखान्य्‌ 
अनुभवतोर गच्छन्ति दिवसाः । कील्ठिको ऽपि राचिशेषसमये 
यन्रगरडम्‌ आरुह्य ' *वेकुणदस्वर्गं यास्यामि ' इति *ताम्‌ उत्कत्छरा- ५ 
पयित्वा स्वगृहम्‌ अल सितो नित्यम्‌ एवागच्छति । 
अथ कदाचिच्‌ चान्तःपुररसिभिः पुरूषो पभोगचिहान्य्‌ आल- 
छ्य राजटुहितुः प्राणविनाशभयभीतिः स्वामिने निवेदितम्‌ । देव । 9 
अभयेन प्रसादः क्रियताम्‌ । किंचिट्‌ विज्ञयम्‌ अस्ति। राज्ञा ' 
तथा ' इति प्रतिपन्ने ऽन्तःपुरपात्केर्‌ विक्ञप्रम्‌ । देव ' प्रयत्नेनापि 
रघ्यमाणे पुरूषप्रवेशे राजटुहितुः सुटशेनायाः पुरूषेणो पमुज्यमा- ५ 
नाया इवाकारः संलष्यते । नुत्रास्माकं गतिविषयः । देव एवच 
प्रमाणम्‌ । 
एवम्‌ आवेदितो राजा समाकुत्ेन मनसा व्यचिन्तयत्‌ । 
जातेति कन्या महतीह चिन्ता 
कस्मे प्रदेयेति महान्‌ वित्तकेः । 
ट्च्रा सुखं प्राप्स्यति वा न वेति 18 
कन्यापितृत्वं खल्नर नाम कष्टम्‌ ॥ २१२॥ प्क 


तथा । 
जननीमनो हरति जातवती 1 
परि वधते सह शुचा सुहृदाम्‌ । 
परसात्‌ कृतापि कुरूते मलिनं 
दुरतिक्रमा दुहितरो विपद्‌: ॥२१३॥ एणं 94 


5०0६ 7. प्र ए ए817^ पलाल 07 एफ 08; 59 


¶216€ 911: त €8ण्€ा 28 ४1807. 


तथा । 
यास्यति सज्ननहस्तं ' रमयिष्यति तं भवेच्‌ च निर्दोषा । 


उत्मादितयापि कविस्‌ ' ताम्यति कथया दुहिचरैव ॥२१४॥ =» 


एवं बहुविधं विचिन्त्य देवी पावे गत्वा प्रोवाच । देवि ' विज्ञायतां 
सम्यक्‌ ' यट्‌ एते कञ्चुकिनो वटन्ति । कस्याद्य कुपितः कृतान्तः ' 
येनेतदरोहः कृतः ' इति । अथ तिर यथास्थिते कथिते देवी व्याकु- १ 
ल्ितमनाः सत्वरं कन्यान्तःपुरे गत्वा खरिडताधरां नखविलिखि- 
तश्रीरावयवां दुहितरम्‌ अपश्यत्‌ ' प्रोवाच *+च । आः पापे ' 
कुत्कत्टङ्ककारिणि । किम्‌ एवं शीत्ठखरडनं कृत्तम्‌ । को ऽयं ° 
कृतान्तावलोकितस्‌ त्वत्सकाशम्‌ अभ्येति । तत्‌ कथ्यताम्‌ एवं 
गते ऽपि सत्यम्‌ ' इति। सापि चपाधोमुखी जगाद सकलं *विष्णु- 
रूपकोल्विकवृत्तान्तम्‌ ' इति । `. 19 
तच्‌ छत्रा सा प्रहसितवदना ' *पुलकितस वाङ्गी सत्वरं गत्वा 
राजानम्‌ ऊचे देव ' रिष्या वधेसे। निशीथे नित्यम्‌ एव भगवान्‌ 
नारायणः कन्यकापार््ै स्वयं समभ्येति । तेन गान्धवेविवाहेन 
परिणीता सा । तट्‌ अद्य रारो मया त्वया च वातायनगताभ्यां 
स निशीये द््टव्यः ' यतो मानुषैः सह वचनात्ापं न करोति । 
इति श्रुत्वा राजा प्रहृषटहृदयस्‌ तट्‌ दिनं वषैशतम्‌ इव कथंचिट्‌ ७ 
अतिचक्राम । ततस्‌ तु राचो निभृतो भूत्वा राजा सकत्करचो 
वातायनस्थो गगननिवेशितदुष्टिर्‌ यावत्‌ तिष्ठति ' तावद्‌ गरूडा- 
रूढं शह्चक्रगटाहस्तं यथो चितचिहम्‌ आकाशाट्‌ अवतरन्तम्‌ 
अपश्यत्‌ । ततः सुधाक्लावित्तम्‌ इवात्मानं मन्यमानो देवीम्‌ उवाच। 
नात्य्‌ अन्यो *धन्यतयो ल्लोके मया त्वया च समः ' ययोः प्रसूतिं 
भगवान्‌ नारायणः स्वयम्‌ एत्य भजते । तत्‌ सिद्धा अ स्माकं सर्वे ५ 


०४, प्रप ए तकि ^ पा) ¶॥प् 58८, 800 ए, 53 
216 ण: लड ण्ाः 28 प, 


हृदयस्था मनोरथाः । अधना +जामातृप्रभावेण सकलाम्‌ अपि 
वसुमतीं वशे करिष्यामि। 

अचान्तरे नवनवतियामलसछ्ाणाम्‌ अधिपतेर दाशिणात्यस्य » 
्रीविक्रमसेनस्य दूताः प्रतिवषैदीयमानकरहेतोः संप्राप्राः । तेषां 
नारायण^"जामातृगवोट्‌ यथापूवेम्‌ आद्र नासो भूपतिः कृतवान्‌ । 
ततस्‌ तेर जातमन्युभिर्‌ अभिहितम्‌ । भो राजन्‌ ' दातव्यदिनान्य्‌ ० 
अतिक्रान्तानि । तत्‌ किं भवता यथादीयमानकरो न प्रहुतः । 
अथ सांप्रतं भवतो ऽत्तौकिकं र्विचिट्‌ अकस्मात्‌ कस्माट्‌ अपि 
सकाशद्‌ वत्वे संपन्नम्‌ ' येना्रिमारूताशीविषकृतान्तो पमं श्रीवि- » 
कमसेनं को पयसि । एवम्‌ उक्ते तेषां राज्ञा देवमागों दशितः । 
तेभ च स्वविषयम्‌ अनुप्रापिः शतसहसखगुणं तत्‌ कथयित्वा कोपितः 
स्वस्वामी । अथासौ सबलत्परिवारण चतुर द्गसेनासनायस्‌ तदुपरि 
प्रचल्ठितः ' सकोधम्‌ उक्तवांश च । 

यदि विशति तोयराशिं ' रोहति वा शक्रररितं मेरुम्‌ । 

स तथापि नुपः पापो ' हन्तव्यो मे प्रतिज्ेषा ॥२१५॥ = 
ततो ऽनवरतप्रयाणकेर विक्रमसेनस्‌ तदेशम्‌ अनुप्राय विध्वंस- 
याम्‌ आस । अथ हतशेषा जनपदाः पुट वधेनराज्लो इारदेशम्‌ 
आस्थायाकरोष्टुम्‌ आरब्धाः । तच्‌ छूवापि न तस्य स्वस्यो ऽपि 
सोभः समभवत्‌ । 

तथान्येद्युर्‌ विक्रमसेनवतरेर आगत्य परूबधे पुर्‌ वधेनपुरे स 
राजा मन्तिपुरोहितमहाजनेर विज्ञघ्रः । देव ' समर्थेन शचुणा 
समागत्य पुररोधः कृतः । देवश च कथं निराकुत्ठस्‌ तिष्ठति ' 
इति । ततो राजाब्रवीत्‌ । तिष्ठत यूयं यथासुखम्‌ । चिन्तितो ऽस्ति 
मयास्य रिपोर वधोपायः । यद्‌ एतदीयबलस्याहं करिष्यामि ' 


5007 1. (पत 1714 वल प& 07 एम एप्)8; 64 


¶ 8216 11: ्€क्षण्€ाः 28 918 प. 


तत्‌ प्रातर्‌ भवन्तो ऽपि ज्ञास्यन्ति । इति भणित्वा प्राकारह्वाराणि 
सुरसितानि कारयां चक्रे । ततः सुदशेनाम्‌ आहूय मधुराश्रेः 
सवहुमानम्‌ अव्रवीत्‌ । वत्से ' त्वदीयभतुर बलाद्‌ अस्माभिः 9 
्च्ुणा सह विहः प्राख्धः । तट्‌ उच्यताम्‌ अद्य निशयाम्‌ 
आगतौ भगवान्‌ नारायणः ' यथा प्रातर्‌ एनम्‌ अस्मच्छचर 
व्यापादयति । ¢ 

सुटशेनापि पितुर्‌ वाक्यं सवै सविशेषं राचो तस्मे निवेदि- 
तवती । तच्‌ छरुत्वा विहस्य कौलिको ऽन वीत्‌ । भद्र ' कियन्माचम्‌ 
एतन्‌ मानुषवियहप्रयोजनम्‌। मया हि पूर्वै हिरण्यकशिपुकंसंम- » 
धुकेटभप्रभृतयो मायाविनो लीलयैव महादानवाः सहखशो 
निहताः । तट्‌ गत्वा बरूहि राजानम्‌ ' यथा । निराकुत्स्‌ तिष्ठ । 
प्रातः स्वचक्रेण नारायणो भवच्छचुेन्यं व्यापादयिष्यति । अथ 
तया गत्वा सवै सगवेया राज्ञे निवेदितम्‌ । तेनाप अतितोषात्‌ 
प्रतीहारम्‌ आदिश्य नगरे पटहो दापितः ' यथा । प्रातः संमामे 
निह त॑विक्रमसेना वासंस्थितंधनधान्यहिरण्यदस्तितुरङ्खायुधीादिकं यो + 
यट्‌ गृह्धुराति ' तत्‌ तस्येव ' इति । पटहघोषणां भ्रुवा तुष्टाः 
पौरजनाः परस्परं मन्तयमाणा ऊचुः ' यथा । अतिमहासच्लो 
ऽयम्‌ अस्मत्स्वामी ' यो रिपुबत्वे ऽधिष्ठिते ऽपि न क्षुभितः । ७ 
अवश्यं प्रात्तर व्यापादयिष्यति प्रतिपक्षम्‌ । 

इतश च कोलिकों सुक्तसुरतारम्भो ऽत्याकुत्ः स्वमनसा 
पयाँत्ोचितवान्‌ । किम्‌ अधुना मया विधेयम्‌ । यदि तावद्‌ ५ 
यन््रम्‌ आरुद्यान्यच गच्छामि ' तदानेन स्रीरत्नेन सह भूयः समा- 
गमो न भवति । विक्रमसेन एव व्यापाद्यास्मच्छुशुरकम्‌ अन्तःपु- 
रमध्याट्‌ एनां गृह्ाति । अथ युद्धम्‌ अङ्गीकरोमि ' तदा संहृता- 


०४, (प [0 ^ प्रा) वप्त ता 200 1. 65 
खिल्मनोरथो मे मृत्युः । ताम्‌ अपि विनामे मृत्युः। किं बहुना 
उभयथापि मृत्युर्‌ एव ' इति । तट्‌ वरं सखम्‌ आत्टख्ितम्‌ ' 
इति । किं च ' युद्धम्‌ अङ्गीकृतवन्तं कटाचिट्‌ गरुडारूढं मां 9 
पश्यन्तो वासुदेवं मत्वा शच वः प्रपत्रायन्ते ' उक्तं च । 

भेयं हि कायं सततं मह्धिः 

कृच्छू ऽपि कष्टे ऽप्‌ अत्िसंक्टे ऽपि । ¢ 

कृच्छाणि दृच्धेण समुत्तरन्ति 

धेर्योच्छ्िता ये प्रतिपत्तिटक्षाः ॥२१६॥ इति । = प्क 

एवं कृतयुडनिश्वये कोलिके विष्णुं *वेकुणदस्वर्गे वेनतेयो व्यज्ञ- ° 

पयत्‌ ' यथा । देव ' पृथिव्यां *“पुण्ढ्‌ वधेनाभिधाने नगरे देवाकारम्‌ 
उपधारी कोल्ठिको राजदुहितरम्‌ उपभुङ्क । ततः पुण्‌ वधनाधि- 
पतेर नृपतेर *दाक्षिणात्यः समथेतो नृपतिर्‌ मूल्ोच्छेदं कतुम्‌ “ 
आयातः । कोलिकश च वशुरसाहाय्ये कृतनिश्चयो ऽद्य वतेते । तट्‌ 
विज्ञाम्‌ इदम्‌ । यटि तस्य संमामे मृत्युर्‌ भविष्यति ' तटा 
टाक्िणात्येन राज्ञा भगवान्‌ नारायणो व्यापारितः ' इति मत्यै- 5 
ल्लोके संजातप्रवादे यज्ञादिक्रियाणाम्‌ अत ऊध्व त्रोपो भविषययति। 
यानि च भटारकायतनानि ' तानि नास्तिका विनाश्यिषयन्ति । 
+भगवद्नक्ताण च चिदरिडनः प्रज्यां त्यघ्यन्ति । इति समुपस्थिते 5 
देवः प्रमाणम्‌ । तत्तो भगवता वासुदेवेन सम्यग्‌ विभाव्य तं प्रत्य्‌ 
अभिहितम्‌ । पतंगराज ' युक्तम्‌ एवेदम्‌ । देवांशकः कोल्िको 
ऽयम्‌ । अनेन तस्य राज्ञो घातकेन भवितव्यम्‌ । ततो ऽयम्‌ 
एवाुभ्युपायः ' यद्‌ अस्य मया त्वया च साहाय्यं कायेम्‌ ' तट्‌ 
अहं तस्य शरीरम्‌ अनुप्रविशमि ' त्वं च गरूढम्‌ अनुप्रविश ' 
चक्रे च चक्रे प्रविशतु । एवम्‌ अस्तु ' इति प्रतिपन्नं गरुडेन । ५ 


500 7. 11 ए 81/67 & 07 एद ए प्र08; 56 
¶ 216 ए: लवणा 28 180४. 


अचान्तरे कौलिको नारायणाधिष्ठितः सुटशेनाम्‌ आदिदेश । 
भद्रे ' मम युद्धायोत्यितस्य सवे मद्भःलादि सन्नं क्रियताम्‌ । इत्य्‌ 
उक्ते कृतमङ्गत्*विधिः सांयामिकालंकरणविभूषितो गोरो चनां- 9 
सितसिद्धाथेककुसु मादिकृत^वन्दनो ऽभ्युदिते भगवति कमत्ाकर- 
बान्धवे प्राचीरिग्वधूसुखतित्के सहस्रकिरणे वेजयिक्षु संयाम- 
तूर्येष्व्‌ आहतेषु नगरान्‌ निगेत्य सं मामभूमिं प्राप्रे राजनि यथा- ० 
स्थानम्‌ उभयवलेषु व्यूहितेषु वृत्ते च पादातसं प्रहारे कौल्िको 
गरूडम्‌ आरुद्य वितीणेसुवणेरत्नादिदानविधिर्‌ धवलगृहाट्‌ 
उत्पत्य विहायस्तलटं कुतरहत्ढराविषटेर नगरजनेर निरीष्यमाणो ° 
ऽभिबन्दमानभ् च नगराद्‌ बहिः स्वसेन्यस्योपरि प्रोढनादं 
पाञ्जन्यं शह्भम्‌ अपूरयत्‌ । 
श्ुत्वा च शङ्कश्ब्ट्‌ गजतुरगस्यपदातयः सुभिताः सकृन्मू- 
चम्‌ असकृत्‌ कुवांणाः केचिट्‌ विरसम्‌ आरसन्तः प्रपत्ायिताः ' 
केचिन्‌ मूड्ीविड्धलतनवो भूमो लुठिताः ' केचिच्‌ च भीता 
गगनतल निहितस्तन्धदृष्टयः स्थिताः । 15 
ततश च कुतहत्ाट्‌ युद्धटशेनाय समुपागतेषु सकत्ठदेवेषु 
देवराजेन ब्रह्माभिहितः। ब्रह्मन्‌ ' किम्‌ अचर कश्चिट्‌ दत्यो दानवो 
वा हन्तव्यः ' येन स्वयं भगवान्‌ नारायणो नागारिम्‌ आसद्य + 
युद्धायोपस्थितः । एवं चाभिहिते ब्रह्मणा चिन्तितम्‌ । 
सुरारिसंघातनिपीतश्णो शितं 
न चक्रम्‌ उन्मुञ्चति मानुषे हरिः । + 
करेण येन प्रपिनरि कुञ्जरान्‌ 
न तेन सिंहो मशकान्‌ प्रबाधते ॥ २१७॥ वि 


०४, प्रप 1.0 ^ प ¶1प्ए एतान, 500६1. 67 
तत्‌ किम्‌ इदम्‌ आश्वयेम्‌ । इति सविस्मयो ब्रह्मापि बभूव । अतो 
ऽहं ब्रवीमि । 

सुप्रयुक्तस्य दम्भस्य ' ब्रह्माण अन्तं न गच्छति। ४ 
कौलिको विष्णुरूपेण ' राजकन्यां निषेवते ॥२१४॥ इति । 
एवं देवानां जातकोतुकानां विचिन्तयताम्‌ एव कोलिकश 
चक्रं विक्रमसेने प्राहिणोत्‌ । तच च तं राजानं डिधा विधाय 
पुनस्‌ तस्यैव हस्तम्‌ अनुप्राप्तम्‌ । तच्‌ च दुष्टा सर्वे ऽपि राजानः 
स्वस्व वाहनेभ्यो ऽ वतीये प्रणिपातबन्धुरपाणिपादशिरसस्‌ तं ना- 
रायणरूपं व्यज्ञपयन्‌ । देव ' 9 
हतं सेन्यम्‌ अनायकम्‌ ' 
इत्य्‌ अवधाये परिरस्ास्मदीयप्राणान्‌ । समारिश्यताम्‌ ' किम्‌ 
अस्माभिः कतेव्यम्‌ ' इति । एवं वादिनि सकलनरपालल्ोके स " 
नारायणषूपो ऽ ब्रवीत्‌ । अभयं भवताम्‌ अतः परम्‌ । यट्‌ अयं 
सुप्रतिवमां समादिश्ति ' तट्‌ अविचारं सवेवारं भवद्धिर अनु- 
हेयम्‌ । ततः ' यथाज्ञापयति स्वामी ' इत्य्‌ एवम्‌ उक्ला सर्वे रा- 
जानस्‌ तदाज्ञाम्‌ अङ्गीचक्रुः । ततो ऽपि नरकरिरथतुरगभार्डा- 
गारादि सवे प्रतिपक्षधनं सुप्रतिवमेणो वशीकृत्य स्वयं कौलिको 
लब्धविजयमाहात्यो राजदुहिबा सह सकलसुखान्य्‌ अनुबभूव ॥ ७ 


अतो ऽहं व्रवीमि । कति विनिश्चये पुंसाम्‌ ' इति । एतद्‌ आकण्यै करटकं आह । यद्य्‌ एवं 
मवान्‌ अपि कृतनिश्चयः । ततो गच्छतु भवान्‌ अभिमतसिद्धये । शिवास्‌ ते सन्तु पन्थानः । 
इत्य उक्ते ऽसाव्‌. अपि सिंहसकाशं गतः । प्रणम्योपविष्टश च सिंहेनाभिहितः । कृतो 9" 
भवांश चिराट्‌ दृष्टः । सो ऽब्रवीत्‌ । देव ' आत्ययिकम्‌ अद्य किम्‌ अपि स्वामिनः । 
तेनाभरियम्‌ अपि भद्राय निवेदितुम्‌ आगतः ' न चायं मनोरथः संच्चितानाम्‌ । किं तु 
समनन्तरक्रियाकालातिपातमोतिर हि निवेदयते ' उक्तं च । | %4 


। 


5001 1, (प 81724 वअ 07 ए प्य एप्)8 ; 58 


ए18116-8६07 ए : 11010 26 एप. 


अनुयुक्ता हि साचिव्ये ' यद्‌ वदन्ति हितिषिणः। 

अनुरागद्र वद्यताः ' प्रणयस्यातिभूमयः ॥ २१९॥ 
तथा च। सुलभाः पुरूषा राजन्‌ ' सततं प्रियवादिनः 3 

अप्रियस्य तु पथ्यस्य ' वक्ता ओता च दुलभः ॥ २२०॥ 
अथ पिङ्गलकः अद्धेयवाक्यत्वात्‌ तं सादरम्‌ अपृच्छत्‌ । किं भवान्‌ विवच्लुः ' इति । सो 
$त्रवोत्‌ । देव । संजीवकस्‌ तवोपरि दुष्टबुद्या विश्वासम्‌ उपगतो मत्संनिधौ रहसि 6 
विश्वासात्‌ प्रसावेष्व आह । दृष्टास्य मया त्त्साभिनः शक्तिचये ऽपि सारासारता । 
तद्‌ एनं हला स्वयम्‌ एवाहं सुखेन राज्यं *ग्रहीष्यामि ' अदैवुयं संजीवक एनम्‌ अर्धं 
चिकीषुर असि । अतो ऽहं कृलस्वामिनं लां ज्ञापयितुं समायातः । 9 

तच च वज्रपातदुःसहतरं वचनम्‌ उपश्रुत्यातीव चुभितहद यः पिङ्गलको मोहम्‌ 

उपगतो न किंचिद्‌ उवाच । दमनकस्‌ तु तदाकारं परिज्ञायात्रवीत्‌ । अयम्‌ एव मन्ति- 
प्राधान्ये महान्‌ दोषः ' साधु चेदम्‌ उच्यते । 12 

अब्युच्छरिते मन्त्रिणि पार्थिवे वु- 

वष्टभ्य पादाव अवतिष्ठते ओरीः। 

सा स््रीसखभावाट्‌ असहा +भरस्य 15 

दयोस्‌ तयोर्‌ एकतरं जहाति ॥ २२१॥ प 
*^तेन हि। कण्टकस्य च भग्रस्य ' दन्तस्य चलितस्य च । 

अमात्यस्य च दुष्टस्य ' मुलाट्‌ उद्धरणं सुखम्‌ ॥ २२२॥ + 
किं च। एकं भूमिपतिः करोति सचिवं राज्ये प्रमाणं यदा 

तं मोहाच्‌ कयते मदः स च मद्‌ाट्‌ दास्येन निर्विद्यते । 

निर्विंखस्य पदं करोति हदये तस्य खतन््रख्युहा 1 

स्वातन्त्यस्यृहया ततः स नृपतेः प्राणेष्व्‌ अभिद्र ह्यते ॥ २२३॥ = ॐ"08 
सो ऽयम्‌ अधुना संजोवको निरवग्रहः स्वकार्येषु खेच्छया प्रवतेते ! तद्‌ एतद्‌ एवात 
युक्तम्‌ । यद्‌ उक्तम्‌ । =) 

कार्या अथां वमर्देन ' स्वनुरक्तो $पि साधयन्‌ । 

नापिच्यः सचिवो राज्ञा ' वाञ्छत भूतिम्‌ आयतौ ॥ २२४॥ 
स्वभावश्‌ चायं प्रभूणाम्‌ ' यथा । 97 

भावल्िग्धेर्‌ उपकृतम्‌ अपि देष्यताम्‌ एति किंचिच्‌ 

कायाद्‌ अन्यैर अपकृतम्‌ अपि प्रीतिम्‌ एवोपयाति। 

दुर्याह्यलान्‌ नुपतिमनसां नैकभावाश्रयाणां 80 

सेवाधर्मः परमगहनो योगिनाम्‌ अप्य्‌ अगम्यः ॥ २२५॥ पात्‌ 
तच्‌ रला पिङ्गलको ऽब्रवीत्‌ । अयं तावन्‌ मम मूत्यः। कथं ममोपरि विपर्ययं करिष्यति। 
दमनक आह । भृत्यो न भूत्य इति । नैतद्‌ एकान्तिकम्‌ । उक्तं च । 38 


०, व्र प्ट तकि ^ 2 वप्त एषा, 800 ए, 59 


7165101: 1107 27त एषा. 


नसोऽस्ि पुरुषो राज्ञां, यो न कामयते धियम्‌ । 
न शक्तिर्‌ यावद्‌ अन्युपि। तावत्‌ संसेवते परम्‌ ॥ २२६॥ 
सिंह आह । भद्र ' तथापि मम तस्योपरि चित्तं न ^+^परि दुष्यति । यतः । 8 
अनेकदोषदुष्टो ऽपि ' कायः कस्य न वल्लभः । 
कुरवे्न अपि व्यलीकानि ' यः प्रियः प्रिय एव सः ॥ २२७॥ 
कििच। अप्रिया अपि कृवांणो ! निष्टुराण्य अपि च ब्रुवन्‌ । 6 
चेतः प्रड्धादरयत्य एव ' सर्वावस्थासु वल्लभः ॥ २२८॥ 
दमनक आह । अत एवायं दोषो ऽभ्युदयस्य । यत्‌ स्मृगजनं परिहत्य खामिना 
यस्योपय आस्था प्रतिबद्धा । सो ऽयम्‌ अधुना स्यं स्वामित्वम्‌ अभिवाञ्छति । उक्तं च। 9 
यस्मिन्न अ्य्‌ अधिकं चच्ुर्‌ ' आरोपयति पार्थिवः। 
अज्ञाते सकृलीने वा ' स लच्स्या हरते मनः ॥ २२९॥ 
तत्‌ ' अयम्‌ अभीष्टो ऽपि दुष्टलवाद्‌ अनिष्टः इति त्यक्त युक्तः । सुष्टु खल्व इदम्‌ 12 
उच्यते । 


पूज्यो बन्धुर्‌ अपि प्रियो ऽपि तनयो भाता वयस्यो ऽपिवा 
यो मोहाद्‌ अनवव्यकार्यविमुखो हेयः स कायांर्थिना । 15 
लोके हि प्रथिता ननु श्रुतिर्‌ इयं नार्यो ऽपि गायन्ति यां 
किं कार्यं कनकेन तेन भवति च्छेदाय कणस्य यत्‌ ॥ २३०॥ हदवव 
यच्‌ च › महाकायो ऽयम्‌ ' इत्य उपकाराय चिन्त्यते ' तट्‌ अपि विपरीतम्‌ एव । यतः । 18 
किं गजेन प्रभिन्नेन ' राजकर्मांख अकुर्वता । 
स्थूलो वा यदि वास्थूलः । श्रेयान्‌ छृत्यकरः पुमान्‌ ॥ २३१॥ 
अथवा देवपादानाम्‌ अस्योपयं अनुकम्पा । तद्‌ अप्य्‌ अयुक्तम्‌ । यतः। 21 
सतां मतिम्‌ अतिक्रम्य ' यो ऽसतां वर्तते मति। 
कालेन व्यसनं प्रापय ' पश्चात्तापं स गच्छति ॥ २३२॥ 
यो न निःओ्ेयसं ज्ञानं ' सुहृदां प्रतिपद्यते । 2५ 
अचिरात्‌ स *च्युतः स्थानाद्‌ । दविषतां वर्तते वशे ॥ २३३॥ 
तथा च। कार्याकार्यम्‌ अनार्थैर्‌ ' उन्मार्गनिरर्गलैर गलन्मतिभिः। 
नाकण्येते विकर्णेर्‌ । नयोक्तिमिर्‌ युक्तम्‌ उक्तम्‌ अपि ॥ २३४॥ ढः 27 
अपिच। अप्रियस्यापि वचसः । *+*परिणामाविरोधिनः। 
वक्ता रोता च यचासि ' रमन्ते तच संपद्‌: ॥ २३५॥ 
तथाच क्रियासु युक्तैर नृप चारचुषो 80 
न वञ्चनीयाः प्रभवो ऽनुजीविभिः। 
अतो ऽहंसि चन्तुम्‌ असाधु साधु वा | 
हितं मनोहारि च दुलंभं वचः ॥ २३६॥ पधप्‌,8 38 


5001 7. प ८874 पला 07 एष्य ए)8; 


12116 -8001 $ : 11010 8 एणा, 


60 


मूलभृत्योपरोधेन । न ह्य_ आगन्तु प्रपूजयेत्‌ । 
नातः परतरो ऽन्यो ऽस्ति  राज्यभेदकरो गदः ॥ २३७॥ 


सिंह आह । भद्र ' मा भवं वोचः । यतः । 


उक्तो भवति यः पूरवे ' गुणवान्‌ इति संसदि । 
न तस्य वाच्यं नगण्यं । प्रतिज्ञामङ्गभीरुणा ॥ २३८॥ 


तथा तस्य मया ' शरणागतो ऽयम्‌ ' इति पूर्वम्‌ अभयप्रदानं दत्तम्‌ । तत्‌ कथम्‌ असौ 5 
कृतघ्नो भविष्यति । दमनक आह । 


अपि च। 


तथा च। 


तया । 


अपिच) 


किंच 


न दुजेनो वेरम्‌ इति प्रकुप्यति 

न साधुर्‌ एवं सुरतेन तुष्यति । 

स्वभावभावेन हि भाविताव्‌ उमौ 

यथेचतुनिम्बौ स्वरसेन तौ तथा ॥ २३९॥ 

दुजंनः प्रकृतिं याति ' सेव्यमानो ऽपि यत्नतः । 

सवेद नाभ्यज्ञ नोपायः ' पुच्छम्‌ इव नामितम्‌ ॥ २४०॥ 
स्वल्ये ऽपि गुणाः स्फोतीषभवन्ति गुणसमुदितेषु पुरुषेषु । 
शशिनः खलु तुहिनगिरेः । शिखरप्राप्ता इव मयुखाः ॥ २४१॥ 
नश्यन्ति गुणा गुणिनां ' पुरुषाणाम्‌ अगुण वत्सु पुरुषेषु । 
अज्ञनगिरिशिखंरेष्व इव ' निशासु चन्द्रांशवः पतिताः ॥ २४२॥ 
छत शतम्‌ असत्सु नष्टं सुभाषितशतं च नष्टम्‌ अवुधेषु । 
वचनशतम्‌ अवचनकरे । बुदधिशतम्‌ अचेतने नष्टम्‌ ॥ २४३॥ 
नष्टम्‌ अपात्रे दानं ' नष्टं हितम्‌ अलसबुद्धिविन्नाने । 

नष्टं छतम्‌ अकृतज्ञे ' नष्टं दािण्यम्‌ अनमिन्ने ॥ २४४॥ 
अरण्यरूदितं छृतं शव शरीरम्‌ उदरतितं 

स्थले कमल रोपणं सुचिरम्‌ ऊषरे वर्षणम्‌ । 

पुच्छम्‌ अवनामितं बधिर क्णजापः छतस्‌ 

तद्‌ अन्धमुखमण्डनं यद्‌ अबुध जने भाषितम्‌ ॥ २४५॥ 
चिरं दुग्धो ऽनङ्कान्‌ स्तनभरनता गौर्‌ इति वुधा 
परिष्वक्तः षण्डो युवतिर्‌ इति लावण्यकलिता । 

छता वैडूयांशा विततकिरणे काचशकले 

यद्‌ अन्नानासङ्गाट्‌ अविबुश्रजने सेवनरतिः ॥ २४६॥ 


तत्‌ सर्वथा स्वामिनस्मदीयं हितवचनं नोलङ्गनोयम्‌ । विं *+च । श्रूयताम्‌ । 


व्याघ्रवानरसर्पांणां ' यन्‌ मया न छतं वचः । 
तेनाहं दुविनतेन ' मानुषेण निपातितः ॥ २४७॥ 


पिङ्गलक आह । कथम्‌ एतत्‌ । दमनकः कथयति । 


छा 15 


97 


०, (प्ट 0 ^ पा) वप्त एताा+ 200 1. 61 


216 1: 62४01 ०6288 8100 08111658 11817. 


॥ कया ९॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिट्‌ अधिष्ठाने यज्ञदत्तो नाम ब्राह्मणः । तस्य 
ब्राह्मणी दारिद्याभिभूता प्रतिदिनम्‌ एवं वटति । भो ब्राह्मण ' $ 
निरूत्साह ' कठोरहृदय । किं न पश्यसि शुधया पीड्यमानान्य्‌ 
अपत्यानि ' येन निशिन्तस्‌ तिष्टसि । कियन्तम्‌ अष्‌ अध्वानं 
गत्वा यथाशक्ति कम्‌ अप्य्‌ अश्नोपायं कृत्वा दुततरं पुनर्‌ ९ 
आगच्छ । अथ ब्राह्मणस्‌ तदचननिर्वेदेन महाध्वानं गन्तुम्‌ 
आण्धः। कतिभिर दिवसे महाटवीं प्रविष्टः । तस्यां चाटव्यां 
व्रजता तेन सषुल्सामेणोदकम्‌ अन्वेष्टुम्‌ आरब्धम्‌ । तावत्‌ तस्याश ° 
चेकप्रदेशे तृणेर आवृत्तो महान्‌ कूपो दृष्टः। यावट्‌ विल्लो कयति ' 
तावद्‌ व्याघ्रवानरसपैमानुषास्‌ तन्मध्ये दृष्टाः ' तेर अष्‌ असौ 
दृष्ट इति । ततः ' मानुषो ऽयम्‌ ' इति मत्वोक्तवान्‌ व्याघ्रः । भो 
भो महास ' प्राणिरस्षणे महान्‌ धर्मैः ' इति मत्वा माम्‌ 
उन्नारय ' येनाहं +प्रियमिचकलत् चपुचस्वजनेः संगतस्‌ तिष्ठामि । 
ब्राह्मण आह । भवतो नामयहणेनापि सर्वेषां प्राणिनां भयम्‌ 
उत्पद्यते । नन्व्‌ अहम्‌ अतस्‌ वच्चो बिभेमि । पुनर अपि 
व्यापघ्रेणाभिहितम्‌ । 

ब्ह्म्रे च सुरापे च ' कीवे भग्रच्ते शठे । 18 

निष्कृतिर्‌ विहिता सद्भिः ' कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥२४४॥ 
पुनर अप्य्‌ आह । चिस्तत्येनाहम्‌ आत्मानं शपामि " नं भयं 
तवास्मत्सकाशाट्‌ विद्यते । अतो ऽनुकम्पयोत्तारय । ततो डिजेन 
स्वचित्तेन धारितम्‌ । प्राणिनां प्राणरक्षणे यदि विपत्तिर्‌ भवति 
तथापि श्रेयस्करी ' इति । एवं मत्वोत्तारितः । वानरो ऽप्य णवं 


5001९ 1, प 871.^ 679४6 07 णा एपा)8; 6 
¶816 1 : लका ०6285 20 ॥01271116885 आदा. 

+त्रवीति। भोः साधो ' माम्‌ अष्य्‌ उन्नारय । एवं श्रुत्वा हिजेनं 
सो ऽप्‌ उत्तारितः । सपो ऽब्रवीत्‌ । भो डिज ' माम्‌ अष्‌ 
उल्नारय । तच्‌ हुत्वा बाद्यणो ऽब्रवीत्‌ । युष्मन्नामयरहणेनापि » 
चस्यते ' किं पुनः स्पशेनेन । सपे आह । अस्माकं स्वातन्त्यं ना- 
स्ति । अनादिष्टा न दशमः । चिसत्येन्‌ात्मानं शपामि । अस्मत्स- 
काशान्‌ न भयं कतेव्यम्‌ । तेनेवम्‌ आकण्यो्तारितः सो ऽपि। १ 
अथ ते ब्रुवन्ति । सर्वेषां पापानाम्‌ आयतनं कश्चिन्‌ मनुष्यो 
भवति । एतन्‌ मत्वा नोच्तारयितव्यो ऽयम्‌ , न चास्य विश्वासम्‌ 
अनुगन्तव्यम्‌ । पुनर अपि व्याघ्रेणोक्तम्‌ । य एष पवतो बहुशि- ° 
खरो दृश्यते ' तस्यो चरे पाश्च दरीगहने मदीयगुहा । तच तया 
ममानुमहणायेकवारम्‌ आगन्तव्यम्‌ ' येनाहं भवतः प्रत्युपकारं 
करोमि ' येनृणेसंबन्धो ऽन्यजन्मन्य्‌ अपि न भवति । एवम्‌ 
उका गुहाभिमुखं प्रायात्‌ । अथ वानरो ऽब्रवीत्‌ । तनैव गुहा- 
संनिधो ममावासो निभैरसमोपे । तस्मिंस्‌ त्वया मत्सकाशम्‌ 
आगन्तव्यम्‌ ' इनि । एवम्‌ उक्ता प्रायात्‌ । सर्पैणोक्तम्‌ । यदा 
भवत आत्ययिकं भवति ' तदाहं स्मतेव्यः ' इति । एवम्‌ उक्ता 
यथागतम्‌ एव प्रायात्‌ । 

अथ स कूपस्थः पुरूषो मुहुर मुहुः शब्दं करोति । भो 
ब्राह्मण । माम्‌ अण्‌ उन्नारय । अथ हिजेन जातानुकम्पेन स्वपक्ष 
इति सो ऽ उत्तारितः । तेन चाभिहितम्‌ ' यथा । अहं सुवणे- 
कारः । भृगुकच्छे वसामि । यदि सुवणं किंचिद्‌ घटनीयं भवति ' ” 
तदा त्वया मम सकाशम्‌ आनेतव्यम्‌ " इति । एवम्‌ उक्ता यथा- 
गतम्‌ एव प्रायात्‌ । 


अथ ब्राह्मणेन भ्रमततापि न किंचिद्‌ आसादितम्‌ । गृहम्‌ 


०४, पए [0 ^ पा प्त एता. 800 क, 63 
आगच्छता तेन स्मृतं वानरोक्तम्‌ । आगतश् च तत्सकाशं दुष्टश्‌ 
च वानरः । तेनामृतस्वादुफल्ठानि निवेदितानि ' आश्वासितश् च 
स नैः । वानरः पुनर अब्रवीत्‌ । यदि फलैर भवतः कायेम्‌ ' ° 
तन्‌ नित्यम्‌ एवृगन्तव्यम्‌ । हिजेनाभिहितम्‌ । भवता सवे 
कृतम्‌ ' परं व्याघ्रं मे दशेय । तेन च नीत्वा व्याघ्रो दशितिः । 
व्याघ्रेण च ज्ञात्वा प्रत्युपकाराथं घटितयेवेयादिकं निवेदितम्‌ ' उक्तं ° 
च । कश्िट्‌ राजपुचो ऽश्वेनापहृत एकाकी मत्कमे पतितो व्यापा- 
दित च । तत्सक्तम्‌ एतत्‌ सवं मया सुप्रयुक्तं स्थापितं तव 
निमित्तम्‌ । एतट्‌ गृहीत्वा गच्छतु भवान्‌ यथयाभिप्रेतम्‌ ' इति । 9 
ब्राह्मणएष्ण च तट्‌ गृहीत्वा सुवणेकारं स्मृत्वा ' स॒ ममोपकारी 
विक्रापयिष्यति ' एवं मत्वा तत्सकाशं गतः । सुवणेकारेणापि 
साद्रेण *+पाद्याघांसनखादनपानभोजनादिसत्कियां कृत्वो क्तम्‌ ! 
यथा । भवान्‌ आदिश्तु ' किं करोमि । बिजेनोक्तम्‌ । मया 
सुवणेम्‌ आनीतम्‌ अस्ति । तत्‌ त्वया विक्रेतव्यम्‌ । सुवणेकारो 
ऽब्रवीत्‌ । दशय सुवणेम्‌ ' इति । टशितम्‌ अनेन । सुवणेकारस्‌ 
तट्‌ दुष्टा चिन्तितवान्‌ । मेवेदं घटितं राजपुचस्य निमित्ते । 
एवं च चित्तेनावधाया ब्रवीत्‌ । तिष्टतु भवान्‌ अनैव ' यावट्‌ अहं 
कस्यचिट्‌ टशेयामि । रवम्‌ उक्ता राजकुले गत्वा दशितं राज्ञः । :5 
तट्‌ दुष्टा राजाब्रवीत्‌ । कुच त्वयेदं प्राप्रम्‌ ' इति । सो ऽब्रवीत्‌ । 
मम वेश्मनि ब्राद्यणस्‌ तिष्ठति । तेनेदम्‌ आनीतम्‌ । ततश 
चिन्तितं राज्ञा । नूनं तेन दुरात्मनेव सुतो मे व्यापादितः ' इति ५ 
दशेयामि तस्य तत्फलम्‌ ' इति । ततः समादिष्टा आरक- 
पुरुषाः ' तं बाद्यणापसदं बन्धयित्वा व्यतीतायां रजन्यां मूत्ाम्‌ 
आरोपयत । 24 


८० 7. गृप्तढ एडा२^ ७176 07 एणा प्त8 ; 64 


¶ 216 ॐ: लदर्नपा ०6288 80 18111688 71810. 


तेभ च बद्धेन ब्राह्मणेन भुजगः स्मृतः ' स्मृतमाच एव च 
तदन्तिकम्‌ आगतः ' अव्रवीच्‌ च । किं तवोपकारं करोमि । 
डिजेनो क्तम्‌ । माम्‌ *अस्माट्‌ बन्धनान्‌ मोचय । सो ऽब्रवीत्‌ । 9 
अहं राजवल्लभा पत्नीं दंश्यामि । ततः कस्यापि महामान्तिकस्या- 
भिमन््रणाट्‌ अन्यभिषजां च विषनाशनैर अगदेः प्रलिघ्नाम्‌ अपि 
न निविषीकरिषयामि । तवेव हस्तस्यशेनान्‌ निविषीभविष्यति । ° 
ततस्‌ त्वं मुच्यसे । इति प्रतिज्ञाय सर्पेण राजमहिषी दष्टा । ततो 
राजकुले हाहाशब्दः समुत्थितः । सवतः पुरम्‌ आकुत्गरीभूतम्‌ । 
अथ गारुडिकमान्तिकतान्तिकंभेषजिकान्यदेशंनिवासिनः समाहूताः। ° 
समस्तेर अपि स्वशक्त्या समुपचरितम्‌ । न कस्यचिद्‌ उपचारेण 
निविषीभूता । ततो अमितो डिरिडिमः । तम्‌ आकण्ये हिजेनाभि- 
हितम्‌ । अहम्‌ एनां निविषीक्रोमि । इति वचनसमम्‌ एव 
बन्धनाद्‌ उन्मोच्य समानीय ब्राह्मणो राज्ञे निवेदितः । तत्तो 
राजाव्रवीत्‌ । भवान्‌ एनां निविषीकरोतु । सो ऽपि गत्वा 
राज्ञीसकाशं हस्तस्यशेमाचात्‌ तां निविंषीकृतवान्‌ । 5 

तां च प्रत्युज्जीविता दुष्टरा राजा तस्य पूजां गौरवं च कृवा 
सबहूमानम्‌ अमुं पृष्टवान्‌ । सत्यं कथयतु भवान्‌ ' केन प्रकारेणोदं 
सुवणं कन्धम्‌ ' इति । हिजेनादितः प्रभृति यथावृत्तम्‌ अनुभूतं 5 
सवेम्‌ आख्यातम्‌ । अवगतार्थेन च राज्ञा तं सुवणेकारं निगृद्यास्मे 
सामसहसरं दात्मनो मन्तित्वे नियोजितः। तेन च स्व की यकुटग्बम्‌ 
आनीय +मुहत्स्वजनसमेतेन भोजनादिक्रियापरितुषश्टेनानेकमख- 
करणाजितपुण्यप्राग्भारेण सकलराज्यचिन्तासंभृताधिपत्येन सुखम्‌ 


अनुभूयते स्म ॥ 


०६, (प [तकि ^ प्र वप्त एता. 280० 7. 65 


ए2116-807 न : 1107 27 एषा. 


अतो ऽहं व्रवीमि । व्याघ्रवानरसर्पांणाम्‌ ' इति । दमनकः पुनर्‌ अव्रवीत्‌ । 
स्वजनो ऽथ सुहृद्‌ गुरुर नृपो वा 
पुरुषेणोत्पथगो निवारणीयः । 8 
विनिवर्तयितुं स चेन्‌ न शक्यः 
परतस्‌ तस्य मनोनुगं विधेयम्‌ ॥ २४९ ॥ 909 
देव । स तावद्‌ द्रौही। किंतु। 6 
हितछृ्धिर अकार्यम्‌ रहमानाः 
सुहृदः क्ञेशपरि हान्‌ *निवायाः। 
परिपणम्‌ इदं हि साधुवृत्तं 9 
कथितं सच्चिर असाधुवृत्तम्‌ अन्यत्‌ ॥ २५०॥ | 
तथा । स ल्िग्धो व्यसनान्‌ निवारयति यस्‌ तत्‌ कमं यन्‌ निर्मलं 
सा स्त्री यानुविधायिनी स मतिमान्‌ यः सद्धिर अभ्यर्च्यते । 12 
साश्रीर्‌ यान मदं करोति स सुखी यस्‌ तुष्णया नह्यति 
तन्‌ भिचं यद्‌ अयन्त्रणं स पुरुषो यः खिद्यते नूापदि ॥ २५१॥ इद्वापत्त 
किंच। सुप्तं वह्नौ शिरः कत्वा  भुजंगस्स्तरे ऽपि वा । 15 
अप्य्‌ उपेचेत सम्मितं ' न पुनर व्यसनोन्मुखम्‌ ॥ २५२॥ 
तड्‌ यद्‌ इदं संजीवकसंसगेव्यसनम्‌ । तट्‌ देवपादानां चिवर्गहानिकरम्‌ । अथ बुह्गप्रकारं 
विज्नप्यमाना देवपाद्‌ा असद्रचनम्‌ अनादृत्य कामतः प्रवर्तन्ते । तद्‌ आयतौ दुःखापाति 18 
भृत्यदोषो न ग्राह्यः । उक्तं च । 
नृपः कामासक्तो गणयति न कारयन च हितं 
यथेष्टं स्वच्छन्दः प्रचरति हि मत्तो गज इव । 21 
ततो मानाध्मातः पतति स यदा शोकगहने 
तदा भव्ये दोषान्‌ क्तिपति न निजं वेत्य अविनयम्‌ ॥ २५३॥ कषाता४ 
सिंह आह । भद्र ' एवं खिति किम्‌ असौ प्रत्यादेश्यः। दमनक आह । किम्‌ इति प्रत्यादिश्यते। 24 
कतर एष नयः । यतः। 
प्रत्यादिष्टः पुरुषस्‌ । तरति विकर्तुं भयात्‌ प्रहरतु वा । 
तसात्‌ प्रत्यादेष्टं । न्याय्यो ऽरिः कर्मणा न गिरा ॥ २५४॥ ह" 27 
पिङ्गलकं आह । स तावच्‌ छष्यभोक्ता । वयं तु पिशितसुजः । तत्‌ कथम्‌ असौ मम्‌ापकर्त 
समर्थः । दमनको ऽब्रवीत्‌ । एवम्‌ एतत्‌ । स *+शष्पभुक्‌ ' देवपादाः पिरशितसुजः । सो 
$न्नभूतः । देवाद्‌ *+भोक्तमूताः । तथाप्य्‌ असौ यदि स्वयम्‌ अनर्थं *न करिष्यति । ततो ॐ 
ऽन्यस्माट्‌ उत्पाद यिष्यति । उक्त च । 
प्रेरयति परम्‌ अनायः ' शक्तेदरिद्रौ ऽपि जगदभिद्रहे। 


तेजयति खद्घा रां ' खयम्‌ असमथां शिला छेत्तुम्‌ ॥ २५५॥ ह 88 
॥ 4 


500 1. प 814 पलपल 07 एय ए प्र)8 ; 66 


81168107, 216 ॐ ¦ 1.0८5€ 206 768. 


सिंह आह । कथम्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । *त्वं तावद्‌ अजस्रम्‌ अनेकमत्तगजंगवयंमहिष॑वराह- 
शादु लंचिचकथु्ेषु नखदन्त॑संनिपातंकतत्रण शबल॑तनुः । अयं पुनः सदा व्वत्समीपवासी 
प्रकोणविरमूचः। तदनुषङ्गाच्‌ च कमयो भविष्यन्ति । ते युष्मच्छरीर सामीप्यात्‌ छतवि- 
वरानुसारिणो ऽन्तः प्रवेच्यन्ति। तथापि तवं विनष्ट एव ' इति । उक्तं च। 

न ह्य्‌ अविन्ञातशीलाय ' प्रदातव्यः परिथ्यः। 

दुण्डुकस्य हि दोषेण । हता मन्द विसर्पिणी ॥ २५६॥ ं 6 
सो ऽब्रवीत्‌ । कथम्‌ एतत्‌ । दमनकः कथयति । 


॥ कया १० ॥ 


अस्ति कस्यचिद्‌ राज्ञो वासगृहे सवेगुणोपेतम्‌ अनन्यसदृशं शय- * 
नीयम्‌ । तत्मच्छादनपटेकदेशे मन्दविसपिंणी नाम युका प्रत्तिव- 
सति स्म। पुच॑पोच॑दुहितुदौहिबादिंमहां प्रस व॑संतत्तिंपरिवृता राजानं 
सुघ्रम्‌ अन्तर्‌ भक्षयति । तच्छोणितेन पुष्टा दशेनीया च सा 
संवृत्वा । एवं च तस्यास्‌ तच वसन्या इणडको नाम मत्कुणो 
वायुप्रेरितस्‌ तस्मिञ्‌ शयने पतितः । स तु तच. छयनम्‌ अति- 
सूच्छोचरप्र्ादनपटम्‌ +"उभयोपधानं जाहवी विपुल पुलि नसदु्ं 
परममृदु सुरभिगन्धि दुद्रा परं परितोषम्‌ अगमत्‌ । तत्स्यश्ोकृष्ट- 
मना इतश चेतश च परिभिमन्‌ कथम्‌ अपि देववशान्‌ मन्दवि- 
सपिंण्या मिलितः ' त्तया चाभिहितः । कुतस्‌ त्वम्‌ अस्मिन्‌ 5 
प्रसुयोग्ये ऽ धिवासस्थाने समायातः । गम्यताम्‌ अस्मात्‌ त्वरितम्‌ ' 
इति । ततः सो ऽब्रवीत्‌ । आय ' मा मेवं वद्‌ । कुतः ।* 

गुरूर अग्निर्‌ जातीनां " वणनां ब्राह्यणो गुरः । श 

पतिर एको गुरूः स्त्रीणां ' सवेस्याभ्यागतो गुरूः ॥२५७॥ 
इति । अतिथिम्‌ तवाहम्‌ । मया तावद्‌ अनेकप्रकाराणि ब्रा 
दहणष्चियविट्‌मदराणां रूधिराण्य्‌ आस्वादितानि । तानि च ५ 
क्षाराणि पिच्छित्कान्य्‌ अपु्टिकणणि च । यः पुनर्‌ अस्य शयन- 


०7» वप्त तकि ^ कण त्त एता + 3008 7. 6¶ 


¶816 ॐ : 1.0८७6 206 768. 


स्याधिष्टाता ' तस्यासं शयं मनोरमम्‌ अमृतोपमं चासृग्‌ भविघययगि। 
अजसखं भिषग्भिः करियमाणोषधाद्युपक्रमप्रयत्नवश्णद्‌ वातपित्तचे- 
ष्मणाम्‌ अविरोधाट्‌ अनामयतया ल्िग्धद्वपेशठेः संखरडंदाडि- 9 
म॑चिकटु्कपटुभिः स्थल ज॑जलत्जखेचरंप्रधान॑पिश्ितो पस्कृतेर आहा- 
रैर उपवृंहणाट्‌ उपचरितं रुधिरं रसायनम्‌ इव मन्ये । ततस्‌ 
तत्‌ सुरभि तुष्टिपुष्टिकरं स्वादु च तव प्रसादाद्‌ आस्वादयितुम्‌ ° 
इच्छामि । सात्रवीत्‌ । असंभाव्यम्‌ एतत्‌ व्वद्िधानाम्‌ अग्रिसुखानां 
दंश्वृत्तीनाम्‌ । अतो ऽ पगम्यताम्‌ अस्माच छयनात्‌ ' इति । 
उक्तं च । 9 
देशं कालं काये ' परम्‌ आत्मानं च यो न जानाति । 
अविमृश्य यः करोति च' न स फलम्‌ आप्नोति वे मूखेः॥२५४॥ > 
ततः सो ऽस्याः पादयोर्‌ निपत्य पुनस्‌ तट्‌ एव प्राथितवान्‌ । "2 
सा तु दाक्षिण्यपरतया तत्‌ ' तथा ' इति प्रतिपन्नवती ' यतो 
राज्ञः कणीमुतकथानके कथ्यमाने प्रच्ाटनेकदेशवस्थितया तया 
श्रुतम्‌ ' यन्‌ मूत्ठेदेवेन देवदत्तायाः पृच्छन्याः कथितम्‌ । तथा हि । ८5 
यः पादयोर्‌ निपतितं ' कुपितो ऽपि न मन्यते । 
तेन ब्रह्मा हरिः शम्भुस्‌ ' चयो ऽपि स्युर्‌ विमानिताः ॥२५९॥ 
तच्‌ च स्मृत्वा तइ चनं प्रतिपद्याभिहितवती । परं नदेशे नाकाले 
त्वयास्य भक्षण योपस्यात्तव्यम्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । को देशः ' को वा 
कत्रः । अनभिज्ञो ऽहं नवसमागमत्वात्‌ । साब्रवीत्‌ । मदच्रम- 
निदरापरीतकायो यदा नृपतिर्‌ भवति ' तदा निभृतं पादयोस्‌ " 
त्वया दं्टव्यः ' एतौ देशकात्म । तथेव च तेन प्रतिपन्नम्‌ । एवं 
वतमाने प्रदोष एव तेन काल्ानभिज्ञेन बुभुक्षया चार्तेन सुप्रमाच्र 
एव पृष्ठप्रदेशे ट्टो राजा । असाव्‌ अष्‌ उल्काट्ग्ध इव ' वृश्चिक- ‰५ 


5001 1. (प ए871.^ मलल 07 एद ्0)8; 68 
¶ 216 ॐ: 1.0८56 8716 768. 78716 -8107$. ¶216 ॐ : 816 1861६]. 


दष्ट इव ' उल्सुकस्युष्ट इव त्वरिततरम्‌ उत्याय पुषटप्रदेशं संस्पृशन्‌ 
परिवतेकम्‌ आह । अरे ' दष्टो ऽस्मि केनापि । अस्मिञ्‌ शयने 
सुनिपुणं किंचित्स्वेटजजातिम्‌ +अन्वेषयत । इति राजवचनं श्रुत्वा ४ 
इरडुको भयात्‌ प्रणश्य सदूाविवरम्‌ एकम्‌ आश्रितः । अथ तेर्‌ 
नृपादेशकारिभिर्‌ आगत्य स्वाम्यादेशद्‌ दीपिकां गृहीत्वा सुनि- 
पुणम्‌ अन्वेषयद्धिर्‌ वस््ररोमान्तत्दीना मन्दविसपिणी विधिनि- ® 
योगाट्‌ आसादिता सपरिजना व्यापादिता च ॥ 

अतो ऽहं व्रवीमि । न ह्य्‌ अविज्ञातशीलाय ' इति । अन्यच्‌ च । देवपादैर्‌ यत्‌ क्रमागता 
मत्यास्‌ त्यक्ताः ' तद्‌ अयुक्तम्‌ । यतः । 9 

त्यक्ताश्‌ चाभ्यन्तरा येन ' बाह्याश्‌ चाभ्यन्तरीक्ृताः । 


स एव मन्युम्‌ आप्नोति ' मूखंश चण्डरवो यथा ॥ २६०॥ 
पिङ्गलक आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽत्रवीत्‌ । 12 


॥ क्या ११ ॥ 


अस्ति कश्चिन्‌ नगरपरिसरसंनिकृष्टविवरान्तर्शयी जग्ुकश 
भचर्डरवो नाम । स कदाचिद्‌ आहारम्‌ अन्वेषयन्‌ छपाम्‌ 
आसाद्य शरुतछषामकण्ठः परिभमन्‌ नगरम्‌ अनुप्रविष्टः । तततो 
नगरावासिभिः सारमेयेस्‌ तीषणदश्नकोटिभिर्‌ विल्दृयमाना- 
वयवो भयंकरारवचस्तहृटय इतस्‌ ततः प्रस्सत्ठन्‌ पत्छायमानः 5 
किम्‌ अपि शिस्पिगृहम्‌ अनुप्रविष्टः । तच बृहन्रीलिकाभारड- 
मध्ये पतितः ' गणश च यथागतं गतः । असाव्‌ अपि क्यम्‌ 
अप्‌ आयुःशेषतया तस्मान्‌ नीलिकाभार्डात्‌ समुत्पत्य वनं प्रति 
गतः । अथ तस्य शरीरं नीलीरसरल्जितं दष्टा समी पवतिनः सर्वे 
मृगगणाः ' किम्‌ इटम्‌ अपूवेवणोद्यं सखम्‌ ' इति वरवाणा 
भयतरत्ितद्‌शः पलायन्ते स्म ' कथयन्ति च । अहो ' अपूवेम्‌ एतत्‌ ५ 


०7, वप 0 ^ प्रा) ¶1प् ४ उणा, 5005 1. 69 
¶ 216 उ: 816 18181. 


सच्चं कुतो ऽप्‌ "आगतम्‌ । तन्‌ न विज्ञायते ' कीदृग्‌ अस्य 
चेष्टितं पीरुषं च । तट्‌ दूरतरे गच्छामः । उक्तं च । 

न यस्य चेश्टितं विद्यान्‌ ' न कुलटे न पराक्रमम्‌ । 8 

न तस्य विश्वसेत्‌ प्राज्ञो ' यदी खच्‌ *कियम्‌ आत्मनः ॥ २६१॥ 
चण्डरवो ऽपि तान्‌ भयव्याकुत्ान्‌ विज्ञायेदम्‌ आह । भो भोः 
्ापदाः ' किं मां दुष यूयं चस्ता *व्रजथ । यतः ' श्वापदानां ° 
न को ऽपि स्वामी ' इत्य्‌ अवगम्याखण्डलठे नाहं चण्डरवो नाम 
प्रभुत्वे ऽभिषिक्त इति मड्जवज्पन्ञरान्तरस्थाः सुखेन तिष्ठत । 
इति । तद्वचनम्‌ आकणये सिंहव्यापघ्र चिचक वानर॑शशकहरिणज- ° 
खुकाटयः खापदगणास्‌ तं प्रणेमुः ' प्रोचुश च । स्वामिन्‌ ' समा- 
दिश ' यट्‌ अस्माभिः कतेव्यम्‌ । अथ तेन सिंहस्यामात्यपद्वी " 
व्याघ्रस्य शय्यापाल्त्वम्‌ ' द्वीपिनः स्यगिका ' करिणः प्रतीहा- " 
एत्वम्‌ ' वानरस्य चछन््धारत्वं दत्तम्‌। ये पुनर्‌ आत्मीयाः भृगात्ा 
आसन्‌ ' ते स्वे ऽण्‌ अधेचन्दरं टा निःसारिताः । एवं च तस्य 
राज्ये धियम्‌ अनुभवतस्‌ ते सिंहादयो मृगान्‌ व्यापाद्य तस्य 
पुरतः प्रक्षिपन्ति । सो ऽपि प्रभुधर्मेण सर्वेषां संविभज्य तान्‌ 
प्रयच्छति । 

एवं गच्छति काटे कदाचित्‌ तेनास्थानगतेन तत्प्रदेशसन्न- 

शब्दायमानणृगात्छवृन्द शब्दम्‌ आकण्ये युलकितवपुषानन्दाशु- 
पूणेनयनयुगलेनोत्थाय तारतरस्वरेण शब्टायितुम्‌ आरब्धम्‌ । अथ 
ते सिंहादयस्‌ तट्‌ आक्णये ' णुगात्छो ऽयम्‌ ' इति मत्वा सलज्जा 
अधोमुखाः सणम्‌ एकं तस्थुर्‌ उक्तवन्तश च । भोः ' वाहिता 
वयम्‌ अनेन भृगाठेन । तट्‌ वध्यताम्‌ असो । सो ऽपि तट्‌ 
आक्ण्य पलायितुम्‌ इहमानो व्याप्रेण खगडशः कृतो मृत च ॥ ५ 


5001 71. गप्र ८ ए6¶1.^ प ल6प्& 07 ए एप्न08; 


ए78116-8107 र : 1.10 8200 एणा]. 


70 


अतो ऽहं ब्रवीमि । त्यक्ताश्‌ चाभ्यन्तरा येन । इति । पिङ्गलक आह । कथं न्नेयो ऽसौ 
मया दुष्टबुद्धिर्‌ इति ' कश्‌ चास युद्वमागेः ' इति । सो ऽत्रवीत्‌ । अन्यदसौ *खस्ताङ्गो 
देवपादान्तिकम्‌ आगच्छति । अद्य यदि शुङ्गायप्रहरणामियुक्तचित्तः सचकितशा चोपशि- $ 
ष्यति ' तद्‌ देवपदिर्‌ अवगन्तव्यम्‌ ' दुष्टबुद्धिर्‌ इति । 
एवम्‌ उत्कत्याय दमनकः संजीवकसकाशं प्रायात्‌ । तस्यपि मन्द गतिर्‌ अधृतिप- 
रीतम्‌ इवुात्मानम्‌ अदशेयत्‌ । ततस्‌ तेनुमिहितः। भद्र ' मवतः कुशलम्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 6 
कृतः कुशलम्‌ अनुजीविनाम्‌ । कस्मात्‌ । 


तथा 


तत्‌ सर्वथा । 


संपत्तयः परायत्ताः ' सद्‌ा चित्तम्‌ अनिर्वतम्‌ । 
स्वजीविते ऽप्य अविश्चासस्‌ । तेषां ये राजसेवकाः ॥ २६२॥ 
तावज जन्मापि दुःखाय । ततो दुगेतता परा। 

तचापि सेवया वृत्तिर्‌ । अहो कष्टपरंपरा ॥ २६३॥ 
जीवन्तो ऽपि मृताः पञ्च ' व्यासेन परिकीर्तिताः । 
दरिद्रो व्याधितो मखः ' प्रवासी नित्यसेवकः ॥ २६४॥ 
आहरन्न अपि न स्वस्थो । विनिद्रो न प्रबुध्यति। 

वक्ति न खेच्छया किंचित्‌ ' सेवको ऽ पह जीवति ॥ २६५॥ 
सेवा श्ववृत्तिर्‌ आख्याता ' यैस्‌ तेर्‌ मिथ्या प्रजल्पितम्‌ । 
स्वच्छन्दं चरति श्चा हि । सेवको राजशासनात्‌ ॥ २६६॥ 
भूशय्या ब्रह्मचर्यं च ' छशत्वं लघुभोजनम्‌ । 

सेवकस्य यतर्‌ यद्वद्‌ ' विशेषः पापधर्मजः ॥ २६७॥ 
स्वामिप्रायपरोकरस्य ' परचित्तानुवतिंनः । 
स्वयंविक्रीतदेहस्य ' सेवकस्य कुतः सुखम्‌ ॥ २६८॥ 
प्रत्यासत्तिं व्रजति पुरूषो यावतीं सेवमानः 

कुर्यात्‌ स्वामिन्य्‌ अवहितमनास्‌ तावतीम्‌ एव भीतिम्‌। 
राजा वहिः सदृ शम्‌ उभयं केवलं नामभिच्नं 

सह्यो दूराट्‌ भवति दहनो दुःसहः संनिकर्षात्‌ ॥ २६९॥ 
मृदुनापि सुगन्धेन । *सुमृष्टेनापि हारिणा। 

मोदकेनापि किं तेन । निष्पन्नो यस्‌ तु सेवया ॥ २७०॥ 
कः कालः कानि मित्राणि, को देशः कौ व्ययागमौ । 


कश्‌ चाहं काचमे शक्तिर्‌ ' इति चिन्त्यं सुगर सुञः ॥ २७१॥ 


12 


15 


18 


21 


24 


10810 


27 


इदयान्तनिंहितभावस्य दमनकस्य वचनं शरुत्वा संजीवको ऽत्रवीत्‌ । भद्र । कथय । किं 8 
वक्तकामस्‌ त्वम्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । भवांस्‌ तावन्‌ मम सुहत्‌ ' अवश्यं च मया तव हितम्‌ 
आस्थेयम्‌ । अयं हि तावत्‌ खामी पिङ्गलकस्‌ तवोपरि कुदधबुद्धिः ' अनेन चुव्यामिहितम्‌। 
संजीवकं हत्वा सर्वक्रव्यमक्षाणां तुर्तिम्‌ उत्यादयिष्यामि । इति । तच कूत्वाहं परं विषादम्‌ 8 


०, वप्र 1.07 ^ 7) वप्ता एता, 53000 ए. प्1 


एद16-8॥07 9 : 11070 2706 एषा. 


आगमम्‌ । तद्‌ यद्‌ अनन्तरं करणीयम्‌ ' तत्‌ क्रियताम्‌ । इति । तच्‌ च तद्वचनं वच्रपा- 
तसदूशम्‌ आक्यं संजीवकः परं विषादम्‌ अगमत्‌ । सर्वकालथ्रद्धेयवचनलाच्‌ च दमनकस्य 
सुतराम्‌ आविम्रहदयः परं भयम्‌ उपागतः संजीवकं आह । साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 8 


दुजेनगम्या नायः ' प्रायेणुपाचभृट्‌ भवति राजा । 
कृपणानुसारि च धनं । देवो गिरिजलधिवर्षो च ॥ २७२॥ र 


कष्टं भोः कष्टम्‌ । किम्‌ इदम्‌ आपतितं ममेति । 6 


कििंच। 


आराध्यमानो नुपतिः प्रयलाद्‌ 

आराध्यते नाम किम्‌ अच चिचम्‌ । 

अयं ब अपूर्वः प्रतिमाविशेषो श 
यः सेव्यमानो रिपुताम्‌ उपेति ॥ २७३॥ | 
निमित्तम्‌ उदिश्च हि यः प्रकुप्यति 

धरुवं स तस्यापगमे प्रसीदति । 12 
अकारणंदेषि मनो हि यस्य वै 

कथं नरस्‌ तं परितोषयिष्यति ॥ २७४॥ श ६8 
अकारणाविष्कृतवेरद्‌ारुणाद्‌ 15 
असज्जनात्‌ कस्य भयं न जायते। 

विषं महहिर इव यस्य दुर्वचः 

सुदुःसहं संनिहितं सद्‌ा मुखे ॥ २७५॥ एभ$9 18 
सरसि ब्ृशस्‌ ताराद्छायां दशन्‌ परि वञ्चितः 

कुसुदविरटपानेषी हंसो निशास्व्‌ अविचक्षणः । 

न द्‌ शति पुनस्‌ ताराशङ्ूौ दिवापि सितोत्पलं ५! 
कुहकचकितो लोकः सत्ये ऽप्य अपायम्‌ अपेते ॥ २७६॥ एं 


तद्‌ अहो । किं मयापकृतं स्वामिनः पिङ्गलकस्य । दमनक आह । वयस्य । निनिमित्ता- 
पकारपराः पररण्ध्रान्वेषिणश्‌ च राजानो भवन्ति। सो ऽब्रवीत्‌ । एवम्‌ एतत्‌ । साधु २५ 


चेदम्‌ उच्यते। 


चन्दनतरुषु भुजंगा । जलेषु कमलानि तच च ग्राहाः । 

गुणघातिनः खला इति › भवन्ति न सुखान्य्‌ अविध्धानि ॥ २७७॥ ढः 97 
न भीलगुद्के कमलं प्ररोहति 

न दुजेनात्‌ क्रापि शुभं प्रवतेते । 

न साधवो यान्ति कद्‌]पि विक्रियां 80 
यवाः प्रकीणां न भवन्ति शालयः ॥ २७८॥ थप्‌१६४ 

न स्मरन्त्य्‌ अपराधानां ' सरन्ति सुरूतान्य्‌ अथ । 

+"असंभित्नार्यमयांदाः । साघवः पुरुषोत्तमाः ॥ २७९॥ 38 


5001 7. (पए 28114 वल 07 एद एप्)8 ; 72 


01811650. ¶216 1: 6७0००86 80 ०1. 


अथवा ममैवायं दोषः ' यन्‌ मया कुमिचरसेवा छता । इति । उक्तं च । 
अकालचयां विषमा च गोष्ठी 


कुमिचरसेवा न कदापि कायां । 8 
पश्याण्डजं पद्यवने प्रसुप्त 
धनुर्विमुक्तेन शरेण भिन्नम्‌ ॥ २८०॥ प 
दमनक आह । कथम्‌ एतत्‌ । संजीवकः कथयति । 6 
॥ कया १२ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिट्‌ वनोदेशे महाप्रमाणं सरः । तत्र च मदरक्तो 
नाम हंसः प्रतिवसति स्म। तस्य च तचानेककालं बहुप्रकारं ° 
डतः समयो ऽतिवतेते । अथ कदाचित्‌ तस्यान्तकरो मृत्युर्‌ 
उत्टूकरूपेणायातः । तं च दुष्टा हंसो ऽब्रवीत्‌ । कुतस्‌ त्वम्‌ 
अस्मिन्‌ विजने वने । सो ऽब्रवीत्‌ । तव गुणखवणाट्‌ अहम्‌ 
आयातः । अपि च। 
पयेटन्‌ पृथिवीं सवौ ' गुणान्वेषणतत्परः । 
गुणेस्‌ त्रदधिको नान्यस्‌ ' तेनायातस्‌ तवान्तिकम्‌ ॥२४१॥ 
त्वया सह मयावश्यं ' सख्यं कायेम्‌ इहादरात्‌ । 
अपविच्रम्‌ अपि प्राण ' गङ्गां याति पविचरताम्‌ ॥ २४२॥ 
तचा च । 18 
हरिहस्तगतः शह्भः " पविचः प्रथितो ऽस्थ्य्‌ अपि । 
महानुभावसंसगेः ' कस्य नो ्तिकारकः ॥२४३॥ 
एवम्‌ उक्तेन हंसेन ' तथेव ' इति प्रतिपन्नम्‌ । हे सुमिच ' “ 
यथेष्टम्‌ उष्यताम्‌ अस्मिन्‌ महासरसि सुखसेव्ये ऽब वने मया 
समम्‌। एवं च तयोर्‌ विहरमाणयोः प्रीतिपूवै कात्मो ऽ तिवतेते। 
अधथान्यदोलूक आह । यास्याम्य्‌ अहम्‌ आत्मीया वासं पद्यवनं 
नाम । यदि मया किंचित्‌ प्रयोजनं ममोपरि च लेहानुभावः ' 


०९, प्ता 1.10 ^+ रा) वप्त एता. 500४ ए. (5: 
तद्‌ अवश्यं त्वया मम प्राधूशेकेनागन्तव्यम्‌ । एवम्‌ उक्ता 
स्वकीयावासं गतः । 

अथ कातेन गच्छता हंसश चिन्तितवान्‌ । तिष्ठन्‌ अहम्‌ » 
इहावासे वृद्धीभूतः ' न चान्याम्‌ अहं कांचिद्‌ अपि दिशं जा- 
नामि । तट्‌ अधुना गच्छामि तस्य प्रियसुहृद्‌ उलूकस्य सकाशम्‌। 
तच्र मे नवनवं विनोटस्थानं भष्यभोज्यं च भविष्यति । एवं 
विचिन्योत्गरूकसकाशं गतः । अथ तत्र पद्मवने तं न पश्यति । 
अतिसुनिपुणम्‌ अन्वेषयन्‌ यावत्‌ पश्यति ' तावद्‌ असुं दिवान्धं 
विषमविवरम्‌ आचितं दुष्टूाभिहितवान्‌ । भटर ' रह्म एहि । ° 
प्रियसुहृत्‌ ते हंसो ऽहम्‌ उपागतः । इति शचुत्वा तेनो च्यते । नाहं 
दिवस्चरः । तव मम चास्तं गते रवो समागमो भविष्यति । इति 
श्रुत्वा सुचिरं प्रतीष्य राचाव्‌ उत्टूकेन सह संगतः । स्वकुशत्ठ- "2 
वातादि विधाय मागेपरिश्रान्तस्‌ तचव प्रसुप्तः । 

अथ तस्मिन्‌ एव सरसि महान्‌ +"वणिजारकसाथे आवा- 
सितः । अथ साथेपतिः प्रत्यूषकात्ठ उत्थाय प्रयाणशङ्क दापि- "5 
तवान्‌ । अचान्तर उलूको महान्तं विस्वर शब्द्‌ कृत्वा नदीविवरम्‌ 
अनुप्रविष्टः । हंसस्‌ तु तथेव स्थितः । ततश च टुनिंमित्तचकि- 
तचित्तसाथेपतिप्ररितेन केनापि शब्टवेधिना धनुधेरेण सुदृढं धनुर्‌ "5 
आरोपाकणेपरूणे बाणम्‌ आकृ चोल्नूकनीडनिकटावासी हंसो 
व्यापारितः ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि । अकालचयां विषमा च *"गोष्ठी' इत्यादि । पुनः संजीवक आह । अयं 21 
तावत्‌ खामी पिङ्गलक आदौ वाग्मधुरः। परिणामे विषप्रतिमचित्तः । तत्‌ सर्वथा । 

परोक्ते गुणहन्तारं । प्रत्यक्ते प्रियवादिनम्‌ । 

वजैयेत्‌ तादशं मिचं ' विषकृम्भं पयोमुखम्‌ ॥ २८४॥ २4 


5001 1. (प ए17^ लाल 07 ए ए्78; 74 


ए1व16-8८07 श : 1.101 806 ४1. 


मया चैतट्‌ अनुभूतम्‌ ' यथा । 
दूराद्‌ उच्छितपाणिर्‌ आद्रंनयनः संप्रोज्द्िताधौसनो 
गाढालिङ्गनतत्परः प्रियकथाप्रभ्चेष्व अखिन्नोत्तरः। 8 
अन्तर्‌ गृढविषो बहिर्‌ मधुमयश्‌ चातीव मायापटुः 
को नामयम्‌ अपूर्वेनारकविधिर्‌ यं शिक्षितो दुजजनः ॥ २८५॥ = ४8ापत् 
आदाव्‌ अल्युपचारचाटुविनयालंकारशोभान्वितं ¢ 
मध्ये चपि विचिच्वाक्यकुसुभेर अभ्य्चितं निष्फलैः । 
*पेगुन्याविनयापमानमलिनं बीभत्सम्‌ अन्ते च यद्‌ 
धिक्‌ केन]प्य्‌ अकुलीनसंगतम्‌ असद्वमार्थम्‌ उत्पादि तम्‌ ॥ २८६ ॥ 8 9 
तथा च। नमति विधिवत्‌ प्रत्युत्यानं करोत्य्‌ अनुगच्छति 
प्रथयति दृढां भक्तिं लेहात्‌ परिष्वजते ऽधिकम्‌ । 
वदति मधुरं चित्तय्राहि प्रशंसति सहुणान्‌ 12 
न हि च कुरूते यत्‌ कर्तव्यं सदैव हि दु जनः ॥ २८७॥ एं 
कष्टं भोः कष्टम्‌ । ्राहं *+शष्यभकः कायम्‌ आमिषभक्सिंहसंसगेः। साधु चदम्‌ उच्यति । 
ययोर्‌ एव समं वित्तं ' ययोर्‌ एव समं कुलम्‌ । 15 
तयोर्‌ विवाहः सख्यं च । न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ २८८॥ 
उक्ती च । ङताशज्वालाभे सितवति रवाव +अस्तशिखंरे 
पिपासुः किज्ञल्कं प्रविशति सरोजं मधुकरः । 18 
तदन्तः संरोधं न गणयति संध्यासमयजं 
जनो ऽर्थो नुपायं विमृशति फलेकान्ततुषितः ॥ २८९॥ 11 
कमलमधुनस्‌ त्यत्का पानं विहाय नवोत्पलं 21 
प्रकतिसुरभिं गन्धोहामाम्‌ अपास्य च मालतीम्‌ । 
जलमधुकराः क्िश्यन्तौमे कटाम्बुषु दन्तिनां 
सुलभम्‌ अपहाथैवं लोकः खलेष्व अनुरज्यते ॥ २९०॥ षणं २५ 
गल्लो पान्त सुचिरनिमृतं वारि वन्यद्धिपानां 
ये सेवन्ते नवमधुरसासाद लुब्धा दिरेफाः। 


ते तत्कर्णेव्यजनपवनप्रङ्धितिः चिप्तदेहा 27 

नभूमिं प्राप्नाः कमलविवरक्रीडितानि सरन्ति ॥ २९१॥ 1 
अथवा गुणानाम्‌ एवायं दोषः । यतः। 

स्वफलनिचयो नम्रां शाखां करोति वनस्पतेर्‌ 80 


गमनम्‌ अलसं बर्हाटोपः करोति शिखण्डिनाम्‌ । 
चतुरगमनो जात्यो यो ऽश्वः स गौर्‌ इव वाह्यते 
गुणवति जने प्रायेैवं गुणाः खलु वैरिणः ॥ २९२॥ 0४ 38 


०४, व प् [तत्रि ^ वप्त एता. 800 1. 75 


72116501, ¶ 216 अ: 1101118 १€६811615 ०४६१६ ८३६१९६1. 


कालिन्द्याः पुलिनेन्द्र नोलशकलश्यामाम्भसो ऽ न्तर्जले 
मम्रस्युज्ञनपुज्ञमेचकनिभस्यहिः कुतो ऽन्वेषणम्‌ । 
तारामाः फणचक्रवालमणयो न स्युर्‌ यदि ्ोतिनो 8 
थर एवोत्रतिम्‌ आघ्रुवन्ति गुणिनस्‌ तैर एव यान्त्य्‌ आपदम्‌ ॥२९३॥ «20४ 
नरेन्द्रा भूयिष्ठं गुणवति जने ऽत्यन्तविमुखाः 
थियः प्रायो लोके व्यसनिषु च मूर्खषु च रताः। 6 
नराणां माहात्यं गुणत इति भिथ्या स्तुतिर्‌ इयं 
जनः प्रायेरौवं न हि पुरुषकारं गणयति ॥ २९४॥ धप४ 
सिंहैः पञ्ञरयन्त्रणापरिभवप्रम्लानदीनाननैर्‌ 9 
नागेर अङ्कशमिन्नमस्तकपुटेर्‌ मन्त्रालसेः पन्नगे । 
विदरद्खिश च निरा्रयव्यसनिभिः गुरेश्‌ च भाग्यत्ततेः 
कालः क्रीडनकैर्‌ + वृात्मरुचितिः प्रेङ्ोलयन्‌ क्रोडति ॥२९५॥ शप्तः 12 
सरःपद्यं त्यत्का विकसितम्‌ अपार विरहितं 
मदं नागेद््राणाम्‌ अभिलषति लोभान्‌ मधुकरः । 
न मूढस्‌ तत्कणव्यजनपरिघातं गणयति 15 
स्वभावात्‌ सर्वो ऽर्थो न हि खलु निदानं विमृशति ॥ २९६॥ (111 
तत्‌ सर्वथा मम चुद्रमण्डलान्तः प्रविष्टस्य जीवितं नासि । उक्तं च। 
बहवः पण्डिताः लुद्राः ' सवं मायो पजीविनः । 18 
कुर्युः छत्यम्‌ अकृत्यं वा । उद्वे काकादयो यथा ॥ २९७॥ 
दमनक आह । कथं चैतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 


॥ कथया १३ ॥ 21 


अस्ति कस्मिंश्चिन्‌ नगरे वणिक्‌ सागरदज्लो नाम । स उष्टशतं 
बहुमूल्यचेत्ककस्य भृत्वा कस्याश्चिद्‌ दिशि प्रस्थितः । अथ तस्य 
विकटनामोष्टो ऽतिभारेण निपीडितो विख्रस्तसवाद्धो निश्चेष्टः 
पतितः । ततो वणिक्‌ चेत्कभरम्‌ अन्येषृष्ेषु विभज्य सिषप्ता ' 
अरण्यभूमिर इयं विषमा ' अस्मिन्‌ स्थाने न शक्यते स्थातुम्‌ 
इति विकटे विहाय प्रस्थितः । तस्मिंश च साथ वाहे गते विकटः ® 
शनेः शनेः सं चरज्‌ +शष्यं भक्षयितुम्‌ आरब्धः । एवम्‌ असौ 


50०1 1. (1 ८6764 96१6 07 एप ए ्08 ; 76 
कतिपयेर्‌ एवाहोभिर बलवान्‌ संवृत्तः । तस्मिंश च वने मदोत्कटो 
नाम सिंहः प्रतिवसति स । तस्यानुचरा द्ीपिवायसगो मायवः । 
अथ तेस्‌ तट्‌ वनं भरमद्विर दृष्टः साथेवाहपरिभष्टः स उष्ट्रः । 9 
तं चाविज्ञातयू वैरूपं हास्यजनकं दुष्टा सिंहः पृष्टवान्‌ । इदम्‌ 
अपूव सखम्‌ इह वने पृच्यताम्‌ । कस्‌ त्वम्‌ असि । ततो 
ऽ बगततच्चाथों वायसो ऽब्रवीत्‌ । उष्टो ऽयं त्ठोके प्रख्यातनामा। ° 
ततः सिंहेन पृष्टः । भोः ' कुतस्‌ त्वम्‌ इह । तेन चात्मनो यथा- 
वृत्तवियोगः साथेवाहात्‌ समाख्यातः । अवगताभ्युपपत्तिना च 
तस्य सिंहेनाभयं दत्तम्‌ । एवं वते माने कदाचित्‌ सिंहो गजयुद्ध- ° 
रटनक्षतशरीरो गुहावासी संवृ्चः । अथ पञ्षेषु टिनेष्व्‌ अति- 
कान्तेषु सवे एव त आहारवेक्स्याट्‌ आत्ययिकापदि पतिताः । 
अथ तान्‌ *सीदतो ऽवत्ोक्य सिंहो ऽभिहितवान्‌ । अहम्‌ अनया 
छतरजा न स्मः पूवेवट्‌ भवताम्‌ आहारम्‌ उत्पाटयितुम्‌ । तट्‌ 
यूयम्‌ आत्मार्थे तावद्‌ अभ्युद्यमं कुरुध्वम्‌ ' इति । ततस्‌ ते प्रोचुः। 
एवं स्थितेषु देवपादेषु किम्‌ अस्माकं पुच्यर्थेन " इति । सिंह 
आह । तरिं ' साध्व्‌ अनुजीविवृत्तं भक्तिश च भवताम्‌ । तट्‌ 
एवमवस्यस्य ममो पानयध्वम्‌ आहारम्‌ ' इति । ततो यदा न 
किंचिट्‌ ऊचुस्‌ ते ' तदानेनाभिहिताः । भोः ' अलम्‌ अनया 
व्रीडया । गवेष्यतां किचित्‌ स्म्‌ । अहम्‌ एतदवस्यो ऽपि 
भवताम्‌ आत्मनश चाहारम्‌ उत्पादयिषे । 

अथ ते चल्वारो ऽपि भमितुम्‌ आरब्धाः । यावत्‌ सच किंचिन्‌ 
न पश्यन्ति ' तावद्‌ वायसम्ुगालो मन्त्येतते । ततर भ्ृगाल्मो 
ऽब्रवीत्‌ । भो वायस । किं प्रभूतभ्रमणेन । अयम्‌ अस्माकं प्रभोर 
विकटो विश्रब्धस्‌ तिष्ठति । तट्‌ एनं हत्वा प्राणयाचां कुमे; । 


० (प्र 1.0 ^ प्रा) वप्त एत 5800 1. ११7 


¶216 ॐ; । 1101718 16817675 0 प(६ 6810161. 


वायसः प्राह । युक्तम्‌ उक्तं भवता। परं किं तु स्वामिनाभयप्रदानं 
टच्तम्‌ अस्ति । तेना वध्यः स्याट्‌ अयम्‌ । णृगाल आह । युक्तम्‌ 
उक्तम्‌ । स्वामिनं विज्ञय यथास्य वधं मन्यते ' तथा करिष्यामि ' 
इति । तत्‌ तिष्ठन्तु भवन्तो ऽचरैव ' यावद्‌ अहं गृहं गत्वा स्वामि- 
वचनम्‌ आनयामि । एवम्‌ अभिधाय स्वामिनम्‌ उहिश्य सत्वरं 
प्रस्थितः । अथय सिंहम्‌ आसाद्येदम्‌ आह । स्वामिन्‌ ' समस्तम्‌ ९ 
अपि भान्ता वनं सांप्रतं बुभुश्षाक्रान्ताः पदम्‌ रकम्‌ अपि चत्कितु 
न शक्ताः । देवो ऽपि पथ्याहारी वतेते । तट्‌ यदि देवादेशो 
भवति ' तदा विकटपिशितिनाद्य पथ्यक्रिया क्रियते । अथ सिंहस्‌ » 
तस्य दारूणवाक्यम्‌ आकण्यं सकोपम्‌ इटम्‌ आह । धिग्‌ धिक्‌ 
पापाधम । यद्य्‌ एवं भूयो वदसि ' तत्‌ त्वां तत्छणाट्‌ एव हनि- 
ष्यामि ' यतो मया तस्याभयप्रदानं दत्तम्‌ । तत्‌ कथं स्वयम्‌ एव ५ 
व्यापाट्यामि । उक्तं च । 

न गोप्रदानं न महीप्रदानं 

नानप्रदानं हि तथा प्रधानम्‌ । 15 

यथा वदन्तीह बुधाः प्रधानं 

सवेप्रदानेष्व्‌ अभयप्रदानम्‌ ॥२९४॥ ९ 


तच्‌ छूता शृगाल आह । स्वामिन्‌ ' यद्य्‌ अनयप्रदानं दा "5 
वधः क्रियते ' तदा ते दोषो भवति । यदि. पुनः स देवपादानां 
स्वयम्‌ एव भक्तयात्मनो जीवितव्यं प्रयच्छति ' ततो न दोषः। 
तट्‌ यदि स्वयम्‌ एव स्वं वधाय नियोजयति " तदा वध्यः । 
अन्यथास्माकं मध्याद्‌ एकतमो भक्षणीयः । यत्कारणम्‌ ' देवः 
पथ्याहारी वतेते । सुधानिरोधाट्‌ अन्यादृशं दशं यास्यति । तत्‌ 
किम्‌ एतेः प्राशेर अस्माकम्‌ ' ये स्वाम्यर्थे न यास्यन्ति । यदि 


500 7. {702 26104 वल 07 ए प्र08; १६ 
¶ 216 अ: 1015 81618 0पका६ 68171161. 


स्वामिपादानां किंचिद्‌ अनिष्टं भविष्यति ' तदा स्माभिः पृष्ठतो 
वह्िप्वेशः कायेः । उक्तं च । 


यस्मिन्‌ कुले यः पुरुषः प्रधानः ४ 
सदेव यत्नेन स रषणीयः । 

तस्मिन्‌ विने हि कुत्ठे विनष्टं 

न नाभिभद्धै ह्य्‌ अरका वहन्ति ॥२९९॥ शक 


तच्‌ दत्वा मदोत्कटः प्राह । यद्य्‌ एवम्‌ ' तत्‌ कुर ' यद्‌ रोचते । 
इति श्चुत्वा सत्वरं गत्वा तान्‌ उवाच । अहो ' स्वामिनो 
महत्य्‌ अ वस्था वतेते । नासिकान्त प्राघ्रजीवितस्‌ तिष्ठति । तत्‌ ° 
तेन विना को ऽस्माकम्‌ अचर कानने रिता । तद्‌ अस्य शुदरो- 
गात्‌ परल्ोकप्रस्थितस्य स्वयं गत्वा स्वशरीरदानं कुमेः " येन 
स्वामिप्रसादस्यानृणतां गच्छामः । उक्तं च । 12 
आपदं प्राुयात्‌ स्वामी ' यस्य भृत्यस्य पश्यतः । 
प्राणेषु विद्यमानेषु ' स भृत्यो नरकं व्रजेत्‌ ॥ ३००॥ 
ततस्‌ ते सरवे बाष्पपूरितदृशो गत्वा मदोत्कटं प्रणम्योपविष्टाः । 
अथ तान्‌ दुद्रा मदोत्कटः प्राह । भो भोः ' प्राप्न दृष्टवा 
किम्‌ अपि स्वम्‌ । अथ काकः प्रोवाच । स्वामिन्‌ ' वयं तावत्‌ 
सवेचरैव पयेटिताः ' परं न किंचित्‌ सच्चं प्राप्रं दृष्टं वा । तट्‌ अद्य 5 
माम्‌ एव भष्यित्वा प्राणान्‌ धारयतु स्वामी ' येन देवस्याणा- 
यना ' मम पुनः स्वगंप्रा्निर्‌ भवति । उक्तं च । 
स्वाम्यर्थे यस्‌ त्यजेत्‌ प्राणान्‌ " म्यों भक्तिसमन्वितः । 
स परं पदम्‌ आप्नोति ' जरामरणवजितम्‌ ॥३०१॥ 
तच्‌ छूत्वा शृगालः प्राह । अस्पकायो भवान्‌ । तव भक्षणात्‌ 


०, (प्र [तकि ^ प्रा) वप्त एता. 80० क. 79 


216 ऋ: 11018 16811675 0 प ८871161. 


स्वामिनः प्राणयाचापि तावन्‌ न भवति । अपरं दोषश् च 
समुत्प द्यते । उक्तं च ' यतः । 
काकमांसं तथोच्छिष्टं ' स्तोकं तट्‌ अपि दुबेत्ठम्‌ । ४ 
भष्ितिनापि किं तेन ' येन तृर्चिर्‌ न जायते ॥३०२॥ 
तट्‌ टित भवता स्वामिभक्तिः। प्राप्रा त्ठोकइये ऽपि साधुता । 
तद्‌ अपसर ' येनाहम्‌ अपि स्वामिनं विज्ञपयामि । तथानुष्ठिते ¢ 
प्पुगाल्ः सादरं प्रणम्य प्रोवाच । स्वामिन्‌ ' अद्य मम कायेन 
प्राणधारणां कृत्वा मम त्टोकदयप्रा्िं कुर । उक्तं च । 
स्वाम्यायत्ता यतः प्राणा ' भृत्यानाम्‌ अजिता धनैः । ° 
यत्स्‌ तेन न दोषो ऽस्ति ' तेषां मह णसंभवे ॥३०३॥ 
तट्‌ आकण्यं द्वीपी प्राह । भोः ' साधूक्तं भवता । परं भवान्‌ अपि 
स्वस्यकायः ' स्वजातीय च *नखायुधत्वाट्‌ अभ्य एव । उक्तं च। 12 
नाभध्यं भक्षयेत्‌ प्राज्ञः ' प्राणैः करदगतैर्‌ अपि । 
विशेषात्‌ तट्‌ अपि स्तोकं ' लोकदयविनाशि च ॥३०४॥ 
तट्‌ दशितं भवतात्मभृत्यत्वम्‌ । साधु चेदम्‌ उच्यते । 16 
एतदयं कुत्ढीनानां ' नृपाः कुवेन्ति संमहम्‌ । 
आदिमध्यावसानेषु ' न ते गच्छन्ति विक्रियाम्‌ ॥ ३०५॥ 
तद्‌ अपसरतु भवान्‌ अयतः ' येनाहम्‌ अपि स्वप्रभं प्रसाद्‌- 5 
यामि । तथानुष्ठिते द्वीपी प्रणम्योवाच । स्वामिन्‌ ' क्रियताम्‌ 
अद्य मम प्राणैः प्राणयाच्ा । दीयतां ममाक्षयः स्वर्गवासः । 
विस्तायेतां सितितले प्रभूतं यशः । तन्‌ नाच विकस्य: कायेः । 
उक्तं च। 
स्थितानां स्वामिनः कार्ये ' भृत्यानाम्‌ अनुवतिनाम्‌ । 
भवेत्‌ स्वर्गे ऽयो वासः ' कीति च धरणीतले ॥३०६॥ > 


5001 7. वप 2871^ 6286 07 एप एप्)8; 80 

216 अया: 1.1071*5 7811678 ० पका६ € व्ल]. 07 वा16-8६07 $. 
तच्‌ छत्वा विकटकश चिन्तयाम्‌ आस । रतेस्‌ तावच्‌ खोभाव- 
चनान्य्‌ अभिहितानि ' न चको ऽपि स्वामिना विनाश्ितिः । 
तट्‌ अहम्‌ अपि प्राप्रकालं विज्ञपयामि ' येनं ममापि वचनम्‌ 9 
एते चयो ऽपि विघटयन्ति। इति निश्ित्य प्रोवाच । भोः ' युक्तम्‌ 
उक्तं भवता । पर भवान्‌ अपि +नखायुधः । तत्‌ कथं स्वामी 
भवन्तं भक्षयति । उक्त च ' यतः । ` ८ 

मनसापि स्वजात्यानां ' यो ऽनिष्टानि विचिन्तयेत्‌ । 

तस्य त्ोकयं नास्ति ' भवेच्‌ चाशुचिकीटकः ॥३०७॥ 
तट्‌ अपसरायत्तः ' येनाहं स्वामिनं विङ्ञपयामि । तथानुष्ठिते * 
विकटकः पुरः स्थित्वा प्रणम्योवाच । स्वामिन्‌ ' एते तावट्‌ 
अभष्या भवताम्‌ । तन्‌ मम प्राणैः प्राणयाचा विधीयत्ताम्‌ " 
येन ममोभयत्टोकप्राघ्निर्‌ भवति । उक्तं च । 12 

न यज्वानो ऽपि गच्छन्ति ' तां गतिं नेव योगिनः । 

स्वाम्यर्थे प्रोज्सितिप्राणा ' यां गतिं यान्ति सेवकाः ॥ ३०४॥ 
एवम्‌ अभिहिते सिंहानुज्ञातचिचकमृगात्छाभ्यां विदारितकुशिः 
काकेन चोत्पाटितनयनो विकटकः प्राणांस्‌ तत्याज । तैश च 
सुद्भारपी डितः सर्वेर अपि भक्तितः ॥ 
अतो ऽहं व्रवीमि । बहवः पण्डिताः चुद्राः ' इति । आख्याते चूख्यानके पुनर्‌ दमनकं 18 
संजी वको ऽब्रवीत्‌ । भद्र ' चुद्रपरिवारो ऽयं राजा न शिवायूारितानाम्‌। करं गृध्रो 
$पि राजा हंसपरिवारः ' न हंसो ऽपि राजा गुघ्रपरिवारः, इति । यतो गृध्रपरिवाराद्‌ 
धि खामिनो बहवो दोषाः प्रादुर्भवन्ति । ते चुलं विनाशाय । तस्मात्‌ तयोः पूर्वम्‌ एव 21 
राजानं लिप्सेत । असद्रचनप्रचारितस्‌ तु राजा विचाराचमो भवति । श्रूयते चैतत्‌। 

येन ते जम्बुकः पाच ' तीच्णतुण्डशरा च वायसः । 


तेनाहं वम्‌ आरूढः । परिवारो न शोभनः ॥३०९॥ ४५ 
दमनक आह । कथम्‌ एतत्‌ । संजीवकः कथयति । 


०१, (प्र [0 ^ प्रण) वप्त एत 800६ 1. 


¶216 अपः 1.10 27त क176ा 11६. 


॥ कया १४ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिन्‌ नगरे रथकारो देवगुप्रो नाम । स चाजस्रं 
पथ्यदनं गृहीता सभायों ऽरण्ये महाञ्ननस्तम्भाज्‌ छिनत्ति । अथय 
तच वने विमत्तो नाम सिंहः प्रतिवसति स्म । तस्यानुचरौ जलौ 
 पिशित्ताश्नौ गोमायुवायसो । अथ कटाचित्‌ सिंह एकाकी वने 
परिभमंस्‌ तं रथकारम्‌ अपश्यत्‌ । रथकारो ऽपि तम्‌ अतिभ- 
यानकं सिंहं दष्टा गतासुम्‌ इवात्मानं मन्यमानः प्रतयुत्पन्नमति- 
तया वा ' बलवदुपसपेणम्‌ एव श्रेयः ' इति तदभिमुखं गत्वा 
प्रणम्य प्रोवाच । ण्य्‌ एहि ' सखे । अद्य मदीयम्‌ एव भष्यं 
त्वया भकछयित्तव्यं तव भातृजाययो पनतम्‌ ' इति । तेन चाभिहितम्‌ 
भद्र ' न ममानेन प्राणयाचा भवति ' यत्तः पिशिताश्नो ऽहम्‌ । 
परं तथापि व्वदीयप्रीत्या किंचिद्‌ आस्वादयामि ' कीदृश्णो ऽयं 
भ्यविशेष इति । एवम्‌ उक्तवति सिंहे रथकारेण संखणडधुतदरा- 
छा चतुजांतक वासितं लुका शोकवतिलाद्यकप्रभृतिभिर्‌ विविधभ- 
स्यविशेषेः सिंहस्‌ तपितः । सिंहेनापि कृतज्ञतया तस्याभयं 
प्रदत्तम्‌ ' वने ऽ सत्ठितप्रचारः कृतः । ततौ रथकारो ऽब्रवीत्‌ । 
वयस्य ' त्या प्रत्यहम्‌ अचरागन्तव्यम्‌ ' परम्‌ एकाकिनेव । न 
कश्चिद्‌ अन्यो ममान्तिकम्‌ आनेतव्यः । एवं च तयोः प्रीतिपू वैकं 
कालत्छो ऽतिवतेते। रवं च प्रतिदिनं तथाविधविविधाहारविहित- 
सौहित्यः सिंहो ऽपि न मृगयाविहारं चकार । अथ परभाग्योप- 
जीवितया सुधा बाध्यमानाभ्यां गो मायुवायसाभ्यां सिंहो विज्ञप्तः । 
स्वामिन्‌ ' क्र भवान्‌ प्रत्यहं गच्छति ' गत्वा च प्रीतमनाः प्रत्याग- 
च्छति ' इत्य्‌ आवयोः कथय । सो ऽब्रवीत्‌ । न क्चिट्‌ अहं 
॥ ॥ 


81 


ॐ 


6 


9 


1 


15 


18 


21 


5001 1. प ४ 2874 9617986 07 एप ए 78; 8 
¶816 ऋफ: [त०ा 27 कल्ला, ह 72.1116.8{01 5. 
गच्छामि । अय ताभ्याम्‌ अत्याद्रेण पृष्टेन सिंहेनोक्तम्‌ । अस्मिन्‌ 
वने ऽस्मत्सखा प्रतिदिनम्‌ आगच्छति । तस्य च जाया महाभ- 
छ्यविशेषान्‌ सं पाटयति । तान्‌ अहं प्रीतिपूवेकम्‌ उपमुञ्ञे । ततस्‌ 9 
ताभ्याम्‌ उच्यते । तच गत्वा रथकार व्यापाद्य तदीयशोणितमांसेन 
प्रभूतकात्ठम्‌ आत्मपुषटिं करिष्यावः। तच्‌ च शचुत्वा सिंहो ऽ ्रवीत्‌। 
अहो ' मया तस्याभयं प्रद्तम्‌ । कथं मनसापि तस्योपरौदृ्षम्‌ ९ 
अशोभनं चिन्यते । किं तु भवतोर्‌ अपि विशिष्टं भष्यविशेषं 
तस्मात्‌ संपादयिषयामि । तथेव ताभ्यां प्रतिपन्नम्‌ । तततो रथकारस्य 
सकाशं ते गन्तुम्‌ आर्धाः। अथ टूराट्‌ एव रथकारः सिंहं दुष्टपरि- ° 
वारसमेतं दुष्टा चिन्तितवान्‌ । न शेभनम्‌ आपतितं मम । इति 
त्ररिततरं सकत्रनो वनस्पतिम्‌ आरूढः। अथागत्य सिंहो ऽ्रवीत्‌। 
भद्र ' किंनिमित्तं माम्‌ आयातं दुद्रा वनस्यतिम्‌ आरूढः । स ५ 
एवाहं तव सुहृद्‌ विमली नाम सिंहः। मा भेषीः ' इति। ततस्थेन 
रथकारेणोच्यते । येन ते जग्ुकः पार्श्वं ' इत्यादि ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि । चुद्रपरिवारो राजा न शिवायूथितानाम्‌। कथिते चाख्यानके पुनर्‌ 15 
अपि संजीवक आह । सो ऽयं केनापि ममोपरि पिङ्गलको विप्रकृतः । अपि च। 
मृदुना सलिलेन खन्यमानान्य्‌ 
अवपुष्यन्ति गिरेर अपि स्थलानि। 18 
उपजापविदां च क्णजापेः 
किम्‌ उ चेतांसि मृदूनि मानवानाम्‌ ॥ ३१०॥ 80108 
तद्‌ एवं गते किम्‌ अधुना प्राप्रकालम्‌ । अथवा किंम्‌ अन्यद्‌ युद्धात्‌ । उक्तं च । 21 
यान्‌ यज्ञसंधेस्‌ तपसा च लोकान्‌ 
स्वर्गेषिणो द्‌ानचयैश च यान्ति । 
प्राणांश च युद्धेषु परित्यजन्तः | 
चणेन तान्‌ एव हि यान्ति शूराः ॥ ३११॥ पा 
तथाच। मृतः प्राप्स्यति वा खगे ' शच्रूज जित्वापि वा सुखम्‌ । 
उभाव अपि हि शूराणां ' गुणाव एतौ सुखावहौ ॥ ३१२॥ 27 


०६, (प्र [0 ^ पा पए एतान 50० ए. 83 


ए78716-51079. ¶216 ऋण: 5871त-817त 206 56३. 


तथा च। मणिकनकविभूषणा युवत्यो 
*#द्विपतुरगासनचामराः थियश्‌ च। 


अविकलशशि कान्तम्‌ आतपचं + 

न भवति मातुमुखस्य युद्धभी रोः ॥ ३१३॥ एण्ड 

तदचः श्रुत्वा दमनकशा चिन्तितवान्‌ । तीच्णगङ्गो ऽयं पुष्टतरवपुः । कदाचिद्‌ दैववशात्‌ 
स्वामिनः प्रहरेत्‌ । *तद्‌ अप्य्‌ अयुक्तम्‌ । उक्तं च । ¢ 


संदिग्धो विजयो युचै ' जायते महताम्‌ अपि । 

उपायचरितयाद्‌ ऊर्ध्वं । तस्माद्‌ युध्येत पण्डितः ॥ ३१४॥ 
तड्‌ एनं खबुद्या युद्धपराद्युखं करोमि । इति । आह च । भद्र '। अनुपाय एषः । 9 
यत्कारणम्‌ 

शरच्ोर्‌ बलम्‌ अविज्ञाय, वैरम्‌ आरभते तु यः। 

स पराभवम्‌ आभ्नोति ' समुद्रष्‌ रिड्िमाद्‌ इव ॥ ३१५॥ 12 
संजीवक आह । कथम्‌ एतत्‌ । दमनकः कथयति । 


॥ क्या १५ ॥ 


अस्ति ' कस्मिंश्चिन्‌ *मषमकरकूमे माहंशिणुमार॑शुक्तिशद्ेर अन्ये + 
च प्राणिगणेर्‌ आवृतस्य महो टधेस्‌ तीरिकदेशे टिटिभिदंपती प्रति- 
वस्तततः । तत्रोत्चानपादो नाम टिट्िभिः ' पतिव्रता नाम टिट्टिभी । 

. सा कदाचिद्‌ ऋतुकात्छरावबद्वफत्का प्रत्यासन्नप्रसवा संवृत्ता । तच 5 
तया टिद्िभो ऽभिहितः। किंचित्‌ स्थानम्‌ अन्विष्यताम्‌ ' यच्राहं 
प्रसुवे । टिट्िभो ऽ वीत्‌ । नन्व्‌ एतद्‌ एव स्थानं पूवेपुरूषो पाजिंतं 
वृद्धिकरम्‌ । अक्रैव प्रसूष्व ' इति । साब्रवीत्‌ । अत्वम्‌ अनेन 
सापायेन स्थानेन । अत्रायम्‌ अभ्यणेः समुद्रः । कदाचित्‌ मुटूरम्‌ 
उल्सता वेत्ाजलेन ममापत्यान्य्‌ अपहरेत्‌ । असाव्‌ आह । भदे ' 
जानात्य्‌ एष माम्‌ उत्तानपादम्‌। न सत्तु शक्तो महोद्धिर्‌ मया 
साधेम्‌ इदृशं वेरानुबन्धं विधातुम्‌ । किं न श्युतं भवत्या । 


500४ 1. (7 ए ए877.^ अप पर& 07 एप एप्रा)8; 84 
¶ 216 अम: 320त-717त 2090 868. 


को गुह्याति फणमणि ' ज्त्न्तम्‌ अतितेजसा भुजंगस्य । 
यो दृष्टैव प्रहरति ' दुरासदं कोपयति कस्‌ तम्‌ ॥३१६॥ ग 
सीष्मातपतप्रो ऽपि हि ' वृक्षादिनिराश्रये ऽपि कान्तारे। २ 
गाचच्छायां कः किल ' मटान्धनागस्य सेवेत ॥३१७॥ > 
किं च। 
प्रालेयत्रेशमि्े ' मरूति प्राभातिके च वाति जड । 5 
गुणदोषज्ञः पुरुषो ' जलेन कः शीतम्‌ अपनयति ॥३१४॥ ° 
मत्तेभकुम्भविदत्नष्कृतश्वमं सुघ्रम्‌ अन्तकप्रतिमम्‌ । 
यमलत्लो कटशेनेच्छुः ' सिंहं बोधयति को नाम ॥३१९॥ ५ 
को गत्वा यमसदनं ' स्वयम्‌ अन्तकम्‌ आदिश्त्य्‌ अजातभयः। 
प्राणान्‌ अपहर मच्चो ' यदि शक्तिः काचिद्‌ अस्ति तव ॥३२०॥ ® 
ज्वाताशतरुदागश्वरम्‌ ' अपगतधूमं सदा महाभयदम्‌ । 12 
मन्दमतिः कः प्रविशति ' हुताशनं स्वेच्छया मनुजः ॥३२१॥ => 
इति । एवं वटति खगे विहस्य सा टिट्िभी विदितता तच्छक्तेर्‌ 
उक्तवती । साध्व्‌ इदम्‌ ' एवं च बहूसद्‌ शम्‌ । 15 
किं भाषितेन गुरुणा ' ल्लोके हास्यो "भविष्यसि खगेन्द्र । च 
हदते तट्‌ इहाश्वयं ' यच्‌ छशको हस्तिलिर्डानि ॥३२२॥ 
कथं चात्मनो स्वयं न ज्ञायते सारासारता ' इति । उक्तं च । 
दुःखम्‌ आत्मा परि द्ेचरुम्‌ ' इति योग्यो न वेत्ति वा । 
इदं यस्यास्ति विज्ञानं ' न स कृद्छूषु सीदति ॥३२३॥ 
अनेन सिध्यति दय्‌ एतन्‌ ' ममाप्य्‌ एष पराक्रमः । भ 
एवं ज्ञावा चरेद्‌ यस्‌ तु ' सफल्ास्‌ तस्य बुद्धयः ॥३२४॥ 
सुषु चदम्‌ उच्यते । 


०४, (प ए [तकि ^ कण (प्त ४ एता. 2800 1. 85 


¶ 216 ऋ: 51810010 270 862. ध 216 णं: 7० £ €€86€ 81 ६०६८०156, 


मित्राणां हितकामानां ' न करोतीह यो वचः । 
स कूमे इव टुबृद्धिः ' काष्ठाट्‌ भष्टो विनश्यति ॥३२५॥ 
टिदटिभ आह । कथम्‌ एतत्‌ । साब्रवीत्‌ । 9 


॥ कथया १६ ॥ 


अस्ति कस्मिश्चित्‌ सरसि क्खुपीवो नाम कच्छपः । तस्य च 
सुहृदो संकटविकटनामानौ हौ हंसो । अथ काल पयौयाट्‌ ्ाद्‌श- ® 
वारषिक्य्‌ अवृष्टिर्‌ आपतिता । ततस्‌ तयोर्‌ श्दृशं चित्ते संजातम्‌ ) 
छी णतोयं जातम्‌ इदं सरः । अन्यं जत्ाश्यं गख्छावः ' इति । किं 
पुनश चिरपरिचित्तम्‌ इदं प्रियमिचं कब्ुमीवम्‌ आमन्तया वहे । ° 
तथानुष्ठिते कच्छपेनाभिहितम्‌ । कस्मान्‌ मम्‌ामन्वणं क्रियते । 
अहं हि जलचरः । इहाद्य स्वल्यजल्त्वाट्‌ युवयोर्‌ वियोगदुःखाच्‌ 
च विनष्ट एवाचिराट्‌ अस्मि तट्‌ यदि मयि कश्चित्‌ लेहो 
ऽस्ति ' ततो माम्‌ अस्मान्‌ मृत्युमुखात्‌ चातुम्‌ अहेथः । किं तु 
युवयोस्‌ तावट्‌ आहारवेकल्यम्‌ एव केवत्म्‌ अस्मिन्‌ स्वस्पोट्के 
सरसि ' सद्य एव ममार मरणम्‌ । तच्‌ चिन्यताम्‌ आहारप्रा- 
णवियोगयोः किं गरीयः ' इति । ततस्‌ ताभ्याम्‌ अभिहितम्‌ । 
असमणाव्‌ आवाम्‌ अपक्षिणं जलचरं लां सह नेतुम्‌ । कच्छपो 
ऽब वीत्‌ । *अस्त्य्‌ उपायः । समानीयतां यटिकाष्टखणडम्‌ एकम्‌ । 5 
तथानुष्ठिते य्टिखश्डं मध्ये *टनसंदंशेन धृत्वो वाच । एनं चञ्चा 
सुदृढम्‌ उभयपाश्वेयोर्‌ गृहीव्योङ्णीय गम्यतां व्योममार्गेण समग- 
तिभ्यां युवाभ्याम्‌ ' यावद्‌ अन्यो विश््िजिताश्यः ' इति । अथ 
ताव्‌ ऊचतुः । अपायत्टष्णो ऽयम्‌ उपायः । यदि कथम्‌ अपि 


5001 1. (प ए 28714 परल क्रल 07 एप एप्08; 86 

¶216 ङण : (7० 26686 271त ६०६०१७९. ¶21€ अफ: 9६21त-07त 27 868. 216 कण: {11766 88068, 
स्वस्पातापम्‌ अपि क्रोषि ' तदा यशटिमरहाच्‌ च्युतः सुदूरात्‌ 
पतितः खरडण्णे भविष्यसि । कच्छप आह । मम खलु मोनव्रतम्‌ 
अद्यप्रभृति ' यावद्‌ आकाशगमनम्‌ । अथ तथानुष्ठिते कथं कथम्‌ 
अपि ताभ्यां हंसाभ्यां जलाशयाट्‌ आसन्रनगरोपरिभागेन तथा 
नी यमानं कच्छपं दुष्टरा ' किम्‌ इदं शएकटसद्‌ शं वियता पक्षिभ्यां 
नीयते " इत्य्‌ अधस्ताज्‌ जनकल कल्ारवः समुत्थितः । तं च १ 
कच्छपः श्युतासन्नमत्युश चापलाद्‌ अव्रवीत्‌ । एष लोकः 
प्रलपति । इति ब्रुवन्‌ वाक्समम्‌ एव चाशयान्‌ मूखेः परिष्टो 
भमो निपतितः । तत्कालम्‌ एव मांसाथिना त्छोकेन तीष्णशस्तेः ° 
खण्डे विभक्तः ' इति ॥ 

अतो ऽहं ब्रवीमि । मिचाणां हितकामानाम्‌ ' +इति । 
पुनश चाब वीत्‌ । 19 

अनागतविधाता च ' प्रत्युत्पन्नसतिश च यः । 

ाव्‌ एतो सुखम्‌ एधेते ' यद्विष्यो विनश्यति ॥३२६॥ 
रिदटिभि आह । कथं चेतत्‌ । सा कथयति । 5 


॥ कया १७ ॥ 


कस्मिंश्चिन्‌ महाहदे महाकायास्‌ चयो मत्स्याः प्रतिवसन्ति स्म " 
तट्‌ यथा ' अनागतविधाता प्रतयुत्पन्नमतिर्‌ यद्जविष्यः ' इति । 
तच यो ऽसाव्‌ अनागतविधाता ' तेनोदकतीरन्ते कदाचिद्‌ 
अतिक्रमतां मतस्य बन्धिनां च वचनम्‌ अनु्रुतम्‌ ' यथा । बहू- 
मत्स्यो ऽयं हृद्‌: । अचर श्वो मस्यवन्धनं कुमेः। तच्‌ च शरुत्ानाग- " 
¦ तविधाचा चिन्तितम्‌ । न शोभनम्‌ आपतित्तम्‌ । अ वश्यम्‌ एते 


०, (प्र 1.10 ^ 7 वप्त एता, 2०00४ 1. 87 


¶ 216 अ: 11766 81068. 216 अः 57800170 816 868. 


श्वः परश्वो वाचागन्तारः । तट्‌ अहं प्रतयुत्पन्नमतियज्नविष्यो गृही- 
त्वान्यम्‌ अविच्छिन्रखोतसं हृद्‌ संश्रयामि । ततस्‌ ताव्‌ आहूय 
पृष्टवान्‌ । तच प्र्युत्प्नमतिर्‌ अव्रवीत्‌ । चिरसेवितो ऽयं हृदो 9 
न शक्यत एकपद एव पलित्यक्कम्‌ । यद्य्‌ अचर मत्यजीविनः 
समागमिष्यन्ति ' तदाहं तत्समयोचित्तकमेणा केनाप््‌ आत्मानं 
रक्षयिष्यामि । यद्वविस्‌ त्‌ आसनमृत्युर आह । सन्त्य्‌ अन्ये ऽपि ® 
विपुलतरा हृदाः। को जानाति ' यद्‌ अच्रागमिषयन्ति वा न *वेति। 
तन्‌ न युक्तम्‌ एतावच्छूवणमात्रेणापि जन्महूद्‌ं परित्यक्तुम्‌ । 
उक्तं च ' यतः । ५ 
सपीणां टुजेनानां च ' परच्छिदानुजी विनाम्‌ । 

अभिप्राया न सिध्यन्ति ' तेनेदं वतेते जगत्‌ ॥ ३२७॥ 
तस्मान्‌ मया न गन्तव्यम्‌ । +एष निश्चयः ' इति । एवं तो तच 
स्थिरौ मल्वनागतविधातान्यजलाशयं गतः । अन्येद्युण चापयाते 
तस्मिन्‌ *"परिजनसमेतेर मत्यवन्धेर्‌ अन्तःसोतो निरुष्य जालं 
प्रक्षि निःशेषमत्स्यानां बन्धः कृतः । एवं स्थिते प्रत्युत्पन्नमतिर्‌ "ऽ 
मृतरूपं *जालस्यान्तर आत्मानं दशितवान्‌ । तेण च ' स्वयम्‌ 
एव मृतो ऽसौ महामत्सः ' इति मत्वा जात्राट्‌ आकृष्य तटे 
स्थापितः । ततो ऽसो भूयो जलाश्यं प्रविष्टः । यद्गविष्यस्‌ तु 
जाल विवरविनिहितसुखः समुलखत्छन्‌ अनेकलगुडप्रहारजजेरित- 
शरीरः पञ्चत्वम्‌ उपनीतस्‌ तिः ॥ 

अतो ऽहं ब्रवीमि । अनागत्तविधाता च ' इति । टिट्टिभ 

आह । भद्रे ' किं मां यद्भविष्यवन्‌ मन्यसे । 

वाजिवारणलोहानां ' काष्टपाषाणवाससाम्‌ । 

नारीपुरुषतो यानां ' दृश्यते महद्‌ अन्तरम्‌ ॥३२४॥ २५ 


5001 7. (प 81714 पलाल 07 एम एप्र)8; 88 


¶ 216 भ: ७720-1 2110 568. 


तन्‌ न भीः कायां । मह्ुजपरिरकितायाः कस्‌ ते पराभवं कतु 
समथेः । अथ प्रसूतायां टिद्िभ्यां शरुतपू वैत्तदात्ापः समुद्रश 
चिन्तयाम्‌ आस । अहो ' साध्व्‌ इटम्‌ उच्यते । ४ 

उत्क्षिप्य टिट्िभः पादो ' शेते भङ्गभयाट्‌ दिवः। 

स्वचित्तकत्यितो गवः ' कस्य नाम न विद्यते ॥३२९॥ 
तट्‌ अहम्‌ एततदीयशक्तिं ज्ञास्यामि । अन्येद्युः प्राणयाचां गततयोस्‌ ° 
तयोर अण्डकानि सविरशेषप्रसारितकल्लोतहस्तेः कोतुकेना पहत- 
वान्‌ । अथायाता टिद्िभी शन्यम्‌ अपत्यस्यानं दष्टा भारम्‌ 
आह । पश्य मे यद्‌ आपतितं मन्दभाग्यायाः । ससुद्रेणाणडकान्य्‌ ° 
अद्यापहतानि। उक्तस्‌ त्वम्‌ असकृन्‌ मया ' यद्‌ अन्य गच्छावः। 
पर यद्जविष्यवट्‌ अस्पमतिर्‌ न गतः । अहम्‌ अधुना स्वापत्य- 
नाशटुःखिता वहू प्रवेष्यामि । इति मे नि खयः । टि आह । 
भद्रे ' दृश्यतां तावन्‌ मम सामथ्येम्‌ ' यावद्‌ एनं दुम्‌ अबु 
निधिं स्वचज्ा शोषयामि । टिटटिभी प्राह । आयेपुच ' कस्‌ ते 
समुद्रेण सह विहः । तथा च । 5 

अविदित्वात्मनः शक्तिं ' परस्य च समुत्सुकः । 

गच्छन्‌ अभिमुखो मोहान्‌ ' नश्येद्‌ वहो पतङ्गवत्‌ ॥३३०॥ 
रिटि आह । प्रिये ' मा मेवं वद्‌ । 18 

बालस्यापि रवेः पादाः ' पतन्त्य्‌ उपरि भूभृताम्‌ । 

तेजसा सह जातानां ' वयः कुजो पयुज्यते ॥३३१॥ 
तट्‌ अनया चञ्चा सकलम्‌ अपि तोयं शेषयित्वा जलधिं 
स्थत्टरीकरिष्यामि । टिट्िभी प्राह । भोः कान्त ' यच जाहूवी 
सिन्धु च नवनवनदीशतानि गृहीत्वा निरन्तरम्‌ एव प्रविशतः 


०४, (प £ 1.0ति ^ व) वप एत. 8300 1. 89 
तं कथं विम्रुडाहिन्या चञ्चा शोषयिघ्यसि । तत्‌ किम्‌ अश्रचेयप्र- 
जस्पितेन । टिटिभ आह । 

अनिर्वेदः धियो मूलं ' चञ्चुर्‌ मे लोहसंनिभा । $ 
अहोराचाणि दीधांणि ' समुदः किं न शुष्यति ॥३३२॥ 
यतः । 
दुरधिगमः परभागो ' यावत्‌ पुरूषेण पौरुषं न कृतम्‌ । ९ 
जयति तुलाम्‌ अधिरूढो ' भास्वान्‌ अपि जल्दपट- 
त्तानि ॥३३३॥ ° 
टिट्टिभी प्राह । यदि त्वयावश्यम्‌ एव समुद्रेण सह वेरयितव्यम्‌ ' ° 
तट्‌ अन्यान्‌ अपि विहगान्‌ समाहूय तट्‌ एव समाचर । उक्तं च 
यतः । 
बहूनाम्‌ अप्‌ असाराणां ' समुदायो जया वहः । 19 
तृणेर आवेष्यते रज्जुस्‌ ' तया नागो ऽपि बध्यते ॥३३४॥ 
तथा च। 
"चटिका काष्टक्टेन ' मक्षिका सह टदुरेः । 15 
महाजनविरोधेन ' कुञ्जरः प्रतठयं गतः ॥३३५॥ 
टिट्िभि आह । कथम्‌ एतत्‌ । सात्रवीत्‌ । 


॥ कथया १४ ॥ 18 


कस्मिंश्चिट्‌ वनगहन प्रदेशे चटकदंपती तमालशाखाकृतनीडो प्रति- 
वसतः । अथ तयोर गच्छति काले संततिर्‌ अभवत्‌ । अयान्य- 
स्मिन्‌ अहनि तच मत्तः कथ्िट्‌ वनगजो घमोतेस्‌ तं तमाल वृक्षं 
छायार्थी समाधितः । ततो मदान्धत्वात्‌ तां चटकयुग्मसमाध्ितां 


फ 


5001 1. (४ 574 वना 6 07 एप्एप्8; 90 


¶216 ग: §एक्ष०न 8 81165 20 €16027६. 


शाखां पुष्करमेणाकृष्य बभन्ञ । तद्दे चटकाणडकानि विशीणांनि। 
आयुःशेषतया कथंचिच्‌ चटकयुगलं न मृत्युम्‌ आससाद्‌ । अथ 
चटिका स्वापत्यमृत्युशे कविधुरा प्रत्छेपित वत्ती । एतस्मिन्‌ अन्तरे ° 
त्स्याः प्रत्ापान्‌ समाकण्यं का्टकूटो नाम परछी तस्याः परम- 
सुहृत्‌ तहूःखदुःखित आगत्य ताम्‌ उवाच । भद्र ' किं वृथाप्रल- 
पितेन । उक्तं च ' यतः । ८ 

नष्टं मृतम्‌ अतिक्रान्तं ' नानुश्ेचन्ति परिडिताः । 

परिडितानां *च मूखांणां ' विशेषो ऽयं यतः स्मृतः ॥ ३३६॥ 
तथा च। 9 

अणशेच्यानीह भूतानि ' यो मूढस्‌ तानि शे चति । 

तहूःखात्य्‌ भते दुःखं ' याव्‌ अनर्थो निषेवते ॥ ३३७॥ 
अन्यच्‌ च । 12 

छेश्माश्रु वान्धवेर्‌ मुक्तं ' पित्ुणाम्‌ उपतिष्ठते । 

तस्मान्‌ न रोदितव्यं स्यात्‌ ' करिया कायो स्वशक्तितः ॥३३४॥ 
चटिका प्राह । अस्त्य्‌ एतत्‌ । परं किम्‌ । अनेन दुष्टगजेन मदान्‌ 
मे संतानक्षयः कृतः । तट्‌ यदि त्वं मम सुहृत्‌ ' तट्‌ अस्य 
महागजस्य भकंचिट्‌ वधोपायं चिन्तय । तदनुष्टानेन संततिवि- 
नाशजं टुःखं निवतेते । उक्तं च । 18 

आपदि येनोपकृतं " येन च हसितं दशासु विषमासु । 

उपकृत्य तयोर्‌ उभयोः ' पुनर्‌ अपि जातं नर मन्ये ॥३३९॥ ग 
काष्ठकूट आह । भवत्या सत्यम्‌ अभिहितम्‌ । उक्तं च ' यतः । 

स सुहृद्‌ व्यसने यः स्याट्‌ ' अन्यजा्युद्भवो ऽपि सन्‌ । 

वृदो सर्वो ऽपि मिचं स्यात्‌ ' सर्वेषाम्‌ एव देहिनाम्‌ ॥ ३४०॥ 


०, (प्र तकि ^ प्रा ¶प्तए उपा, 80० 1. 91 


¶ 216 अणा: 50877075 21168 8710 €16008.7६. 


| तथा च । 
स सुहृट्‌ व्यसने यः स्यात्‌ ' स पिता यस्‌ तु पोषकः। 
| तन्‌ मिं यत्र विश्वासः ' सा भाया यच निवृतिः ॥३४१॥ 2 
तत्‌ पश्य मे बु्िप्रभावम्‌। पर किंतु ममापि सुहता वीणारवा 
नाम मकिकास्ति। तां समाहूयागच्छामि ' येन स दुरात्मा 
दुष्टगजो वध्यते । अथासो *चटिकया सह मक्षिकम्‌ आसाद्य १ 
प्रोवाच । भद्र ' इयं मम सुहृच्‌ *चटिका टुष्टगजेनारडकविस्फोटेन 
। पराभूता । तत्‌ तस्य वधो पायम्‌ अनुतिष्ठतो मे साहाय्यं कतुम्‌ 
¦ अहेसि त्वम्‌ । मस्िकाह । भद्‌ " किम्‌ उच्यते ऽच विषये । पर ° 
। ममापि परममुहृन्‌ मेघदूतो नाम मण्डको ऽस्ति । तम्‌ अपि 
समाहूय यथो चितं कुमः । उक्तं च ' यतः । 
हतेः साधुसमाचरः ' शस्त्रे मतिशलििभिः। 19 
कथचिन्‌ न विकल्पन्ते ' विद्वद्धिश चिन्तिता नयाः ॥ ३४२॥ 
अथ चयो ऽपि गत्वा मेघदूतस्य समस्तम्‌ अपि वृत्तान्तं निवेद- 
याम्‌ आसुः । अथ स प्रोवाच । कियन्माचो ऽसो वराकः करी 5 
महाजनस्य कुपितस्य । तत्‌ ' मद्िके ' त्वं गला तस्य मदोद्धतस्य 
कणं शब्ट्‌ कुर ' येन तच्छब्द श्रवणसुखान्‌ निमीलिताक्षो भवति । 
ततश च काष्टठकूटचञ्चुस्फोटितनयनः पिपासां गतौतटसंधितस्य „5 
मम शब्दम्‌ आकण्यं जलाशयं +मा समागच्छन्‌ गताम्‌ 
आसाद्य पतित्वा पञ्चत्वं याति । अथ तथानुष्ठिते स मत्तगजो 
मरिकागेयसुखान्‌ निमी लितनेचः काष्टक्टापहतचक्षुर मध्या- 
हसमये तृषातों भमन्‌ मरईकणशब्दानुसारी गच्छन्‌ महतीं गताम्‌ 
आसाद्य पतितो मृतश च ॥ 


500 1. ¶ प ए 21784 66 07 ए ए प्28 ; 9९ 
अतो ऽहं बरवीमि । +*चटिका काष्ठकूटेन ' इति । टिट्िभः 
प्राह । एवं भवतु । सुहृत्समुदायेन समुद्रं शेषयिष्यामि । इति 
निश्चित्य सवान्‌ पर्णः समाहूय स्वापत्यापहारदुःखं निवेदि- * 
तम्‌ । ते ऽपि तहुःखप्रतीकारनिमित्तं समुद्रं पक्षेम्‌ ताडयितुम्‌ 
आरन्धाः । तचैकेन परिणाभिहितम्‌ । नेवम्‌ अस्मन्मनोरथाः 
सिध्यन्ति । किं तु समुद्रम्‌ णव ल्टोष्ेः पांसुभिश् च पूरयामः । ९ 
इत्य्‌ उक्ते सर्वे ऽपि चञ्चुपुटसंगृहीतपासुल्ो्टनिचयाः समुदं परूर- 
यितुम्‌ आरेभिरे । अथान्यो ऽब्रवीत्‌ । सवेथाशक्ता वयं महोद- 
धिवियहस्य । तट्‌ अचर यत्‌ प्राघ्रकात्म्‌ ' तट्‌ उपदिशामि । 
अस्त्य्‌ एको वृद्धहंसो न्यमोधपाद्पवासी । स चास्माकं समयो- 
चितहितवुद्धिं दास्यति । अतस्‌ तं गत्वा पृच्छामः । उक्तं च । 
रव्यं वाक्यं हि वृद्धानां ' ते वृद्धा ये बहुश्रुताः । ५ 
हंसयृथं वने बद्धं ' वृद्धवुद्धा विमोचितम्‌ ॥ ३४३॥ 
पक्षिण ऊचुः । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 


॥ कया १९ ॥ 15 


अस्ति कस्मिंशिट्‌ वनोदेे महाशसो वटवृक्षः । तच च हंसकुलं 
प्रतिवसति स्म , अथ तस्य वटस्याधस्तात्‌ कोशी नाम वल्ली 
प्राटुभूता । अथ तेन वृद्धहंसेनो क्तम्‌ । येयं वल्य अमुं वटवृक्षम्‌ 
आरोहति ' सास्माकम्‌ अतिविषमा । अनेनाश्येण कश्चिद्‌ 
इहाद्य कट्‌ाचिट्‌ अस्मान्‌ हन्याद्‌ इति । यावद्‌ इयं लघु 
सुख्ेद्या ' तावद्‌ अपनीयताम्‌ ' इति । अथ तस्य वचनम्‌ 
'अवगणय्यते न च तां वल्लीं छिन्नवत्तः। अय कालक्रमात्‌ सा. 


०४, प ८ [तकि ^) वप एत 500 1. 98 

¶81€ ॐ; ७0००8€ 8714 णाध, 216 गए: 5721त-117त 206 868. 
व्ली तं वृक्षं समन्ताद्‌ आरूढवती । अथ कदाचित्‌ कथ्चिट्‌ 
व्याधस्‌ तेषां हंसानाम्‌ आहाराय विनिर्मतानां ल्तानुसारेण 
वटवृक्षे समारुह्य हंसावासेषु पान्‌ आसज्य स्वकीयावासं ययो। 9 
अथ ते हंसाः कृताहारविहारा निशायां यावद्‌ आगताः ' तावत्‌ 
सर्वे ऽपि पाशैर्‌ बद्धाः । अथ वृद्धहंसो ऽब्रवीत्‌ । इदं तट्‌ 
{ आपतितं पाशवन्धनव्यसनम्‌ ' यन्‌ मम वचनम्‌ अनाद्य ९ 
युष्माभिश चेष्टितम्‌ ' इति । तट्‌ इदानीं सवं विनष्टाः +स्मः । 
ततस्‌ ते हंसास्‌ तम्‌ ऊचुः । आये ' एवम्‌ अवस्थिते किम्‌ 
अधुना कतेव्यम्‌ । अयासाव्‌ आह । यदि मम वचनं +कुरुथ ' ° 
तदा यावट्‌ असो व्याधः समभ्येति ' तावद्‌ भवद्धिर्‌ मृतकरूपे- 
णासितव्यम्‌ । व्याधस्‌ तु ' मृता एवते ' इति मत्वा यावत्‌ सवान्‌ 
अपि भूमो प्रकिपिति ' ततः सर्वेः पतितस्‌ तस्योत्चरत एककालम्‌ " 
उत्पतितव्यम्‌ । अथ वृत्ते सुप्रभाते व्याधः समायातो यावत्‌ 
पश्यति " तावत्‌ ते सर्वे ऽपि मृतप्रायाः । ततस्‌ तेन विश्व- 
स्तमतिना पाद्‌ अवमुच्य क्रमेण सवे भूमो प्रधिप्राः । तं च 
ते ऽवतरणाय कृतोद्यमं दुष्टा वृद्धहंसद्तमतिप्रमाणेन सवं ऽपि 
समकाठम्‌ उत्पतिताः ॥ 

अतो ऽहं ब्रवीमि । रव्यं वाक्यं हि वृद्धानाम्‌ ' इति । आ- 
ख्याते चूख्यानके सर्वे ते पकिणो वृद्धहंसान्तिकं गत्वापत्यहरण- 
दुःखं निवेदितवन्तः। अय वृद्धहंसेनो च्यते । अस्माकं सकल्पक्िणां 
गरुडो राजा । तट्‌ अच समयो चितम्‌। सवे एव भवन्त एककात्ठरम्‌ 
आक्न्दारवेण गरूडम्‌ उङ्जयन्तु । एवं च स नो दुःखम्‌ अपने- 
ष्यति । इति संप्रधाये गरूढस काशं गताः । गरुडो ऽपि देवासुरसं- 
यामनिमित्तं समाहूतो भगवता नारायणेन । ततस्‌ तस्मिन्न्‌ एव २५ 


5001 7. (प 10.466 07 ए्मप्र08; 94 
¶ 216 ऋ: ७६ 21त-917त 871 868. वर 216 अञ: 1407 वात एद. ¶ 216 ऋणः ७ऽ121त-917त 200 868, 
समये तेः पक्षिभिर्‌ निवेदितं समुदकृतम्‌ अपत्यहरणवियोगदुःखं 
स्वामिने पश्िराजाय ' यथा । देव ' चयि नाये प्रतपति चज्बुभ- 
रणमाचजीविनो भोजनदौवेस्याट्‌ अस्मान्‌ परिभूय समुद्रः शिन्‌ ° 
अपहृतवान्‌ । श्रूयते च । 

| प्रच्छन्नं किल भोक्तव्यं ' ट्रिद्रेण विशेषतः । 

पश्य भोजन टोेस्याट्‌ ' धुडः केसरिणा हतः ॥३४४॥ « 
गरूडः पृच्छति । कथम्‌ एतत्‌ । वृदधपक्षी कथयति । 


॥ कया २० ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिद्‌ वनोदेणे स्वयूथव्युतो हडः । स॒ च वृहत्केसर- ° 
भृङ्गपन्ञरः कटिनगाच्रो वनं परिभ्रमति । अथ कदाचित्‌ तच 
वने सकल्मृगपरिवृतः सिंहस्‌ तम्‌ अपश्यत्‌ । दुष्टा च तम्‌ 
अदृषटपूवै सवेतः सततोडुषितगाचम्‌ अव्यक्ततनुं सुभितहृदयो 
भयम्‌ उपागतो । नूनम्‌ अयं मत्तो ऽ तिबत्वान्‌ ' इति मन्यते । 
अत एवा विशङ्कः परिभमति ' इति विचिन्य शनैः शनेर्‌ 
अपससार । अयान्येद्युस्‌ तम्‌ एव हुडं वननुवि तृणानि चरन्तं 
दष्टा सिंहो व्यचिन्तयत्‌ । कथम्‌ असो तृणाशी । तन्‌ नूनम्‌ 
अनेनाहारानुरूपवलेन भवितव्यम्‌ । इति विचिन्य सहसोपसृत्य 
हुढो व्यापादितः ॥ 16 
अतो ऽहं बरवीमि । प्रच्छन्नं कित भोक्तव्यम्‌ ' इति । इत्य्‌ 
एवं कथयतां तेषां पुनर्‌ विष्णुटूतः समागत्य प्राह । भो गर्त्मन्‌ ' 
स्वामी नारायणस्‌ त्वाम्‌ आज्ञापयति । अमरावतीगमनाय शीघ्रम्‌ 
आगम्यताम्‌ ' इति । तट्‌ आकणये गरुडः साभिमानं तम्‌ आह । 


०, वृ [0 ^ प्र? पप्रा एएा.ा, न्नः 1. 95 
¶ 216 अप: 578110.717त 8200 568. 


भो टूत ' किं मया कुभृत्येन स्वामी करिष्यति । दूत आह । भो 
गरूड ' कदाचिद्‌ भगवता भवन्तं प्रति विरूपम्‌ अभिहितम्‌ । 
तत्‌ कथं भगवन्तं प्रत्य्‌ अभिमानं करोषि । गरूड आह । भगवतः 9 
समाशच्रयभूतेन समुद्रेण स्मन्गत्यस्य टिटिभस्यारडकान्य्‌ अपहतानि। 
तट्‌ यदि तस्य नियहं न करोमि " ततो भगवतो ऽहं न भृत्यः ' 
इति त्वया स्वामिने निवेदनीयम्‌ । अथ टूतसुखेन विष्णुः प्रणय- ° 
कुपितं गरत्मन्तं विज्ञाय चिन्तयाम्‌ आस । अहो ' अतिकोपो 
वेनतेयस्य । तत्‌ स्वयम्‌ एनं गत्वा संबोध्य संमानपुरःसरम्‌ 
आनयामि । उक्तं च । 9 

शक्तं भक्तं कुत्टीनं च ' न भृत्यम्‌ अपमानयेत्‌ । 

पुचवल्कर लालयन्‌ नित्यं ' यदी च्छे च्‌ *छियम्‌ आत्मनः ॥३४५॥ 
किं च। 12 

स्वामी तुरो ऽपि भृत्यानां ' मानमाचं प्रयच्छति । 

ते तु संमानितास्‌ तस्य ' प्राणेर अप्य्‌ उपकुवेते ॥३४६॥ 
इति सं प्रधाये सत्वरं गरूडसकाशम्‌ अगमत्‌। सो ऽपि स्वस्वामिनं 
गृहागत्तम्‌ अवलोक्य चपाधोसुखः प्रणम्योवाच । भगवन्‌ ' त्वदा- 
अयवणशोन्मत्तेन समुद्रेण ' पश्य ' मे भृत्यस्यार्डकान्य्‌ अपहत्य 
ममापमानं विहितम्‌ । भगवल्लज्नया मया वित्कृश्ितम्‌ । नो ” 
चेत्‌ ' एनम्‌ अहं स्यतताम्‌ अद्येव नयामि । उक्तं च । 

येन स्याल्‌ लघुता लोके ' पीडा च प्रमुचेतसि । 

प्राणत्यागे ऽपि तत्‌ कमं ' न कुयोत्‌ कुत्सेवकः ॥३४७॥ 
इत्य्‌ उक्ते भगवान्‌ आह । भो वेनतेय ' सत्यम्‌ उक्तं भवता । यतः 

सदा भृत्यापराधेन ' स्वामिनं दण्डयेत्‌ कित्ठ । 

यदि करूरं च दुष्टं च ' स्वामी भृत्यं न मुञ्चति ॥३४४॥ ५ 


50०0 1. वक्र 18177^ पलपल 07 ए एप्08 ; 96 
तट्‌ आगच्छ ' येन समुद्राद्‌ अर्डकान्य्‌ आदाय टिदट्िभं च संतोष्य 
सुरकायायामरावतीं गच्छावः । तथेति प्रतिपन्ने समुद्रं निभे 
भगवता धनुष्‌ आग्रेयं शर संधायाभिहितम्‌ । भो दुरात्मन्‌ ' ४ 
दीयताम्‌ अस्य टिद्िभस्याण्डकानि । नो चेत्‌ ' त्वां स्थत्छतां 
नेष्यामि । इति श्ुत्वा समुद्रो ऽपि भयचकितसकल्परिवारो 
वेपमानस्‌ तान्य्‌ अण्डकानि गृहीत्वा भगवदिदितं टिद्िभस्य ° 
समपेयाम्‌ आस ॥ 


अतो ऽहं व्रवीमि । शचोर बलम्‌ अविज्ञाय । इति । अवगततत्त्वार्थश च संजीवक तम्‌ 
अपृच्छत्‌ । वयस्य । कथय । कस्‌ तस्य युद्धमागेः । इति । सो ऽब्रवीत्‌ । अन्यदाुसौ 9 
*#खस्ताङ्गः शिलातलख्ितो यथा तथैवासीत्‌ । अद्य यदि प्रथमम्‌ एव संगृह तलाङ्कलः 
संहितचतुश्चरणस्तब्धकर्णो दू राट्‌ एव व्वत्संसुखम्‌ ई ्माणस तिष्ठति । ततस्‌ यावग- 
न्तव्यः ' ममोपरि द्रोहवुद्धिः । इति । 12 
एवम्‌ उत्का दमनकः करटकसकाशं गतः । तेन चाभिहितम्‌ । किम्‌ अनुष्टितं भवता । 

सो ऽब्रवीत्‌ । *भेदितौ तौ तावत्‌ परस्परं मया। करटक आह । किं सत्यम्‌ । दमनको 
ऽब्रवीत्‌ । फलेन ज्ञास्यति भवान्‌ । करटक आह । को ऽ च विस्मयः । उक्तं च । 15 

भिनत्ति सम्यक्‌ प्रहितो ' भेदः स्िरमतीन्‌ अपि। 

भूधरान्‌ संहितशिलान्‌ ' महापूर इवाम्भसाम्‌ ॥ ३४९॥ 


दमनक आह । भेदम्‌ उत्पाद्य सर्वथा पुरुषेणात्महितं कार्यम्‌ । उक्तं च । 18 
यो ऽधीत्य शास्त्रम्‌ अखिलं ' शास्त्रा तत््वतश्‌ च विन्नाय। 
आत्महितं न हि कृरते ' ्रमावंहेस्‌ तस्य किं शास्तैः ॥ ३५०॥ द्रा 
करटक आह । तत्वतो न किंचिद्‌ आत्महितम्‌ । यतः । 21 


कमयो मस्म विष्ठा वा । निष्ठा यद्ययम्‌ ईदृशी । 

स कायः परपीडाभिः ' पोष्यते यत्‌ स को नयः ॥ ३५१॥ 
दमनक आह । अनभिज्ञो ऽसि मन्त्िकृलमूलंवेतनस्य प्रकतिकृरिलस्य नीतिमार्गख्य । 24 
तचरैत्य उक्तम्‌ । 

निच्िंशं हदयं कला ' वाणीं चेन्लुरसोपमाम्‌ । 

विकल्पो ऽच न कर्तव्यो । हन्यात्‌ पूवांपकारिणम्‌ ॥ ३५२॥ 27 
अन्यच्‌ च । निहतो ऽप्य्‌ एष संजीवको ऽस्माकम्‌ उपभोग्यो भविष्यति । यतः । 

परस्य पोडनं कुर्वन्‌ ' स्वार्थसििं च पण्डितः । 

गूढवुद्धिर्‌ न लच्येत ' वने चतुरको यथा ॥ ३५३॥ 80 
करटक आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽ त्रवीत्‌ । 


०६, (प्र 1.10 ^ प्त एता. 2800४ ४. 97 


¶ 816 ऋज्ध: 1861६81 ठपध्का४8 6816] कात पजा, 


॥ कया २१ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिट्‌ वनोदेणे कव्यमुखचतुरकशङ कणौ ख्येर वृकज- 
खुककरभेर मन्तिभिः सहितो वजदेष्टो नाम सिंहः । स कदाचिन्‌ ° 
मत्तगजेन सह युध्यमानम्‌ तदीयदन्तकोरिपाटितवपुर्‌ एकान्तम्‌ 
आस्थितः । ततः सप्रदिनोपवासपीडितः शुत्सषामतनुस्‌ तान्‌ षुधा 
बाध्यमानान्‌ सचिवान्‌ आह । किंचिट्‌ अन्विष्यतां वने स्वम्‌ ' १ 
येनाहम्‌ रतदवस्थो ऽपि भवतां तृ्चिम्‌ उत्पादयामि ' इति । 
अथ तदाज्ञासमकात्म्‌ एव ते वने पयेटिताः ' परं न किंचिद्‌ 
आसादितम्‌ । अथ चतुरकश् चिन्तयाम्‌ आस । यदि शङकणों * 
ऽयं व्यापादयते ' तदा सर्वेषां कतिचिट्‌ दिनानि तृ्धिर्‌ भवति । 
परं नेनं स्वामी भिचरताट्‌ व्यापादयिष्यति । अथवा बुद्धिप्रभावेण 
स्वस्वामिनं तथा प्रबोधयिष्यामि ' यथा व्यापादयति । तथा च। " 

अवध्यं वाथवागम्यम्‌ ' *अकृत्यं नास्ति किंचन । 

लोके बुद्धिमताम्‌ अच ' तस्मात्‌ तां योजयाम्य्‌ अहम्‌ ॥३५४॥ 
एवं संचिनय शङ्कुकणेम्‌ इदम्‌ आह । भोः शङ्ककणे ' स्वामी पथ्यं ५ 
विना क्सुधया परिपीड्यते । स्वाम्यभावाट्‌ अस्माकं चव भुवं 
मृत्युः । तत्‌ त्वदथे स्वाम्यं च किंचिद्‌ वदिष्यामि । तच्‌ छूय- 
ताम्‌ । शङःकणे आह । भो भद्‌ ' शीघ्रतरं निवेद्य ' येन तवद्च- 5 
चनम्‌ अविकल्पः करोमि । अपरं स्वामिनो हिते कृते सुकृतशतं 
कृतम्‌ । चतुरक आह । भो भद्र ' आत्मशरीरं िगुणल्ाभेन 
प्रयच्छ ' येन ते गुणं शरीर भवति ' स्वामिनः प्राणयाचा 
भवति । तच्‌ छवा शङ्कणे आह । भदू ' यद्य्‌ एवम्‌ ' तन्‌ 
मदीयम्‌ एवेदं प्रयोजनम्‌ । तट्‌ उच्यतां स्वामी । एतद्‌ एव 


500 7. (प ८ 617^ पल्वल 07 एम एप्)8); 98 
क्रियताम्‌ ' इति । परम्‌ अत्र विषये धमेराजः प्रतिभूर्‌ याच 
नीयः। 

एवं निश्चित्य सर्वे ते सिंहसकाशम्‌ आजग्मुः । ततश चतुरक ४ 
आह । देव ' न किंचिद्‌ अद्य सखम्‌ आसादितम्‌ ' भगवान्‌ 
आदित्यो ऽप्य्‌ आसन्रास्तमयः । तच्‌ छत्व सिंहः परं विषादम्‌ 
अगमत्‌ । अथ चतुरक आह । देव ' एवम्‌ असो शङ्ककणों ऽभि- ५ 
धत्ते । यदि धमेराजं प्रतिश्ुवं टला डिगुणवृद्धा पुनः प्रयच्छति ' 
तदाहं स्वशरीरं प्रयच्छामि ' इति । सिंह आह । भद्र ' सुन्दरम्‌ 
इटम्‌ । एवं क्रियताम्‌ । तथा ' इति प्रतिपन्ने सिंहतत्ाहतो ५ 
 वृकमृगालाभ्यां विदारितकुश्षिः शङ्ककणैः पञ्चत्वम्‌ उपगतः । 
अथ चतुरकश चिन्तयाम्‌ आस । कथम्‌ अयम्‌ एकाकिनो मे 
भ्यः स्यात्‌ । इति मनसा संप्रधाये सिंहं रुधिरसिक्ताङ्ग दुष्टाब- ५ 
वीत्‌ । गच्छतु स्वामी नद्यां लानदेवताचेननिमित्तम्‌ । अहं च 
ऋव्यसुखसहितो भष्यम्‌ इदं रसंस्‌ तिष्ठामि । इति शयुत्रा सिंहो 
नद्यां जगाम । गते च सिंहे चतुरकः कव्यमुखम्‌ आह । भोः ऽ 
कव्यमुख ' छषुधात्टरर्‌ भवान्‌ । तट्‌ यावद्‌ असी स्वामी नाग- 
च्छति ' तावत्‌ त्वम्‌ अस्योष्टस्य मांसं भक्षय । अहं स्वामिनो ऽये 
त्वां निर्दोषं करिष्यामि । तस्य वचनेन किंचिन्‌ मांसं यावट्‌ 
आस्वादयति ' तावच्‌ चतुरकेणाभिहितम्‌ । भोः कव्यसुख ' दूरम्‌ 
अपसर । आगच्छति स्वामी । तथानुष्ठिते सिंहः समागत्योष्ट 
रिक्तीकृतहदयं दुष्टा सकोपम्‌ इदम्‌ आह । भोः ' केन]यम्‌ उष्ट्र " 
उच्छिष्टतां नीतः ' येन तम्‌ अपि व्यापादयामि । इत्य्‌ अभिहिते 
व्यसुखश्र चतुरकमुखम्‌ अ वत्टो कयति ' किते वद्‌ किंचित्‌ ' 
येनायम्‌ उपश्णाम्यत्ति ' इति । अथ चतुरको विहस्याब्रवीत्‌ । भोः ' ५ 


0४, प्न त ^ पाण वप्त एता. 800 1. 99 

1916 अ: 180६ छपा ४७ 68761 820 न. ए7216.5६07. 
ऋमेत्कहृटयम्‌ आत्मना भक्षयित्वा कथं मे मुखम्‌ अ वल्ोकयसि। 
तच्‌ छत्वा कव्यमुखः प्राणभयात्‌ प्रपलाय्य देशणन्तरं गतः । सिंह 
च किंचित्‌ तम्‌ अनुसृत्य ' नखायुधो ऽ वध्यो मे ' इति विचिन्य 9 
निवृत्तः । 

एतस्मिन्न्‌ अन्तरे देवयोगात्‌ तेनैव मार्गेण महान्‌ ""दासेर- 
कसाथों भाराक्रान्तो सी वावबद्धवृहद्धणटा*^रणत्कारकारी समाग- ५ 
च्छति । तस्य च महान्तं धरटानादं टूराट्‌ एव श्रुत्वा सिंहो 
जब्बुकम्‌ उवाच । भद्र ' ज्ञायताम्‌ ' क एष रौद्रौ नादः । तच्‌ 
खत्वा चतुरकः किंचिद्‌ वनान्तरं गत्वा सत्वरम्‌ अभ्येत्य सावेगम्‌ ° 
उवाच । स्वामिन्‌ ' गम्यतां गम्यताम्‌ ' यदि शक्रोषि गन्तुम्‌ । 
सो ऽव्रवीत्‌। भद्र ' किम्‌ एवं *मां व्याकुलयसि । तत्‌ कथय 
किम्‌ एतत्‌ । चतुरक आह । स्वामिन्‌ ' एष धमेराजस्‌ तवोपरि 
कुपितो ऽभ्येति । यत्‌ किल्कानेन मदीयदासेरको मां प्रतिभुवं 
टच्ाकात् णव व्यापादितः ' तत्‌ सहखगुणम्‌ आत्मीयम्‌ उटम्‌ 
अस्माद्‌ अहं +पहीष्यामि ' इति निश्चित्य वृहटुष्टमानम्‌ आदाये- 
तदीयपितृपितामहान्‌ अपि गवेषयितुकाम इतत एव संनिहितो 
ऽभ्युपेति । तच्‌ छूत्वा सिंहो ऽपि मृतम्‌ उष्टं परित्यज्य स्वप्रा- 
रभयात्‌ प्रनष्टः । चतुरको ऽपि शनैः शनेस्‌ तस्योष्टस्य मांसं 
चिर भक्षयाम्‌ आस ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि । परस्य पीडनं कुर्वन्‌ । इति । अथ गते दमनके संजीवकश्‌ चिन्तयाम्‌ 
आस । किं करोमि । यदि तावद्‌ अन्यच गच्छामि । तद्‌ अन्येनापि क्रूरसत््वेन मे वधः 21 
क्रियते । यतो निजेनं वनम्‌ एतत्‌ । रुषटेषु च सखामिषु गन्तुम्‌ अपि न शक्यते । उक्तं हि । 
छत्वुपराधं नष्टः सन्‌ ' दूरस्थो ऽसमीति नूाश्सेत्‌ । 
दीं बुिमतां बाद ' कषैतो हि प्रमादिनम्‌ ॥ ३५५॥ ‰५ 
तट्‌ वरं सिंहम्‌ एवानुसरामि । कद्‌ाचित्‌ ' शरणागतो ऽ यम्‌ । इति मत्वा मां त्यजेद्‌ 
अपि। 


50० 1. (प्र 2617124 96786 07 एय एप्08 ; 100 


एव716-0ा ङ : 11071 200 एषा. 


एवं सखचेतसि निश्ित्योद्धिममना मन्द्‌ मन्दं गता दमनकाख्यातानुकारष्पं सिंहं 

दृष्टा खानान्तर उपविश्चाचिन्तयत्‌ । अहो । विषमता प्रभूणाम्‌ । उक्तं च । 

अन्तगढमुजंगमं गृहम्‌ इव व्यालाकुलं वा वनं 8 

याहाकीणेम्‌ इवभिरामकमलच्छायासनाथं सरः । 

नित्यं दुष्टजनैर असत्यवचनेः चुर र अनार्यीितं 

दुःखेनह विगाह्यते सुचक्ति राज्ञां मनः सेवकैः ॥ २५६॥ इद्वम्तत्त 6 
पिङ्गलको ऽपि दमनकजल्यिताकारं तम्‌ अवलोक्य सहसा तस्योपरि पपात । अथ संजी- 
वकस्‌ तत्नखकुलिशाग्र^्विकर्तितशरीरः स्वग्पुङ्गाग्राभ्यां सिंहस्योद रप्रदेशम्‌ उलिख्य कथम्‌ 
अपि तस्माद्‌ अपेत्य पुनर्‌ अपि भुङ्गाभ्यां हन्तुम्‌ इच्छन्‌ योद्धुम्‌ अवस्थितः । 9 

अथोभाव्‌ अपि त्तौ पुष्पितपलाशमप्रतिमौ परस्परं वधकाङ्धिणौ दृष्टा करटकः साक्लेपं 

दमनकम्‌ उवाच । भो मूढमते ' यद्‌ अनयोर्‌ विरोधस्‌ त्वया छतः । तन्‌ न साधु 
विहितम्‌ । यतः सकलम्‌ अपि वनम्‌ इदम्‌ आकुलीकतं मवता । ततस्‌ तवं न नतित 12 
वेत्सि । उक्तं च। 

कायांण्य्‌ उन्तमदण्डसाहसफलान्य्‌ आयाससाध्यानि ये 

प्रीत्या संशमयन्ति नीतिकुशलाः साननैव ते मन्तिणः। 15 

निःसाराल्यफलानि ये त्वं अविधिना वाञ्छन्ति दण्डोव्यमैस्‌ 

तिषां दुनयचेटितैर नरपतेर आरोप्यते श्रीस्‌ तुलाम्‌ ॥ ३५७॥ इदे 
तत्‌ । मखं । 18 

साननैवादौ प्रयोक्तव्यं ' कार्यांकायैविचकच्णैः। 

सामसिद्धा हि विधयो । न प्रयान्ति पराभवम्‌ ॥ ३५८॥ 
तत्‌ ' मूढ । मन्त्िपदम्‌ अभिलषसि । न च सामनामापि जानासि । तद्‌ वृथा मनोरथौ 1 
ऽयंते। यद्‌ दण्डविधेर्‌ इति । उक्तं च । 

सामादिर दण्डपर्यन्तो ' नयः प्रोक्तः स्वयंभुवा । 

तषां दण्डस्‌ तु पापीयांस ' तस्माद्‌ दण्डं विवजेयेत्‌ ॥ ३५९॥ २५ 

नोन्मयुखेन रतेन । नूातपेन न वह्विना । 

सान्नैव प्रलयं याति ' विद्धेषिप्रभवं तमः ॥ ३६०॥ 
किंच। साननैव यत्र सिद्धिः स्यात्‌ ' तच दण्डं न योजयेत्‌ । 27 

यदि शकैरया पित्तं । शाम्येत्‌ तत्‌ किं परोलया ॥ ३६१॥ 
अन्यच्‌ च। ये सामद्‌नभेदास्‌ । ते किल वुद्धैर अपावृतं दारम्‌ । 

यस्‌ तु चतुर्थोपायस्‌ । तम्‌ आङ्र्‌ आयाः पुरुषकारम्‌ ॥ ३६२॥ द 80 

बुद्धिर या सतत्वरहिता । स्त्रीत्वं तत्‌ केवलं मतम्‌ । 

शौर्यं च्‌नयसंपन्नं ' तत्‌ पशुत्वं न संशयः ॥ ३६३॥ 


०४, (प्र 1.0 ^ प्राः (प्त उता, 500 1. 101 


ए व16-8६07 ४ : 1700 200 एषा. 


दिपाशीविषसिंहामि"जलानिलविवस्वताम्‌ । 

बलं बलवतां दृष्टम्‌ ' उपायाक्रान्तिनिष्फलम्‌ ॥ ३६४॥ 
तड्‌ यदि ' मन्विपुचो ऽहम्‌ ' इत्य अवलेपाद्‌ अतिभूमिं गतो ऽसि ' तद्‌ अप्य आत्मवि- 3 
नाश्रस तव । उक्तं च । 

यां लब्ध्वेद्धि यनिग्रहो न महता भावेन संपव्यते 

या वुचधैर न विधेयतां प्रकुरुते धम न या वर्तते । 6 

लोके केवलवाक्यमाचरचना यां प्राय संजायते 

या नैवोपशमाय नापि यशसे विद्वत्तया किं तया ॥ ३६५॥ ६ 
तड्‌ अच शास्त्रेष्व्‌ अभिहितः पञ्चाङ्गो मन्त्रः । तड्‌ यथा । कर्मणाम्‌ आरम्नोपायः । 9 
पुरुषद्र व्यसंपत्‌ ' देशकालविभागः । विनिपातप्रतीकारः ' कार्यसिद्धिश्‌ च ' इति । सो 
ऽयम्‌ अधुना स्वामिनो महात्ययो वतेते । तद्‌ अचर यदि तव शक्तिर्‌ अस्ति तद्‌ 
विनिपातप्रतीकारश्‌ चिन्त्यताम्‌ । *भिन्नसंधाने हि मन्त्रिणां बुद्धिपरी्ा । तत्‌ । मूख । 12 
तत्‌ कर्तुम्‌ असमर्थस्‌ त्वम्‌ । यतो विपरीतवुद्धिर्‌ असि । उक्तं च । 

नाशयितुम्‌ एव नीचः ' परकार्यं वेत्ति न प्रसाधयितुम्‌ । 

पातयितुम्‌ असि शक्तिर ' नाखोर उद्वतुंम्‌ उचिपिरिम्‌ ॥३६६॥ ह" 15 
अथवा न तवायं दोषः! अपि तु खाभिन एव । यस्‌ तव मन्द्‌ मतेर्‌ वाक्यं अरहघाति । 
उक्तं च । मद्‌ादिक्तालनं शास्त्रं ' मन्दानां कुरूते मदम्‌ । 

चनुःप्रबोधनं तेज । उलूकानाम्‌ इ वूाच्धयकत्‌ ॥ ३६७॥ 18 

ज्ञानं मददपैहरं ' माद्यति यस्‌ तेन तस्य को वैव्यः। 

अमृतं यस्य विषायति ' तस्य चिकित्सा कथं क्रियते ॥ ३६८॥ ध) 
तं च छच्छावस्थं स्वामिनं दृष्टा करटकः परं विषादम्‌ अगमत्‌ । कष्टं कष्टम्‌ इदम्‌ 21 
आपतितं स्वामिनो ऽ नयोपदेशात्‌ । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 

नराधिपा +नीचमतानुवर्तिनो 

बुधोपदिष्टेन पथा न यान्ति ये। 24 

विशन्ति ते दु्गममार्गेनिर्गेमं 

सपत्रसंबाघधम्‌ अनर्थपञज्ञरम्‌ ॥ ३६९॥ प४ 
तत्‌ । मखं ' सर्वो ऽपि जनो गुणवत्परिजनस्य स्वामिनः सेवापंरि यहं करोति । तत्‌ कृतो ?7 
युष्मद्विधेन पम्पुनेव केवलभेद विद्‌सन्मन्त्रिणा स्वामिनो गुणवत्सहायसंपत्‌ । उक्तं च । 

गुणवान्‌ अप्य असन्न ' नुपतिर्‌ नाधिगम्यते । 

प्रसन्नसखादुसलिलो ' दुष्टग्राहो यथा हदः ॥ ३७०॥ 80 
त्वं तु प्रायश आत्ममूल्यं विविक्तम्‌ एव राजानम्‌ इच्छसि । तत्‌ । मूख । किं न वेत्सि । 

आकीर्णः शोभते राजा । न विविक्तः कदाचन । 

ये तं विविक्तम्‌ इच्छन्ति । ते तस्य परिपन्थिनः ॥ ३७१॥ 88 


5001 1. {1 ए81^ 8676 07 एय ए प्र08; 1028 
ए18116-8101.9, ¶ 216 अजाः 10, 11018६61, 210 2186 10. 


किंच। परुषे हितम्‌ अन्वेष्यं ' तच्‌ च नासि विषं हि तत्‌ । 

मधुरे शादम्‌ अन्वेष्यं ' तच्‌ च नास्त्य अमृतं हि तत्‌ ॥ ३७२॥ 
यद्‌ अपि च परसुखविभूत्योर्‌ दशनाद दुःखितो ऽसि ! तद्‌ अप्य्‌ असाधु । लब्धस्वभावेषु 8 
मिचैष्व एवं न वर्तितुम्‌ उचितम्‌। यतः । 


शादोन सिचं कपटेन धर्म 

परोपतपिन समृद्धिमावम्‌ । 6 

सुखेन विद्यां परुषेण नारीं 

वाञ्छन्ति ये व्यक्तम्‌ अपण्डितास्‌ ते ॥ ३७३॥ प 
तथा । चैव मृत्यगता संपट्‌ । विभूतिः सैव भूपतेः । 9 


रतोच्ञासिमिर्‌ उन्ुतिः ' कस्‌ तरङ्गेर *विनेोद धिः ॥ ३७४॥ 

तथा च । यः खामिलब्धप्रसादो भवति ' सुतरां स विनीतः स्यात्‌ । उक्तं च । 
यथा यथा प्रसादेन । भता भृत्ये प्रवर्तते । 12 
तथा तथा सशङ्कस्य , गतिर्‌ निन्नास् शोभते ॥ ३७५॥ 

त्वं तु लधुप्रछतिर्‌ असि । उक्तं च। 


महान्‌ प्रणुन्नो न जहाति धीरतां 15 
न कूलपातिः कलुषो महोदधिः । 

लघोर्‌ विकारस्‌ तनुनापि हेतुना 

चलन्ति दभाः शिथिले ऽपि मारते ॥ ३७६॥ नवी 


अथवा स्वामिन एवायं दोषः ' यद्‌ युष्मद्विधे मन्तिमाचव्यपदेशजीविनि षाञ्जुण्योपाया- 
व्यन्तबाह्ये चिवर्गप्राघ्यर्थम्‌ असमीच्य मन्त्रयते । साधु चेदम्‌ उच्यते । 
चिचचाटुवरिर्‌ मलेर ! अनायासितकार्मुकः । : "नी 
ये रमन्ते नुपास्‌ तेषां ' रमन्ते रिपवः धियम्‌ ॥ ३७७॥ 
सुषु खल्व इदम्‌ आख्यानकम्‌ आख्यायते । उक्तं च । 
नगरः अवणको दग्धः ' पार्थिवो ऽभिमुखीक्तः। 24 
आत्मा चैवोत्रतिं नीतो । बलभद्रेण मन्त्रिणा ॥ ३७८॥ 
दमनक आह । कथम्‌ एतत्‌ । करटकः कथयति । 


॥ कया २२॥ 9 


अस्ति कोशलेषु जनपदेष्व्‌ अयोध्या नाम नगरी । तस्यां चाने- 
कप्रणतसामन्तमुकुटात्गीद॑पादपीटः सुरथो नाम राजा । तस्य 
कटदाचिट्‌ वनपाकेनागत्य निवेदितम्‌ । स्वामिन्‌ ' सर्वे वि- 


०7, (प [ति ^) प एता, 800६ 1. 103 
प्रतिपन्ना आटविका राजानः । तेषां च मध्ये विन्ध्यको नामा- 
टविकः । तस्य विनयोपदेशे देव एव प्रमाणम्‌ । एवं च शरुत्वा 
राजा बलभद्रसचिवम्‌ आहूय तेषां नियहाथं प्रेषितवान्‌ । अथ 
गतवति तस्मिन्‌ नग्रश्रवणकस्‌ तां पुरीम्‌ उष्णकात्ावसाने 
प्रविष्टः । कतिपये च दिवसैः प्रभ्रव्याकरणंहोरांश्कुन॑ानंल 
ग्रदृक्घाणंन वां शडादशां शंचिंशां शच्छायानष्टमु्टिधातुमूत्टंजी वचि - ९ 
न्ता॑चुत्टुकमाषकादिज्योतिष्कप्रकरिर असो स्वेम्‌ एव॒ जनपदं 
तम्‌ इवात्मीकृत वान्‌ । अन्यदा जनपरंपरया तत्‌ स्वरूपं श्ुत्वा 
राज्ञा कौतुकेन स्वकीयावासम्‌ आनीतः कृतासनपरिमहश. च 
पृष्टः । सत्यम्‌ ' कित्दराचायोः परचित्तवेचचारः। ततः सो ऽ व्र वीत्‌ । 
फलरिर ज्ञास्यति भवान्‌ । एवम्‌ उचितकथाभिः परं कोतुकम्‌ 
उपनीतो ऽसो राजा । एकदा च समसुचितागमन कातरम्‌ अतिक्र- 
म्यापरहृस्मये राजन्ुवनम्‌ अनुप्रविश्याह । भो राजन्‌ ' प्रियं 
प्रियम्‌ आवेद्यामि । अहम्‌ अद्य प्रभाते मटिकाभ्यन्तर एव 
कायम्‌ इमं निसिपयान्येन सुरल्ोकयोग्येन शरीरेण ' स वोमरजनो "5 
माम्‌ अनुस्मरतीति ' अतो ऽहं स्वगे गतः पुनर आगत च । 
तच मुरेर उक्तम्‌ ' यथा । अस्मइचनाट्‌ असो पाथिवः कुशलं 
प्रटव्यः । इति श्रुत्वा परमकोतुकजनितविस्मयो राजाब्रवीत्‌ । "5 
कथम्‌ ' आचाये । स्वगे गच्छति भवान्‌ । असाव्‌ आह । महा- 
राज ' सवेटिनेषु स्वगे गच्छामि । इति श्रहधानः स राजा 
जडमतिः सवांणय्‌ अपि राज्यप्रयोजनान्य्‌ अन्तःपुरकृत्यानि च 
शिथित्रीकृत्य तत्परः संवृत्तः । अवान्तरे हतकण्टकम्‌ अटवीराज्यं 
कृत्वा रगजपादान्तिकम्‌ अनुप्रविष्टो बत्ठभद्‌ः । पश्यति च स्वामि- 
नम्‌ एकान्तोज्मितिमन्तिमणडत्कं तेनैव नम्रश्रवणेन सहेकान्तम्‌ ५ 


50०1 1. (प ४ 2817174 पल 07 स ए08; 104 
उपगतं विकसितवदनकमल्े किम्‌ अष्‌ आ्येम्‌ इव मन्तरय- 
माणम्‌ । विदिततखश् च प्रणम्योक्तवान्‌ । जयतु देवो देवानां 
प्रियः ' इति । ततो राज्ञा मन्त्री कुशत्टं पृष्ट उक्तश च । जानाति 
भवान्‌ अमुम्‌ आचाम्‌ । असाव्‌ आह । बहूनाम्‌ आचायांणां 
प्रजापतिभूतः कथं न ज्ञायते । श्रूयते चास्याचा्यस्य सुरत्तोके 
गमनम्‌ । तत्‌ किं सत्यम्‌ । राजाह । सवेम्‌ अवितथम्‌ " यट्‌ भवता ५ 
श्रुतम्‌ ' इति । ततः छपणको ऽब्रवीत्‌ । यद्य्‌ अस्य मन्बिणः 
कौतुकम्‌ ' ततः पश्यत्‌ एषः । एवम्‌ उक्ता मटिकाभ्यन्तरम्‌ 
अनुप्रविश्य साल्ट हारं कृत्वा स्थितः । ततो सुहूतेमाच्रापगमे ° 
मन्तिणोक्तम्‌ । देव ' कस्यां वेत्ायाम्‌ अयम्‌ आगमिष्यति । 
पाथिवः प्राह । किम्‌ इति त्वरसे । यतो ऽसो स्वकलेवरं मटि- 
काभ्यन्तरस्थं कृत्वान्येन दिव्यश्रीरेणागच्छति । असाव्‌ आह । यदि 
सत्यम्‌ एवेदम्‌ ' तटानीयताम्‌ अग्रिका्टनिचयः ' येनेमां मदि- 
काम्‌ आदीपयामि । भूपतिर्‌ आह । किंनिमिच्म्‌ ' इति । सचिवे- 
नोच्यते । देव ' अस्मिन्‌ कलेवरे दग्धे तेनेव सुरत्ोकयायिना 
शरीरेण यथासो युष्मत्पाश्वैवर्तीं भवति । श्रूयते चेतत्‌ । 


॥ कथा २३ ॥ 


अस्ति राजगृहे नगरे देवमा नाम ब्राह्मणः । तस्य ब्राह्मणी 
निरपत्यतया प्रातिवेश्मकाभकान्‌ दृष्टा भृशं सरोद्‌ । अथेकस्मिन्‌ 
दिने बाद्यणेनुभिहितम्‌ । भद्रे ' अलं संतापेन । पश्य ' अच ' अहं 
पुच्रकामाम्‌ इष्टिं कुवांणः केनाप्य अदृष्टेन स्पष्टाक्षरम्‌ अभिहितः । ° 
यथा । ब्राह्मण ' सवेमनुघयोत्तररूपसचसोभाग्यान्वितः पुचस्‌ ते 
भविष्यति । इति श्वुत्वा परमप्रमोदापूयेमाणहदया ब्राह्मणी ' 


०४, (प्र [तकि ^) प्र एत, 300 1. 105 
अवितयास्‌ तस्य व्याहारा भवन्तु ' इति जगाद्‌ । कमेण संजा- 
तगभा प्रसवकाले सपं सुषुवे । तं दृष्टा ' त्यज्यताम्‌ अयम्‌ ' इत्य्‌ 
¡ अशेषपरिजनवचनान्य्‌ अनादुत्य प्रगृद्य सलपयित्वा पुचवात्सस्याट्‌ 9 
विपुल्ृशुचिभार्डे ऽ वस्थाण क्षीरनवनीतादिभिर्‌ उपनृंहितशरीरः 
| कत्तिपयेर्‌ एव दिवतेर असौ प्रोढीकृतः । एकदा तु ब्राह्मणी 
। बाष्पावरुडवटना प्रातिवेश्मकपुचरवि वारोत्सवम्‌ अवलोक्य ¢ 

भतारम्‌ अव्रवीत्‌ । सवेथेव ममोपरि तवावज्ञा ' येन मम 
दारकस्य विवाहोत्सवाय न यतसे । तच्‌ छवा ब्राह्मणः प्राह । 
आर्ये ' यदि परं पातालम्‌ अनुप्रविश्य वासुकिम्‌ अभ्यथेये । 9 
मूढे ' को ऽन्यो ऽस्य सपेस्य स्वदारिकां प्रयच्छति " इति । एवम्‌ 
उक्ते सविशेषं दीन वदनां ब्राह्मणीम्‌ अवलोक्य तदुपरोधाट्‌ वहू 
पाथेयं गृहीत्वा प्रियकल्चतया देन्तरं पयैटन्‌ कतिपयेर मासेर 
दूरदेशवस्थितं कुत्कुटनगरनामाधिष्ठानं प्राप्तः । तच च परस्प- 
रपरिज्ञात॑सन्ना व॑सुख॑संश्रयणी य॑संबन्धिक्गृहे ल्ानभोजनादिभिर्‌ 
उपचयेमाणस्‌ तां निशम्‌ अतिवाह्य प्रभातसमये तं ब्राह्मणम्‌ 25 
अभिवाद्य यावत्‌ प्रस्थितः ' तावत्‌ तेनाभिहितः । किमथे भवान्‌ 
इहागतः ' कुचर वा यास्यति । इत्य्‌ उक्ते ऽसाव्‌ आह । पुचयोग्यां 
दारिकाम्‌ अन्वेष्टुम्‌ अहम्‌ आगतः। इति श्युत्वा ब्राह्मणो ऽ ब्रवीत्‌ । ७ 
यद्य्‌ एवम्‌ ' ततो ममेयम्‌ अततिसुरूपा दारिका । भवांश च 
ममापि प्रभविष्णुः । तट्‌ गृह्यताम्‌ इयं स्वपुच्राय । इत्य्‌ अभिहिते 
ब्राह्मणस्‌ तदारिकां सपरिजना गृहीत्वा स्वाधिष्ठानं प्रत्यागतः । 
अथय तस्याः परमल्रावण्याइूतगुणोपेताम्‌ असाधारणं रूपसं- 
पदम्‌ अभिवीष्य प्रीतिविस्फारितनयना जनपदास्‌ त्त्परिजनम्‌ 
अब्रुवन्‌ । कथं सन्धिर्‌ इदृशं कन्यारत्नं सपेस्योपपाटितम्‌ । इति ५ 
:. 


5001 1. (प्र 287 ^ अला 6 07 एदा एप्र)8 ; 106 

7216 =: १18 68 2 86706०४, 4816 अ: ०0७ ०611688 2६21119६ 068६1. 
शयुत्वा +सर्वेर एवो दिग्रहटयेस्‌ तस्या महच्मेर अभिहितम्‌। अ परिय 
ताम्‌ इयम्‌ अस्माद्‌ पहोपष्टम्मितबटृकात्‌। अथ तया कन्ययो क्तम्‌ । 
अत्छम्‌ अनया विडद्धनया । पश्यत ' यतः । ५ 

सकृज्‌ जल्पन्ति राजानः ' सकृज्‌ जल्यन्ति साधवः । 

सकृत्‌ कन्याः प्रदीयन्ते ' चीण्य्‌ एतानि सकृत्‌ सकृत्‌ ॥३७९॥ 
किं च। कृतान्विहितं कमे ' यट्‌ भवेत्‌ पू वेनिमिंत्तम्‌ । ¢ 

न शक्यम्‌ अन्यथा कतुं ' पुष्पकस्य सुरेर यथा ॥३४०॥ 
अथ ते सव एव पृछन्ति स । को ऽयं पुष्पको नाम । कन्या 
कथयति । 9 


॥ कथा २४ ॥ 
आसीट्‌ इन्द्रस्यानेकशस््रागमांप्रतिहतवुद्धिः परमरूपत्ावण्यगु- 
णेपेतः शुकः पुष्पको नाम । अथ कदाचिद्‌ असौ महेन्द्रकरतत्ते 
स्पशेसुखाणायितशरीरो विविधसूक्तानि पठन्‌ स्वसेवासमये समा- 
यातं यमं दुष्पसृतः । स्वैर एवामरगणेः पृष्टः । किं भवान्‌ 
अमुं दृष्टुापक्रान्तः ' इति । शुक आह । सवेप्राण्यपकतां कित्तायम्‌ । 
कथम्‌ अस्मान्‌ नापकरम्यते । इति श्रुत्वा तेः सर्वेस्‌ तद्धयोपश- 
मायाभिहितो यमः ' यत्‌ रिल्छास्मह्वचनाट्‌ अयं भवता शुको न 
मायेः । यम आह । नाहं जानामि । अच कालः प्रनविष्णुः ' 
इति। एवं च तं गृहीत्वा कालेसकाशं गत्वा पूर्वोक्तम्‌ एवान्रुवन्‌ । 
अथ कालत्ठो ऽष्‌ आह । मृत्युर्‌ एतज्‌ जानाति । स एव भण्यताम्‌। 
अथेवम्‌ अनुष्ठिते मृत्युदशेनाट्‌ एव शुकः पञ्चत्वम्‌ उपगतः । ° 
तच्‌ च दुष्टा सर्वेर णवृकुत्क़ीभूतमनोभिर्‌ यम उक्तः । को ऽसो 
वृत्तान्तः । ततो यमो ऽ रवीत्‌ । मृत्युदशेनाद्‌ एव मरणं निबद्धम्‌ 
आसीद्‌ अस्य । इति भुत्वा स्वस्थानं जग्मुः ॥ २५ 


०६, प तकति ~^ पम ¶10४ एता. 80गः ए. 107 
व 216 अञः 18त 68 2 8670671६, 216 अन्तं ; ष्ट, पपपेडध्लाः, 20 81856 710. ए7द7116-51079. 


अतो ऽहं ब्रवीसि । कृतान्त विहितं कमे ' इति । अन्यच्‌ च। 
कन्यानृतवचनीयता मे पितुर्‌ मा भूत्‌ ' इति । एवम्‌ अभिहिते 
परिवारानुमता सा सर्पण परिणीत्ता। अथासौ भक्तिपू वे दुग्ध- * 
पानादिक्रियाभिः सपेम्‌ उपचरितुम्‌ आरण्या । अन्यदा राचाव्‌ 
अयं सपो ऽपवरक्स्यापित्तविपुत्पेटाभ्यन्तरान्‌ निर्गत्य तस्याः 
शयनम्‌ आरूढः । तत्तस्‌ तयोक्तः । को ऽ यं पुरुषाकृतिः । परपुरूष ० 
इति मत्वोत्याय प्रवेपितसवाङ्गी हारम्‌ उद्वाट प्रस्थानाभिमुखी 
तेनोक्ता । भद्रे ' स्थीयताम्‌ । अहं तव भता । अथ तत्मत्यया्ं 
पेटाभ्यन्तरस्थं शरीरम्‌ अनुप्रविश्य पुनस्‌ तस्मान्‌ निगेत्यागतः । 9 
सा च दूरोच्छितिमुकुटकुरडत्कटवंकियुरादगद्‌विभूषितस्यास्य पाद्‌- 
योर अपतत्‌ । पश्चात्‌ तो सुरतसुखम्‌ *अन्वभूताम्‌ । तच्‌ च दषा 
पूर्वोत्थितस्‌ तस्य पिता ब्राह्मणः पेटाभ्यन्तरस्थं तत्‌ सपैकीशं 
गृहीत्वा ' मायम्‌ अचर पुनः प्रवेष्टयति ' इत्य्‌ असौ वहिना संस्का- 
रित्िवान्‌ । प्रभाते च परमहषात्‌ पल्या सह सेह वा्तांपरायणं 
प्रधानपुचायमाणं स्वपुरं सवेजनस्य ट्शितिवान्‌ ॥ 15 

एतन्‌ निदशेनं राज्ञे निवेद्य नम्र्रवणकगभी मटिकां बल- 
भटः प्रज्वात्ितवान्‌ ॥ 


अतो ऽहं त्रवीमि। नप्र: अवणको *दग्धः। इति । तत्‌ ' मूखं ' ईदृशा मन्त्रिणो भवन्ति । 15 

न भवद्विधाः केवलमन्त्रिमाचव्यपदे शोपजीविनो नीतिमार्गानभिन्ञाः । सर्वथा प्रकरीकृतं 

त्वयान्वयागतम्‌ अनेन दुखरितेन दुमन्तरिल्म्‌ । नूनं तव पिताप्य एवंलक्षण आसीत्‌ । 

यतः। यो ऽ वश्यं पितुर आचारः ' पुस्‌ तम्‌ अनुवर्तते । 21 
न हि *केतकिवृ्तस्य । भवत्य्‌ आमलकी फलम्‌ ॥ ३८१॥ 

न च स्वभावगम्भोराणां विदुषां बज्नापि कालेनागम्यं रन्ध्रान्तरं लभ्यते यदि न खयम्‌ 
एव गाम्ी्यम्‌ अपहा यूात्ममतिच्छिद्रं द शेयेयुः । यतः । 24 
यत्नाट्‌ अपि कः पश्येच्‌ । किखिनाम्‌ आहारनिर्गमस्थानम्‌ । 

यदि जलदष्वनिसुदितास्‌ । त एव मूढा न नृत्येयुः ॥ ३८२॥ द 


5001 7. गत ८8174 पअ 07 एए 08; 108 


78716810 ग 216 अरः 6.96, 210 कपा, 20 00608 1016. ॥ 3-14-13 


तत्‌ सर्वथा किं तवपसद स्यो पदेशेन । उक्तं च । 

नानाम्यं नाम्यते दार ' न शस्त्रं क्रमते ऽश्मनि। 

सूचीसुख्या इ वाशिधये ' नोपदे शः सुखावहः ॥ ३८३॥ 8 
दमनक आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 


॥ कया २५ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चि्‌ वनोदेणे वानरयूथम्‌ । तच्‌ च हेमन्तकात्वे ऽ 
ऽ तिविड्धत्ठं निश्णसुखे खद्योतम्‌ अपश्यत्‌ । तच्‌ च तं दुष्टा ' 
अभिर अयम्‌ ' इति मत्वा यत्नाद्‌ आहत्य शुष्कतृणपर्णेर्‌ 
अवच्छाद्य प्रसारित्रुजकछाकुसिवछःप्रदे्णन्‌ कर्डयमानं तापम- ° 
नोरथसुखं कित्रानुभवति स्म । अथ तत्रैकः शाखामृगो विशेषतः 
शीतातेस्‌ तच्रतमना मुहुर मुहुस्‌ तम्‌ एवोपाधमत्‌ । अथ सूची- 
सुखी नाम पक्षिणी वृक्षाद्‌ अवतीये देवाहतूत्मो पधाताय तम्‌ 
उवाच । भद्‌ ' मा ्िष्यताम्‌ । नायं वहिः । खद्योतो ऽयम्‌ ' 
इति । अथसौ तद्वचनम्‌ अनादृत्य पुनर्‌ धमति । ततस्‌ तया- 
सकृन्‌ निवायेमाणो ऽपि नोपशणम्यति । अथ किं बहुना । तावत्‌ + 
तया कणौभ्यणेम्‌ आगत्य प्रब्रम्‌ उद्वेजितः ' यावत्‌ तेन सा 
गृहीत्वा श्त्ठियाम्‌ आस्फाल्ठिता पि्टवक्तनेचशिरोमीवा पञ्चत्वम्‌ 
आप ॥ 18 


अतो ऽहं व्रवीमि । नानाम्यं नाम्यते दारू ' इति । अथवा । 

किं करिष्यति पाण्डित्यम्‌ ' अपात्रे प्रतिपादितम्‌ । 

सपिघधानघरान्तःस्थः ' प्रदोप इव वेश्मनि ॥ ३८४॥ 21 
तन्‌ नूनम्‌ अपजातस्‌ त्रम्‌ । उक्तं च । 

जातः पुचो ऽनुजातश्र्‌ च । अमिजातस्‌ तथैव च। 

अपजातश्‌ च लोके ऽस्मिन्‌ ' मन्तव्याः शास्त्रदशिभिः ॥ ३८५॥ 24 

मातुतुल्यगुणो जातस्‌ त अनुजातः पितुः समः। 

अभिजातो ऽधिकस्‌ तस्माट्‌ । अपजातो ऽघमाघधमः ॥ ३८६॥ 


०४, एप्त (0 ^ प्रा) कपष एणा, ण्णः 7. | 109 


78116807 9. 816 उरण; 6००6 .€87६ 8.05 ८884 -0681६., 


साधु चदम्‌ उच्यते। 
प्रज्नयातिविसारिणया । यो घनेन बलेन वा । 
धुरं वहति गोचरस्य । जननी तेन पुणी ॥ ३८७॥ 8 
अपि च। आपातमाचसौन्दर्य ' कृच नाम न विद्यते । 
अत्यन्तप्रतिपत््या तु ' दुलैभो +$ लं कृतो जनः ॥ ३८८॥ 
अथवा साधु चेदम्‌ उच्यते। 6 
धर्मवुद्धिर अवुद्धिश च ' दाव्‌ एतौ विदितौ मम। 
तनयेनातिपाण्डित्यात्‌ । पिता *धूमेन मारितः ॥३८९॥ 
दमनक आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 9 


॥ कथया २६ ॥ 


अस्ति ' कस्मिंश्चिन्‌ नगरे वणिक्पुचो धमेवुद्धिदु्टवुदिनामानो 
सुहृदाव्‌ आस्ताम्‌ । तौ चार्थोपाजेननिमिचं विप्रकृष्टं देशान्तरं ५ 
गतौ । अथ यो धमेवुद्धिनामा ' तेन स्वभाग्योदय वशत्‌ कस्यापि 
साधोः पू वैस्थापितं कत्श्गतं दीनारसहखं प्राप्रम्‌ । स तु दु्टवु- 
दिना सह सं प्रधाये ' कृताव्‌ आवाम्‌ ' स्वदेशं गच्छावः ' इति 
निश्चित्य याव्‌ अपि प्रत्यागतो । स्वाधिष्टानसमीपे च धमेवुद्धि- 
नाभिहितम्‌ । भद्र ' अधेविभागस्‌ त्वय्य्‌ आगच्छति । तट्‌ गहाण ' 
येनाधुना स्वगृहं प्राण मिच्रामिचसमसम्‌ उञ्ज्वत्टं व्यवहरि- 
ष्यामः । अथ दुष्टबुद्धिः कुटित्ठहृद्यतया स्वाथेपुष्टये तम्‌ आह । 
भद्‌ ' यावद्‌ आवयोर्‌ अयम्‌ अथः सामान्यः ' तावद्‌ अव्यव- 
च्छिन्नः सेहसन्ञावः। तत एकेकं शतं गृहीत्वा शेषं भूमौ निधि > 
स्वगृहं प्रविशावः ' यतो ऽस्याथेस्य हरासवृडिन्यां पुण्यपरीष्ा 
कृता भवति । ततो धमेवुदधिना स्वभावायेतया तदन्तगेतदुष्टाभि- 
प्रायम्‌ अविज्ञाय तथेति प्रतिपन्ने तो इाव्‌ अपि किंचिट्‌ आदाय 
शेषं भूमो सुगुप्रं कृता नगरान्तः प्रविष्टौ । अथय दु्टबदधिर्‌ असद्य- 


50०01 1. (प 871^ वल पर 07 एय ए प्रा)8; 110 
यव्यसनसेवितया सच्छिद्रभाग्यतया च छीणप्रत्यंशः पुनर्‌ अपि 
धमेवुदधिना सहापर शतं शतं विभक्तवान्‌ । अय तस्य तट्‌ अपि 
वषैस्यान्तरे तथेव परिछीणम्‌ । एवं च दुष्ट बुधि चिन्तयाम्‌ ° 
आस । यदि पुनस्‌ तेन सह शतं विभजामि ' ततः शेषेण चतुभिः 
शतैर अपहतेर अपि किम्‌ अत्येः । तस्मात्‌ षट्‌ शतान्य्‌ एवाप- 
हरामि । इति विचिन्येकाकीभूय ताम्‌ अथेमाचाम्‌ अपनीय तं ° 
भूप्रदेशं समीकृततवान्‌ । अतिक्रान्ते च मासमात्रे स्वयं गत्वा 
धमेवुद्धिम्‌ अभिहितवान्‌ । भद्‌ ' शेषट्व्यं समविभागं कुवः । 
इत्य्‌ उक्ता धमेवुद्धिना सह तम्‌ उदेशं गत्वा खातकमे कतुम्‌ ° 
आर्यो । खन्यमाने च भूभागे यदासाव्‌ अथो न दृश्यते ' तदा 
धृष्टतया दुष्टबुद्धिः प्रथमत एव तेनव रिक्तभारडनात्मनः शिरस्‌ 
ताडयन्‌ अव्रवीत्‌ । क्र तट्‌ बद्महृदयम्‌ । नूनम्‌ ' धमेवुद्धे ' 
त्वथेवा पहृतम्‌ । तट्‌ अपेय तस्याधेम्‌ । नो चेत्‌ ' अहं राजकुले 
निवेदयिष्यामि । स आह । भो दुरात्मन्‌ ' मेवं वद्‌ । धमेबुद्धिः 
खल्व्‌ अहम्‌ । नेतच्‌ चोयेकमोाचरामि । उक्तं च । 5 

मातृवत्‌ परदाराणि ' परद्रव्याणि त्टो्टवत्‌ । 

आत्मवत्‌ सवेभूतानि ' वीस॒न्ते धमेवुद्धयः ॥ ३९०॥ 
ततस्‌ तौ याव्‌ अपि विवदन्तौ धमांधिकरणं गत्वा टृव्यापहरण- 
वृत्चान्तं कथयतः । तच्‌ छरुत्वा धमोधिकरणिङकेस्‌ तयोर्‌ दिव्यम्‌ 
आदिष्टम्‌ । अथ पापवुद्धिः प्राह । अहो ' न सम्यग्‌ दृष्टो न्यायः। 
उक्तं च ' यत्तः । भ 

विवादे दृश्यते पच ' तदभावे तु साश्िणः । 

साष्यभावात्‌ ततो दिव्यं ' प्रवदन्ति मनीषिणः ॥३९१॥ 
तट्‌ अचर विषये मम वनदेवता साक्िभूता तिष्ठति । सापि भवताम्‌ २५ 


०४, वप्र [तकि ^) वप्त एला. 8001 1. 111 

¶816 अञ91: ©००4-0€ कह 200 52त-16 दप, ¶216 अरण: प्क्ाः00, 8670670६, 804 71018005. 
आवयोः साधुम्‌ असाधुं वा कथयिष्यति । अथ तेर्‌ अभिहितम्‌ । 
युक्तम्‌ उक्तं भवता । उक्तं च ' यतः । 

अन्यजो ऽपि यदा साक्षी ' विवादे संप्रजायते । 9 

न तच युज्यते रिव्यं ' किं पुनर्‌ वनदेवताः ॥ ३९२॥ 
तट्‌ अस्माकम्‌ अप्य्‌ अच विषये महत्‌ कोतुकम्‌ अस्ति । प्रत्यूषे 
युवाभ्याम्‌ अप्‌ अस्माभिः सह तच वनोदेशे गन्तव्यम्‌ । ततस्‌ ५ 
तेर याव्‌ अपि प्रतिभुवं गृहीत्वा गृहं प्रति विसजितौ । अथ 
दुष्टबुद्धिना स्वगृहं गतेन पित्ता प्राथितः । तात ' मत्पाणिगतास्‌ 
ते दीनाराः ' किं तु तहचनमाच्रापेक्षिणस्‌ तिष्टन्ति । अतो ऽहम्‌ » 
अद्य रा्राव्‌ अदृश्यम्‌ एव पूर्वोष्वातंनिधान॑संनिधानंप्रदेशस्थ॑श- 
मींतरूकोटरांन्तरे त्वां स्थापयिष्यामि । प्रातस्‌ त्या धमोधिकरणि- 
प्रत्यक्षं साधितं विधेयम्‌ । ततः पिचाभिहितम्‌ । पुर ' विनष्टाव्‌ 
आवाम्‌ । यत्कारणम्‌ ' अनुपाय एषः । साधु चेदम्‌ उच्यते । 

उपायं चिन्तयेद्‌ विद्वान्‌ ' अपायम्‌ अपि चिन्तयेत्‌ । 

पश्यतो बकमूखेस्य ' नकुतरेर भिता वकाः ॥३९३॥ 
दुष्टबुद्धिर अत्रवीत्‌ । कथम्‌ एतत्‌ । पित्ता कथयति । 


॥ कथा २७ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिट्‌ वनोदेशे बककटब्वकसनाथो वटपादपः । तस्य "5 
कोटरे कृष्णसपैः प्रतिवसति स्म । स च बकवात्छकान्य्‌ अजातप- 
छषाण्य्‌ एव सदेव भक्षयन्‌ कालं नयति । अथेको बकः सपेनक्ि- 
तशिशुवेराग्यात्‌ सरस्तीरम्‌ आसाद्य बाष्यभरम्‌ उत्सुजन्‌ अधो- 
सुखस्‌ तिष्ठति । तं च तथाविधम्‌ अवलोक्चेकः कुलीरकः 
प्रोवाच । माम ' किम्‌ एवम्‌ अद्य रुद्यते । बक आह । भद्र ' किं 


50००1 1. प्र 814 परल 07 एए 28; 112 


¶ 216 अर ण्ा: पलः०, 8660४, 80 71070008. ¶ 816 अरण: &००५-५62६7६ 2.० ए 24.168. 


करोमि । मन्दभाग्यो ऽहम्‌ । मम बात्कानि स्वजनापत्यानि 
च वटकोटरनिवासिना सर्पेण भक्तानि । तहु: खटुःखितो ऽहं 
रोटनं करोमि । तत्‌ कथय मे ' कश्चिट्‌ उपायो ऽस्ति तहिनाशे । 9 
तच्‌ इत्वा कुत्दरीरकण चिन्तयाम्‌ आस । अयं तावद्‌ अस्नज्जा- 
तिसहजवेरी । तत्‌ तथाविधं सत्यानृतम्‌ उपदेशं प्रयच्छामि 
यथान्ये ऽपि बकाः छयं यान्ति । उक्तं च । ¢ 

नवनीतसमां वाणीं ' कृत्वा चित्तं सुनिदेयम्‌ । | 

तथा प्रबोध्यते चरुः ' सान्वयो मरियते यथा ॥ ३९४॥ 
आह च । माम ' यद्य्‌ एवम्‌ ' तन्‌ मत्मां स^खर्डानि नकुल्- ° 
बिल्धद्वारात्‌ सपेकोटरं यावत्‌ प्रशिप ' येन तन्मार्गेण गल्ला स तं 
दुष्टसपे विनाशयति । तथानुष्ठिते नकुलेन मत्समांस"खरडानुसा- 
रिणा तं दुषटसपं व्यापाद्य ते ऽपि च तदुक्षाश्रयाः सर्वे बकाः शनेः 
श्नेर भिताः ॥ 

अतो ऽहं ्रवीमि। उपायं चिन्तयेद्‌ विद्वान्‌ ' इति । अथ 

दुष्ट बुद्धिना तत्‌ पितृवचनम्‌ अवगणयता तस्मिन्‌ वृष्विवरे 
राचाव्‌ अदृश्य एव पिता स्थापितः । अथ प्रातर्‌ णव जात्वा 
पापवुद्धिर्‌ धोतप्रावरणो धमंवुद्धिपुरःसरो धमोधिकरणिकेः 
तां शमीं समभ्येत्य तारस्वरेण प्रोवाच । 18 

आदित्यचन्द्राव्‌ अनिलो ऽनलत्श च 

द्योर्‌ भूमिर्‌ आपो हृदयं यमश च । 

अहश् च राचिश् च उभे च संध्ये श 

धर्मो विजानाति नरस्य वृत्तम्‌ ॥ ३९५॥ 
भगवति वनदेवते । आवयोर्‌ मध्ये यश चौरः ' तं कथय । अथय 
शमीकोटरस्थः पापबुद्धिपिता प्रोवाच । भोः ' धमेवुद्धिनापहतम्‌ 


० प्रप्त [0ति ^ पा) वप्त एए, 80०६ 1. 113 
¶816 अकण : 6००4-८ अ६ 20 8801627६. 13.113 
एतद्‌ द्रव्यम्‌ । तच्‌ छवा सर्वे ते राजपुरुषा विस्मयोत्फुल्लनयना 
यावट्‌ वित्तहरणोचितं शस्त्रदु्या धमेनुद्धेर नियहं विचारयन्ति ' 
तावद्‌ धमेवुद्धिना वह्िभोज्यदृथेर्‌ आव्य तच्‌ छमीकोटरं ४ 
वह्िना संदीपितम्‌ । अथ ज्वत्ठति तस्मिन्‌ अधेट्ग्धशरीरः 
स्फुटितदृष्टिः करुणम्‌ आक्रन्दन्‌ पापनुद्धिपिता शमीकोटरान्‌ 
निश्चक्राम । ततण् च तैः सर्वेः पृष्टः । भोः ' किम्‌ इटम्‌ । इत्य्‌ ० 
उक्ते स ' पापबुदधिविचेष्टितं सवेम्‌ इटम्‌ ' इति कथयाम्‌ आस । 
अथ ते राजपुरूषास्‌ तं दुष्टवृ्धिं तस्याम्‌ एव शमीशखायां 
प्रवित्छम्न्य धमेवुद्धिं प्रशस्य राजप्रसादादिना संतोषयाम्‌ आसुः ॥ ° 


अतो ऽहं ब्रवीमि । धर्मबुच्चिर्‌ अवुद्धिश्‌ च इति । आख्याति चूाख्यानके पुनः करटको 
$त्रवीत्‌ । धिग मृखं । अतिशयपाण्डित्येन तया दग्धः सखवंशः। साधु चेदम्‌ उच्यते । 


लवणजलान्ता नव्यः । स्त्रीभेदन्तानि बन्धुहद यानि । 12 

पिगुनजनान्तं गृह्यं । दुःपुचान्तानि च कलानि ॥ ३९६॥ र 
अपि च । यस्य तावन्‌ मनुष्यस्य]ष्य्‌ एकस्मिन्‌ मुखे जिद्भाद्वयं भवति ' कस्‌ तस्य विश्वासम्‌ 
उपेति । उक्तं च । ~ 


दिजिङ्कम्‌ उद्वेगकरं । क्रूरम्‌ अत्यन्तनिष्टुरम्‌ । 
खलस्याहेश्‌ च वद नम्‌ । अपकाराय केवलम्‌ ॥ ३९७॥ 

तन्‌ ममष्य्‌ अनेन तव चरितेन भयम्‌ उत्पन्नम्‌ । कस्मात्‌। 18 
मा गाः खलेषु विश्रासं । मभेते पूरवैसंस्तुताः । 
चिरकालोपची्णो ऽपि ' द शत्य एव भुजंगमः ॥ ३९८॥ 

अपि च। चन्दनाट्‌ अपि संभूतो ' द हत्य एव ज ताशनः। 21 
विशिष्टकृलजातो ऽपि ' यः खलः खल एव सः ॥ ३९९॥ 

अथवा सखभाव एष खलानाम्‌ । उक्तं च । 


परदोषकथाविचक्षणः २4 
स्वगणख्यापननित्यतत्परः । 

स्वयम्‌ एव हि दैवदण्डितः 
पिमुनो विश्वविनाशपण्डितः ॥ ४००॥ ष० श 


नूनं तस्यास्यपुटे । जिङ्भा वज्ञोपमा मनुष्यस्य । 
यस्य परदोषकथने । सदयो न विशीर्यते शतधा ॥ ४०१॥ ध 


500 7. प 8¶17.^ 61786 0 एम ्08; 114 


216 अ ४111; ० 11166 8४6 10. 


181168६0, 


मा भवतु तस्य पापं ' परहितनिरतसख्य पुरुषसिंहस्य । 


यस्य परदोषकथने ' जिद्धा मौनव्रतं चरति ॥४०२॥ ढः 
तत्‌ सर्वथा परीच्य संगतं कार्यम्‌ । उक्तं च । 3 

विद्वान्‌ ऋजुर्‌ अभिगम्यो । विदुषि शे *चाप्रमादिना भाव्यम्‌ । 

ऋलजुमूखेस्‌ त अनुकम्प्यो । मूखंशटः सर्वथा त्याज्यः ॥ ४०३॥ ढः 


तन्‌ न केवलं तयुत्मीयवंशविनाशाय यतितम्‌ । किं पुनर्‌ अधुना खामिनो ऽपि। यस्‌ 6 
त्वं स्वामिनम्‌ अप्य्‌ एनाम्‌ अवस्थां प्रापयसि , तस्य तवान्यो जनो जी्ण॑तृणमभूत एव । 
उक्तं च। तुलां लोहसहस्रस्य । यत्र खादन्ति मूषकाः। 

श्येनः कुज रहत्‌ तच ' किं चित्रं यदि पुचहत्‌ ॥ ४०४॥ 9 
दमनकं आह । कथम्‌ एतत्‌ । करटकः कथयति । 


॥ क्था २७ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्िट्‌ अधिष्ठाने नाडुको नाम वणिकपुचः । स॒ च 
विभवक्षयाट्‌ देशन्तरगमनम्‌ अचिन्तयत्‌ । यतः । 

यच देशे ऽवा स्थाने ' भोगा भुक्ताः स्ववीयेतः । 

तस्मिन्‌ विभवहीनो यो ' वसेत्‌ स पुरुषाधमः ॥४०५॥ 
तथा च । 

यचाहकारयुक्तेन ' चिरं वित्ठसितं पुरा । 

दीनं चरति तत्रैव ' यः परेषां स निन्दितः ॥४०६॥ 18 
तस्य च गृहे पू वेपुरुषो पाजिता लोहपत्ठसहसख्रघटिता तुत्छास्ति । 
तां च चेष्ठिलष्छणस्य निसेपभूतां कृवा देशान्तरं प्रस्थितः । 
ततश. च सुचिरं यदृच्छया देशान्तरेषु मित्वा पुनस्‌ तट्‌ एव ५ 
नगरं समागत्य तं लशमणश्चेठिनं जगाद्‌ । भो लष्मण ' समपेय 
मे निष्ेपतुत्कराम्‌ । ततो लषणः प्राह । भो नाइक ' त्वदीयतुत्ा 
मूषकेर्‌ भिता । तच्‌ वा नाडकः प्राह । लषछण ' नास्ति ५ 
ते दोषः ' यदि सा मूषकेर्‌ भरिता । *यत इदुग्‌ एवायं संसारः । 
न किचिद्‌ अचर शश्वतम्‌ अस्ति । परम्‌ अहं नद्यां लानां 


०, (प्र तति ^) प्रप्त एता. 80 7. 115 


¶ 216 उकण: जण 0166 2.06 1707. 


गमिष्यामि । ततस्‌ त्वं धनदेवनामानम्‌ आत्मी यपुचं लानोपकर- 
शयहणाय मया सह संप्रेषय। सो ऽपि लष्सणो निजचो येशङ्ितः 
पुचं धनटेवम्‌ उवाच । वत्स ' पितृव्यो ऽयं ते नाडुकः सरानाथे 
नद्यां यास्यति । तट्‌ गम्यताम्‌ अनेन सह लानोपकरणम्‌ 
आदाय ' इति । अहो " साध्व्‌ इटम्‌ उच्यते । 

न भक्तया कस्यचित्‌ को ऽपि ' प्रियं प्रकुरूते नरः । ९ 

सुक्का भयं प्रलोभं वा ' कायेकारणम्‌ एव वा ॥४०७॥ 
तथा च । 

अत्यादरो भवेट्‌ यर ' कायेकारणवजितः । 

तच शङ्गा प्रकतेव्या ' परिणामे ऽभयावहा ॥४०४॥ 
अथासो लषणपुचः लानो पकरणम्‌ आदाय प्रहृष्टमना नादुकेन 
सह नद्यां गतः । अथ नाडुको नद्यां सरात्वा तं तषमणपुचं 
धनदेवं गिरिगुहायां प्रक्षि तहारे वृहच्छित्ां टा लषमण- 
गृहम्‌ आयातो ल्छृष्ूछणेन पृष्टः । भो नादुक । कथ्यताम्‌ ' क्र 
मे पुरो धनटेवस्‌ त्वया सह गतः स्थितवान्‌ । नाइक आह । + 
भो लष्मण ' नदीतटाच्‌ च्येनेनापहृतः । लषछण आह । भो 
नाइक ' अतथ्यवादिन्‌ । महाकायं धनदेवं कथम्‌ इव श्येनो 
ऽ पहरति । नाडको ऽबवीत्‌ । भो लष्मण । मूषकाः पुनर्‌ 
लोहमयी तुलां भक्षयन्ति । तट्‌ अपेय मे तुलाम्‌ " यदि पुतेण 
प्रयोजनम्‌ । एवं विवदन्तौ तौ याव्‌ अपि राजद्वारम्‌ उपगतौ । 
ततो लषमणस्‌ तारस्वरेण प्रोवाच । भोः ' अब्रह्मण्यम्‌ अब्रह्मण्यं ? 
वतेते । मम पुरो धनदेवनामानेन नाडकेनापहतः । अय 
 धमोधिकारिणस्‌ तं नाडकम्‌ ऊचुः । भोः ' समपेय लद्मण- 
पुच्रम्‌ । नाडको जगाद्‌ । किं करोमि । पश्यतो मे नदीतटाच्‌ २ 


> 


500 1. (त 8174 अ लप< 07 य ए08 ; 116 


व 816 अकर: ० 1166 2४6 17010. 8716500 प्न. 


्येनेन नीतः । ते प्रोचुः । भो नाइक ' न सत्यम्‌ उक्तं त्वया । 
किं श्येनः पञ्चदशवाषिकं पुचम्‌ *अपहतुं शक्रोति । ततो नाइको 
विहस्य प्रोवाच । भोः ' श्रूयतां मडचनम्‌ । ४ 
तुलां लोहसहसखस्य ' यत्र खादन्ति मूषकाः । 
श्येनः कुञ्जरहत्‌ तच ' किं चिच यदि पुचहत्‌ ॥४०९॥ 
ते प्रोचुः । कथम्‌ एतत्‌ । नाडको ऽपि तेषां तुलावृच्चान्तम्‌ ° 
अकथयत्‌ । तं श्ुत्वा विहस्येकस्य तुलाम्‌ ' अपरस्य पुतं समपेयाम्‌ 
आसुः ॥ 


अतो ऽहं व्रवीमि । तुलां लोहसहस्रस्य । इति । करटकः पुनर अब्रवीत्‌ । तत्‌ । मूख । 9 
पिङ्गलककृतं संजो वकप्रसादम्‌ असहमानेन त्वयैतत्‌ कतम्‌ । यड्‌ वा साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 
प्रायेण कुलान्वितं कुकुलजाः स्त्र वल्लभं दुभेगा 


दातारं कृपणा जून्‌ अनुजवस्‌ तेजखिनं कातराः । 12 

*'वेरूप्योपहताश च कान्तवपुषं सौख्यस्थितं दुःस्थिता 

नानाशास्त्रविशारदं च पुरुषं निन्द्‌ न्ति मखाः सद्‌ ॥४१०॥ ईद्वापत् 
तथा । मूखांणां पण्डिता ष्या ' निर्धनानां महाधनाः । 15 


व्रतिनः पापशौलानां । *दुखारिण्याः कुलस्त्रियः ॥ ४११॥ 
अथवा। सदृशं *+चेष्टते खस्याः ' प्रकतेर्‌ ज्ञानवान्‌ अपि। 

प्रकृतिं यानि भूतानि ' निग्रहः किं करिष्यति ॥४१९॥ 18 
तस्यैव युक्तम्‌ उपदेष्टुम्‌ । चः सकृद्‌ उक्तं गृह्णाति । तं तु पाषाण इव गन्यहदयो निशष्टः। 
किं तवोपदिषटेन । किं च । मखं ' लया सह संवास एव न युज्यते । कदाचित्‌ लत्संपकांड्‌ 
अस्माकम्‌ अप्य्‌ अनर्थः स्यात्‌ । उक्तं च । ~ 

मूर्खेण सह वासो ऽपि ' देशे ग्रामे पुरे गृहे। 

अनथांचैव संभाव्यो ' व्यवहरिर विनैव हि ॥ ४१३। 

वरं जलधिपातालज्वलनावरटपातनम्‌ । 24 

न विवेकविहीनेन  मूर्खण सह संगतम्‌ ॥ ४१४॥ 

लभति पुरुषस्‌ तांस्‌ तान्‌ ' गुणदोषान्‌ साध्वसाधुसंपकांत्‌ । 

नानादेशविचारी । पवन इव शुभाशुभान्‌ गन्धान्‌ ॥ ४१५॥ तः 9 
साधु चेदम्‌ उच्यते। 


०, (प्र [तपि ^ पए एत 8001६ 1. 117 


78116507 $. ¶216 अज्य: ©००त 12 €8 &००५, ४8 72165 ०६५. 


माताष्य्‌ एका पितष्य्‌ एको । मम तस्य च पक्षिणः । 

अहं मुनिभिर आनीतः ' स च नीतो गवाशनेः ॥ ४१६॥ 

गवाशनानां स वचः गुणोति 

राजन्न अहं चुविरतं मुनीनाम्‌ । 

प्रत्य्तम्‌ एतद्‌ भवतापि दृष्टं 

संसगेजा दोषगुणा भवन्ति ॥ ४१७॥ युग्मम्‌ ॥ प]० 6 
सो ऽत्रवीत्‌ । कथम्‌ एतत्‌ । कररखकः कथयति । 


॥५ 


॥ कया २९ ॥ 


कस्मिंश्चित्‌ पवेतेकदेशे शुकी प्रसूता । तस्या ज्ञो शुको ससुत्न्न । ° 
अयाहाराथे निर्गतायाः शुक्यास्‌ तौ पुतो व्याधेन गृहीतो । 
तयोर एकः कथम्‌ अपि देववशाट्‌ अपेतः । हितीयं पञ्ञरके 
संस्थाप्य पाठयितुम्‌ आणख्धः । अपर च शुकः परिभमत्‌षिणा 
दृष्टः । ततस्‌ तेन संगृह्य स्वम्‌ आश्रमपदम्‌ आनीय पोषितः । 
एवं च काते ऽतिवतेमाने कश्चिद्‌ राजा स्वसेन्याट्‌ अश्वेना- 
पहूतस्‌ तं वनोदेशम्‌ आगतः " यच ते व्याधा नि वसन्ति । तत "5 
आगतं राजानम्‌ अवलोक्य सहसेव पज्ञरस्थः शुकः कलकल - 
श्ब्दम्‌ अकरोत्‌ । भो भो मदीयस्वामिनः ' एष को ऽपि हयारूढ 
आगच्छति । तट्‌ एनं बन्ध बन्ध ' व्यापादयत्‌ व्यापाट्यत ' इति । ‡5 
अथ तट्‌ राजा शुकवचनं श्युत्वान्यतो दुततरं वाजिनं प्रेरितवान्‌ । 
अथ यावट्‌ राजान्यट्‌ टूरवनान्तरं गच्छति ' तावत्‌ पश्यति 
सुनीनाम्‌ आश्रमम्‌ । तचापि पज्ञरस्यः शुको ऽब्रवीत्‌ । एय्‌ 
एहि ' राजन्‌ । विश्राम्यताम्‌ । शीतत्ठान्य्‌ उटकानि स्वाट्नि 
च फलानि भूय । भो भो ऋषयः । अस्याध्येपाद्ेन पूजा 
क्रियताम्‌ अस्मिन्‌ सुशीतले दुमतले । एवं शुत्वा राजती- 
वोत्फुल्लनयनो विस्मितमनाः ' किम्‌ इदम्‌ ' इति चिन्तितवान्‌ । 


5001९ 7. वत ए877^+ वप 07 एद प्8; 118 


¶ 216 अश्१ड : 6००त 1112168 & ००५, ०20 7181565 ४०३.4. एव716-8६07 ४, ग 216 गअ 2: 186 96. 


शुकं चापृच्छत्‌। मयेतो ऽन्यो ऽपि वनोदिशे त्वत्सदृशः शुको दुष्टः। 

` स कूररूपः ' वन्ध बन्ध । घातयत घातयत ' इत्य्‌ एवम्‌ अवदत्‌ 

अथ राज्ञो वचनम्‌ आकण्यं शुकेन यथावृत्तम्‌ आत्मनो वृं 

निवेदितम्‌ ॥ 

अतो ऽहं ब्रवीमि । संसगेजा दोषगुणा भवन्ति । अतः संसभं एव त्वया सह न श्रेयान्‌ । 

उक्तं च । यतः। 6 
पण्डितो $पि वरं शुर ' न तुं मित्रम्‌ अपण्डितम्‌ । 


स्ववध्याय मृतश चौरो ' वानरेण हतो नुपः ॥४१८॥ 
दमनकं आह ' कथम्‌ एतत्‌ । करटकः कथयति । 9 


॥ कया ३० ॥ 


अस्ति कस्यचिट्‌ राज्ञः पुबो वणिक्युचभट पुचाभ्यां सह मेचीम्‌ 
उपगतः । प्रत्यहं चत्वरारामविहारविनोद॑विलासंकीडाभिर्‌ एव 
सुखम्‌ अनुभवन्ति । धनुर्वेदगजाश्वारोहण॑वाहनंमुगयाकीडाविमुखः 
प्रतिदिनम्‌ आस्ते । अथान्यदा ' *राजनीतिविसुखस्‌ त्वम्‌ ' इति 
पित्रा तिरस्कृतो निजम्‌ अभिमानदुः खं मिच्रयोर्‌ आवेदितवान्‌ । 
*ताव्‌ आहतुः । आवयोर्‌ अपि स्वकमविमुखयोः संमुखं पितरो 
नित्यम्‌ एवासंबद्वं जल्पतः । तच्‌ च दुःखं भवन्मेचीसुखेनेता- 
वहिनान्य्‌ आवाभ्यां न ज्ञातम्‌ । इटानीं च लाम्‌ अष अनेनव + 
दुःखेन दुःखितं दष्टूातिदुःखिताव्‌ आवां संवृतो । अथ राजपुत्रो 
ऽब्रवीत्‌ । न खल्व्‌ अपमानितानाम्‌ इह स्थातुं युक्तम्‌ । अतः 
सवे एवेकटुः खटुःखिता निःसृत्य क्राण्‌ अन्यत्र यास्यामः । यत्तः। 

वीरत्रतस्य विद्यायाः ' पुण्यानां शक्तिशीलयोः । 

परीक्षा मानिनां ज्ञेया ' स्वदेशत्यागतः फलः ॥४१९॥ 
अथ तथानुष्ठिते ' क गन्तुं युक्तम्‌ ' इति चिन्तयन्ति स्म । ततो २, 


३ 


०, पप्तः 170 ^) एप्त एणा, एतन्म 1. 119 


चर 216 उअ 2: 56 06, 


वणिकपुत्रेणाभिहितम्‌ । न खल्व्‌ अथं विना +क्रु्‌ अभिम- 
तसिद्धिर भवति ' इति रोहणाचल्ं गच्छामः । तच रत्नान्य 
आसाद्य समस्तमनोरणान्‌ अनुभविषामः । इति समीचीनम्‌ 
अथम्‌ एनं सवे प्रतिपद्य रोहणाचत्टं गताः । तच च भाग्यवशट्‌ 
एकेकम्‌ अमूत्यम्‌ उत्तमरत्नम्‌ आसादितम्‌ । अथ ते पयीतो- 
चित्तवन्तः । कथम्‌ अस्माभिर्‌ इतो बद्पायेनाटवीमार्गेण ° 
प्रस्थितेर एतानि रत्नानि रक्षणीयानि । अय भटरपुजो ऽब्रवीत्‌ । 
ननु मन्तिपु्ो ऽहम्‌ । तन्‌ मयाचबोपायश् चिन्तितः ' यथा । 
एतानि स्वस्वोदरान्तः प्रक्षि नीयन्ते " यथा साथिकस्य चोरा- ° 
दिकस्य च योग्या न भवामः । इति निणीयि भोजनवेत्ायाम्‌ 
अन्नकवल्ठान्तर निधाय तेस्‌ तानि क्वल्ठितानि । एवं चानु- 
छीयमाने तच पवेतो पत्यकायाम्‌ अल्छितिविश्वान्तः को ऽपि" 
पुरुषस्‌ तान्‌ दुष्टा चिन्तयाम्‌ आस । अहो ' मया च रोहणाचत्ते 
रत्नाधिना बहुदिनानि पयेटितानि ' सषीणभाग्यतया न विचिल्न्‌ 
लब्धम्‌ । तद्‌ एभिः सह गच्छामि ' यतो यच्रैव मार्गे जातश्चमा 
निद्रां यास्यन्ति ` तचरैवामीषाम्‌ उदराणि विटाये चीण्य्‌ अपि 
रत्नान्य अपहरिष्यामि । इति कृतनिश्चयः पवेत्ताट्‌ अवतीय तेषां 
गच्छतां पृष्ठतो ल्टग्रः ' अव्रवीच्‌ च। भो भो महापुरूषाः । 5 
न शक्रोम्य्‌ अहम्‌ एकाकी भीषणां महाटवीम्‌ उक्लद्धयं स्वदेशं 
गन्तुम्‌ । अक्तो भवतां सार्थे मिलितः समेष्यामि । ते ऽपि 
+"साहाय्यवृद्धिम्‌ इच्छन्तः ' तथा ' इति प्रतिपद्य सहैव गन्तुम्‌ 
आर्थाः । 

अथ तस्याम्‌ अटव्यां गिरिगहनप्रदेश्णध्िता मागांसनभि- 
पल्ली तिष्ठति । तत्परिसरेण गच्छतां तेषां पल्ली पतिगृहे कोतु- ५ 


8०0६ 7. प्प््ट ए^ प्रजाप 07 एर त78 ; 120 


वद16 अजञ 2: $प156 106. 


कवशाट्‌ विधृतनानाविधपक्छिणां मध्याट्‌ एकः पन्ञरस्यो वृदप- 
छी शब्द चकार । स च पल्लीपतिः समस्तपक्िरतभाषाकुशत्ठः 
परठिरूताथे विचाये प्रहृष्टमनाः स्वभृत्यान्‌ अव्रवीत्‌ ' यत्‌ किलगेष * 
पक्षी खल्व्‌ एवं कथयति । मार्गेण गच्छताम्‌ अमीषाम्‌ अध्व- 
न्यानां पाच महामूल्यानि रत्नानि सन्ति। ततो गृहीत गृह्रीत ' 
इति । तट्‌ एतान्‌ विधृत्यानयत । अथ तेस्‌ तथानुष्ठिते पल्ली ९ 
पतिना स्वयम्‌ *“उत्सुरख्ठितानाम्‌ अपि तेषां पाश्च न किंचित्‌ 
प्राप्रम्‌ । ततो सुक्तास्‌ ते कक्षापटमा्रपरिच्छदा गन्तुम्‌ आरब्धाः! 
ततः स पक्षी तथेव पुनर्‌ विरौति । तच्‌ च शयुत्रा पल्लो पतिना 9 
पुनर आनायितास्‌ ते सविशेषं सम्यक्‌ संशोध्य मुक्ताः सनो 
यावट्‌ गच्छन्ति ' तावत्‌ तथेव तारतरं तस्मिन्‌ पक्षिणि व्याहरति 
पुनर अण्‌ आकाये पञ्लीपतिना ते पृष्टाः ' यथा । किल्ेष पक्षी 
सवेदा दृषटम्रत्ययो न कदाचिद्‌ अत्कं ब्रूते । ततो भवतां पार्थ 
रत्नानि कथयति । तत्‌ क्र तानि ' इति । अथ ते ऽब्रुवन्‌ । 
यद्य्‌ अस्माकं पार्् रत्नानि भवेयुः ' तत्‌ कथं वित्ोकनपरा 
अपि भवन्तो न पश्येयुः । प्लीपतिर्‌ आह " यद्‌ रष पक्षी 
पुनः पुनः कथयति ' तट्‌ अवश्यं भवदीयजठरान्तरे रत्नानि 
विद्यन्ते । संप्रति च संध्या संजाता । प्रभाते रत्नकारणाट्‌ अवश्यं 
युष्माकम्‌ उदराणि विदारयिष्यामि । इत्य्‌ आसक्िप्य कारापवरके 
सेपिताः। ततश चौरश् चिन्तयाम्‌ आस । प्रातः खल्व्‌ अमीषाम्‌ 
उद्रेषु विदायेमाणेषु यदा तादृशरत्नानि पल्लीपतिः प्राप्स्यति ' 
तदा निश्चितं दुरात्मा मदीयम्‌ अपि जठरं त्टोभाविष्टः पाटयि- 
ष्यति । ततो यथाकथम्‌ अपि मम मृत्युर्‌ एव । तट्‌ अचर किम्‌ 
अहं करोमि । उक्तं च । २५ 


०४, ¶ प 10कि ^ पा) प एता 800 1. 121 
अवश्यगत्वरेः प्राणेर्‌ ' मृत्युकाठे महात्मनाम्‌ । 
परोपकारण् चेत्‌ कश्चित्‌ ' सिध्येत्‌ तट्‌ अमृतं मृतम्‌ ॥४२०॥ 

तद्‌ वरम्‌ आत्मोट्र प्रथमम्‌ एवास्य विदारणाय दा स्ववध्यान्‌ » 
अप्य्‌ एतान्‌ रसामि ' यत आदाव्‌ एव विदारितमदीयोदरे 
सुनिपुणम्‌ अपि "वीक्षमाणो दुरात्मा स यदा न किंचिद्‌ 
आसादयिषययति ' तदा *लिन्नरत्नसत्तासं श्यः स्वत र्वामीषां ९ 
जटरविदारणकमे *निस्िंशे ऽपि कार्एयान्‌ न करिष्यति । रवं 
च सति तेषां प्राणदानाट्‌ धनदानाच्‌ च ममोपकारकीतिर्‌ 
इहत्र के ऽन्यत्मोके च जन्मशुद्धिश च भविष्यति । स्वतः प्राप्न- ° 
कातरम्‌ अण्‌ एतद्‌ एव॒ किंचित्‌ परिडतमरणम्‌ ' इति । 
अधातिक्रान्तायां रजन्यां प्रातर्‌ एव पल्ली पतिना तेषां जठरवि- 
दारणे प्रार्ये चोरो योजिताज्ञल्विर भूत्वा तं विज्ञप्रवान्‌ । न 
शक्रोम्य्‌ अमीषां स्वधरातुणां जटरविदारणं दृष्टुम्‌ । अतः प्रसीद ' 
प्रथमम्‌ एव मदीयोदट्रविदारणं कायेताम्‌ । ततः पल्लीपतिना 
द्यावश्णात्‌ तथा प्रतिपन्ने विदारिते ऽपि सति तस्योद्रे न 
किंचिट्‌ रत्नम्‌ आसादित्म्‌। ततो ऽसाव्‌ अनुशुणेच । कष्टं भोः 
कष्टम्‌ । मया हि परकिरुतविचारमानो पवृंहितत्लोभेन महट्‌ 
वेशसं कृतम्‌ । यथास्य जठरे ' तथा शेषाणाम्‌ अपि न किंचित्‌ ७ 
संभावयामि । इत्य्‌ उक्ता चयो ऽप्य्‌ अशतशरीरा मुक्तास्‌ ते 
सत्वरम्‌ अटवीम्‌ उल््य प्राप्राः किंचिद्‌ अधिष्ठानम्‌ ॥ 

अतो ऽहं ब्रवीमि । स्ववध्यार्थे मृतश्रा चौरः । तद्‌ वरं पण्डितशतुः । इति । 21 


अथ तेस्‌ तचाधिष्ठाने वशिक्पुचम्‌ अये कृवा चयाणाम्‌ अपि 
रत्नानां विक्रयः कृतः । अय प्रभूतं सूस्यधनम्‌ आनीय राजपुचाये 
सुक्तम्‌ । अनेन च भटरपुतं मन्त्रिते स्थाय तदिषयाधिपतिराज्यम्‌ ५ 


१: 


500४ 7. वप» 23114 पा 07 द्यप्र)8; 122 
आच्छु पयांलोच्य वणिक्यु्ो भार्डागारिकतवे नियोजितः । 
अय प्रचुर वरकरितुरगप्िदलत्टं हिगुणाथेदानतो मेलयित्वा तस्य 
च मन्तिणः षा्ुण्यबुद्धिवलेन विग्रहम्‌ आरभ्य संमामेण व्या- 9 
पाद्य राजानं स राजपुचस्‌ तद्राज्यम्‌ एव गृहीत्वा राजा बभूव । 
मिच्रहये ऽष््‌ आरोपितसवाङ्गराज्यचिन्ताभारः स्वच्छन्दवृत्चिर 
वित्कराससोख्यान्य्‌ अनुबभूव । अन्यदा च तेनान्तःपुरसमाश्ितेन ८ 
प्रत्यासन्नमन्दुरावानर एकः कौतुकात्‌ सटात्मसंनिहितः कृतः ' 
यतः शुक्चकोरपारापतंमेषंवानरादयः प्रकृयेव राज्ञां प्रिया 
भवन्ति । कमयोगाच्‌ च वानरो नुपतिद्तविविधभष्योपचीय- 9 
मानो वृद्धिम्‌ उपगतः ' सकल्राजल्मो कमान्यश्‌ च संजातः । 
राजापि तं वानरम्‌ *अतिविश्वासाट्‌ वात्सस्याच्‌ च स्वखद्धधरं 
चकार । अथ तस्य राज्ञो गृहाभ्याशे *नानातरूखर्डम रितं 
प्रमदवनम्‌ अस्ति । तच्‌ च तेन राज्ञा वस्षन्तागमे मधुकरकुलो- 
पगीयमानमदनकीतिप्रसरं बहुकुसमुमपरिमलसुगन्धि रमणीयम्‌ 
अवलोक्य मन्मयाविष्टेनासमहिषया सह तच प्रविशति स्म । सों 
ऽपि परिजनो इार एव स्थापितः । अथ कोतुकात्‌ प्रमदवनं 
परिभम्या वत्लोकयत्ता श्रान्तेन राज्ञा वानरो ऽभिहितः । अहम्‌ 
अस्मिन्‌ पुष्पगृहे छरणं स्वपिमि लग्रः । मम को ऽप्य्‌ उपटूवं 5 
कुवांणस्‌ त्वयाप्रमत्तेन प्रयत्नेन रस्षणीयः । इत्य्‌ उक्ता राजा 
प्रस्नः । तस्य चोपरि पुष्प॑गन्धंकस्तूरिकादिपरिमल्दलुन्धो मधुकरः 
समागत्य शिरसि निलीनः । तं दुष्टा सरोषो वानर चिन्तयाम्‌ 
आस । कथं मम पश्यतो ऽपि कषुद्जन्तुनानेन राजा ट्श्यते । 
इति निवारयितुम्‌ आख्यः । अथ यदा निवायेमाणो ऽपि मरः 
पुनः पुना राजानम्‌ उपेति ' तावत्‌ कोपान्धो वानरः खङ्गम्‌ ५ 


० (प तकि ^ पा) प्ट एता. 500 1. 123 


¶ध्€ अञ 9: 00189 71600. ए18016-8{01 9. 


आकृष्य मरम्‌ अनु प्रहारं पातितवान्‌ । तेन च प्रहारेण राज्ञः 
शिरश छिन्नम्‌ । अथ सहसुघ्रा राजमहिषी चासाट्‌ उत्थिता ' 
तादृशं चुसमनज्ञसम्‌ आलोक्य ऋन्द्िति वतौ ' आह च । रे रे 
मूखेवानर ' विश्वस्ते राजनि किम्‌ इटम्‌ एवम्‌ अनुष्टितं त्वया ' 
इति । वानरो ऽपि यथावृत्तम्‌ आख्यातवान्‌ । ततो मित्वितसवं- 
त्लोकेनाकरुश्य परिहेतः ॥ ९ 


अत एवोच्यते । न तु मितम्‌ अपण्डितं कायम्‌ ' यतो वानरेण हतो नृपः । इति । अतो 
$हं ब्रवीमि । 
पण्डितो ऽपि वरं शबुर्‌ । न तु मित्रम्‌ अपण्डितम्‌ । 9 


` स्ववध्यथै मृतश्रा चौरो । वानरेण हतो नुपः ॥ ४२१॥ 
पुनः करटक आह । 
*पेग्युन्यमा चकृशलः ' सौहादंस्य विनाशकः । 19 
प्रमाणं लादृशो यच ' तत्‌ कार्यं न शुभं भवेत्‌ ॥ ४२२॥ 
तथाच। स्थितो ऽष््‌ अन्त्यास्व अवस्थासु ' +न वाकार्यं व्यवस्यति । 
*साधुस्‌ तत्‌ कुरूते येन ' न लोके दूष्यते य शः ॥४२३॥ 15 
तथा । अन्त्यावस्थो ऽपि बुधो । न गुणान्‌ विजहाति जातिगुद्यासौ । 
न श्चेतभावम्‌ उज्छ्ति ' शङ्खः शिखिभुक्तसुक्तो ऽपि ॥४२४॥ ध) 
उक्तं च। यद्‌ अकायम्‌ अकार्यम्‌ एव तन्‌ 18 
न बुस्‌ तच मतिं प्रयोजयेत्‌ । 
परयापि तुषा प्रवाधितेर्‌ 
न हि रध्यागतम्‌ अम्बु पीयते ॥ ४२५॥ ० 21 
विं च। कर्तव्यम्‌ एव कर्तव्यं ' प्राणैः कण्ठगतेर्‌ अपि। 
अकर्तव्यं न कर्तव्यं ' प्राणैः कण्डगतेर्‌ अपि ॥ ४२६॥ 
इत्य उक्तस तदीयनोतिमागानुगं वचनं कुट बुद्धित्वाद्‌ विषम्‌ इव मन्यमानो दमनको 24 
$ परतः । 
अचन्तरे तौ पिङ्गलकसंजीवकौ क्रोधान्धितधियौ युद्धाय पुनर उव्यतौ । ततः 
पिङ्गलकः संजोवकं व्यापाद्य प्रशान्तकोपो ऽ रृण्दग्धपाणिना स्प्तपूर्वलेहव शात्‌ करुणया 27 
बाष्पं नयने प्रमृज्य सपञ्चात्तापम्‌ इदम्‌ अव्रवीत्‌ । अहो कष्टम्‌ । महद्‌ इदम्‌ अकृत्यम्‌। 
मया हि द्वितीयम्‌ इवृ्‌ात्मशरीरं संजीवकं व्यापाद यत्‌ात्मन एवापकतम्‌ । 


5007 1. प ८ 2ए877^ पला 0 एप एप्र 08 ; 124 


78116801 : 1101 2170 ४. 


उक्तं च । 


भूम्येकदे शस्य गुणान्वितस्य 

भृत्यस्य वा बुद्धिमतः प्रणाशे । | 

भृत्यप्रणाशो मरणं नृपाणां 8 
नष्टापि भूमिः सुलभा न भूत्याः ॥४२७॥ णता 


तं चैवं पिङ्गलकम्‌ अधुतिपरीतं दृष्टातिधष्टतया शनेः शनैर उपशटत्य दमनको ऽब्रवीत्‌ । 
स्वामिन्‌ । क एष न्यायः । यत्‌ सपत्नं हत्व] धृतिः क्रियते । उक्तं च । न+ 


किंच। 


पितावायदिवाभाता, पुचो वा यदि वा सुहत्‌। 

प्राणद्रोहि प्रवृत्तः सन्‌ ' हन्तव्यो भूतिम्‌ इच्छता ॥४२८॥ 

राजा धृणी भतब्राह्मणः सर्वभकी 9 
स्त्री चावशा दुष्टबुच्चिः सहायः। 

प्रेष्यः प्रतोपो ऽधिक्तः प्रमादी 


त्याज्याः सवं यश्रा च कछत्यं न वेत्ति ॥४२९॥ पा 12 
गच्छ दूरम्‌ अपि यच नन्दसि 

पुच्छ बालम्‌ अपि पण्डितं जनम्‌ । 

देहि देहम्‌ अपि याचितो ऽरथिने "छ 
हिन्द बाङ्म्‌ अपि दुष्टम्‌ आत्मनः ॥ ४३०॥ 11 


न चायं धर्मों राज्ञाम्‌ । यः किल प्राकृतपुरुषाणां साधारणः । उक्तं च । 


अपिच। 


न मनुष्यप्रछतिना ' शक्यं राज्यं प्रशासितुम्‌ । ` 18 
ये हि दोषा मनुष्याणां । त एव नृपतेर गुणाः ॥ ४३१॥ 

सत्यानृता च परुषा प्रियवादिनी च | 

हिंसा दयालुर्‌ अपि चार्थपरा वद्‌ान्या । 21 
नित्यव्यया प्रचुर वित्तसमागमा च । 
वेश्याङ्गनेव नुपनीतिर अनेक्पा ॥ ४३२॥ 11 


अथानागतम्‌ एव समागत्य सिंहसकाशे समुपविष्टः करटको दमनकं प्रत्य अव्रवीत्‌ । 24 
भवांस्‌ तावन्‌ मन्त्रितम्‌ एव न *+*जानाति ' यतो दयोः परस्यरप्रील्युपभोगयोर्‌ ब्युच्छि- 
त्तिकारणं भेदः । न च नीतिर्‌ एषा मन्त्रिणाम्‌ ' यत्‌ सामद्‌नभेदसाध्येषु र्थेषु 
विव्यमानेष्व आत्मी यभृत्यस्योपरि खामी युद्धोपदेशेन संशयम्‌ आरोषप्यति । उक्तं च । 97 


किच। 


धनद्‌स्य तथैव व्चिणः 
पवनस्याथ जलेश्चरस्य च । 
कलंहेः खलु खण्डिताः चिः 80 
कलहो नित्यजयो न कस्यचित्‌ ॥ ४३३॥ 1. 
नया्‌ अपेतं प्रवदन्ति युच्ं | 
युद्धं व्यवस्यन्ति हि बुदिहीनाः। ं ` 88 


०, वप्रा 1.10 ~^) पए एता, 2800 1. 125 


78716807 : 1.101 27 एणा. 


नयं च *+*धीराः प्रवदन्ति शास्त्र 
शास्त्राच्‌ च सामादिगुणमप्रयोगः ॥ ४३४॥ पा६ 
तख्मान्‌ मन्त्रिणा कदाचिद्‌ अपि सखामिनो युद्धं नोपदेष्टव्यम्‌ । उक्तं च । यतः । 8 
शुचयो हितकारिणो विनीताः 
प्रतिपक्च्यकारिणो ह्य अलुब्धाः । 
निवसन्ति नरा गृहेषु येषां 6 
वशम्‌ आयान्ति न ते नृपा रिपृणाम्‌ ॥ ४३५॥ प]9 
तस्मात्‌ । हितम्‌ एव हि वक्तव्यम्‌ ' अर्च्यम्‌ अपि सर्वथा । 
एकान्तप्रियवादितं ' विर्द्धम्‌ अनुजो विनाम्‌ ॥ ४३६॥ 9 
किंच। पुष्टापृष्टा नरेद्धेण । प्रियाणि यदि मन्त्रिणः । 
परतरूयुर अहितार्थानि ' प्रचीयेरन्‌ नुपञ्चियः ॥ ४३७॥ 
किं च। स्वामिनापि मन्त्रिणः प्रत्येकशः प्रष्टव्याः । पुष्टेषु च तेषु किं केनात्मनो हिताहितं 12 
श्रेयो वामिहितम्‌ । तत्‌ सर्वे सयं विचारणीयम्‌ । यतः कदाचिद्‌ अन्यथा स्थापितम्‌ 
अपि वस्तु मतिभान््यान्यथा दृश्यते । उक्तं च । 


तलवड्‌ दृश्यते व्योम ' खद्योतो हव्यवाड इव । 15 
न तलं विद्यति व्योज्नि। न खद्योतो जकताशनः ॥ ४३८॥ 

अपिच। असत्याः सत्यसंकाशाः ' सत्याश्‌ चुसत्यरूपिणः । 
दृश्यन्ते विविधा भावास्‌ । तस्माद्‌ युक्तं परौचणम्‌ ॥ ४३९॥ 18 


तसख्याद्‌ अपगतनयेन भृत्येन यद्‌ अभिहितम्‌ । खामिना तत्‌ तथेव न प्रत्येतव्यम्‌ । यतः 
कारणाट्‌ धूर्तमृत्या हि स्वार्थसिद्धये विचिचवाकयेः कार्यम्‌ अन्यथा स्थितम्‌ अन्यथेव 


स्वामिनो निवेदयन्ति । तस्माट्‌ आलोच्य खामिना कार्यम्‌ अनुषेयम्‌ । उक्तं च । 21 
सुह्धिर आभर असकृट्‌ विचारितं 
स्वयं च बुद्धा प्रविचिन्तिताक्षरम्‌ । 
करोति कार्यं खलु यः स बुद्धिमान्‌ 24 
स एव लच्छम्या यशसां च भाजनम्‌ ॥ ४४०॥ 1 


तस्मात्‌ *परवचनप्रत्याहार्यवुद्धिना स्वामिना स्वयम्‌ एव न माव्यम्‌ ' यत्‌ सर्वधेव पुरुषा- 
न्तरम्‌ अवधार्य हिताहितवचनोत्तरकालपरिणामं च विचाय{नाहार्यबु्िना स्वामिना 2 
स्वयम्‌ एव बुद्धिमता सरवे कार्यजातं सदैव प्रत्येतव्यम्‌ । इति ॥ 


समाप्तं चदं मिचभेदं नाम प्रथमं तन्त्रम्‌ ' यस्युयम्‌ आद्यः सोको भवति । 
वधमानो महान्‌ लेहः *सिंहगोवुषयोर्‌ वने । 80 
जम्बकेन]तिलुब्धेन पिगुनेन विनाशितः ॥१॥ 


॥ अहम्‌ ॥ 


अथेदम्‌ आरभ्यते मिच्रसंप्रात्तिर्‌ नाम द्वितीयं तन्त्रम्‌ ' यस्युयम्‌ आदिमः सोकः। 

असाधना वित्तहीना । बुद्धिमन्तो बहृश्चुताः। 8 

साधयन्त्य्‌ आशु कार्याणि ' काकाखुमृगकूमंवत्‌ ॥१॥ 
राजपुत्राः पृच्छन्ति । कथम्‌ एतत्‌ । विष्णुशमां कथयति । | 

अलि दाक्षिणात्ये जनपदे प्रमदारों नाम नगरम्‌ । तस्य नातिदूरे महोच्छायो 6 

महाखन्धशाखोपचितो न्य्मोधपादपः सर्वाश्रयो ऽसि । उक्तं च । 

च्छायासुप्नमृगः शकृन्तनिवंहेर आलीननीलच्छदः 

कीरेर्‌ आवृतकोररः कपिकुलैः स्कन्धे छतप्रश्रयः । 9 

विश्रब्धं मपुपेर्‌ निपीतकुमसुमः खाष्यः स एव द्रूमः 

सवङ्किर बङसतत्वसंघसुखदो भूभारभूतो ऽपरः ॥२॥ स्पत 
तच च लघुपतनको नाम वायसः प्रतिवसति ख । स कदाचित्‌ प्रातः प्राणयाचार्थं 12 
पुरम्‌ उदिश्च प्रचलितः । तदधिष्टानवासिनं पक्तिबन्धननिमित्तम्‌ आयान्तम्‌ उग्रख्पं 
स्फुटितकरचरणम्‌ उद्रद्पिण्डिकम्‌ अतिपरूषशरीरच्छविं रक्तान्तनयनं भिर्‌ अनुग- 
म्यमानम्‌ ऊर्ष्ववबद्धशिरोरहं जाललगुडपाणिम्‌ ' किं बङना ' द्वितीयम्‌ इव *+*कालं 15 
पाशहस्तम्‌ ' अवतारम्‌ इव पापस्य ' हदयम्‌ इवुधर्मस्य ' उपदेष्टारम्‌ इव सर्व॑पात- 
कानाम्‌ ' सुहृदम्‌ इव मृत्योर्‌ वृक्ताभ्याश्म्‌ आगतं व्याघधम्‌ एकम्‌ अपश्यत्‌ । अथ तं 
दृष्टा शद्धितमना व्यचिन्तयत्‌ । किम्‌ अयं पापश चिकीर्षति । किं मभैवनर्थाय ' आहो 18 
*स्वित्‌ कञ्चिद्‌ अन्यो ऽस्]ध्यवसायः। इति कौतुकपरस्‌ तम्‌ एव पृष्ठतो ऽनुगम्यावख्ितः । 
अथ व्याधो ऽपि तत्रैकदेशे जालं वितत्य धान्यकणान्‌ अवकीयं ततो नातिदूरे निभृतः 
खितः । अच ये तत्र पक्षिणः सन्ति ' ते लघुपतनकवाक्यागैलया नियन्त्रितास्‌ तांस्‌ 21 
तण्डुलान्‌ हालाहलम्‌ इव मन्यमानास्‌ तूष्णीं तस्थुः । 

अचन्तरे कपोतशतैः परिवृतश्‌ चित्रग्रीवो नाम कपोतराजः प्राणयावार्थं परिथमंस्‌ 

तांस तण्डलान्‌ दूरतो ऽप्य्‌ अपश्चत्‌ । अथ लघुपतनकेन निवायेमाणो ऽपि जिद्ालौल्यात्‌ 24 


पप्र मद 07 य्ि05. 5800६ 11. 127 


78116-810179. ¶216 3: 817 म ६० 166६8. 88116.8॥07 9. 


तद्वां तन्‌ महाजालम्‌ अपतत्‌ । संनिपातसमकालम्‌ एव सपरिवारः स्लायुपाशेर्‌ 
बद्धश च । अथवा दैवप्रतिकूलतया भवत्य एवम्‌ । न कञ्चिद्‌ अस्य दोषः । उक्तं च । 
पौलस्त्यः कथम्‌ अन्यद्‌ारहरणे दोषं न विज्ञातवान्‌ 8 
रामेणापि कथं न हेमहरिणस्व]संभवो लक्षितः । 
अक्तेश चपि युधिष्ठिरेण सुमहान्‌ प्राप्नो ह्य अनर्थः कथं 
प्रत्यासत्तविपत्तिमृढमनसां प्रायो मतिः चीयते ॥ ३५ ईद्वापत्त 6 


तथा च। कछतान्तपाशबद्धानां ' दैवेन्‌ाविष्टचेतसाम्‌ । 
बुद्धयः कुन्नगामिन्यो ' भवन्ति महताम्‌ अपि ॥४॥ 
अथ लुब्धको ऽपि प्रहृष्टमना लगुडम्‌ उब्यम्य प्रधावितः । चिचय्रीवो ऽपि सानुचरः 9 
पाशबन्धव्यसनाकृलस्‌ तम्‌ आयान्तं दृष्टा प्रत्युत्पन्नमतितया तान्‌ कपोतान्‌ अब्रवीत्‌ । 
अहो न भेतव्यम्‌ । न भेतव्यम्‌ । यतः । 
व्यसनेष्व अपि सर्वेषु ' यस्य बुद्धिर्‌ न हीयते । 18 
स तेषां पारम्‌ अभ्येत्य , प्राप्नोति परमं सुखम्‌ ॥५॥ 
तत्‌ सर्वैर अप्य एकचित्तैर भूत्वा संघातिनोत्पत्य जालम्‌ अपहतव्यम्‌ । अन्यथा संघातं 
विना न शक्यते जालम्‌ अपहतुम्‌। यतो ऽ संहतचित्तानां मृत्युर्‌ एव भवति । उक्तं च । 15 
एकोदराः पृथग्ीवा । अन्यान्यफलभक्षिणः। 
असंहता विनश्यन्ति ' मारूण्डा इव पक्षिणः ॥ ६॥ 
कपोताः पृच्छन्ति । कथम्‌ एतत्‌ । चि्रग्रीवः कथयति । 18 


॥ क्या १॥ 


इह हि कस्मिंश्चित्‌ सरसि भारुण्डा नाम पक्िणः प्रतिवसन्ति 
स्म । तेषाम्‌ उदट्रम्‌ एकं मीवे च इ पृथक्‌ पृथग्‌ भवतः । अथ 
तेषां मध्यात्‌ कस्यापि पिः स्वेच्छया विचरत एकया म्रीवया 
क्वाप्य्‌ अमृतं प्राप्तम्‌ । अथ इडितीययाभिहितम्‌ । ममाप्‌ अं 
देहि । अथ यदा तया न दत्तम्‌ ' तदा डितीययीवया कोपात्‌ कुतो 
ऽप्य्‌ अन्विष्य भरिते विष एकोदरत्वान्‌ मृत्युर अभवत्‌ ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि। एकोदराः पृथग््रीवाः ' इति । एवं संघात एव समर्थः । इति श्रुता 
ते कपोता जीवितार्थिनः संघातेन जालम्‌ अपहल्षुक्तेपमाचम्‌ ऊर्ध्वम्‌ उडोय वियति 2 


500४ 1. प्रा "णा कक्रा्ल 07 एद्यएप्8; 128 


ए787116-807$ : 00४6, 1056, €ठ क, ४0210186, 27 १६६१. 


वितानबन्धं कृत्वा निर्भयं प्रखिताः । लुब्धको ऽपि पक्षिभिर्‌ जालम्‌ अपद्धियमाणं दृष्टा 
विस्ितमना ऊध्वौननः । अदृष्टपूर्वम्‌ इदम्‌ ' इति चिन्तयञ सोकम्‌ अपटत्‌। 
संहतास्‌ तु हरन्तीमे ' मम जालं विहंगमाः । 8 
यदा तु विवदिष्यन्ति ' वशम्‌ एष्यन्ति मे तदा ॥ ७॥ 
इति विचायानुसर्पितुम्‌ आरब्धः । चिचग्रीवो ऽपि तं क्रूरम्‌ अनुगच्छन्तं दृष्टा तदभि- 
प्रायं च ज्ञात्वुनाकृलमना गिरितर्विषमभूभागानाम्‌ उपरि गन्तुम्‌ आरब्धः । लघुप- 6 
तनकश च चिच्रग्रीवस्य सुनयचरितेन व्याधस्य च दुरध्यवसायेन विस्मितमना ऊर्वम्‌ 
अधश्‌ च मुज्गर्‌ सुर निरीक्षमाण आहारचिन्ताम्‌ उत्सृज्य कौतुकपरस्‌ तद्‌ एव 
कपोतवृन्दम्‌ अनुगतश्‌ चिन्तयति । किम्‌ एष महात्मा ' किम्‌ अयं दुरात्मा च करि-9. 
ष्यति । इति । अथ लुब्धको ऽपि विषममा्गैव्यवहितं कपोतचक्रं ज्ञात्वा विहताशः प्रतिनि- 
वृत्तो ऽत्रवीत्‌ । 


न हि भवति यन न भाव्यं । भवति च भाव्यं विनापि यतरिन। 12 

करतलगतम्‌ अपि नश्यति ' यस्य च भवितव्यता नास्ति ॥८॥ + 
किं च। पराङ्मुखे विधौ पुंसां ' यदि चेत्‌ स्वाद्‌ धनागमः । 

तत्‌ सो ऽन्यद्‌ अपि संगृह्य ' याति शङ्कनिधिर्‌ यथा ॥९। 15 


तड्‌ आस्तां तावद्‌ विहगामिषलाभः ' कुटम्बजी वनोपायभूतं तज्‌ जालम्‌ अपि नष्टम्‌। 
अचान्तरे चिचग्रीवस तं निराशं प्रतिनिवुत्तं दृष्टा तान्‌ कपोतान्‌ उवाच । भोः । 
विश्न्धं गम्यताम्‌ । निवृत्तो दुरात्मा लुब्धकः । तड्‌ अचरुखाकं प्रमद्‌ारोष्ये नगरे गमनं 18 
श्रेयः। यतस्‌ तच प्रागुत्तरदिग्भागे हिरण्यो नाम मूषको मम प्रियसुहृत्‌ प्रतिवसति । 
स चास्माकम्‌ अविलम्बितं पाशच्छेदं करिष्यति। समर्थशा चयम्‌ आपद्विमोकणाय । इति। 
अथ तथैवानुषटिते हिरण्यमुषकदि द चवस्‌ ते स्वँ तद्विलदुगेम्‌ आसाद्य भूमाव्‌ अवतिङः । 21 
अथ च। अनागतं मयं दृष्टा ' नीतिशास््रविशारदः। 
अवसन्‌ मूषकस्‌ तच ' छत्वा शतमुखं बिलम्‌ ॥ १०॥ 
अथैवं सति पकिपाताशङ्कितहदयो हिरण्यो ऽपि बिडालपदमाचं निजबिलदुगेमा्गेम्‌ २५ 
अनुषत्य ' किम्‌ इदम्‌ । इति वीक्षितुम्‌ आरब्धः । चिचयीवो $पि बिलद्वारावख्ित एवम्‌ 
आह । भद्र हिरण्य ' इतः सत्वरम्‌ एहि । पश्च मभेनाम्‌ अवस्थाम्‌ । 
तच्‌ च श्रुता दुगौन्तगेत एव हिरण्यो ऽब्रवीत्‌। भद्र " को भवान्‌ ' किमर्थम्‌ आयातः । 7 
कीदृक्‌ च ते व्यसनम्‌ । तत्‌ कथ्यताम्‌ । इति । तच्‌ छूलवा चित्रग्रीव आह । भोः 
चिचरग्रीवो नाम कपोतपतिस्‌ तव सुहृत्‌ । सत्वरम्‌ आगच्छ । तट्‌ आकणयं पुलकिततनुः 
प्रहृष्टात्मा लरमाणो निष्क्रामन्न्‌ अत्रवीत्‌ । 80 
सुषदः सेहम्‌ आपन्ना ' लोचनानन्द दायिनः। 
गुहे गृहवतां नित्यम्‌ । आगच्छन्ति कृतात्मनाम्‌ ॥११॥ 


०४, वप्र 0091, 008४, 0, 71008, ^+ पण 0808. ८०0० या. 129 


ए 7व्16-8107 : 0०४९, 10४86, 670, ६0110186, 27त १६८४. 


अथ चिचरग्रीवं सपरिवारं पाशबद्धं दृष्टा सविषादम्‌ अब्रवीत्‌ । भद्र ' किम्‌ इदम्‌, 
कुतो वा । कथय ' इति । सो ऽब्रवीत्‌ । मद्र ' जानन्न अपि किं मां पृच्छसि । उक्तं च । 

यस्माच्‌ च येन च यथाचयद्‌ाच यच्‌ च 8 

यावच्‌ च यतर च शुभाशुभम्‌ आत्मकं । 

तस्माच्‌ च तेन च तथाच तदा च तच्‌ च 

तावच्‌ च त्र च छतान्तव शाद्‌ उपेति ॥१२॥ ०४8४ 6 
किंच। विलोचनानां विकचोत्पललिषां 

जगत्‌ सहस्रेण किल सते हरिः। 

यद्‌]ख ल्युः पुरतो विजुम्भते 9 

तदा स जात्यन्ध इववसीदति ॥ १३॥ ॥1 1. 

सपादाद्‌ योजनशताद्‌ । आमिषं प्रेते खगः। 

सो ऽपि पाश्च॑सितं दैवाद्‌ ' बन्धनं नैव पश्यति ॥१४॥ 12 
अपिच। शशिदिवाकरयोर्‌ ग्रहपीडनं 

गजभुजंगविहंगमवबन्धनम्‌ । 

मतिमतां च समीच्य दरिद्रतां 15 

विधिर्‌ अहो बलवान्‌ इति मे मतिः ॥१५॥ वाण 
किंच। व्योमैकान्तविहारिणो ऽपि विहगाः संप्राभ्रुवन्त्य आपदं 

बध्यन्ते निपुणैर अगाघधसलिलान्‌ मीनाः समुद्राद्‌ अपि। 18 

दुर्नीतं किम्‌ इहास्ि किं सुचरितं कः स्थानलाभे गणः 

कालो हि व्यसनप्रसारितमुजो गृह्णाति दूराद्‌ अपि॥१६॥ 11 
अथ हिरण्य एवम्‌ उक्तवतश चिषय्रीवस्य पाशं दन्तम्‌ आरब्धश चिचय्रीवेण निरः । 21 
उक्तं च । भद्र ' विरूढम्‌ एतत्‌ । मा तावत्‌ प्रथमं मम पाशश्‌ छिद्यताम्‌ ' किं तु मत्परि- 
जनस्य । तच्‌ छता हिरण्यः प्रकृपितः प्राह । भोः ' न युक्तम्‌ उक्तं भवता । यतः खाभिनो 
$नन्तरं भृत्याः । स आह । भद्र ' मा भैवं वद्‌ । अन्यान्‌ अपि परित्यज्य मम्‌ाधिता एते 2 
सवे वराकाः । तत्‌ कथम्‌ अप्य्‌ एताकन्माचं संमानं न करोमि । उक्तं च। 

यः संमानं सद्‌ा घन्ते , भृत्यानां सितिपो ऽधिकम्‌ । 

वित्ताभवे ऽपिति हृष्टास ' तं त्यजन्ति न किंचित्‌ ॥ १७॥ श 
तथाच। विश्वासः संपदो मूलं ' तेन युथपतिर्‌ मुगः। 

सिंहो मुगाधिपल्ये ऽपि ' न मृओैर उपसेव्यते ॥१८॥ 
अपरं मम कदाचित्‌ पाशे हिते तव दन्तवेदना भवति । अथव स पापात्मा लुब्धकः 80 
समभ्येति ' तन्‌ नूनं मम नरकपातः। उक्तं च। 

सदाचारेषु भवेषु ' सीदत्ख अपि हि चः प्रसुः। 

सुखी स्यान्‌ नरकं याति ' स परत्रेह सीदति ॥१९॥ 8 


5800 1. पप्र "वदि द्िप्ल 07 71008; 130 


7 व116 8८07 : 00४6, 710४५86, 60, 1010186, वात ६६. 


तच्‌ छा हिरण्यः प्राह । भोः ' वेय अहम्‌ इमं स्वामिधमेम्‌ । परं तव परी चाति 
मथैतद्‌ अभिहितम्‌ । ततः सर्वेषां पाशच्छेदं करिष्यामि । मवान्‌ अप्य एतिर बह्ृपरिवारो 
भविष्यति । उक्तं च । यतः। 8 
कारुण्यं संविभागगशा च ' *यस्य भल्यषु सर्वदा । 
संभाव्यः स महीपालस्‌ ' चैलोक्यस्यापि रक्षणि ॥२०॥ 
एवम्‌ उत्का सर्वेषां पाशच्छ्दं कत्वा हिरण्या चिचग्रीवं प्राह । सखे ' गच्छ]धुना 6 
स्वाश्रयम्‌ । चिचग्रोवो ऽपि सपरिवारः खाश्रयम्‌ अगमत्‌ । साधु चेदम्‌ उच्यते। 
भिचवान्‌ साधयेत्‌ कार्य ' दुःसाध्यम्‌ अपिवे यतः। 
तस्मान्‌ मिचाणि कुवीत ' समान्य +एव ियूत्मनः ॥२१॥ 9 
लघुपतनको ऽपि सर्वे चिचय्ीवस्य *बन्धनं मोतच्तं च विलोक्य विस्मितमना व्यचि 
न्तयत्‌ । अहो बुद्धिर अस हिरण्यस्य , शक्तिश्‌ च ' दुगैसामयी च । तस्मान्‌ ममापि युक्तं 
हरणेन सह भैचोकरणम्‌। यव्य अप्य अहं चञ्चलप्रकतिः कस्यापि न विश्वासं ब्रजामि । 12 
न च केनापि वञ्चितं शक्यः ' तथापि मित्रं कार्यम्‌ एव । उक्त च । 
संपू्णेनापि कर्तव्यं ' भिचम्‌ अभ्युदयार्थिना। 
उदधिः परिपूर्णो $पि ' स्वातिर्‌ जलम्‌ अपिते ॥२२॥ 15 
एवं मता पादपाट्‌ अवतीर्य बिलद्वारम्‌ आभित्य पूर्वोपलब्धनामानं हिरण्यम्‌ आदत- 
वान्‌ । भद्र हिरण्य । इतस्‌ तावत्‌ । इति। 
तच्‌ कूत्वा हिरण्यो व्यचिन्तयत्‌ । किम्‌ अन्यो ऽपि कञ्चित्‌ सावशेषबन्धनः कपोतस्‌ 18 
तिष्ठति ' यो मां बाहरति । इति। आह च। भोः । को भवान्‌। वायस आह ।.अहं लघुपतनको 
नाम वायसः । तच्‌ छूला हिरण्यो विशेषाद्‌ अन्तर्‌ लीनः प्राह । भद्र ' गम्यताम्‌ 
अस्मात्‌ स्थानात्‌ । स प्रत्याह । अहं तव पाच्च गुरुकार्यैण समायातः । तत्‌ क्रियतां मया 9 
सह दशनम्‌ । इति । हिरण्य आह । न मे ऽसि त्त्संगमेन प्रयोजनम्‌ । इति । स आह । 
भोः । चिचग्रीवबन्धमोक्षणं व्वत्सकाशाद्‌ दृष्टा मे महती प्रतीतिः संजाता । तन्‌ ममपि 
कदाचिट्‌ बन्धने संजाति तव परार्ध्रौन्‌ मुक्तिर्‌ भविष्यति । इति । तत्‌ क्रियतां मया सह २५ 
मैची । हिरण्यः प्राह । भोः ' तवं परिभोक्ता ' अहं भोज्यभूतः । का लया सह मम मैत्री । 
उक्तंच। भ्यो मितं कुरूते मूढ । आत्मनो ऽसदृशं कुधीः । 
हीनं वुण्‌ अधिकं वपि ' हाखतां यात्य्‌ असौ जने ॥२३॥ 27 
तद्‌ गम्यताम्‌ ' इति । वायस आह । भोः । एषो ऽहं तव दुगेद्रार उपविष्टः । यदि लं 
भेचीं न करोषि, ततः प्राणयात्रां न करिष्यामि । हिरण्य आह । भोः ' कथं लया वैरिणा 
सह मैचों करोमि । उक्तं च । 80 
शरचुणा न हि संदध्यात्‌ ' सुकिष्टेनुपि संधिना । 
सुतप्तम्‌ अपि पानीयं ' शमयत्य्‌ एव पाव कम्‌ ॥ २४॥ 


०४, प्त 70, 11008, (0, प्00ा8्, ^ पण एषा. 2०0० 77. 131 


72116807 : 0०४6, 71056, 70, ६०1६0156, 279 ८६. 


वायस आह । भोः ! भवता सह मम द शनम्‌ अपि नास्ति ' कृतो वैरम्‌ । तत्‌ किम्‌ 
अनुचितं वदसि । हिरण्य आह । भोः ' वैरं *+दिविधं भवति ' सहजं कचिमं च । तत्‌ सह- 
जवेरी त्वम्‌ अस्माकम्‌ । ततः । 8 
कचिमं नाशम्‌ आयाति वैरं द्राक्‌ छचिभैर्‌ गुणैः। 
प्राणदानं विना नैव ' सहजं याति संक्षयम्‌ ॥ २५॥ 
वायस आह । मोः । दिविधस्यापि वैरस्य लकणं ओरोतुम्‌ इच्छामि । स आह । भोः । 6 
कारणेन निष्पादितं कछचिमम्‌ । तत्‌ तद्‌ अर्होपकारकरणादट्‌ गच्छति । साभाविकं पुनः 
कथम्‌ अपि नापगच्छति । तच्‌ च नकुलसपौणाम्‌ । शष्पञुग्रखायुधानाम्‌ ' जलानलयोः ! 
देवदैत्यानाम्‌ ' सारमेयमाजाराणाम्‌ ' सपत्न्यः + सिंहगजानाम्‌ ' लुब्धकहरि णानाम्‌ । 9 
काकोल्‌कानाम्‌ ' पण्डितमूखाणाम्‌ । पतित्रताकुलटानाम्‌ ' सञ्जनदुजेनानां च नित्यवैरं 
भवति । न च कस्यचित्‌ केनापि कोऽपि व्यापादितः । तथपि प्राणान्ताय यतन्ते । 
वायस आह । अकारणम्‌ एतत्‌ । श्रूयतां मे वचनम्‌ । 12 
कारणान्‌ मित्रताम्‌ एति ' कारणाद्‌ याति शताम्‌ । 
तस्मान्‌ मिचत्वम्‌ एवच ' योज्यं वैरं न धीमता ॥ २६॥ 
हिरण्य आह । लया सह मम कः समागमः । श्रूयतां नीतिसर्वस्वम्‌ । 18 
सकृद्‌ दुष्टं च यो मितं । पुनः संधातुम्‌ इच्छति । 
स मत्युम्‌ एव गुाति । गाद्‌ अश्वतरी यथा ॥२७॥ 
तथाच। सिंहो व्याकरणस्य कतुर अहरत्‌ प्रणान्‌ प्रियान्‌ *पाणिनेर्‌ 18 
मीमांसाकृतम्‌ उन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं +जेमिनिम्‌ । 
छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिङ्लम्‌ 
अन्नानावृतचेतसाम्‌ अतिरषां को ऽर्थ॑स्‌ तिरश्चां गुणैः ॥ २८॥ इदप 21 
वायस आह । अस्त्य एतत्‌ । परं श्रूयताम्‌ । 
उपकाराद्‌ धि लोकानां ' निमित्तान्‌ मृगपक्िणाम्‌ । 


भयलोभाच्‌ च मूर्खाणां ' मैचो स्याट्‌ द्‌ शंनात्‌ सताम्‌ ॥ २९॥ 24 
किंच। मत्तर इव सुखभेदयो । दुःसंघधानश्‌ च दुजेनो भवति । 

सुजनस्‌ तु कनकघटर इव ! दुर्भेद्यः सुकरसंधिश्‌ च ॥ ३०॥ ह 
अपिच। इत्तोर अग्रात्‌ क्रमशः ' पर्वणि पर्वणि यथा रसविशेषः। 7 

तद्रत्‌ सजञ्जनमेचो ' विपरीतानां तु विपरीता ॥३१॥ र, 
तत्‌ सर्वेधा साधुर्‌ एवाहम्‌ । अपरं लां शपथेर निर्भयं करोमि । हिरण्य आह । न मे 
ऽसि लदोयशपधैः प्रत्ययः । उक्तं च । 80 


शर पयेः संहितस्यापि ' न विश्वासं रिपोर ब्रजेत्‌ । 
अव्यर्थ शपथं छता । वुः शक्रेण सूदितः ॥ ३२॥ 


5001 77. प्र ए क प्राप्रल 07 एय प्08; 182 


721116-8६01 ; 00४6, 1086, 610, ६०7४०186, 211 ५६६7. 


तथा च। न विश्वासं विना शुर ' देवानाम्‌ अपि सिषध्यति। 

विश्वास्य चिदशेद्धेण ' दितेर गर्भो विदारितः ॥३३॥ 

सुसूच्छेणापि रन्त्रेण , प्रविशत्य अन्तरे रिपुः । 8 

ना ष्येच्‌ च शनैः पात्‌ । क्वं सलिलपूरवत्‌ ॥ ३४॥ 

महतष्य्‌ अर्थसारेण । यो विश्वरसं रिपोर गतः। 

भार्यासु च विरक्तासु ' तदन्तं तस्य जीवितम्‌ ॥ ३५॥ 6 
तच्‌ कूला लघुपतनको ऽ पि निरुत्तरीकतश्‌ चिन्तयाम्‌ आस । अहो तुद्धिप्रागरूभ्यम्‌ 
अस्य नीतिविषये । अथवत एव]्योपरि मे मेत्रीपक्पातः । आह च । 

सख्यं साप्तपदीनं भो ' इत्य आङर विबुधा जनाः । 9 

बलात्‌ तवं भिचतां प्राप्नो ' वचनं मम तच्‌ दशु ५ ३६॥ 
इदानीं मेचीं प्रतिपव्यख । अन्ययाहम्‌ अन्चैव स्थाने प्राणत्यागं करिष्यामि ' इति । एवम्‌ 
उक्तो हिरण्यो ऽचिन्तयत्‌ । नायम्‌ *अबुद्धिर्‌ वचनाद्‌ एव ज्ञायति । 12 

नाविदग्धः प्रियं ब्रूयान्‌ । नुकामी मण्डनप्रियः । 

निःस्हो नुधिकारी स्वात्‌ । स्फुटवक्ता न वञ्चकः ॥ ३७॥ 
` तद्‌ अवश्चम्‌ अनेन सह मया मैच प्रतिपत्तव्या । एवं मनसा संप्रधार्य वायसम्‌ अब्रवीत्‌ । 15 
मद्र ' *प्रत्यितो ऽहं भवता । परं मया लदुदधिपरीच्षणारथम्‌ एतद्‌ अभिहितम्‌ । अधुना 
त्वदङ्कगतं मे शिरः । इति । एवम्‌ उत्का निर्गन्तुम्‌ आरब्धः । ई षड्‌ अ्धनिगेतश्‌ च 
पुनर्‌ एवावख्ितः । ततो लघुपतनकेनाभिहितम्‌ । किम्‌ अद्यापि ममोपरि किंचिद्‌ 18 ` 
अविश्वासकारणम्‌ । यद्‌ दुर्गान्‌ न निगेच्छसि । सो ऽब्रवीत्‌ । नाहम्‌ उपलब्धचित्तस्‌ 
त्वत्तो बिभेमि । किं तु वदीयान्यमिचपार््ात्‌ कदाचिन्‌ मम विश्वस्तस्य विनाशः स्यात्‌ 
इति । अथासाव्‌ आह । 21 

गुणवग्मिचनाशओेन ' यन्‌ मिम्‌ उपजायते । 

शालिस्तम्बाभिभवनं । श्चामाकाट्‌ इव तत्‌ त्यजेत्‌ ॥ ३८॥ 
तच्‌ च श्रुत्वा सत्वरं निर्गत्य सादरं परसरं समागतौ । सुहत स्थला लघुपतनको २५ 
हिरण्यम्‌ आह । प्रविशतु भवान्‌ स्वभवनम्‌ । अहम्‌ आहारम्‌ अन्वेषयामि । एवम्‌ उत्का 
तस्य सकाशाद्‌ अपक्रान्तः किंचिट्‌ वनगहनम्‌ अनुप्रविश्च शादूंलव्यापादितम्‌ एकं 
वनमहिषं दृष्टा तच भप्रकामम्‌ आहारं छत्वा किंशुककृसुमतुल्यां मांस्पेशीम्‌ आदाय 27 
*#हिरण्यान्तिकम्‌ एवायातः। तं चूद्भतवान्‌ । एह्य्‌ एहि ' भद्र हिरण्य । भच्यताम्‌ इदं 
मयोपनीतं मांसम्‌ ' इति । तस्यापि च हति तेनूादाव्‌ एवृादृतेन भूत्वा श्यामाकतण्डुलानां 
महान्‌ पुज्ञः छतः । आह च । भद्र । मया *+स्वसामर्थनोपनीता भच्यन्तां तण्डुलाः । 0 
इति । ततस्‌ तौ परस्परं सुतृप्नाव्‌ अपि प्रीतिप्रकटनाय भक्षितवन्तौ । यतो मे्रीबीजम्‌ 
एतत्‌ । उक्तं च । 


०४, वप्र 00, 0087, 00, 70708, + टार, छण्णप 77. 133 


ए द716-8007$: 0०४6, 10056, 60, 107६0486, 27 १६९६. 


ददाति प्रतिगृह्णाति ' गृह्यम्‌ आख्याति पृच्छति । 

सुद्के भोजयते चैव ' षङ्धिधं प्रीतिलक्षणम्‌ ॥ ३९॥ 

नोपकारं विना प्रीतिः ' कथंचित्‌ कस्यचिद्‌ भवेत्‌ । ५ 

उपयाचितद्‌नेन । यतो देवो ऽपि तुष्यति ॥ ४०॥ 

तावत्‌ प्रीतिर्‌ भवेल्‌ लोके ' यावद्‌ द्‌ानं प्रदीयते। 

वत्सः चीरत्तयं दृष्टा ' स्वयं त्यजति मातरम्‌ ॥४१॥ 6 
किं बज्ना। प्रीतिं निरन्तरां छता ' दुरभेदां नखमांसवत्‌ । 

मूषको वायसशा चैव । गताव एकान्तमिच्रताम्‌ ॥ ४२॥ 
एवं स मूषकम्‌ तदुपकाररज्ञितमनास्‌ तथा विश्वस्तः । यथा तत्पच्ततिमध्ये प्रविष्टः सद्‌ा 9 
तिष्ठति । 

अथान्यित्न अहनि वायसो ऽश्रुपूरितनयनः समागत्य सगत्रदम्‌ उवाच । भद्र 
हिरण्य । मम विरक्तिः संजातास्य देशस्योपरि । तद्‌ यास्ाम्य्‌ अन्यत्राहम्‌ । हिरण्य 12 
आह । भद्र ' किं कारणं विरक्तेः। सो ऽब्रवीत्‌ । भद्र ' श्रूयताम्‌ । अस्मिन्‌ देशे महत्य्‌ 
अवृष्टिः संजाता । स्वो ऽपि नगरजनो बुभुच्तापीडितो बलिमाचम्‌ अपि न प्रयच्छति । 
अपरं गृहि गहि विहंगवन्धनार्धं पाशाः प्रगुणीरताः । अहम्‌ अप्य्‌ आयुःशेषतया पाशे 15 
न पतितः । तेनाहं विदेशचलितो बाष्यमोच्षणं करोमि । इति । तेनाहं देशान्तरे 
यास्यामि । हिरण्य आह 1 तहिं ! क्र यास्यसि । इति कथय । स आह । 
असि दक्षिणापथे वनगहनमध्ये महान्‌ हदः । तचासि त्वत्तो ऽप्य्‌ अधिकः 18 

परमसुहन्‌ मन्थरको नाम कूमैः। स मे लघुमत्यमांसशकलानि द्‌स्यति ' इति । तेन 
सह सुभाषितगोष्ठीमुखम्‌ अनुभवन्‌ सुखेन कालं नेष्यामि ।' यतो नहम्‌ ईदृक्परि्यं 
द्रष्टं शक्रोमि । उक्तं च । यतः। ८1 

धन्यास्‌ तात न पश्यन्ति ' देशभङ्गं कुलक्षयम्‌ । 

परहस्तगतां भार्यो ' भितं च विषमस्थितम्‌ ॥ ४३॥ 
हिरण्य आह । यद्य्‌ एवम्‌ । तहिं । अहम्‌ अप्ब्‌ आगमिष्यामि । यतो ममापि महद्‌ 24 
दुःखम्‌ अलि । स आह । किं दुःखम्‌ । हिरण्य आह । भोः । बज वक्तव्यम्‌ असि । 
तत्रैव गतस्‌ ते सर्वै निवेदयिष्यामि । वायस आह । अहं तावद्‌ आकाशगतिः । भवान्‌ 
भूचरः । तत्‌ कथं मया सह तच गमिष्यति । स आह । यदि मत््राणि रक्षितः प्रयोजनम्‌ 1 27 
तद्रात्मपुष्ठम्‌ आरोप्य शनैः शनैर माम्‌ उद्वहस्व ' इति । तच्‌ हूत्वा सानन्दो वायसः 
प्राह । यद्य्‌ एवम्‌ । तद्‌ धन्यो ऽ हम्‌ । न मत्तः समस्त्य्‌ अन्यो धन्यतरः । तद्‌ एवं 
क्रियताम्‌ । अहं हि संपातादिकान्य्‌ अष्टाव्‌ उडयनानि वेचि । तत्‌ लां सुखेन नेष्यामि । ॐ 
हिरण्य आह । भोः । उडयननामानि श्रोतुम्‌ इच्छामि । वायस आह । 

संपातं च विपातं च ' महापातं निपातनम्‌ । 

वक्रं तिर्यक्‌ तथा चोर््व॑म्‌ ' अष्टमं लघुसंज्नञकम्‌ ॥ ४४॥ 8 


5001९ 77. प्त पद्मा 07 णया्प)8; 134 


78116801. 216 +: 70८86 21 ६0 1101018. 


तद्‌ एवं श्रुत्वा हिरण्यको ऽपि *+तत्पुष्टोपरि समारूढः । सो ऽपि संपातोड यनेन 
प्रस्थितः । ततः शनैः शनेस तेन स तं इदं प्रापितः। 
अचरान्तरे मूषकाधिष्ठितं वायसम्‌ अवलोक्य देशकालवित्‌ । को ऽयम्‌ । इति ॐ 
विचिन्त्य मन्थरकः सत्वरं जले प्रविष्टः । लघुपतनको ऽपि तत्तोरस्थतरूकोरटरे हिरणं 
सुत्वा शाखाग्रम्‌ आरुह्य तारस्वरेणोवाच । भो मन्थरक । आगच्छ । तव भिचम्‌ अहं 
वायसश्‌ चिरात्‌ सोत्कण्डहद यः समायातः । तद्‌ आगनत्यालिङ्ग माम्‌ ° इति । उक्तं च । 6 
यतः। किं चन्दनैः सकपुरेस्‌ ' तुषरेः किम्‌ उ शीतलैः । 
संवे ते मिचगाचस्य ' कलां नाहंन्ति षोडशीम्‌ ॥ ४५॥ 
तच्‌ क्रत्वा निपुणतरं परिज्ञाय पुलकिततनुर्‌ आनन्दाशुञ्चुतनयनः सत्वरं सलिलान्‌ 9 
निष्क्रम्य । न मया परिज्ञातो ऽसि । इति ममापराधः क्षम्यताम्‌ । इति त्रुवन्‌ मन्थरको 
वृक्तोत्तीर्णे लघुपतनकम्‌ आलिङ्गितवान्‌ । 
एवं तौ द्वाव अपि विहितालिङ्गनौ पुलकितशरीरौ वृक्ताधस्ताद्‌ उपविष्टाव्‌ आत्मचि- 12 
रन्तनवत्तान्तं परस्परं प्रोचतुः । हिरण्यो ऽपि मन्थरकं प्रणम्य त्रपविष्टः । अथ तं 
समालोक्य मन्थरको लघुपतनकम्‌ आह । भोः । को ऽयं मूषकः ' कस्माच्‌ च मच्यमूतो 
ऽयं पृष्ठम्‌ आरोपया्र समानीतः । तच्‌ छरूता लघुपतनक आह । मोः ' हिरणनामा 15 
मूषको ऽयं मम सुहृद्‌ दितीयम्‌ इव जीवितम्‌ । तत्‌ किं बज्ना । 
पर्जन्यस्य यथा धारा ' यथा च दिवि तारकाः, 
भूतले रेणवो यद्वत्‌ ' संख्यया परिवजिंताः ॥ ४६॥ 18 
गुणाः संख्यापरित्यक्तास्‌ ' तद्रट्‌ असय महात्रनः। 
परं निर्वेदम्‌ आपन्नः संप्राप्तो ऽयं तवान्तिकम्‌ ॥ ४७॥ 
मन्थरक आह । किम्‌ अस्य वैराग्यकारणम्‌ । वायस आह । पृष्ठो मथैतत्‌ तच्चैव । परम्‌ । 1 
बड़ वक्तव्यम्‌ । एतत्‌ त्रैव गतः कथयिष्यामि ' इत्य्‌ उत्का ममानेन न कथितम्‌ । तत्‌ । 
भद्र हिरण्य ' इदानीम्‌ आवयोर्‌ वैराग्यकारणं निवेदय । हिरण्यः कथयति । 


॥ कया २॥ 24 


अस्ति टा्िणात्ये जनपदे प्रमदारोपं नाम नगरम्‌ । तस्य 
नातिदूरे महेश्चरायतनम्‌ । तत्प्त्यासन्ने मदे परिव्राड्‌ बूटकणों 
नाम प्रतिवसति स्म। स च भिक्षावेत्ायां तस्मान्‌ नगरात्‌ ® 
सखरदगुडदाडिमगभो णां लिग्धद्वपेशत्छानां भष्यविशेषाणां भि- 
सछाभाजनं संपूण कृवा मठम्‌ आगत्य यथाविधि प्राणयाचां कृत्वा 


०४, (प्न ८ 200४, 0082, 0, 1010182, + प्रण 07, 250०४ 71. 135 
¶ 216 4: 71०प5€ शाते ६० ०78, 

तदुद्धरितरेषम्‌ अन्न भिसापाते गप्र कृत्वा प्रात्यूषिकपरिचारकाथं 
नागटन्ते स्थापयति । अहं तु सपरिजनस्‌ तेन जीवामि । रवं 
च कात्मरो ऽतिवतते । सुप्रयत्नम्‌ अवस्थापिते ऽपि तस्मिन्‌ 
मया भष्यमाणे स परित्राइ निविंखो मत्‌ प्रति भयात्‌ स्थानात्‌ 
स्थानम्‌ उच्चेस्तरं प्रतिसंकमयति । तथापि तट्‌ अहम्‌ अनाया- 
सेनेव प्राप्नोमि भषयामि च । अथ कदाचित्‌ तच वृहष्स्फिग्रामा ० 
तापसः प्राधूणेकः समायातः । बृटकर्णो ऽपि तस्य स्वागताद्यु- 
पचारं कृत्वा *+रमम्‌ अपनीतवान्‌ । ततश; च राचाव्‌ एकच 
खस्तरे ाव्‌ अपि सुप्नो धर्मकथां कतुम्‌ आरब्धो । अथ बृूटकणों ° 
मूषकरक्षालिप्रमना जजेर वंशेन भिक्षापाचं ताडयन्‌ +वृहष्स्फिगो 
धमेकथां कथयतः भान्यं प्रतिवचनं प्रयच्छति । अयासाव्‌ अभ्या- 
गतः परं कोपम्‌ उपागतस्‌ तम्‌ उवाच। भो बूटकणे ' परिज्लातस्‌ " 
त्वं सम्यग्‌ मया गतसोहृटः । तेन मया सह साह्वादं न जस्यसि । 
तट्‌ राचाव्‌ अपि त्वदीयमदं त्यज्घान्यच यास्यामि ' इति । उक्तं 
च ' यत्तः । 15 

ण्य्‌ आगच्छ समाविशासनम्‌ इदं कस्माच्‌ चिराद्‌ दृश्यसे 

का वार्तेति सुदुबेलो ऽसि कुश्ठ्ठे प्रीतो ऽस्मि ते दशेनात्‌। 

एवं ये समुपागतान्‌ प्रणयिनः प्रत्यालपन्य्‌ आदरात्‌ 18 

तेषां युक्तम्‌ अशङ्तिन मनसा हम्याणि गन्तुं सटा ॥४०॥ ० 
अन्यच्‌ च । 

य चागते *प्राघुणके ' दिशे वीत वाण अधः। श 

ये यान्ति सदने तस्य ' ते भृङ्गरहिता वृषाः ॥४९॥ 

नुभ्युत्थानक्रिया यत्र ' नूात्ापमधुरा गिरः। 

गुणदोषकथा नेव ' तस्य हर्म्य न गम्यते ॥५०॥ २५ 


500६ व. प "पिप्प 07 द्म ए्)8; ` 136 


९16 आ: 7रणऽ€ 89 ६0 7010718, 


तथेकमरग्राघ्यापि त्वं गविंतस्‌ त्यक्तमुहृत्लेरो नेतट्‌ वेत्सि ' यन्‌ 
मटाश्रयव्याजेन नरकोपाजेना कृता । उक्तं च ' यतः । 

नरकाय मतिस्‌ ते चेत्‌ ' पौरोहित्यं समाचर । ४ 

वषे यावत्‌ किम्‌ अन्येन ' *माठपत्यं टिनचरयम्‌ ॥५१॥ 
तत्‌ ' मूढ ' श्णेचितव्ये ऽप्य्‌ अयं तवं गवितः ' इति । अथय तच्‌ 
दत्वा भयचस्तमना बृूटकणैः प्राह । भो भगवन्‌ ' मा मैवं वट्‌ । १ 
नं तवत्नो ममान्यसुहृत्‌ को ऽण्‌ अस्ति । तच्‌ यतां गोष्ठीशेयि- 
स्यकारणम्‌ । एष दुरात्मा मूषकः प्रोन्रतस्यानस्यम्‌ अपि भिरछा- 
पाचम्‌ उन्कूद्या रद्य भिक्षाशेषं भसयति । तदभावे कमेकरा वृ्लि- ° 
च्छेदान्‌ माजेनादिकमे न कुवन्ति । तन्‌ मूषक्चासार्थेनानेन 
वंशेन मुहुर मुहुर भिश्छापाचं ताडयामि ' नान्यत्‌ कारणम्‌ ' 
इति । अपरम्‌ ' एतत्‌ कुतूहलम्‌ एतस्य दुरात्मनः ' यद्‌ उत्पतनेन ‡ 
माजोरमक्टादयो ऽपि तिरस्कृताः । बृहत्स्फिग्‌ आह । अथ 
ज्ञायते कस्मिंश्चित्‌ प्रदेशे तस्य विलम्‌ । वूटकणे आह । भो 
भगवन्‌ ' न वेदि। सो ऽब्रवीत्‌ । नूनं निधानस्योपरि तस्य 
वितरम्‌ । निधानोष्मणा निशितं द्राक्‌ कूदेते ऽसो । उक्तं च । 

ऊष्मा हि वित्नजो वृद्धिं ' तेजो नयति देहिनाम्‌ । 

किं पुनस्‌ तस्य संभोगस्‌ ' त्यागधमेसमन्वितः ॥५२॥ 18 
तथा च। 

नाक्स्माच्‌ छारिडल्टीमाता ' विक्रीणाति तिकिस्‌ तिलान्‌ । 

त्नुञ्चितान्‌ इतेरेर यच ' हेतुर्‌ अचर भविष्यति ॥५३॥ श 
वूटकणे आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 


०, गप्रा 009, 10087, 60, 10070187, ^+ एर, 20०६ 7. 19 
816 आ: प्षणाा€त्‌ हए 0 ध पा16€त. 


॥ कया ३ ॥ 


कटाचिट्‌ अहं कस्मिंश्चिट्‌ अधिष्ठान तुमह णनि मित्त कम्‌ अपि 
ब्राह्मणम्‌ आवासां प्राथितवान्‌ । ततो मम बाद्मणेना वासो » 
ट्त: । तचाहं देवताचनादिपरस्‌ तिष्ठामि । अथान्यस्मिन््‌ अहनि 
प्रत्यूषप्रवुद्धो ब्राह्मणव्राह्यणयोः सं वादं दत्तावधानः भृणोमि । 
ब्राद्यणः प्राह । ब्राह्मणि ' प्रभाते टक्षिणायनसंकान्तिर अनन्त- ० 
फलदा भवियति । तट्‌ अहं मामान्तरं प्रतिग्रहा यास्यामि । 
त्रया ब्राद्यणस्येकस्य सू्योदेशेन यथाशक्ति भोजनं दातव्यम्‌ ' 
इति । अथ तच्‌ छत्व बाद्यणी परूषवचनेस्‌ तं भत्सेयमाना ° 
प्राह । कुतस्‌ ते टरिद्रस्य ब्राह्यणस्य भोजनप्राघ्तिः । तत्‌ किं न 
त्ज्नस एवं ब्रुवन्‌ । अपि च। 
न मया तव हस्तां ' प्राण लग्धं कचित्‌ सुखम्‌ । 19 
नास्वादितं च मिष्टान्नं " का कथा भूषणादिषु ॥५४॥ 
तच्‌ छूत्वा भयचस्तो िजो मन्दं मन्दं प्राह । ब्राह्मणि ' नृतट्‌ 
युज्यते वक्तुम्‌ । उक्तं च । 15 
मासाद्‌ अधम्‌ अपि यासम्‌ ' अथिभ्यः किंन दीयते। 
इच्छानुरूपो विभवः ' कटा कस्य भविष्यति ॥५५॥ 
तथा च। 18 
ईश्वरा भूरिदानेन ' यत्क लभन्ते फलं किलर । 
टरिद्रस्‌ तच्‌ च काकिण्या ' प्राघ्रुयाट्‌ इति नः युतिः ॥५६॥ 
यच्छज्‌ जलत्म्‌ अपि जलदो ' वल्लभताम्‌ एति सकललोकस्य । ” 
नित्यं प्रसारितकरो ' मिच्ो ऽपि न वीधिततुं शक्यः ॥५७॥ म 


४ 


5001 77. ए लप 07 णय28; 138 
¶३16 1: पणात्‌ हभ 60 प्णप्ा€त,. 216 फ: ¶0० &6९1४ 1१6६1. 
एवं ज्ञात्वा दरिद्रे अपि स्वस्यास्येतरम्‌ अपि समये पात्रे देयम्‌। 
उक्तं च ' यतः। 
सत्पाचरं महती शरद्धा ' काटे देयं यथोचितम्‌ । ४ 
यट्‌ दीयते विवेकञेस्‌ ' तट्‌ अनन्ताय कस्ते ॥५४॥ 
तथा च प्रोक्तं कश्चित्‌ । 
अतितृष्णा न कतेष्या ' *तृष्णां नेव परित्यजेत्‌ । ५ 
अतितृष्णाभिभूतस्य ' शिखा भवति मस्तके ॥५९॥ 
ब्राह्मण्य्‌ आह । कथम्‌ एतत्‌ । ब्राह्मणः कथयति । 


॥ कथा ४॥ 9 


अस्ति कस्मिंश्चित्‌ प्रदेशे कथित्‌ पुलिन्दः । स पापक्धिं कत 
प्रस्थितः । अथ तेन गच्छता महाज्ञनपवेतशिखराकारः कोडः 
समासादितः । तं चासो दृष्टा आ *कणौन्तं बाणम्‌ आकृथमं ५ 
छरोकम्‌ अपठत्‌ । 

न मे धनुर्‌ नापि च वाणयोजनं 

दृष्टापि शङ्कां समुपेति भूकर: । ४ 

यथा च पश्याम्य्‌ अहम्‌ अस्य निश्चयं 

यमेन नूनं प्रहितो ममान्तिकम्‌ ॥६०॥ णा 
अयासो तीषणसायकेन समाहतः । भूकरेणापि कोपाविष्टेन 
बालेन्दुदयुतिना दंष्टायेण पाटितोदरः पुलिन्दो गतासुर भुवि 
पपात । अथ त्दब्धकं व्यापाद्य शूकरो ऽपि शरप्रहारवेदनया 
पञ्चत्वम्‌ उपागतः । एतस्मिन्न्‌ अन्तरे कश्चिद्‌ आसन्नमृत्युः 
प्युगाल इतश चेत्र. च परिभमन्‌ अमुं देशम्‌ आजगाम । यावत्‌ 
पश्यति वराहपुल्किन्दौ राव्‌ अपि पञ्चम्‌ उपागतो ' ततः 


०, ए प्र ए 700, 11008, 6९0 क, 7101018, ^ प्ण” 07. 2००६ 77. 139 
¶ 816 19: 100 &66त9 12681. 816 44 : पघणा16€त्‌ हवक्ाा 0 पफ्पणाादत्‌. 


प्रहृष्टो व्यचिन्तयत्‌ । अनुक्त्टरो मे विधिः । तेनतद्‌ अचिन्तितम्‌ 
उपस्थितं भोजनम्‌ । अथवा साध्व्‌ इटम्‌ उच्यते । 

अकृते ऽप उद्यमे पुंसाम्‌ ' अन्यजन्मकृतं फलम्‌ । ॐ 

भ्बभाश्ुभं समभ्येति ' विधिना संनियोजितम्‌ ॥६१॥ 
तथा च। 

यस्मिन्‌ देशे च काते च ' वयसा यादृशेन वा । 6 

कृतं गुभाुभं कमे ' तत्‌ तट्‌ ए वानुगुज्यते ॥६२॥ 
तट्‌ अहं तथा भषयामि ' यथा मे वहून्य्‌ अहानि प्राणयाचा 
भवति । तत्‌ तावट्‌ र्नं लायुपाशं धनुःकोटिगतं भरयामि * 
पादाभ्याम्‌ आदाय शनेः शनेः " इति । उक्तं च ' यतः । 

शनेः शनेः प्रभो क्तव्यं ' स्वयं वित्तम्‌ उपाजिंतम्‌ । 

रसायनम्‌ इव प्रेर्‌ ' हेत्या न कथंचन ॥६३॥ 19 
इति विचिन्य चापचटितकोटिं मुखमध्ये स्िप्वा लायुं भरयितुम्‌ 
आर्यः । ततश च चुटितपाशे तात्टरप्रदेशं विदाये चापकोटिर्‌ 
मस्तकमध्येन शिखावन्‌ निष्कान्ता। सो ऽपि तद्वेदनया निगेतया "5 
परासुर्‌ अभूत्‌ ॥ 
अतो ऽहं ब्रवीमि । अतितृष्णा न कतेव्या ' इति । पुनर्‌ अप्‌ 
आह । ब्राह्मणि ' न श्रुतं भवत्या । 15 

आयुः कमे च वित्तं च ' विद्या निधनम्‌ एव च । 

पञ्चेतानि हि सृज्यन्ते ' गभेस्यस्येव देहिनः ॥६४॥ 
अथेवं प्रतिबोधिता ब्राह्मणी प्राह । यद्य्‌ एवम्‌ " तहि ' सन्ति 
मे गृहे स्तोकास्‌ तित्कराः । तां चूणेयित्वा तिल्लचर्णेन ब्राह्मणं 
भोजयिष्यामि । तस्यास्‌ तट्‌ वचनम्‌ आकण्यं ब्राह्यणो मामान्तरं 
गतः। तयापि ते तिला उष्णोदकेन सह सं मद्य त्ुच्छित्वा सूयत्तपे ५ 


5001९ 771. (02 पफाल 07 ण्न पा) 8; 140 
टच्नाः । एतस्मिन्न्‌ अन्तरे तस्या गृहे कमेव्ययत्तया तेषां तित्कानां 
मध्ये कश्चित्‌ सारमेयो मूबोत्सगे चकार । तट्‌ ध 1 सा व्यचि- 
न्तयत्‌ । अहो ' पश्य नेपुशयं पराड्यु सीभूतस्य विधेः ' यद्‌ एतान्‌ 9 
अपि तित्ठान्‌ अभोज्यान्‌ कृतवान्‌ । तट्‌ अहम्‌ एतान्‌ समादाय 
कस्यचिट्‌ गृहं गता लुञ्ितेर अत्टूञ्चितान्‌ आनयामि । सवं 
{ऽपि जनो ऽनेन विधिना दास्यति ' इति । अथ ताज्‌ शूर्पे ® 
निधाय गृहाद्‌ गृहं प्रविशन्तीदम्‌ आह । अहो ' गृह्दातु कश्चिट्‌ 
अत्ुच्चितेस्‌ तिलेर्‌ त्तुञ्वितांस्‌ तित्कान्‌ । अथ यस्मिन्‌ गृहे ऽहं 
भिक्षाथे प्रविष्टः ' तच सा तित्करान्‌ आदाय प्रवि्टा पूवोक्तम्‌ 9 
एवाह । अथ तद्रृहिण्या प्रहृ्टयात्तुज्चितेर त्टुज्वितास्‌ तिला 
गुहीताः। तथा च प्रवृते तस्या भता समायातः । तेन साभिहिता। 
भद्रे ' किम्‌ इटम्‌ ' इति । सा कथयति । समधा मया तिता 
त्व्धा लुञ्विता अल्ुच्चितेः ' इति । ततः स वितक्या्वीत्‌ । 
कस्य "संबन्धिनि इमे तिताः । तच तत्सुतः कामन्दकिर्‌ आह । 
श्णारिइत्दरी मातुः । सो ऽब्रवीत्‌ । भद्रे ' सातीव निपुणा व्यवहार- 
कुशत्छा च । ततस्‌ त्याज्या रते तित्काः ' यतः । नाकस्माच्‌ 
ऋारिडत्ीमाता विक्रीणाति तिकरिस्‌ तित्ठान्‌ ' इति ॥ 

+^तन्‌ निधित्तं निधानोष्मजनिताच कूदेनशक्िर अस्य । ७ 
एवम्‌ उका स भूयो ऽप्‌ आह । अथ ज्ञायत्ते तस्य कमणम्‌ । 
वृूटकणे आह । भगवन्‌ ' ज्ञायते ' यततो न स एकाकी समभ्येति ' 
किं तु यूणपरिवृतः । बृहस्स्फिग्‌ आह । भोः ' समस्ति किंचित्‌ ” 
*"खनिचकम्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । बाढम्‌ अस्ति । एषा सुहस्तिका 
सर्वल्ोहमयी । अभ्यागत आह । तहि ' प्रत्यूषे त्वया मया सह 
प्रबोडव्यम्‌ ' येन ाव्‌ अपि चरणमल्ितायां भूमो ता्पादानु- ५ 


०४, (प्र ए 701, 1008, 0 र, 70०8, + पण 708. 800४ 771. 141 
शर216 3: एठप8€ 290 ६0 7710088. 2016 -8६५.028 (67) : 266 १०७७ ००६ 6868१96 १6३४. ॥ १.१.६१ 
सारिणी गच्छावः । मयापि तस्य दुरात्मनस्‌ तट्‌ वजपातसदृशं 
वचः समाकण्यं चिन्तितम्‌ । अहो ' विनष्टो ऽस्मि ' इति । यतः 
सानिप्रायाणय्‌ अस्य वचांसि शूयन्ते । नूनं यथा निधान 
लसितिम्‌ ' तथा टुगैम्‌ अपि मामकं ज्ञास्यति ' इति । एतद्‌ 
अभिप्रायाट्‌ एव ज्ञायते । उक्तं च ' यतः । 

सकृट्‌ अपि दृष्टा पुरुषं ' विद्वाञ्‌ जानाति सारतां तस्य । 5 
हस्ततुलयापि निपुणाः ' पल्परिमाणं विगणयन्ति ॥६५॥ र 
तथा च। 


वाञ्छैव सूचयति पूवेतरं *भविष्यत्‌ ° 

पुंसो ऽन्यजन्मसुकृतं यदि वतर च्‌ च । 

विज्ञायते शिभुर अजातकल्तापचिहः 

प्रतयुत्पदेः परिसरन्‌ सरसः कल्टापी ॥६६॥ ह 9 
ततो ऽहं भयचस्तमना टुगैमा्गे परित्यज्य सपरिवारो ऽन्यमार्गेण 
गन्तु प्रवृत्तः । 


ततो ऽमे बृहत्कायो माजाँरः संमुखीनम्‌ अस्मदुन्दम्‌ अव- + 
लोक्य यूथमध्ये पपात । अथ ते मूषका मां कुमागेगामिनं 
गहेन्तो हतशेषास्‌ तट्‌ एव दुगं रुधिराक्षावितवसुधराः प्रविष्टाः । 
अथवा साध्व्‌ इट्म्‌ उच्यते । 15 

च्लि पाशम्‌ अपास्य कूटरचनां भङ्ग बलाद्‌ वागुरां 

पयेन्ताग्रिश्खाकत्ापजरित्ठान्‌ निगेत्य टूर वनात्‌ । 

व्याधानां शरगो चरार्‌ अतिजवेनोन्घुत्य धावन्‌ मृगः ५ 

कूपान्तः पतितः करोतु विधुरे विं वा विधो पौरुषम्‌ ॥६७॥ ४० 
अपाहम्‌ एको ऽन्य गतः ' शेषा मूढतया तचव दुर्गे प्रविष्टाः । 
परिव्राजको ऽपि रुधिरविन्ट्‌च्चितां भूमिम्‌ अवत्टोक्य तेनव >, 


5800४ 11. प प्ए कका प्रल 07 ए्ए8; 142 


216 11: 7056 81 धम © 00171६8, 


मार्गेण दुगे गतः । ततश च सुह स्तिकया खनितुम्‌ आरव्यः । अथ 
तेन खनता प्राप्रं तन्‌ निधानम्‌ ' यस्योपरि सटेवाहं कृतवसततिर्‌ 
यस्योष्मणा च दुगेम्‌ अपि गद्छामि ' इति । ततो हृष्टमना ° 
अभ्यागत इटम्‌ ऊचे । भो बूटकणे ' स्वपिहीरानीं निःशङ्ः । 
अस्योष्मणा मूषकस्‌ त्वां जागरितवान्‌ । एवम्‌ उक्ता *तन्‌ 
निधानम्‌ आदाय मटाभिमुखो प्रतस्थाते । 6 

अहम्‌ अपि यावत्‌ तत्‌ स्थानम्‌ आगच्छामि ' तावद्‌ 
अरमणीयम्‌ उडेगजननं वीधितुम्‌ अपि न शक्रोमि । *अचिन्तयं 
च । अहो ' किं करोमि । क्र गच्छामि । क्थं मे स्यान्‌ मनसः ° 
प्रशान्तिः । एवं चिन्तयतो मे महता कष्टेन स दिवसो जगाम । 

अथास्तम्‌ इते सहसकिरणे सोदेगो निरुत्साहस्‌ तस्मिन्‌ 
एव मठे सपरिवारः प्रविष्टः । अघास्मत्परिमहश्ब्ट्‌म्‌ आकणयं 
बूटकणों +भूयो भूयो ऽपि भिक्लापाचं जजेर वंशेन ताडयितुम्‌ 
आख्यः। अथासाव्‌ अभ्यागतो ऽब्रवीत्‌ । सखे ' किम्‌ अद्यापि न 
निःशङो निद्रां गच्छसि । स आह । भगवन्‌ ' अयातो नूनं सपरि- 
जनो दुष्टमूषकः । तद्गयाट्‌ एतत्‌ करोमि । ततो विहस्याभ्यागतः 
प्रोवाच । सखे ' मा भेषीः । विक्नेन सह गतो ऽस्य कूदेनोत्साहः ' 
यतः सर्वेषाम्‌ अपि जन्तूनाम्‌ एषा गतिः । उक्तं च । +^ 

यट्‌ उत्साही सदा मत्यः ' पराभवति यज्‌ जनान्‌ । 
यट्‌ उद्धतं वदेट्‌ वाक्यं ' तत्‌ सवे विचजं बत्ठम्‌ ॥६४॥ 

अथाहं तच्‌ कत्वा कोपाविष्टो भिक्षापात्रम्‌ उद्दिश्य विशेषाट्‌ 
उत्कूदितो ऽप्राप्र एव भूमो पतितश्च । ततो मां दृष्टा समे 
+शचरुर वूटकणेम्‌ उवाच । ससे ' पश्य पश्य कोतूहत्म्‌ । उक्तं 
च ' यतः। ०५ 


०, गप्र 707, 0087, 00, पाए, ^० एर, 2०0 एव. 
¶216 3: 79०56 8.0 ६0 11078. 
अर्थेन बलवान्‌ सवो ' ऽप्‌ अथेयुक्तश् च परिडतः । 
पश्येनं मूषकं व्यं ' स्वजाततिसमतां गतम्‌ ॥६९॥ 
अथवा साध्व्‌ इटम्‌ उच्यते । 
दंष्टाविरहितः सपों ' मदहीनो यथा गजः । 
तथार्थेन विहीनो ऽच ' पुरूषो नामधार कः ॥७०॥ 


143 


तच्‌ छूतवाहं चिन्तितवान्‌ । अहो " सत्यम्‌ आह ममेष चुः । ° 


यततो ममाद्याङ्कलमाचम्‌ अपि न देने शक्तिर अस्ति । *तट्‌ 
धिग्‌ अथेहीनं पुरुषस्य जीवितम्‌ ' इति । उक्तं च । 

अर्थेन तु विहीनस्य ' पुरूषस्यास्यमेधसः । 

उच्छिद्यन्ते क्रियाः सवां ' मीष्मे कुसरितो यथा ॥७१॥ 

यथा काकयवाः प्रोक्ता ' यथारण्यभवास्‌ तिलाः । 

नाममाचरा न सिद्धे स्युर्‌ ' धनहीनास्‌ तथा नराः ॥७२॥ 

सन्तो ऽपि हि न राजन्ते ' दर्द्रस्येतरे गुणाः । 

आदित्य इव भूतानां ' खीर गुणानां प्रकाशिनी ॥७३॥ 

न तथा बाध्यते लोके ' प्रकृत्या निधेनो जनः। 

यथा ट्व्यं समासाद्य " तदिहीनः सुखोचितः ॥७४॥ 

उन्नम्योन्नम्य तचरैव ' दरिद्राणां मनोरथाः । 

पतन्ति हदये व्यथां ' विधवस््रीस्तना इव ॥७५॥ 

व्यक्तो ऽपि वासरे सत्यं ' टोगेत्यततमसावृतिः । 

अयतो ऽपि स्थितो यत्नाद्‌ ' भास्वान्‌ अपि न दश्यते ॥७६॥ 
इति । एवं विलप भग्रोत्ाहस्‌ तत्‌ स्वं निधानं गल्लोपधानोकृतं 
पश्यन्‌ व्यथेश्रमः स्वटुगं प्रभातकाले गतः । 

ततत च ते मङ्गत्या गच्छन्तो मिथो जल्पन्ति । अरो ' 

+असमथों ऽयम्‌ उदट्रपूरणे ऽस्माकम्‌ । केवलम्‌ अस्य पृष्टल- 


1 


15 


18 


21 


24 


500९ 771. वप ४ वतिक्ति& 0ए एप्मए्08; 144 
¶816 +: 0प86 80 धम ० पजा8, 
प्रानां बिडालादिभ्यो विपत्तयः । तत्‌ किम्‌ अनेनाराधितेन । 
उक्तं च , यत्तः । 
यत्सकाशान्‌ न लाभः स्यात्‌ ' केवत्ठाश् च विपत्तयः । 3 
स स्वामी टरतस्‌ त्याज्यो ' विशेषाच्‌ छर्त्रजीविभिः ॥9७॥ 


एवं तेषां वचो मार्गे भृणखन्‌ दुं प्रविष्टः । यावन्‌ निधेनत्वात्‌ 
को ऽपि परिजनमध्यात्‌ सह न प्रविष्टः ' तावद्‌ अहं वितके- ¢ 
यितुम्‌ आख्यः । अहो धिग्‌ इयं दख्ट्रिता । अथवा साधु चेदम्‌ 
उच्यते । 

दासिद्यात्‌ पुरुषस्य बान्धवजनो वाक्ये न संतिष्ठते ५ 

मानो हासम्‌ उपेति शीट शशिनः कान्तिः परिक्चायति । 

निर्वेदाद्‌ विसुखीभवन्ति सुहृदः स्फीतीभवन्य्‌ आपद्‌ः ४ 

पापं यच्‌ च भवेत्‌ पैरेर अपि कृतं तत्‌ तस्य संभाव्यते ॥७४॥ 

यदा हि भाग्यक्षयपीडितां दश्णं 

नरः कृतान्तोपहतः प्रपद्यते । 

तदास्य मिच्राणय्‌ अपि यान्य्‌ अमिचतां ८ 

चिरानुरक्तो ऽपि जनो विरज्यते ॥७९॥ ए 
तथा च। 

भ्न्यम्‌ अपुचस्य गृहं ' हच्‌ छून्यं यस्य नास्ति सन्मिचरम्‌ । 

मूखेस्य दिशः शून्याः ' "सवे मान्यं दरिद्रस्य ॥ ४०॥ ह 
तथा हि । 

तानीन्द्रियाण्य्‌ अविकल्ानि तद्‌ एव नाम 1 

सा बुद्धिर्‌ अप्रतिहता वचनं तट्‌ एव । 

अर्थोष्मणा विरहितः पुरूषः स एव 

चान्यः सणेन भवतीत्य्‌ अतिचिरम्‌ एतत्‌ ॥४१॥ १५५ ५ 


०४, ¶ प 200४, 108, 0, 7008, + प 087. 80०६ 1. 145 
यद्‌ वा मादृश्णनां किं धनेन ' यस्येदृशः फलविपाकः । तत्‌ 
सवेथा विभवहीनस्य ममाधुना वनवास एव श्रेयान्‌ । यत उक्तम्‌। 

येन्‌ मानाधिकं वासं ' भग्रमानं न संश्रयेत्‌ । $ 

मानहीनं सुरैः साधे ' विमानम्‌ अपि वजेयेत्‌ ॥४२॥ 

मानम्‌ उद्वहतां पुंसां " वरम्‌ आपत्‌ पदे पटे । 

नापमानमलच्छन्ना ' विस्तारिण्यो ऽपि संपद्‌: ॥४३॥ ¢ 
पुनर्‌ अष्‌ अचिन्तयम्‌ । याच्चाक््टम्‌ अपि मरणोपमम्‌। यतः। 

कुब्जस्य कीटखातस्य ' *टावनिष्कुषितत्वचः । 

तरोर अप्य्‌ ऊषरस्थस्य ' भदरं जन्म न चाधिनः ॥ ४४॥ » 
किंच। 

टौभौग्यायतनं धियो ऽ पहरणं मिथ्याविकल्यास्पद्‌ं 

पर्यायो मरणस्य टेन्यवसनिः शङ्ानिधानं परम्‌ । ५ 

मूते लाघवम्‌ आश्य च विपदां तेजोहरं मानिनाम्‌ 

अथित्वं हि मनस्विनां न नरकात्‌ पश्यामि वस्त्वन्तरम्‌ ॥४५॥ <" 
तथा च। 25 

निदरव्यो ह्यम्‌ एति हीपरिगतः प्रोन्मुच्यते तेजसा 

निस्तेजाः परिभूयते परिभवान्‌ निर्वेदम्‌ आगच्छति । 

निविंखः शुचम्‌ एति शोकविधुरो वृद्धा परित्यज्यते ॥, 

निे्धिः सयम्‌ एत्य्‌ अहो निधनता सवांपदाम्‌ आस्पदम्‌ ॥४६॥ 
अन्यच्‌ च्च । इ्ाप्त 

वरम्‌ अहिमुखे कोधाविष्टे करो विनिवेशित श 

विषम्‌ अपि वर पीवा सुप्तं कृतान्तनिवेशने । 

गिखिगुरुतटान्‌ मुक्तः कायो वरं शतधा गतो 

न हि *खत्जनात्‌ प्रिर अर्थैः प्रियं कृतम्‌ आत्मनः ॥४७॥ ८ 


प्र 


2300४ 7. वप्रा वकि क्न7ल 07 एद्य्प)8; 146 


¶ € 11: #०पऽ€ 81त ६0 ्ाजा18. 


अपि च। 

वरं विभवहीनेन ' प्राणैः संतपितो ऽनलः । 

नोपकारपरिथिष्टः ' कृपणो ऽभ्यथितो जनः ॥४४॥ 

वरं पवेतदुर्गेषु ' भान्तं वनचरैः सह । 

न तु दीनार वाच्यं ' देहीति कृपणं वचः ॥४९॥ 
अथ चेवं गत्ते केन नामान्योपायेन जीवितं स्यात्‌ । किं चौर्येण । ८ 
तट्‌ अपि परस्वादानात्‌ कष्टतरम्‌ ^ यत्कारणम्‌ । 

वरं मौनं नित्यं न च वचनम्‌ उक्तं यट्‌ अनृतं 

वर कव्यं पुंसां न च परकलचाभिगमनम्‌ । ४ 

वरं प्राणत्यागो न च पिप्ुनवाक्येष्व्‌ अभिरतिर्‌ 

वरं भिक्षाधित्वं न च परधनास्वाटनमतिः ॥९०॥ कप 
अथवा किं परपिर्डनात्मानं पोषयामि । तद्‌ अपि कष्टं भोः 
कष्टम्‌ । एतद्‌ अपि हितीयं मृत्युद्ठारम्‌ । उक्तं च । 

रोगी चिरप्रवासी ' परान्नभोजी परावसथशायी । 

यज्‌ जीवति तन्‌ मरणं " यन्‌ मरणं सो ऽस्य विश्रामः॥९१॥ = 
तत्‌ सवेणा तद्‌ एव बृहष्स्पिगपहृतं धनम्‌ आत्मीकरोमि । मया 
हि तयोर्‌ दुरात्मनोर उच्छीषेकसंनिधाने धनपेटिका दृष्टास्ति । 
तदित्नापहारं कुवेतो मे मृत्युर्‌ अपि श्रेयान्‌ । यततः । 18 

स्ववित्तहरणं दष्टा " कातरो यस्‌ तितिक्षते । 

पितरो ऽपि न गृह्न्ति ' तदन्तम्‌ उट्काञ्ञल्िम्‌ ॥९२॥ 
इति । एवं संपराये राचो तत्र गत्वा निद्रावशम्‌ उपगतस्य तस्य 
मया पेटिकायां यावच्‌ दिं कृतम्‌ ' तावत्‌ प्रबुद्धो ऽसो तापसः। 
ततो जजेरवंशप्रहारेण तेनाहं शिरसि ताडितः कथंचिद्‌ आयुःसा- 
वशेषतया न मृतो ऽस्मि ' इति । अथवा । २५ 


०४, गप्र 20 एए, 110 087, 680", 7008 ए, ^ ण 0. ८0० ए. 147 


¶21€ +: 1086 21त ६0 7101718. ¶821€ $: 101. प 02-181€.07081118, 


प्राप्नव्यम्‌ अथं तभे सनुयो 

ष्देवो ऽपितं लङ्घयितुं न शक्तः । 

तस्मान्‌ न शेचामि न विस्मयो मे 5 
`  यट्‌ अस्मदीयं न हि तत्‌ परेषाम्‌ ॥९३॥ प 
काककूर्मो पृच्छतः । कथम्‌ एतत्‌ । हिरण्यः कथयति । 


1 कया ५॥ 65 


अस्ति कस्मिंश्चिन्‌ नगरे सागरदन्नो नाम वणिक्‌ । तत्सूनुना 
रूपकशतेन विक्रीयमाणः पुस्तको गृही तः । तस्मिंश च लिखितम्‌ 
अलस्ि। 9 
प्राप्तव्यम्‌ अथं लभते मनुष्यः । 

इति । तं दष्टा सागरदक्तेन सूनुः पृष्टः । पुच , कियता मूस्येनूष 
पुस्तको गृहीतः ' इति । सो ऽ्रवीत्‌ 1 रूपकशतेन । तच्‌ छता 
सागरटन्नो ऽब्रवीत्‌ 1 धिग्‌ मूखे ' छ्ठिखितैकश्रोकपादं पुस्तकं 
रूपकश्तेन यट्‌ गृहदासि ' एतैया वैद्या कथं द्व्यस्योपाजेनं 
करिष्यसि । अद्यप्रभृति त्या मम गृहे न प्रवेष्टव्यम्‌ । एवं निभतं "ऽ 
गृहान्‌ निवीसितः। 

स च तेन निर्वेदेन विप्रकृष्टं देशन्तरं गत्वा किम्‌ अपि 
नगरम्‌ आश्ित्यावस्थितः । अथ कत्तिपयदिवसेस्‌ तन्नगरनिवा- "5 
सिना केनचिट्‌ असो पृष्टः । कृतो भवान्‌ आगतः ' कनामधेयो 
वा ' इति । असाव्‌ अव्रवीत्‌ । 

प्राप्रव्यम्‌ अथे तभे *मनुयः । भ 


500९ 77. (प "णाल 0 एयएप्ा)8; 148 
216 9: 7. क 18६816-01त8108 
इति । अथान्येनापि पृष्टस्‌ तथेवाब्रवीत्‌। एवं यः कश्चित्‌ पृच्छति ' 
तस्येदम्‌ एवोत्तरं वितरति । एवं च तस्य प्राप्नव्यमथेम्‌ इति 
प्रसिद्धं नाम जातम्‌ । 5 
अथय राजकन्या चन्द्रमती नामाभिनवयोवनरूपसं पन्ना ससी- 

दितीयेकस्मिन्‌ दिवसे नगरं निरीक्षमाणा तिष्ठति । तनैव कश्चिट्‌ 
राजपुचो ऽतीव रूपसंपन्नो मनोरमश च तस्याः कथम्‌ अपि 
देववश्णट्‌ दृष्टिगोचरे गतः । तदशेनसमकात्म्‌ रव कुसुमबाण- 
बाणाहतया तया निजसख्य्‌ अभिहिता । हठे ' यथा कित्तानेन 
सह समागमो भवति ` तथाद्य त्वया यतितव्यम्‌ । एवं श्ुत्वा ° 
सखी शीध्रं तत्सकाशं गत्वा ब्रवीत्‌ ' यद्‌ अहं चन्दरमत्या त्वदन्तिकं 
प्रेषिता । भणितं च ववां प्रति तया ' यन्‌ मम व्वहशेनान्‌ 
मनोभवेन पश्चिमावस्था कृता । तट्‌ यदि शीध्रं मटन्तिकं न 
"समेष्यसि ' तदा मे मरणम्‌ एव । इति श्त्वा तेनाभिहितम्‌ । 
यद्य्‌ अवश्यं मया तच्रूगन््व्यम्‌ ' त्त्‌ कथय ' केनोपायेन 
प्रवेष्टव्यम्‌ । अथ सख्याभिहितम्‌ । रारो सोपोत्सङ्गावत्षितया * 
दृढवरत्रया त्वया तक्रारोढव्यम्‌ । सो ऽबरवीत्‌ । यद्य्‌ एवं निश्चयो 
भवत्याः ' तट्‌ अहम्‌ एवं करिष्यामि । इति निश्चित्य ससी 
चन्द्रमतीसकाशं गता । अघागत्तायां रजन्यां स राजपुचः स्वचेतसा 5 
व्यचिन्तयत्‌ । 

गुरोः सुतां मिचभायौं ' स्वामिसेवकगेहिनीम्‌ । 

यो गच्छति पुमांत्क्‌ ल्लोके ' तम्‌ आहुर्‌ बरह्मधातकम्‌ ॥९४॥ 
अपर च। 

अयशः प्राप्यते येन ' येन चाधोगतिर्‌ भवेत्‌ । 
¦ स्वाथाच्‌ च भरश्यते येन ' तत्‌ कमे न समाचरेत्‌ ॥९५॥ 


०४, "प्र 000, 10087, 0", 7008४, ^ 0 ए, 5००1 71. 149 
816 9: 1, चप 8८.260 8108. 


इति सम्यग्‌ विचाये स न तत्सकाशं जगाम । अय प्राप्नव्यमथेः 
पयैटन्‌ धवलगृहपार््े राचाव्‌ अवल्ष्वितवरत्रां दुरा *+कोतुकाट्‌ 
धृष्टहदयस्‌ ताम्‌ अवत्छम्ब्याधिरूढः । तया च राजपुच्या ' स? 
एवायम्‌ ' इत्य्‌ आश्वस्तचित्तया लानखाद्यपानाच्छादनादिना 
संमान्य तेन सह श्यनतत्म्‌ आधितया तटङ्गसङ्गसंजातहषेरो- 
माञ्ितगाचयोक्तम्‌ । युष्महशेनमाचानुरक्तया मयात्मा तुभ्यं १ 
प्रदत्तः । ममान्यो भता मनसापि न भविष्यति ' इति जावा 
किं मया सह न व्रवीषि । सो ऽब्रवीत्‌ । 

प्राप्तव्यम्‌ अथं लभते मनुष्यः । ० 
इति । अथ तट्‌ आकण्यं स्तम्मितहद्यया त्वरिततर वरत्रया वता- 
रितः । स तु गत्वा खश्डदेवकुते प्रसुतः । अथ तत्र कयाचित्‌ 
स्वैरिण्या टत्तसंकेतको यावट्‌ टशएडपाशिकः प्राप्न; ' तावद्‌ असो " 
पूवेसुप्रस्‌ तेन दृष्टः ' रहस्यसंरछणाथेम्‌ अभिहितश् च । को 
भवान्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 

प्राप्नव्यम्‌ अथे लभते मनुष्यः । 15 
इति श्चुत्वा दश्डपाशिकेनाभिहितम्‌ । शून्यं देवगृहम्‌ इदम्‌ । त्‌ 
अचरं मदीयश्यने गत्वा स्वपिहि । तथा प्रतिपद्य स॒ मतिवि- 
पयांसाट्‌ अन्यशयने सुप्र: । अथ तस्यारस्ष॒कस्य बृहत्कन्यकाविन- *ऽ 
यवती नाम रूपयोवनसंपन्ना कस्यापि पुरूषस्यानुरक्ता संकेतकं 
ट्ला तत्र शयने सुप्रासीत्‌ । अथ सा तम्‌ आगतं दृष्टा" स 
एवायम्‌ अस्मदल्भः ' इति राच घनतरान्धकारव्यामो हितोत्थाय " 
गन्धवेविवाहेन्‌ात्मानं विवाहयित्वा तेन समं शयने स्थिता विक- 
सित्तनयनवदनकमल्ा तम्‌ आह । किम्‌ अद्यापि मया सह 
विच्रग्धं भवान्‌ न ब्रवीति । सो ऽब्रवीत्‌ । २५ 


500९ 1. प "णपा 0 एय प्)8; 150 


¶21€ शः गा, ¶ध12.-8.6-01त 81118. 


प्रापघ्नव्यम्‌ अथं लभतते मनुष्यः । 

इति श्रुत्वा तया चिन्तितम्‌ । यत्‌ कायेम्‌ असमो धितं क्रियते ' 
तस्येदक्फल्पाको भवति । | ९ 

एवं विमृश्य सविषादटया तया निभं निःसारितो ऽसौ 
यावट्‌ वीथीमार्गेण गच्छति ' तावद्‌ अन्यविषयवासी वरकी- 
{ तिनामवरो महता वाद्यशब्देनागद्छति । प्राप्रव्यमथों ऽपि तैः 
सह गन्तुम्‌ आर्यः । अथ यावत्‌ प्रत्यासन्ने लमग्रसमये राजमा- 
गोसन्नश्रेषठिगृहङ्वारि रचितमर्डपवेदिकायां कृतकोतुकमङ्गत्ठवेषा 
वणिङ्कन्या तिष्ठति ' तावन्‌ मदमत्तो हस्त्य्‌ आरोहकं हत्वा प्रणश्य 9 
जनकोत्ठाहठेन लोकम्‌ आकुत्यंस्‌ तम्‌ ए वोदेश संप्राघ्रः। तं च 
दृष्टा सर्वे वरानुयायिनो वरेण सह प्रणश्य दिशे जग्मुः । अथु- 
स्मिन्‌ अवसरे भयतर त्र लोचनाम्‌ एकाकिनीं कन्याम्‌ अवत्मोक्य " 
मा भैषीः ' अहं ते परित्राता ' इति सुधीरं स्थिरीकृत्य टक्षिण- 
पाणो संगृद्य महासाहसिकतया प्राप्रव्यमथेः परुषवाक्येर हस्तिनं 
निभैत्सितवान्‌ । कथम्‌ .अपि देववद्‌ अपयाति हस्तिनि 
यावत्‌ ससुहृद्वान्थवो वरकीतिर्‌ अतिक्रान्ते टग्रसमये समाग- 
च्छति ' तावद्‌ वधूर्‌ अन्येन हस्ते गृहीता तिष्ठति । तं दषा 
वरकीतिनाभिहितम्‌ । भोः मुर ' विरूम्‌ इदं त्वयानुश्टितम्‌ ' 5 
यन्‌ मद्यं प्रदाय कन्यान्यस्मे प्रदत्ञा " इति । सो ऽ ब्रवीत्‌ । भोः ' 
अहम्‌ अपि +हस्तिभियपल्ायितो भवद्भिः सहायातो न जाने 
किम्‌ इदं वृत्तम्‌ । इत्य्‌ अभिधाय दुहितरं प्रष्टुम्‌ आरब्धः । वत्से " न 
त्वया सुन्दरं कृत्तम्‌ । तत्त्‌ कथ्यताम्‌ ' को ऽयं वृत्नान्तः । सात्रवीत्‌। 
अहम्‌ एेन प्राणसंश्याट्‌ रक्षिता । तट्‌ एनं मुक्ता मम जीवन्या 
नान्यः पाणिं +"पहीष्यति। अनेन वाच्चीव्यतिकरेण रजनी व्यु्टा। २ 


०, ग्र 70४, 0087, 070, (रद्य, ^+ एप, ण्न 77. 151 


¶81€ श: श. चप 02.88 ८6-07081105. ¶216 11: 770०ण८5€ 21 ६0 11018. 


अथय प्रातः संजातमदहाजनसमवाये तं वाज्चाव्यतिकरं शरुत्वा 
राजदुहिता तम्‌ उदेशम्‌ आगता । कणेपरंपरया श्रुत्वा दण्डपा- 
शिकदुहितापि तत्रैवाजगाम । अथ तं महाजनसमवायं श्रुत्वा ° 
राजापि स्वयं तचेवागतः प्राप्रव्यमथे प्रत्य्‌ आह । विशन्धं कथय ' 
कीदृशो ऽसो वृत्तान्तः ' इति । सौ ऽब्रवीत्‌ । 
प्राप्तव्यम्‌ अथे लभते मनुष्यः । 5 
अथ राजकन्या स्मृत्वा वीत्‌ । 
देवो ऽपित लङ्घयितुं न शक्तः । 
ततो टश्डपाशिकदुहिताब्रवीत्‌ । ४ 
तस्मान्‌ न शोचामि न विस्मयो मे। 
तट्‌ अखिलम्‌ आकण्यं वणिग्दुहिताबवीत्‌ । 
यट्‌ अस्मदीयं न हि तत्‌ परेषाम्‌ । 12 
अथ राजा तेषां स्वेषाम्‌ अष्‌ अभयप्रदानं दा पृथक्‌ पृथग्‌ 
वृत्तान्ताज्‌ ज्ञात्वावगततचस्‌ तस्मे स्वटुहितरं सबहुमानं मामस- 
हसरेण सह पुनर्‌ टला ' अपुरो ऽस्मि ' इति यौवराज्ये तम्‌ 
अभिषिक्तवान्‌ । सो ऽपि स्वगोेण सह विविधभोगान्‌ उपमु- 
ज्ञानः सुखेनावस्थितः ॥ 
अतो ऽहं ब्रवीमि । प्राप्रव्यम्‌ अथे त्ठभते मनुष्यः ' इत्यादि । 
पुनर अपि हिरण्यो ऽ ब्रवीत्‌ । सो ऽहम्‌ एवं विचिन्य धनव्या- 
मोहात्‌ प्रतिनिवृत्तः । सुष्टु खल्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 
ज्ञानं चष्ुर न तु दक ' शोल सुकुत्कीनता न कुलजन्म । 
संतोष च समृद्धिः ' पा रिडत्यम्‌ अकायेविनिवृत्तिः ॥९६ै॥ 


5001 71, प्न शककल 07 एद्मप्ा)8; 152 


¶ 816 1: 70०४५४86 89 ६० आजाा६8. 


तथा । 
सवः सं पच्तयस्‌ तस्य ' संतुष्टं यस्य मानसम्‌ । 
उपानद्रूढपादस्य ' ननु चमोवृततेव भूः ॥९७॥ ४ 
न योजनशतं टूर ' वाह्यमानस्य तृष्णया । 
संतुष्टस्य करप्राप्रे " ऽप्य्‌ अर्थे भवति नादरः ॥९४॥ 
तृष्णे देवि नमस्‌ तुभ्यं ' धेयैविक्षवकारिणि । ७ 
विष्णुस्‌ चेत्टोक्यनाथो ऽपि ' यत्‌ त्वया वामनीकृतः ॥९९॥ ` 
न ते किंचिद्‌ अकतेव्यम्‌ ' अपमानकुटब्िनि । 
*आस्वाटयसि यत्‌ तृष्णे ' दाक्िण्यसहितान्‌ अपि ॥१००॥ 
*अस्यान्य्‌ अपि सोढानि ' गदितान्य्‌ अप्रियाणय्‌ अपि । 
स्थितः परगृहद्वारि ' तृष्णे निवृ्तिम्‌ आघ्रुहि ॥१०१॥ 
अपिच। ५2 
पीतं दुगेन्धि तोयं कुशत्छवरचिते सस्तरे चापि सुप 
सोढः कान्तावियोगो निजजटररुजा दीनम्‌ उक्तं परेषाम्‌ । 
पद्यां यातं पयोधेस्‌ तरणम्‌ अपि कृतं धारितं कपेराधं 18 
तृष्णे कतेव्यम्‌ अन्यद्‌ भवति यदि हे सिप्रम्‌ आदिश्यतां 
तत्‌ ॥१०२॥ ५५ 
हेतुपरमाणयुक्तं ' वाक्यं न चयते दरिद्रस्य । ्# 
अगुणं परुषम्‌ अनये ' वाक्यं व्यं समृद्धस्य ॥१०३॥ 
धनवान्‌ टुष्कुत्ीनो ऽपि ' ल्लोके पूज्यतमो नरः । 
शशिनस्‌ तुल्यवंश्णे ऽपि ' निधनः परिभूयते ॥१०४॥ भ 
गततवयसाम्‌ अपि पुंसां ' येषाम्‌ अथां भवन्ति ते तरुणाः । 
अर्थेन तु हीना ये ' वृद्धास्‌ ते योवने ऽपि स्युः ॥१०५॥ र 


॥ = 


०४, (प 209, 0, ९0 ण, 1008, + पण 02. 500 71. 153 


¶ 16: 7००56 20 ६क0 11018. 218116-8101 5. 


त्यजन्ति मिच्राणि धनेन हीनं 

पुचाश च दारा च सहोटराश च । 

तम्‌ अथेवन्तं पुनर णव यान्ति ४ 

ह्य्‌ अथो ऽच लोके पुरुषस्य वन्धुः ॥१०६॥ णा 
एवम्‌ अवधाय स्वभवनम्‌ अहं गतो यावत्‌ ' तावद्‌ अचान्तर 
एष ल्धुपतनको ममान्तिकम्‌ आगत्य पृष्टवान्‌ इहागमनाय । ° 
सो ऽहम्‌ अनेनैव साधे भवत्सकाशम्‌ आगतः। तट्‌ एतट्‌ भवतां 
निर्वेदकारणम्‌ आख्यातम्‌ । 


साधु चेदम्‌ उच्यते। 9 
समृगोरगमातङ्खं । सदे वासुर मानवम्‌ । 
आ मध्याहात्‌ कृताहारं । भवतीह जगत्यम्‌ ॥ १०७॥ 
छत्लाम्‌ अपि धरां जिला ' कष्टां प्राप्याथवा दशाम्‌ । 12 
वेलायां भोक्तुकामस्य । लभ्या तण्डुलसेतिका ॥ १०८॥ 
तस्याः कते बुधः को नु ' कुर्यात्‌ कम विगहिंतम्‌ । | 
यस्वानुबन्धात्‌ पापिष्ठां । नरो निष्ठां प्रपद्यते ॥ १०९॥ 18 
तच्‌ च श्रुवा मन्थरकः समाश्चासयितुम्‌ आरब्धः । भद्र ' नाधृतिः कायां ' यत्‌ खदेश- 
परित्यागः छतः । इति । तद्‌ बुध्यमानो ऽप्य्‌ अकाय किं सुद्यसि । अपि च । 


शास्त्रा अधीत्यापि भवन्ति मृखां 18 
यस्‌ तु क्रियावान्‌ पुरूषः स विद्धान्‌ । 

संचिन्तितं त्‌ ओषधम्‌ आतुरं हि 

किं नाममात्रेण करोत्य्‌ अरोगम्‌ ॥ ११०॥ 1०79 21 


को धीरस्य मनस्विनः खविषयः को वा विदेशः सतो 

यं देशं श्रयते तम्‌ एव कुरते बाङप्रतापाजिंतम्‌ । 

यद्‌ दंप्रानखलाङ्गलप्रहर णः सिंहो वनं गाहति 2५ 

तसिन्न्‌ एव हतद्धिपेन््र रुधिरेस्‌ तृष्णां दिनत््य्‌ अर्थिनाम्‌ ॥ १११॥ <द'प४ 
तत्‌ । भद्र । नित्यम्‌ उद्यमपरेर भाव्यम्‌ । क्रं धनं भोगा वा यास्यन्ति । यतः। 

निपानम्‌ इव मण्डकाः ' सरः पूर्णम्‌ इवाण्डजाः । 97 


सोद्योगं खयम्‌ आयान्ति ' सहायाश्‌ च धनानि च ॥११२॥ 
>.4 


50० 71. वप्र "कित्र पल 07 एवक्)8; 154 


 716-8६07 9 : 9०96, 71056, €70 क, ६010156, 2.0 ०८६. 


अथवा। उत्साहसंपन्नम्‌ अदी घेमूचं 
*क्रियाविधिन्ञं व्यसनेष्व्‌ असक्तम्‌ । 
ग्रं छतन्नं दृटसौहदं च 8 
लच्छीः सख्यं मार्गेति वासहेतोः ॥ ११३॥ प7४ 
अथवा। अक्ृपणम्‌ अशम्‌ अचपलं ' योगिनम्‌ अविषादिनं बुधं शूरम्‌ । 
यदि नाश्रयति नरं श्रीः । श्रीर्‌ एव हि वञ्चिता भवति ॥११४॥ 2 6 
अपि च। अव्यवसायिनम्‌ अलसं ' दैवपरं साहसाच्‌ च परिहीणम्‌। 
| प्रमदेव हि वृद्धपतिं । नेच्छत्य्‌ अवगृहितुं लच्छीः ॥११५॥ ` ५, 
न खल्यम्‌ अप्य्‌ अध्यवसायभीरोः 9. 
करोति विन्ञानविधिर्‌ गुणं हि । 
अन्धस्य किं हस्ततलख्ितो ऽपि 
निवर्तयेद्‌ अर्थम्‌ इह प्रदीपः ॥ ११६॥ ८५ 19 
दातारो ऽप्य्‌ अचर याचन्ते ' हन्तारो ऽष््‌ अबलैर हताः । 
याचितारो न याचन्ते ' नराः कमेविपर्ययात्‌ ॥ ११७॥ 
न चैतन्‌ मन्तव्यं भवता । 15 
स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते ' दन्ताः केशा नखा नराः। 
ददं हि कापुरषत्रतम्‌ ' यत्‌ 
स्वं स्थानं न परित्यजेत्‌ ॥ ११८॥ 15 
इति। नहि शक्तिमतां खदेश्परदेशयोः किट्‌ विशेषः । उक्तं च । यतः । 
म्यूराश्‌ च कृतविद्याश च ' खपवत्यश्‌ च योषितः । 


यच यच हि गच्छन्ति ' तत्र तच कछतालयाः ॥ ११९॥ 21 
पटर इह पुरुषः पराक्रमे 

भवति सद्‌ प्रभुर अर्थसाधने। 
न हि सदृूशमतिर्‌ बृहस्पतेः ५, 


शिथिलपराक्रम एष नियः ॥ १२०॥ 
तद्‌ यद्य्‌ अर्थरहितो भवान्‌ ' तथापि प्रन्नोत्साहसंपत्तो न सामान्यपुरुषतुद्यः। यतः। 
विनाष्य्‌ अर्थेर्‌ धीरः स्युशति बज्मानोत्नतिपदं 97 
परिष्वक्तो ऽप्य्‌ अर्थः परिभवपदं याति कपणः। 
स्वभावाद्‌ उद्भूतां गुणसमुद या वाश्चिविपुलां 
द्युतिं संहं न श्चा छतकनकमालो ऽपि लभते ॥ १२१॥ 80 
किंच। उत्साहशक्तेयुतविक्रमधैयराशिर 9 
यो वेत्ति गोष्पदम्‌ इवाल्यतरं समुद्रम्‌ । 


०४, ग्रप्न् 70, 087, 60, प0ारा'0ाइएट, +ण 0, एष्व 77. 155 


ए72716-8{07 $ : 0०96, 71086, €70 फक, 107६0186, 270 066. 


वत्मीकम्पुङ्गसदृशं च सद्‌ा नगेद््र 

लच्छीः स्वयं तम्‌ उपयाति न दीनसत्तम्‌ ॥ १२२॥ | 
अपरं च। नाल्युच्चं मेरुशिखरं । नातिनीचं रसातलम्‌ । 8 

व्यवसायद्वितीयानां ' नात्यपारो महोद्‌ धिः ॥ १२३॥ 
अथवा। सधन इति को मदस्‌ ते ' गतविभवः किं विषादम्‌ उपयासि । 

करकलितकन्द्‌ कसमाः । पातोत्पाता मनुष्याणाम्‌ ॥ १२४॥ 2» 6 
तत्‌ सर्वथा जलवुद्भुद्‌ा इवाख्िराणि यौवनानि धनानि च । यतः। 

भमेघच्छाया खलप्रीतिर्‌ ' *नवसस्यानि योषितः । 

किंचित्कालोपमोग्यानि ' यौवनानि धनानि च ॥ १२५॥ 9 
तद्‌ बुद्धिमता चञ्चलं धनम्‌ आसाद्य दानभोगयाभ्याम्‌ एव सफलतां नेयम्‌ । उक्तं च । 

आयासशतलब्धस्य । प्राणेभ्यो ऽपि गरीयसः । 


गतिर्‌ एकेव वित्तस्य दानम्‌ अन्या विपत्तयः ॥ १२६॥ 19 
अपरंच। नददातियो न भद्ध" सति विभवेनैव तस्य तड्‌ वित्तम्‌ । 

कन्यारत्नम्‌ इव गृहे ' तिष्ठत्य्‌ अथे परस्यैव ॥१२७॥ र 
तथा च। अतिसंचयलुब्धानां । वित्तम्‌ अन्यस्य कारणे । 15 


अन्यैः संचीयते यत्नात्‌ ' चौद्रम्‌ अन्येश्‌ च पयते ॥१२८॥ 
तत्‌ सर्वथा *+देवम्‌ एवा कारणम्‌ । उक्तं च । 


संग्रामे प्रहरणसंकटे गृहे वा | 15 
दीप्नाभौ गिरिविवंरे महोदधौ वा। 

सर्पैर वा सह वसताम्‌ उदीर्ण॑वक्तैर 

नाभाव्यं भवति न भाविनो ऽसि नाशः ॥ १२९॥ एधा» 21 


तट्‌ भवान्‌ यद्‌ अरोगः संतुष्टश च ' स एव परमो लाभः । उक्तं च। 

सप्तद्रीपाधिपस्यापि  तुष्णा यस्य विसर्पिणी । 

दरिद्रःसतु विज्ञेयः ' संतुष्टः परमेश्वरः ॥१३०॥ २५ 
किच) दानेन तुल्यो निधिर्‌ असि नान्यः 

संतोषतुल्यं धनम्‌ असि किं वा। 

विभूषणं शोलसमं कृतो ऽ स्ति श 

लाभो ऽसि नारोग्यसमः पृथिव्याम्‌ ॥ १३१॥ 1, 
न चैतन्‌ मन्तव्यम्‌ '। अर्थच्छुतः कथम्‌ अहं वर्तिधे । यतो वित्तं हि विनाशि । स्थिरं 
पौरुषम्‌ । उक्तं च । ¦ 90 

सकृत्‌ कन्द कपातं हि । पतत्य्‌ आयः पतत्न अपि । 

कातरस्‌ तु पतत्य्‌ एव । मृत्पिण्ड पतनेन हि ॥१३२॥ 


500४६ 77. वप्र ए "्नापत्नाप्रल 07 ए्प्ा)8; 156 
01211680. ¶816 णः भप €8.५४९7 20 50६ 2०4 ए0प््णि।. 


किं बहना । श्रूयतां कायैतत्त्वम्‌ । केचिद्‌ अचर पुरुषा धनमोगमोगिनः ' केचिच च 
घनरक्तितार एव भवन्ति । तथा चोक्तम्‌ । 
अथस्योपाजंनं कत्वा नैवाभाग्यः समश्रुते । 8 
अरण्यं महढ्‌ आसाद्य ' मूढः सोमिलको यथा ॥ १३३॥ 
हिरण्य आह । कथम्‌ एतत्‌ । मन्थरकः कथयति । 


॥ कया £ ॥ 6 . 


अस्ति कस्मिंश्चिट्‌ अधिष्ठाने सोमिलको नाम तन्तुवायः । स 
चानेकरचनारल्जितानि पाथिवजनोचितानि वस्लाणि सदेव विद्‌- 
धाति। परं भोजनाच्छादनाधिका कथम्‌ अपि नाथेमाचा संप- ° 
द्यते । ये चान्ये स्थूत्छवस्त्रसंपादकाः कौल्विकाः ' तान्‌ महि- 
संपन्नान्‌ अवलोक्य स्वभायम्‌ आह । परिये ' प्येतान्‌ स्थूलप- 
टकन्‌ अष्‌ उपाजिततधननिकरान्‌ । तद्‌ अधारणकं ममेतन्‌ 
नगरम्‌ । अतो ऽहम्‌ अन्य यास्यामि । तद्खायौब्रवीत्‌ । भोः 
प्रिय " मिथ्या प्रजस्यि्तम्‌ इदम्‌ ' यट्‌ अन्यत्र गतानां धनं 
*भवति । उक्तं च । 5 

न हि भवति यन्‌ न भाव्यं ' भवति च भाव्यं विनापि यत्नेन । 

करतत्गतम्‌ अपि नश्यति ' यस्य च भवितव्यता नास्ति॥१३४॥ स 
अपर च। 18 

यथा धेनुसह सेषु ' वत्सो विन्दति मात्तरम्‌ । 

एवं परवेकृतं कमे ' कतरम्‌ अनुगच्छति ॥१३५॥ 
क्िंच। 21 

यथा छायातपौ नित्यं ' सुसंबद्धौ परस्परम्‌ । 

एवं कमै च कतां च ' संशिष्टाव्‌ इतरेतरम्‌ ॥१३६॥ 


०४, (प्र 00पए, 11008, (0, १0०8, ^ पण एर, 5०0६ 17. 157 
1816 शः : पप ल्दर्ाः 27 8४0६ 8०१ ए0प्णण।. 
तस्माट्‌ अनैव स्वकमेनिष्ठस्‌ तिष्ठ । सो ऽब्रवीत्‌ । प्रिये" न 
सम्यग्‌ अभिहितम्‌ । व्यवसायं विना कमे न फत्ृति । उक्तं च । 
यथेकेन न हस्तेन ' ताल्ठिका सं प्रपद्यते । ॥ 
तथो द्यमपरित्यक्तं ' न फल्टं कमेणः स्मृतम्‌ ॥१३७॥ 
तथा च। 
पश्य कमेवश्णात्‌ प्राप्रं ' भोज्यकाले च भोजनम्‌ । ¢ 
हस्तोद्यमं विना वक्ते " प्रविशेन्‌ न कथंचन ॥१३४॥ 
किं च। 
उद्यमेन हि सिध्यन्ति ' कार्याणि न मनोरथेः । ° 
न हि सुप्रस्य सिंहस्य ' प्रविशन्ति सुखे मृगाः ॥१३९॥ 
अपर च। 
स्व शक्या कुवेतः कमे ' सिद्धिश चेन्‌ न भवेद्‌ यदि । 19 
*नो पालभ्यः पुमांस्‌ तच ' देवान्तरितपो रुषः ॥१४०॥ 
तट्‌ अवश्यं मया दे्णन्तरं कतेव्यम्‌ । इत्य्‌ उक्ता वधेमानपुरं 
गतः । वषेचयं स्थित्वा सुवणेशतचयो पाजेनां कृत्वा भूयो ऽपि " 
स्वगृहं प्रति प्रस्थितः । 
अथाधमार्गे महाटव्यां गच्छतो ऽस्य भगवान्‌ आद्यो 
ऽस्तम्‌ उपागतः । तट्‌ असाव्‌ आत्मभयाट्‌ वटवृक्षस्य स्थूत्ृण- 
खाम्‌ आरुह्य यावत्‌ प्रसुप्रः ' तावन्‌ निशीथे स्वभे बलो पुरुषो 
ोधसंरक्तत्ोचनो परस्परं जल्पन्तो ण्ृणोति । तत्रैकः प्राह । भोः 
कतः ' त्वं बहुधा निवारितः ' यथा । अस्य किल सोभिलकस्य 
भोजनाच्छादनाधिका समृ्धिर नास्ति । अतो भवता कदाचिद्‌ 
अपि नाधेया। तत्‌ कथम्‌ अस्य सुवणेशतचयं प्रदत्तम्‌ । स आह । 
भोः कमेन्‌ ' अवश्यं मया व्यवसायिनां व्यवसायानुरूपं फल्कं 


5001 77. (प पिपा 07 ए्य)8; ` 158 


¶216 णः €द णाः 21 ऽप 21 80. 


देयम्‌ । तस्य च परिणतिम्‌ त्वदायत्ना " इति । अतस्‌ तम्‌ 
एवापहर ' इति । तच्‌ छूत्वा यावट्‌ असौ प्रवृद्धः सुवणेमन्थिम्‌ 
अन्वेषयति ' तावद्‌ रिक्तां दृष्रा चिन्तयाम्‌ आस । अहो ' मय 
तावता कष्ेनो पाजितं द्रव्यं कथं हेत्या गतम्‌ । तट्‌ व्य्थेश्चमो 
निष्किचनः कथं स्वपल्या मिचाणां वा मुखं टशेयिषयामि । इति 
निश्चित्य भूयो ऽपि वधेमानपुरं गतः । तच च वषेमाचेणापि ऽ 
सुवणेशतपञ्चकम्‌ अजेयित्वा भूयो ऽपि स्वगृहं प्रत्य्‌ अन्यमार्गेण ` 
प्रचलितः । 

यावट्‌ अस्तं गच्छति भानुः ' तावत्‌ तम्‌ एव न्ययमोधम्‌ » 
आसादितवान्‌ । कष्टं भोः कष्टम्‌ ' किम्‌ णवं प्रारब्धं देवहतकेन । 
पुनः स एव न्ययोधरूपी राकसः संप्राप्तः ' इति । एवं चिन्तयन्‌ 
स्वप्रायमानस्‌ तस्य शसायां ताव्‌ एव ज्ञो पुरुषाव्‌ अ पश्यत्‌ । 
तयोर्‌ एको ऽब्रवीत्‌ । कतै: ' विं त्येतस्य सोमिलकस्य सुवणे- 
शत पञ्चकं दत्तम्‌ । किं न वेति भवान्‌ ' यट्‌ भोजनाख्छादनाट्‌ 
ऋते ऽस्याभ्यधिकं किंचिद्‌ एव नास्ति । सो ऽब्रवीत्‌ । भोः ५ 
*"कमेन्‌ ' मया वश्यं देयं व्यवसायिनाम्‌ । तस्य परिणामस्‌ त्वदा- 
यत्तः । तत्‌ किं माम्‌ उपाल्कम्भयसि । तच्‌ ुत्वा यावद्‌ असौ 
सोमिलको मन्थिम्‌ अन्वेषयति ' तावट्‌ रिक्तां पश्यति । ततश 
च परमवेराग्यसंपन्नो व्यचिन्तयत्‌ । अहो ' किं मम धनरहितस्य 
जीवितेन । तट्‌ अच वटवृक् आत्मानम्‌ उडध्य प्राणत्यागं करोमि । 

एतन्‌ निश्चित्य दभेमयीं रन्न विधाय मीवायां पाशं नियोज्य 
शाखाम्‌ आसाद्य यावत्‌ तस्यां निवध्यात्मानं निशिपति ' तावट्‌ 
एकः पुमान्‌ आकाशस्य इदम्‌ आह । भोः सोमिलक ' मा मेवं 
साहसं कार्षीः । स एवाहं वि्चापष्टारकः ' यस्‌ ते भोजनाच्छा- ५ 


०४, व्र प् 2009, 108४, 0", 10008, + 0.8. 80० 1. 159 


¶21€ णं: #्€दर्€ाः 200 80 200 80. चर 216 श: वश्2ा 200 एणााः§ ८०. 


दनाभ्यधिकां वराटिकाम्‌ अपि न सेहे । तट्‌ गच्छ गुहम्‌ । तथा 
न मे स्याट्‌ व्यथे टशेनम्‌ । तत्‌ प्राथ्येतां वरम्‌ अभीष्टम्‌ ' इति । 
` सोमित्छक आह । यद्य्‌ एवम्‌ ' तट्‌ देहि मे प्रभूतं धनम्‌ । सो 9 
ऽब्रवीत्‌ । भदू " किं करिष्यसि भोगत्यागरहितिन धनेन । यत्तो 
भोजनाच्छाटनाभ्यधिको नास्ति ते भोगः । सोमिलक आह । 
यद्य्‌ अपि भोगो न भवति ' तथापि तट्‌ भवतु । उक्तं च। ० 
विरूपो ऽप अकृल्ीनो ऽपि  सदानाध्ितमानसेः । 
सेव्यते च नरो त्किर्‌ ' यस्य स्याट्‌ वित्तसंचयः ॥१४१॥ 
तया च| 9 
शिथिलो च सुबद्धो च ' पततः पततो न वा। 
निरीसिततो मया भद्रे ' दश वर्षाणि पञ्च च ॥१४२॥ 
पुरुष आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 12 


॥ कया ७ ॥ 


` ¦ कस्मिंश्चिट्‌ अधिष्ठाने प्रटश्वृषणो नाम षर्डः प्रतिवसति स्म । 
स च मदातिरेकात्‌ पलित्यक्तयूथो नदीतटानि णुङ्गाभ्यां विदारयन्‌ 
स्वेच्छया मरकतसदृशानि शष्पासाणि भयन्‌ अरण्यचरो बभूव। 
अथ तनैव वने प्रलोभिको नाम भृगात्छः प्रतिवसति स्म। स 
भायेया सह कदाचिन्‌ नदीपुलिने सुखेनो पविष्ट आस्ते। एतस्मिन्‌ ‡5 
अन्तरे प्रतखवृषणः षरडो जलपानाथे तट्‌ एव पुलिनम्‌ 
अवत्तीणेः। तस्य तौ प्रलश्ववृषणाव्‌ अवलोक्य भ्ुगास्या भृगालरो 
ऽभिहितः । स्वामिन्‌ ' पश्यास्य वृषभस्य मांसपिर्रो लचखमानौ = 
यथावस्थितौ । तट्‌ एतौ क्षणेन प्रहरेणए वा पतिष्यतः । एवं 
ज्ञात्वा भवान्‌ अस्य पृष्ठे यातुम्‌ अहेति । भगाल आह । प्रिये ' 


500६ 77. (प "कपिक्नाप्ल 07 णद्मएप्र)8; 160 
¶ 816 शा: वद्लथ् 20 एप118 ६०५. 

न ज्ञायते ' कदाचिद्‌ एतयोः पत्तनं भविष्यति वान वा। तत्‌ 
किं मां वृधा श्रमाय नियोजयसि । अचस्यस्‌ तावज्‌ जलाथेम्‌ 
आगतांस्‌ व्वत्समेतो मूषकान्‌ भक्षयिष्यामि ' मागो ऽ यं यतस्‌ $ 
तेषाम्‌ । अथवास्य पृष्टे गमिघामि ' तट्‌ अचान्यः कश्चिट्‌ एत्य 
स्थानं समाश्रयिष्ति । तट्‌ एतन्‌ न युज्यते कतुम्‌ । उक्तं च । 

यो भ्रुवाणि परित्यज्य ' अध्रुवाणि निषेवते । ` 6 

भ्ुवाणि तस्य नश्यन्ति ' अध्रुवं नष्टम्‌ रवं च ॥ १४३॥ 
सात्रवीत्‌ । भोः ' कापुरुषस्‌ त्वम्‌ " यत्‌ किंचिद्‌ अवाण संतोषं 
करोषि । तन्‌ न युक्तम्‌ । पुरुषेण संदूवोद्योगवता विशेषेण * 
भाव्यम्‌ । उक्तं च । 

यचोत्साहसमात्टख्नो ' यचाल्स्यविहीनता । 

नयविक्रमपतंयोगस्‌ ' तच श्रीर्‌ असिता भुवम्‌ ॥१४४॥ 
तथा च । 

न देवम्‌ इति संचिन्य ' त्यजेन्‌ नोद्योगम्‌ आत्मनः । 

अनुद्योगेन नो तेतं ' तिल्वेभ्यो ऽपि हि जायते ॥१४५॥ 
यच_ च त्वं वदसि ' एतो पतितो वा न वा ' इति ' तद्‌ अष्‌ 
अयुक्तम्‌ । उक्तं च । 

कृतनिश्चयिनो वन्दास्‌ ' तुद्धिमा नो पयुज्यते । 18 

चात्तकः को वराको ऽयं ' यस्येन्द्रो वारिवाहकः ॥१४६॥ 
अपरम्‌ ' तावद्‌ अहं मूषकमांसस्यातीव निविखा । एतो च 
मांसपिण्ड प्रत्यासन्नरपतनो च दृश्येते । तत्‌ सवेथा नान्यथा 
कतेव्यम्‌ ' इति । अयासो तद्‌ आकण्यं मूषकप्राप्निस्थानं त्यक्ता 
तस्य प्रतष्ठवृषणस्य पृष्ठम्‌ अन्वगच्छत्‌ । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ 
उच्यते । ५ 


०४, (प 200*0, 10081, 670४, 10108, + प्रण 07. 200 1. 161 
¶81€ श: 1861६81 21 9115 ६०५. ¶216 9: भ €2४6 270१ 5718 20 80 ण्ण. 


तावत्‌ स्यात्‌ सवेकृत्येषु ' पुरुषो ऽ स्वयं प्रभुः । 

*स्तरीणां वाक्याङ्कशेः करणे ' यावन्‌ न भ्रियते वत्ठात्‌ ॥१४७॥ 
तथा च। 8 

अकृत्यं मन्यते कृत्यम्‌ ' अगम्यं मन्यते सुगम्‌ । 

अभयं मन्यते भष्यं ' स्त वाक्यप्रेरितो नरः ॥१४४॥ 
{एवं तस्य पृष्टतः सभायेः परिभमंश चिरकालतम्‌ अनयत्‌ । न च 
तयोः पतनम्‌ अभूत्‌ । ततश च पञ्चटशे वर्षे निर्वेदात्‌ स 
भायाम्‌ आह । 

शिथिली च सुबद्धो च ' पततः पततो न वा। ४ 

निरीसितो मया भद्रे ' टश वषांणि पञ्च च ॥१४९॥ 
तत्‌ पश्चाद्‌ अपि ' नेतयोः पत्तनं भविष्यति ' इति तम्‌ एव 
मूषकमागेम्‌ अनुसरावः ॥ 19 

अतो ऽहं ब्रवीमि । श्िथित्मो च सुबद्धो च ' इति । तट्‌ 
एवं धनवान्‌ सर्वो ऽपि स्पृहणीयो भवति । अतो देहि मे प्रभूतं 
धनम्‌ । पुरुष आह । यद्य्‌ एवम्‌ " तद्‌ गच्छ त्वं भूयो ऽपि "° 
वधंमानपुरम्‌ । तच दो वणिक्पुचौ धनगुप्रशुक्तधनाख्यौ प्रति- 
वसतः । तयो चेष्टितं बुङ्खैकस्य स्वरूपं प्राथेनीयम्‌ । इत्य्‌ 
उक्घादशेनं गतः । सोमिलको ऽपि विस्मितमना भूयो ऽपि" 
वधेमानपुर गतः । 
अथ संध्यासमये परिश्रान्तो धनगुप्रगृहं पृच्छन्‌ कृच्छात््‌ 

लब्ध्वा प्रविष्टः । अथ तस्य भायेया पुचादिभिश च निभेत्खयमानो 
ऽपि गृहाजिरं प्रायोपविष्टः । ततश च भोजनवेलायां भक्ति- 
वजितं भोजनं ठन्ध्वा ततैव सुप्तः । यावन्‌ निशीये पश्यति ' 
तावत्‌ ताव्‌ एव हो पुरूषो मन्येते । तचैको ऽब्रवीत्‌ । भोः 


500४ [1. प्त णाप 07 एयएप्)8; 162 
¶216€ णं: ऋ€दश्लाः 271 ऽप्णहङ 271त 80), 


कते: ' किं त्वयास्य धनगुप्रस्याधिको व्ययो निमितः ' यत्‌ सोमि- 
ल क्स्यानेन. भोजनं प्रदम्‌ । तट्‌ अयुक्तं कृतं त्वया । हितीयः 
प्राह । भोः कर्मन्‌ ' न ममाच दोषः । मया लाभः सुतिः च » 
कतेव्या ' तत्परिणतिश् च त्वदायत्ता । अथ यावद्‌ असाव्‌ उ्चि- 
ति ' तावद्‌ धनगुघ्रस्य विषूचिकादोषेण हितीये ऽहि सिद्यमा- 
नस्योपवासः संजातः । ¢ 

ततः सोमिलको ऽपि तद्रृहान्‌ निष्कम्य सुक्तधनगृहं गतः । ` 
तेनापि चाुभ्युत्थानभोजनाच्छादनादिभिर विहितवहुमानस्‌ तस्येव 
गृहे सुखशय्यायां सुष्वाप । ततश च निशोथे यावत्‌ पश्यति ' » 
तावत्‌ ताव्‌ एव द्वो पुरुषौ भिथो मन्येते । तत्रैको ऽब्रवीत्‌ । 
भोः कतेः ' अद्यानेन भुक्तधनेन सोभिलकस्योप चारं कुवेता प्रभूतो 
व्ययः कृतः । ततः कुतो ऽयम्‌ उद्धारविधिं दास्यति ' यतः स्वेम्‌ 
अनेन +व्यवहारक्गुहाट्‌ आनीतम्‌ अस्ति। स आह । भोः कमेन्‌ ' 
मम कृत्यम्‌ एतत्‌ । परिणति च त्वदायत्ना । अथ प्रभाते को 
ऽपि राजपुरुषो राजप्रसादजं विच्म्‌ आदाय समायातो भुक्तधनाय 
सवं समपेयाम्‌ आस । 

तद्‌ दुष्टा सोभिककण चिन्तितवान्‌ । सं चयरहितो ऽपि 
वरम्‌ एष +भुक्कधनः ' न पुनर असो कटयों गुघ्रधनः । उक्तं च । 

अग्रिहोचफला वेदाः ' शीत्ठवृत्तफत्टे श्रुतम्‌ । 
रतिपुचफत्ा दारा ' टच्तभुक्तफल्े धनम्‌ ॥ १५०॥ 

तट्‌. भगवान्‌ विधाता मां दत्तभुक्तधनं करोतु । न काये मे 
"धनगृप्रतया । इत्य्‌ उक्ते विधाता तं तथेव कृतवान्‌ ॥ 


०४, ¶् प 20 ए, 10ए8४, 600, 7010187, ^ पण 0, 800 1. 163 
ए18116-8॥07 र, ए 2016-512728. (159) : 710 प5€ 211 5171816. 


अतो ऽहं व्रवीमि । अर्थस्योपार्जनं छता । इति । तत्‌ । भद्र हिरण्य । एवं ज्ञाला 
धनविषये त्यासंतोषो न कार्यः । उक्तं च । 
संपत्सु महतां चित्तं ' भवत्य्‌ उत्पलकोमलम्‌ । 3 
आपत्सु च महाशैल'शिलासंघातककैशम्‌ ॥ १५१॥ 
किच। प्राप्नो नियतिबलाश्रयेण यो ऽर्यो 
निचष्टः शयनगतो ऽप्य्‌ उपाञ्ुते तम्‌ । 6 
भूतानां महति कते ऽपि हि प्रयते 
नाभाव्यं भवति न माविनो ऽसि नाशः ॥ १५२॥ एणी 
अपरेच। किं चिन्तितेन बहना । किंवा शोकेन मनसि निहतेन । 9 
तन्‌ नि्ितं भविष्यति ' विधिना लिखितं ललाटे यत्‌ ॥ १५३॥ त 
तथा च। द्वोपाट्‌ अन्यस्माद्‌ अपि ' मध्याद्‌ अपि जलनिधेर्‌ दिशो ऽप्व्‌ अन्तात्‌ । 
आनीय द्र इति घटयति ' विधिर्‌ अभिमतम्‌ अभिमुखोभूतः ॥१५४॥ ब" 12 
अपरं च। +अघरितघरितं घटयति ' सुघटितघटितानि जजरीकृरूते । 
विधिर्‌ एव तानि घटयति ' यानि पुमान्‌ नैव चिन्तयति ॥१५५॥ घ 
अनिच्छन्तो ऽपि दुःखानि ' यथेहायान्ति देहिनः । 15 
सुखान्य्‌ अपि तथा मन्ये ' चिन्तादेन्येन को गुणः ॥ १५६॥ 
अपरं च। अन्यथा शास््रगर्भिणा । धिया धीरो ऽर्थम्‌ ईहते । 
स्वामीव प्राक्तनं कमं ' विद्‌ घाति तद्‌ अन्यथा ॥ १५७॥ 18 
येन गुक्गोकता हंसाः । शुकाश्‌ च हरितीकृताः । 
मयूराश्‌ चितिता येन ' स नो वृत्तिं विधास्यति ॥ १५८॥ 
साधु चदम्‌ उच्यते। 21 
भग्नाशस्य करण्डपिण्डिततनोर्‌ ग्लानेद्धि यस्य ुधा 
छत्वाखुर्‌ विवरं स्वयं निपतितो नक्तं सुखे भोगिनः । 
तुप्चस्‌ तत्पिशितेन सत्वरम्‌ असौ तेनैव यातः पथा ५ 
स्वस्थास्‌ तिष्ठत दैवम्‌ एव हि नृणां वृद्धौ चये चाकुलम्‌ ॥ १५९॥ &8"0४ 
तद्‌ इति मल्वा ज्रेय एव चिन्तनीयम्‌ । तथा चोक्तम्‌ । 


कर्तव्यः प्रतिदि वसं प्रसन्नचित्तः 2 

स्वल्यो $पि ब्रतनियमोपवासधर्मः । 

प्राणेषु प्रहरति नित्यम्‌ एव देवं 

भूतानां महति छते ऽपि हि प्रयते ॥ १६०॥ 18108 30 
तस्मात्‌ सदैव संतोष एव च्रेयान्‌ । 


संतोषामृततुप्तानां ' यत्‌ सुखं शान्तचेतसाम्‌ । 
कृतस्‌ तद्‌ धनलुग्धानाम्‌ ' इतश चेतश च धावताम्‌ ॥ १६१॥ 88 


5001 71. वप कपिप्ातरल 07 एप धोप)8; 


ए0116-807 9 : 00४6, 71056, €70 क, ६0710186, 871 ०६६7. 


164. 


अपर च। 


च्षान्तितु्यं तपो नासि ' न संतोषसमं सुखम्‌ । 
न भेैचीसदृशं दानं ' न धमो ऽसि दयासमः ॥ १६२॥ 


किं बना प्रलपितेन । स्ववेग्मेदं भवतः । निवृतिनानुद्िम्नेन च भूत्वा त्वया मया सह 3 
प्रोतिपूर्वै कालो ऽतिवाह्यः । तच्‌ चानेकशास्तरार्थानुगतं मन्थरोक्तं श्ुत्वा लघुपतनको 
विकसितवदनः परितोषम्‌ उपगतो ऽत्रवीत्‌। मद्र मन्थरक ' साधुर आश्यणीयगुणो ऽसि 
त्वम्‌ । भवता ह्य्‌ एवं छतहिरण्याभ्युपपत्तौ मम मनसः परमतुष्टिर्‌ उत्पादिता । उक्तं च । 6 


अपर च। 


सुखस्य सारः परिभुज्यते तेर्‌ 

जोवन्ति ते सत्पुरूषास्‌ त एव । 

इष्टाः सुः सुहृदः सुहविः 

नप्रियाः प्रिधैर्‌ ये सहिता रमन्ते ५ १६३॥ 
रेश्र्यवन्तो ऽपि हि निर्धनास्‌ ते 
व्यर्थ्रमा जीवितमाचसाराः। 

कृता न लोभोपहतात्मभिर्‌ चैः 
सुहत्सयंग्राहविभूषणा ओः ॥ १६४॥ 


तद्‌ अनेन हितोपदेशेन दुःखार्णवनिमसो ऽसौ भवतैव समुद्धतः । युक्तं चैतत्‌ । 


सन्त एव सतां नित्यम्‌ ' आपत्तर हेतवः । 
गजानां पड्ूमस्रानां ' गजा एव धुरंधराः ५ १६५॥ 


अन्यच्‌ च। आध्यः स एको भुवि मानवानां 
सो ऽन्तं गतः सत्पुरुषत्रतस्य । 
यस्यार्थिनो वा शरणागता वा 
न्‌ाशाविभङ्गाट्‌ विमुखाः प्रयान्ति ॥ १६६॥ 
साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते। 


किं पौरुषं रति येन नतान्‌ 

किंवा धनं नार्चिंजनाय यत्‌ स्यात्‌ । 
कासाक्रियाया न हितानुबन्धा 

किं जीवितं यद्‌ यशसो विरोधि ॥ १६७॥ 


ध 


12 


॥ 1 + 


15 


18 


10त्‌78 21 


24 


10ता8 


अथैवं जल्यतां तेषां चिचाङ्गो नाम कुरङ्गो लुब्धकबाणपातचकितचित्तस्‌ तुषार्तस्‌ 27 
तम्‌ उदे शम्‌ आगतः । आयान्तं च तम्‌ अवलोक्य लघुपतनको वृन्तम्‌ आरूढः । हिरण्यः 
शररस्तम्बं प्रविष्टः । मन्थरकः सलिलाशयम्‌ आस्थितः । चिचाङ्गो ऽप्य्‌ आत्मशङ्कया 
तरनिकट एव खितः । अथय लघुपतनक उत्पत्य योजनमानं भूमण्डलम्‌ आलोक्व 8 
पुनर वृक्षम्‌ अधिरुह्य मन्थरकम्‌ आद्कतवान्‌ । भद्र मन्थरक । एह्य्‌ एहि । न ते कञ्चिद्‌ 
इहावस्थितस्युपायो विद्यते । सुवीकषितम्‌ एतद्‌ वनं मया कतम्‌ । केवलं मृगो ऽ यम्‌ 
उदकार्थो हदम्‌ उपगतः । इत्य उक्ते चयो ऽपि तधैव समागताः । अथाभ्यागतवत्सलतया 88 


०४, (प 20", 006, 60४4४, 006, ^ प्रण 08, ए८0गहर 7. 165 


72116807. व द16 ण: 66 768८6 €16008115. 


मन्थरकस्‌ तं मृगम्‌ आह । भद्र । पीयताम्‌ अवगाह्यतां च । प्रधानम्‌ उदकं शोतलं च । 
तद्वचनम्‌ आधाय चिचाङ्कश चिन्तयाम्‌ आस । न मभतेभ्यः सकाशात्‌ स्वल्यम्‌ अपि 
भयम्‌ अलि । कस्मात्‌ । कच्छपस्‌ तावद्‌ उद्‌ कगत एव शक्तिमान्‌ । मूषकवायसाव 3 
अपि मृतम्‌ एव भक्चयतः । तद्‌ एतान्‌ अनुसरामि । इति मलत्वा तेः सह संगतः । 
मन्थरकेण च स्वागताभ्युपचारपुरःसरम्‌ अभमिहितश्‌ चिचाङ्गः । अपि शिवं भवतः। 
कथ्यताम्‌ अस्माकम्‌ । कथम्‌ इदं वनगहनम्‌ आगतो ऽसि । इति । अथसाव अब्रवीत्‌ । 6 
निर्विंसो ऽस्म्य्‌ अनेनाकामविहारित्वेन । अश्चवरिः सारमेयेर्‌ लुब्धकेर इतश्‌ चेतश 
च संनिरुष्यमानो भयान्‌ महता जवेनातिक्रम्य सवान्‌ आगतो ऽचाहम्‌ उद्‌कार्थो । 
तड्‌ इच्छामि भवद्धिः सार्धं भेचीं कलम्‌ । तच्‌ हूत्वा मन्थरक आह । अल्पकाया वयम्‌ । 9 
न युज्यते भवतो ऽस्माभिः सह सख्यं कतुम्‌ । यतः प्रत्युपकार समर्थैः सह सख्यं कर्तुम्‌ 
उचितम्‌ । तच्‌ कूत्वा चिचाङ्गो ऽब्रवीत्‌ । 

वरं नरकवासो ऽपि ' विद्वद्खिः सहितो मम । 12 

न नोचजनसंपरकीः ' सुरे दद्र भुवनेष्व्‌ अपि ॥ १६८॥ 
अल्यकायो ऽनल्यकाय इति । किम्‌ अनेनूत्मनिन्दपूर्वकेणाभिहितेन । अथवा युक्तं 
सत्पुरुषाणाम्‌ ईदृशं वचनं वक्तुम्‌ । तद्‌ अद्या वश्यं भवद्धिर्‌ मया सह सख्यं कर्तव्यम्‌ । 15 
एवं चानुश्रूयते । 

कर्तव्यान्य्‌ एव भिच्राणि ' सबलान्य्‌ अबलानि च । 

हस्तियूथं वने वद्वं ' मूषकेर्‌ यद्‌ विमोचितम्‌ ॥ १६९॥ 18 
मन्थरकः पुच्छति । कथम्‌ एतत्‌ । चिचाङ्गः कथयति । 


॥ कया ¢ ॥ 


अस्ति कश्चिट्‌ *+उत्सन्नजनपदगुहदेवतायतनो भूमिप्रदेशः । तच 
पूर्वोषितमूषकाः संजातपुचपोचदोहिबादिभिर्‌ भवनभूभागच्छिद्‌- 
वसततयो वेश्मप्रतिवेश्मपरपरया वासं चक्रिरे । एवं च तेषां 
विविधोत्सवप्रकरणविवाहषाद्यपानादिना परं सोख्यम्‌ अनुभ वतां 
कालो ऽतिवतेते। अचान्तरे गजपतिर्‌ गजसहस्रपरिवृतः पूर्वो 
पलन्धोदके सरसि स्वयूेन सहोद्कमहणाय गन्तुम्‌ आरब्ध वान्‌ । 
अथ गद्छता तेन गजपतिना मूषकावसथानां मध्येन यथाकालो- ° 


5001 71. (1८ "पप्रा 07 एय धप08; 166 
¶ 216 111: 7066 +€86€प€ लाल 21४8, 

पपन्ना मूषकाः संपिष्ट वक्कूनेचशिरोपी वाः कृताः ' शेषभूताश् च 
संप्रहारं चक्रे । व्यापादिता वयम्‌ एभिर्‌ दु्टगजेर गच्छल्धिः । 
यदि पुनर ण्वैत इहागमिष्यन्ति ' ततो बीजशेषा अपि न° 
भविष्यामः । अपि च। 

स्पृशन्‌ अपि गजो हन्ति ' जिघ्रन्न्‌ अपि भुजंगमः 

हसन्‌ अपि नृपो हन्ति ' मानयन्‌ अपि दुजेनः ॥१७०॥ ५ 
तट्‌ अचरान्तरे करणीयेनोपायश चिन्यताम्‌ । अथ विचिन्योपायं 
कतिपये ऽपि गतास्‌ तत्‌ सरो गजपतिं प्रणम्य सविनयम्‌ 
अब्रुवन्‌ । देव ' इतो नातिदूरे पारपयेकरमायातो ऽस्माकम्‌ आव- ? 
सथः । तच पुचपौचपरपरया वृद्धिम्‌ उपागताः । तट्‌ भवद्धिर्‌ 
इहो दकमहणाथेम्‌ आगच्छ्धिः सहसखण्णे विनाशिता वयम्‌ । यदि 
पुनस्‌ तेनेव मार्गेण यास्यथ ' ततो वीजा वशेषा अपि न भवि- 
ष्यामः। तट्‌ यद्य्‌ अस्माकम्‌ उपरि कृपास्ति ' ततो ऽन्येन पथा 
गच्छत ' इति । यत्कारणम्‌ ' अवश्यम्‌ एवास्मदिधेर अपि 
कटाचित्‌ किंचित्‌ प्रयोजनं भविष्यति । तच्‌ च श्रुत्वा यूथपतिः 
स्वचित्तेना वधाये ' यथेमे वदन्ति मूषकाः ' तथेव ' नान्यथा ' 
इति कृत्वा तम्‌ अथे प्रतिपन्नवान्‌ । अथ गच्छति काले केनचिद्‌ 
राज्ञा हस्ति बन्धकपुरुषा हस्तिनां बन्धनाय समादिष्टाः । तिश च + 
वारिवन्धं कृत्वा. सयूथो यूथाधिपत्तिर विधृत्य दिनिचयानन्तरं 
महत्या रज्ज्वादियन्णया ततः समाकृष्य तस्मिन्‌ एव वने स्थूल- 
स्वन्धवृोषु बद्धः । अथ गतेषु वबन्धकपुरूषेषु स रवं चिन्तयति । 
केन प्रकारेण कस्य वा सकाशान्‌ मे मोषो भविष्यति । स्मृत्वा । 
तान्‌ मूषकान्‌ विहाय नान्यो ऽस्त्य्‌ अस्माकं मोषरोपायः । ततो 
गजवन्धनभूमिवहिः स्थितया पर्वोपत्व्धमूषकावस्थया निज्ञप- ५ 


०, ग्र 00४, 1008, (80, 10870187, ^पण एए. ८००४ 771. 16 


¶ 216 णा: 716८ €8८प€ €1€01027४8. ए7व7116-8101 $. 


रिचारकहस्तिन्या मूषकेभ्यो यथावृत्नं निज वबन्धनव्यसनं यूथपतिर्‌ 
 आख्यापितवान्‌। ते च श्रुत्वा प्रत्युपकारकरणाथे सहस्रशो मित्तित्वा 
तद्यूथसकाशं गताः । दुष्टा च सयूथं यूथपतिं बद्धं यथास्थानं 
पाशांश हिचा वृक्षस्कन्धोपरि समारुह्य स्कन्ध बन्धरज्जुभ च खरड- 
यित्वा बन्धनान्‌ मोचितवन्तः ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि । कतव्यान्य्‌ एव मिच्राणि । इत्यादि । तच्‌ हूत्वा मन्थरकेणाभिहितम्‌ । 6 
भद्र । भवत्व्‌ एवम्‌ । मा भेषीः । खवेश्मेदं भवतः । तन्‌ निरुदेगमनसा यथेष्टम्‌ 
अचोष्यताम्‌ । ततस्‌ तेषां खेच्छया कृताहारविहाराणां मध्याहसमये विपुलद्रद समोपे 
बहलवच्च्छायाघधस्तात्‌ छतसमागमानां विविधधर्मां्थादिशास्त्रविचारेण परस्यरं प्रीति- 9 
पूर्वकं कालो ऽ तिवतेते । युक्तं चतत्‌ । 

काव्यशास््रविनोदेन ' कालो गच्छति धीमताम्‌ । 

व्यसनेन हि मूर्खाणां ' निद्रया कलंहेन वा ॥ १७१॥ 12 
किं च। सुभाषितरसास्ाद'वद्वरोमाञ्चकञ्चुकाः । 

विनापि संगमं स्त्रीणां । सुधियः सुखम्‌ आभरुयुः ॥ १७२॥ 

अथ कद्‌ाचित्‌ तस्यां नियतवेलायां चिचाङ्गो नायातः । तं चापश्चन्तस्‌ ते तत्का- 15 

लसमुपजातविपरी तनिमित्तशङितहद यास तस्यकृशलं मन्यमाना धृतिं न लेभिरे । 
ततो मन्थरकहिरण्यौ लघुपतनकं प्रत्य्‌ उक्तवन्तौ । भद्र ' अशक्ताव आवां मन्द्‌गतितया 
तं प्रियसुहदम्‌ अन्वेष्टुम्‌ । तड्‌ भवान्‌ एवान्विष्य जानातु ' किम्‌ असौ सिंहेन भक्तितः । 18 
अथवा द्‌ावानलेनावलीढः ' उत ज्गुब्धकादि गोचरे पतितः । इति । उक्तं चैतत्‌ । 

लीलोव्यानगते $पि हि ' सहसा पापं विशङ्युति बन्धौ । 

किम्‌ उ दृष्टबड्पायप्रतिभयकान्तारमध्यस्ये ॥ १७३॥ हः 21 
तत्‌ सर्वथा गत्वा चिवाङ्गवारत्ता यथावस्यिताम्‌ अन्विष्य शोघ्रम्‌ आगच्छ । तच्‌ कूत्वा 
लघुपतनको नातिदूरे गत्वा पल्वलसमोपि खादिरकीलकावलम्बितदृढकूटपाशपतितं 
चिचाङ्खं दृष्टा सविषादम्‌ आह । भद्र ' कथम्‌ इमाम्‌ आपदं प्राप्नो ऽसि। सो ऽब्रवीत्‌ । 24 
मिच्र ' नयं विलम्बकालः । श्रूयताम्‌ असखदचनम्‌ । यथा । 

प्राणव्यये समुत्पत्े ' यद्‌ स्यान्‌ भिचद शनम्‌ । 

दयोः सुखप्रदं तच्‌ च ' जीवतो $पि मृतस्य च ॥ १७४॥ 27 
तत्‌ क्षन्तव्यम्‌ । यत्‌ किंचिन्‌ मया प्रणयकृपितेन गोष्ठीष्व्‌ अभिहितम्‌ । तथा हिरणम- 
न्थरकाव्‌ अपि मदचनाद्‌ वाच्यौ । 


र 


50०0 व. (प्र पत्रान्‌ 0 एद्यम08; 168 


1-1-19 216 ॐ: 0€ल"8 पला (कपण. 


अज्ञानाज्‌ ज्ञानतो वापि, यट्‌ दुरुक्तम्‌ उद्‌ाहतम्‌ । 

तत्‌ क्षन्तव्यं युवाभ्यां मे ' छत्वा प्रोतिपरं मनः ॥ १७५॥ 
तच्‌ छत्रा लघुपतनक आह । भद्र । न भेतव्यम्‌ अस्मद्विधेषु भितेषु विद्यमानेषु । तद्‌ अहं $ 
हिरण्यं गृहीता तत्पाशच्छेदनाय द्रूततरम्‌ आगमिष्यामि । एवम्‌ उत्कोदिम्रहदयो | 
मन्थर कहिर ण्यान्तिके गत्वा चिचाङ्गवन्धनसखर्ूपं निवेव्य हिरण्यं चञ्चा गृहीता पुनश्‌ 
चिचाङ्गान्तिकम्‌ आगतः । हिरण्यो ऽपि तं तदवस्थम्‌ अवलोक्य सविषादम्‌ आह । भद्र । 5 
त्वं सद्‌ा शङ्धितहदयो ज्ञानचक्ुश्‌ चासि । तत्‌ कथम्‌ इदं ते बन्धनव्यसनम्‌ । सो 
ऽब्रवीत्‌ । वयस्य । किम्‌ अनेन पुष्टेन । बलवद्‌ धि दैवम्‌ । उक्तं च । 


किं शक्वं सुमतिमतापि तच कर्तु 9 ` 
यचुसौ व्यसनमहोदधिः कृतान्तः । 
राचौ वा दिनसमये ऽथवा समथे 
यो ऽदृश्यः प्रहरति तेन को विरोधः ॥ १७६॥ 1808 12 


तत्‌ ' साघो ' त्रम्‌ अभिन्नो ऽसि नियतिविलसितानाम्‌। अतो दतं हिन्बि पाशम्‌ । 
यावत्‌ क्रूरकमां व्याधो नेहागच्छति । हिरण्य आह । मयि पास्ये न भेतव्यम्‌ । किं च। 
मम मनसि महान्‌ संतापो वर्तते । तम्‌ अपनयतु भवान्‌ वृ्तान्तकथनेन । प्रन्ञाचन्ुर्‌ 15 
असि । कथम्‌ अस्य बन्धनस्यं वशम्‌ उपगतः । सो ऽ त्रवीत्‌ । यद्य्‌ अवश्यं लया ओरोतव्यम्‌ । 
तद्‌ आकणंय ' यथाहं पूर्वम्‌ अनुभूतबन्धनव्यसनो ऽपि देववशात्‌ पुनर बद्धः । सो 
ऽब्रवीत्‌ । कथय । कथम्‌ अनुभूतपूरवै *भवता बन्धनव्यसनम्‌ । तत्‌ सर्वे विस्तरतः ओतुम्‌ 18 
इच्छामि । चिचाङ्ो ऽब्रवीत्‌ । 


॥ कया ९ ॥ 


पूवेम्‌ अहं षण्मासजातः शिणुभावात्‌ सर्वेषाम्‌ अयतो विह- 
रामि ' लीलया च दूरं गत्वा स्वयूथं प्रतिपालयामि । अस्माकं 
च चै गती । ऊध्वो ' अज्ञसा च । तयोर्‌ अहम्‌ अज्ञसां वेद्धि 
न चोध्वीम्‌ । अथ कदाचिट्‌ विचरन्‌ यावन्‌ मृगगणान्‌ न ५ 
पश्यामि ' तावत्‌ सुतराम्‌ आविग्रहृदयः " क ते गताः " इति 
दिशो विल्छोकयन्‌ असतः स्थितान्‌ पश्यामि । ते दय्‌ ऊषध्वेगत्या 
जात्टं व्यतिक्रम्य सर्वे ऽपि पुरतः स्थित्वा माम्‌ एव भ्वीक्षमा- 
णास्‌ तिष्टन्ति । अयोध्वेगतेर अनभिज्ञतयाहं व्याधपाश्जालेन 


०४, (प्न £ 709, 008, &0 र, (008, ^ 098. 80०४ 71. 169 
¶216 1: 06१ {ग पालाः वधम. 
बद्धो यावत्‌ स्वयूथान्तिकम्‌ उपसपितुमना जालम्‌ आक्षामि ' 
तावट्‌ व्याधेन सवेतो नञो ऽधःशिरा भूमो निपतितः । गततं च 
तन्‌ मृगयूथं मयि निराश्तया । अय व्याधेनागत्य ' शिशुर्‌ 9 
अयं क्रीडामाचयोग्यः ' इति संजातमृदुहदयेनाहं मृत्युना न संयो- 
जितः । विशेषत च गृहं नीत्वा राजपुचस्य क्रीडन काथं प्रदत्तः । 
स राजपुबो ऽपि मां दृषा परितुष्टो व्याधस्य पारितोषिकं ददौ ' ° 
मां चाभ्यद्धोंहतेन॑लान॑भोजन॑गन्धवित्ेपनंसत्कारिेर अपि समुचि- 
तमनोह राहारेर अतपेयत्‌ । सो ऽहम्‌ अन्तःपुरिकाजनस्य कुमा- 
राणां च कोतुकपराणां हस्ताट्‌ धस्तं गच्छन्‌ मीवानयनकरच- » 
रणकणंकषेणाटिभिः परिङेशितः । अथय कटाचिट्‌ राजपुचस्य 
शयनीयाधःस्थेन प्रावृदालसमये सविद्युन्मेधस्त नितं शुत्वोत्कणिदि- 
तहदयेन मया स्वयूथम्‌ अनुस्मृत्येदम्‌ अभिहितम्‌ । 12 
यथा वात्तविधूतस्य ' मृगयूथस्य धावतः । 
पृष्ठतो ऽनुगमिष्यामि ' कंटेतन्‌ मे भविष्यति ॥१७७॥ 
अथासौ राजपुत्रः ' केनेदम्‌ अभिहितम्‌ ' इत्ति सं चस्तहृदयः "८ 
समन्ताद्‌ अवत्छोकयन्‌ माम्‌ अपश्यत्‌ । दुष्टा च" न मानुषे- 
णोदम्‌ अभिहितम्‌ ' किं तु मृगेण ' अत रएतट्‌ ओत्ातिकम्‌ ' 
तत्‌ सवेथा विनष्टो ऽस्मि ' इत्ति मत्वा महगृहीत इव कथम्‌ ऽ 
अपि प्रसल्ितवासा राजपुबो गृहाट्‌ बहिर्‌ निश्चक्राम । भूता- 
धिष्ठितम्‌ इवात्मानं मन्यमानो मान्तिकतान्तिकादिपुरुषान्‌ मह- 
त्याथेमाचया प्रत्लोभ्याभिहितवान्‌ । यो ममेमां रुजम्‌ अपनयति ' 
तस्माय्‌ अकृशं पूजां करोमि । अहम्‌ अपि तचासमीषयकारिणा 
जनेन काष्ठे्टकात्गुडप्रहरिर हन्यमानः ' अनेन किं पशुना 
व्यापादितेन ' इति वदतूायुःशेषतया केनापि साधुना रितिः । 


( 


5001 71. व्र "पक्र 07 एम 08; 170 


¶ 216 1: 2066775 जालाः €व्प् ण. 18168101 


तेन च मदिकारोपल्ग्धार्थेन विज्ञप्नो राजपुचः ' यथा । भट 

अनेन प्रावृदालसमयोत्सुकेन स्वयूयम्‌ अनुस्मृत्य दम्‌ अभिहितम्‌। 
यथा वातविधूतस्य ' मृगयूथस्य धावतः । ४ 
पृष्ठतो ऽनुगमिषयामि ' कंटेतन्‌ मे भविष्यति ॥१७४॥ 

तट्‌ भवतः किम्‌ असंबच्खं ज्वरकारणम्‌ । तच्‌ छता राजपुबो 

ऽपगतज्वरविकारः पूवेप्रकृतिम्‌ आपन्नः स्वपुरूषान्‌ एवम्‌ आह । ¢ 

यथा । अमु मृगं प्रभूतजत्ठेन शिरसि सिक्का तस्मिन्न्‌ एवं वने 

प्रतिमुज्चध्वम्‌ । ते च तथेवानुष्ठितम्‌ ॥ 


एवम्‌ अनुभूतपूर्वबन्धनो ऽप्य्‌ अहं पुनर नियतिवशाद्‌ बद्धः ' इति । अचान्तरे सुहत्लेहा- 9 
िप्तचित्तो मन्थरकस्‌ तदनुसारेण शर^दयुण्टकुशावमदंनं कुवांणस तेषां सकाशम्‌ 
आगतः। तं चागतं दृष्टा सुतराम्‌ आविम्रहदयास्‌ ते संजाताः । अथ हिरण्यो मन्थरकम्‌ 
आह । भद्र । न त्वया शोभनं कतम्‌ ' यत्‌ सवदुगेम्‌ अपहायूागतः । यत्कारणम्‌ । 12 
अशक्तस्‌ तवं लुब्धकाद्‌ आत्मानं परिचातुम्‌ । वयं ल्‌ अगम्यास्‌ तस्य । यत्कारणम्‌ । 
दिते पाशे संनिकृष्टे लुब्धके ऽ यं चिचाङ्कः प्रणश्च यास्यति ।' लघुपतनको ऽपि वृन्तम्‌ 
आरोच्यति । अहम्‌ अप्य्‌ अलयकायलाद्‌ द्रौीविवरम्‌ +अनुप्रवेच्यामि । भवांस्‌ तु 15 
तन्नोचरगतः किं करिष्यति । तच्‌ कूला मन्थरकस्‌ तम्‌ आह । मा भवं वोचस्‌ त्वम्‌ । 
यतः। दयितजनविप्रयोगो ' वित्तवियोगश्‌ च कस्य सह्यः स्यात्‌ 

यदि सुमहौषधकल्यो ' वयस्यजनसंगमो न भवेत्‌ ॥ १७९॥ ढः 18 
तथा च। अविरलम्‌ अप्य्‌ अनुभूताः  शिष्टेष्टठसमागमेषु ये दिवसाः । 

*पथ्यटनसंनिमास्‌ ते ' जीवितकान्तारशेषस्य ॥ १८०॥ ध, 

सुहृदि निरन्तरचित्ते ' गुणिनि कलत्र प्रभौ च दुःखन्ने । 21 

विध्राम्यतीव हृदयं ' दुःखस्य निवेदनं कत्वा ॥१८१॥ ध 
तत्‌ । भद्र । ओत्सुक्यगभां मतीव दृष्टिः 

प्यांकृलं कापि. मनः प्रयाति। २ 

वियुज्यमानस्य गणान्वितेन 

निरन्तरप्रेमवता जनेन ॥ १८२॥ प 
अपिच। वरं प्राणपरित्यागो न वियोगो भवादृशैः। 27 

प्राणा जन्मान्तरे भूयो । न भवन्ति भवद्विधाः ॥ १८३॥ 


०४, (प ८ 70", 11008, 0 ण, 70 काऽ, ^ पण 02.27. 80० (1. 1१71 


ए78116-5101ए : 006, 11056, €70 क, ६07४0186, 80 66८. 


अचान्तरे लुब्धकः शरासनपाणिः समायातः । तस्य पश्यतो ऽपि हिरण्यः पाशं 
हित्वा यथापूर्वव्याहतविवरं प्रायात्‌ । लघुपतनको वियत्य्‌ उत्पल्यैव गतः । चिचाङ्गो 
$पि वेगेनापक्रान्तः । लुब्धको ऽपि च्छित्िपाशं मृगं दृष्टा विख्ितमनाः प्राह । कथं चन 3 
मृगाः पाशांश्‌ हिन्दन्ति । ननु दैवान्‌ मृगः पाशच्छेदं कछतवान्‌ । कच्छपं च]संभाव्यां 
भूमिम्‌ आगतं दृष्टा साधारणचित्तम्‌ अकरोत्‌ । यद्य्‌ अपि दैववशान्‌ मृग इमान्‌ 
पाशांश दित्ता गतः ' तथाप्य्‌ अयं कच्छपः प्राप्तः । उक्तं च । 6 
उत्पततो ऽप्य्‌ अन्तरित ' गच्छतो ऽपि महीतलम्‌ । 
धावतः पृथिवीं सर्वां । नादत्तम्‌ उपतिष्ठति ॥१८४॥ 
एवम्‌ अवधार्य न्ुरिकया कुशान्‌ आदाय दृढां रज्जं कृत्वा चरणाव्‌ आकृष्य कच्छपं 9 
सुबद्धं कत्वा धनुषः कोचखां रज्जुम्‌ आलम्ब्य लुब्धको यथागतम्‌ एव गन्तुम्‌ आरब्धः । 
तं च नीयमानं दृष्टा हिरण्यः सविषादम्‌ आह । कष्टं भोः कष्टम्‌ । 
एकस्य दुःखस्य न यावद्‌ अन्तं 12 
गच्छाम्य्‌ अहं पारम्‌ इ वणवस्य । 
तावद्‌ दवितीयं समुपस्थितं मे 
िद्रेष्व अनर्थां बहलीभवन्ति ॥ १८५॥ ¡पता 15 
चते प्रहाराः प्रपतन्ति तत्रा 
अच्रक्तये दीव्यति जाठरान्निः। 
आपत्सु वैराणि समुच्छलन्ति 18 
द्टद्रेष्व्‌ अनथां बहलोभवन्ति ॥ १८६॥ णा 
यावद्‌ अस्खलितं तावत्‌ । सुखं याति समे पथि । 
स्खलिते च समुत्पन्ने , विषमं च पदे पदे ॥ १८७॥ 21 
किं च। यन्‌ नरं सगुणं चापि । यच्‌ चापत्सु न सोदति । 
धनुर्‌ मिचं कलं च ' दुलंभं गुद्धवंशजम्‌ ॥१८८॥ 
यतो ऽ कृचिमं मितं । लभ्यते न स्वभावजम्‌ । २4 
स्वभावजं हि यन्‌ मितं ' तद्‌ भाग्यैर्‌ एव लभ्यते ॥ १८९॥ 
न मातरि न दारेषु न सोदर्ये न चूात्मञे। 
विञ्रम्भस्‌ तादृशः पुंसां ' यादृङ्‌ मित्रे निरन्तरे ॥ १९०॥ श 
चोयते नोपभोगेन ' नाप्य्‌ अनार्थेर्‌ विलुप्यते । 
हियते मृत्युनकेन । मिचं सद्धावबन्धुरम्‌ ॥ १९१॥ 
तत्‌ किं ममोपय अनवरतम्‌ एवैतद्‌ दैवं प्रहरति । आदौ तावद्‌ अर्थभरंशः ' दारिद्दो- ॐ 
षात्‌ सखजनपरिभवः । तत्नर्वेदाद्‌ देश्परित्यागः । सुहद्धियोगश्‌ चेदानीं देवेन मे 
जनितः । उक्तं च । 


500 77. वप्त "पक्राप्नल 07 एदयप्र)8; 172 


ए व116 8६01 : ०6, 10४86, €7० फ, ४0110156, 20 १९९६. 


सत्यं घने न मम नाशगते ऽपि चिन्ता 

भाग्यक्रमेण हि धनानि पुनर्‌ भवन्ति । 

"एतत्‌ तु मां दहति नष्टधनाश्रयस्य ५ 

यत्‌ सौहद नि सुजने शिथिलीभवन्ति ॥ १९२॥ १९७३ 
अन्यच्‌ च। स्वकर्मसंतानविचेष्ितानि 

लोकान्तरं प्राप्य गुभागुभानि। 6 

इहैव दृष्टानि मया चलानि 

जन्मान्तराणीव द शएन्तराणि ॥ १९३१ | घ])8 
साधु चदम्‌ उच्यते। 9 

कायः संनिहितापायः ' संपदः पदम्‌ आपदाम्‌ । 

समागमाः सापगमाः ' सर्वम्‌ उत्पादि भङ्कुरम्‌ ॥ १९४॥ 
तत्‌ कष्टं भोः ' मिचवियोगेन हतो ऽहम्‌ ' इति किं निजैर अपि स्वजनैः । उक्तं च । 12 

शोकारतिभयताणं ' प्रीतिविश्रम्भमभाजनम्‌ । 

केन रत्नम्‌ इदं ष्टं ' मित्रम्‌ इत्य अत्तरद्रयम्‌ ॥ १९५॥ 
अपिच। सखच्छानि सौभाग्यनिरन्तराणि 15 

सेहेकपाशाहितयन्त्रणानि । 

स केवलं सञ्जनसंगतानि 

हिनत््य असह्यो मरणप्रवासः ॥ १९६॥ प] 18 
तथाच। संगतानि सुबद्धानि' संपद्श्‌ च मनोरमाः। 

दिनतत्य एकपदे मृत्युर्‌ ' वैराणि च मनखिनाम्‌ ॥ १९७१ 
तथा च। यदि जन्मजरामरणं न भवेट्‌ 21 

यदि चेष्टवियोगभयं न भवेत्‌ । 

यदि सर्वम्‌ अनित्यम्‌ इदं न भवेद्‌ 

| इह जन्मनि कंस्य रतिर्‌ न भवेत्‌ ॥ १९८॥ 1०48 24 

एवं शोकगर्भ वदति हिरण्यके चि चाङ्गलघुपतनकाव्‌ आक्रन्दमानौ समेत्य मिलितौ । 
अथ हिरण्यम्‌ +*ताव्‌_ अत्रवीत्‌। यावड्‌ अयं मन्थरको ऽ खच्चचुर्गोचरगतः' ताव्‌ एव मो- 
चनोपायः। तद्‌ गच्छ ' चिचाङ्ग। लम्‌ अस्व व्याधस्यादृश्यो ऽ यतो गत्वोद कसंनिकृष्टभूप्रदेशे 7 
निपत्य मृतदूपम्‌ आत्मानं द शंय । लघुपतनक । त्वम्‌ अपि +चिचाङ्ग्पङ्गपज्ञरान्तरे 
वितत्य चरणौ नेचोत्पाटनच्छद्नूत्मानं दर्शय । असाव अपि व्याधाधमो ऽवश्यं लोभात्‌ । 
सारङ्गो ऽयं मृतः ' इति तद्रहणा्ं कुर्म भूम्यां निक्षिप्य तच यास्यति । अहम्‌ अष 30 
अपक्रान्ते तस्सिन्‌ निमेषमाचेैव मन्थरम्‌ आसन्नजलदुर्गाश्रयणाय बन्धनान्‌ मोचयिता 
श्र स्तम्बे प्रवेच्यामि । अन्यच्‌ च ' पुनर्‌ अभ्याशगते तस्िंल लुब्धकाधमे यथा पलायनं 
क्रियते । तथा यतितव्यम्‌ । तथैवनुष्ठिते प्रयोगे यावल्‌ लुब्धकः पश्यत्य उद्‌ कतीरे मृतप्रायं ॐ 


०४, ¶ 0४ 200", 10 प, 60", 70078, ^» 08 5800६ 71. 173 


07116807 : 90०४९, 1110056, 60, ६01६0186, वत १६६. 


सारङ्गम्‌ ' वायसेन मच्यमाणं तं च दृष्टा ' भूम्यां सहं कच्छपं निक्षिप्य लगुडम्‌ उदिश्य 
धावितवान्‌ । अचरन्तरे पादशब्दे नाभ्याशम्‌ आगतं व्याधं ज्ञाला चिचाङ्ग उत्तमं जवम्‌ 
आस्थाय वनगहनम्‌ अनुप्रविष्टः ' लघुपतनको ऽप्य्‌ उड्ीय वृत्तम्‌ आरूढः । कच्छपो 3 
$पि हिरण्यखण्डितवबन्धनरज्जुः सलिलाशयम्‌ अनुप्रविष्टः । हिरण्यको ऽपि हि शर स्तम्बम्‌ 
आशितः । अथ लुब्धको ऽपि तद्‌ इन्द्रजालम्‌ इव मन्यमानः ' किम्‌ इदम्‌ ' इति 
विहताशः कच्छपस्थानम्‌ अगच्छत्‌ । पश्यति च तच्रुङ्लमाचप्रमाणेन शतशश कितना ९ 
बन्धनरजञ्जुम्‌ । तं च योगिनम्‌ इव कच्छपम्‌ अदृश्यतां गतम्‌ अवगम्य स्वशरीरे ऽपि 
संशयम्‌ अचिन्तयत्‌ ' संचुमितहृदयस्‌ तु तस्माद्‌ वनाद्‌ दिशो ऽवलोकयञ्‌ शीघ्रतरम्‌ 
एव स्वगृहं जगाम । अथ चत्वारो ऽपि ते कल्याणशरीराः पुनर्‌ एकस्थीभूय परस्परं 9 
सहेन वर्तमानाः पुनजातम्‌ इवात्मानं मन्यमानाः सुखेन तिष्ठन्ति । तस्मात्‌ । 

तिरश्चाम्‌ अपि यन्नेदृक्‌ ' संगतं लोकसंमतम्‌ । 

मर्त्यानां तच को नाम ' विस्मयो ज्ञानशालिनाम्‌ ॥१९९॥ 12 


समाप्तं चेदं मिचसंप्रा्तिर्‌ नाम द्वितीयं तन्त्रम्‌ ' यस्यायम्‌ आद्यखोकः। 
असाधना वित्तहीना ' बुद्धिमन्तो बह्ग्चुताः । 
साधयन्त्य आगु कायांणि ' काकाखुमृगकू्मवत्‌ ॥ *२॥ 18 


रः 


९5 
स 


सस 


॥ अहम्‌ ॥ 


अधेदम्‌ आरभ्यते संधिविग्रहादिसंबन्धं काकोलूकीयं नाम तुतीयं तन्त्रम्‌ ' यस्यायम्‌ 


आव्यञ्लोकः। 8 
न विश्वसेत्‌ पूर्वविरोधितस्य 
शचोश च मिचत्वम्‌ उपागतस्य । 
दग्धां गुहां पश्चत धघूकपूणां 6 
काकप्रणीतेन ङ ताशनेन ॥१॥ पा 


राजपुचाः पृच्छन्ति । कथम्‌ एतत्‌ । विष्णुशमौ कथयति । 
अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे पृधरीप्रतिष्ठानं नाम नगरम्‌ । तस्य समीपस्थो महान्‌ 9 
अनेकशाखासनायो न्यग्रोध्पादपस्‌ तिष्ठति । तच च मेघवर्णो नाम वायसराजो ऽनेक- 
काकपरिवृतः प्रतिवसति स । स तच विहितावासः कालं नयति । तथान्यो ऽरिमदंनो 
नाम महान्‌ उलूको ऽ संख्योलूकपरिवारो गिरिगृहादुर्गां्रयः प्रतिवसति सख । अथो- 1: 
लकराजः पूर्वविरोधवशात्‌ समन्तात्‌ परिभ्रमन्‌ यं कंचिद्‌ वायसम्‌ आसादयति । तं 
व्यापाद्य गच्छति । एवं नित्याभिगमाच्‌ कनेः शनैः स न्यग्रोधस्‌ तेन समन्ताद्‌ धतवायसः 
कृतः । अथवा भवत्य्‌ एवम्‌ । उक्तं च । यतः । 15 
य उपेक्ेत शतं स्वं ' प्रचरन्तं यदृच्छया । 
रोगं चालस्यसंयुक्तः ' स शनैस्‌ तेन हन्यते ॥२॥ 
अधा]न्येदुः स मेघवणः सर्वान्‌ सचिवान्‌ आद्भय प्रोवाच । भोः । उत्कटस्‌ तावद्‌ अयम्‌ 18 
अस्माकं शतुः । उव्यमसंपन्नः कालविच्‌ च । नित्यम्‌ एव निशागमे समेत्यासमत्पच््यं 
करोति । तत्‌ कथम्‌ अस्य प्रतिविधातव्यम्‌ । वयं तावद्‌ राचौ न पश्यामः! न च 
दिवा तस्व दुरे विजानीमः । येन गत्वा प्रहरामः । तत्‌ किम्‌ अच युज्यते संधिंविग्रह॑या- 21 
नौ सन॑संश्रयद्विधीभावानां मध्यात्‌ । अथ ति प्रोचुः । युक्तम्‌ उक्तं स्वामिना । यड्‌ एष 
प्रञ्चः कतः । उक्तं च । 


तप्र "^ 07 प &0 "8 ^ प्रा) (प्र 0१18. 80०0६ प. 170 


एकाज्‌: चदा ० 608 81 ०18. 


अपृष्टेनापि वक्तव्यं ' सचिवेन किंचन । 
पृष्टेन तु विशेषेण । वाच्यं पथ्यं महीपतेः ॥ ३॥ 
यः पृष्टो न ऋतं ब्रूते । परिणामसुखावहम्‌ । 8 
मन्त्री च प्रियवक्ता च ' केवलं स रिपुः समृतः ॥४॥ 
तत्‌ सांप्रतम्‌ एकान्तम्‌ आसाद्य मन्त्रः कर्तु युज्यति । 
अथ स मेघवर्णो ऽन्वयागतान्‌ उज्जीविंसंजीव्य॑नुजी विं प्रजीविंचिरजीविंनाग्नः पञ्च 6 
सचिवान्‌ प्रलेकं प्रष्टुम्‌ आरब्धः । तद्‌ एषाम्‌ आदौ तावद्‌ उञ्जी विनं पृष्टवान्‌ । भद्र । 
एवं खिति किं मन्यते भवान्‌ । स आह । देव ' बलवता सह विग्रहो न कार्यः । सच 
बलवान्‌ कालप्रहतां च । तस्मात्‌ संघधानीयः । उक्त च । 9 
*बलीोयसि प्रणमतां ' कालेन महताम्‌ अपि। 
संपदो नापगच्छन्ति । प्रतीपम्‌ इव निन््नरगाः ॥५॥ 
तथा च। सत्नायो धार्मिकश्‌ चूद्यो । शातुसंघातवान्‌ बली । 12 
अनेकविजयी चैव । संधेयः स रिपुर्‌ भवेत्‌ ॥६॥ 
संधिः कार्यो ऽप्य अनर्येण ' विज्ञाय प्राणसंशयम्‌ । 


प्राणैः संररितेः सर्वे ' राज्यं भवति रक्षितम्‌ ॥७॥ 15 
तथा च। अनेकयुद्धविजयी । संधानं यस्य गच्छति । 

तत््रभावेन तस्याशु ' वशं यान्त्य अरयः परे ॥ ८॥ 

संधिम्‌ इच्छत्‌ समेनापि ' संदिग्धो विजयो युधि । 18 


न हि सांशयिकं कृयांट्‌ ' इत्य उवाच बृहस्पतिः ॥ ९॥ 

संदिग्धो विजयो युते ' समेनापि हि योधिनाम्‌ । 

उपायच्ितयाद्‌ ऊध्व । तस्माद्‌ युद्धं समाचरेत्‌ ॥ १०॥ 21 
तथा च। असंदधानो मानान्धः ' समेनापि हतो भृशम्‌ । 

आमकृम्भम्‌ इ वृाभित्वा । नावतिष्ठेत शक्तिमान्‌ ॥ ११॥ 

भूमिर्‌ भिचं हिरण्यं च । विग्रहस्य फलचयम्‌ । 24 

नास्त्य एकम्‌ अपि यद्य्‌ एषां ' विग्रहं न समाचरेत्‌ ॥१२॥ 

खनन्न्‌ आखुबिलं सिंहः । पाषाण श कला कुलम्‌ । 

प्राप्नोति नखभङ्गे वा ' फलं वा मूषको भवेत्‌ ॥१३॥ 27 

तस्मान्‌ न स्यात्‌ फलं यत्र , पुष्टं युद्धं तु केवलम्‌ । 

ततः खयं तट्‌ उत्ाद्य ' कर्तव्यं न कथंचन ॥ १४॥ 

बलीयसा समाक्रान्तो वैतसीं वृत्तिम्‌ आश्रयेत्‌ । 30 

वाज्छत्न अभरंशिनीं लच्छी ' न भौजंगीं कथंचन ॥ १५॥ 

क्रमाद्‌ वैतसवृत्तिस्‌ तु ' प्राप्नोति महतीं धियम्‌ । 

मुजंगवृत्तिम्‌ आपन्नो । वधम्‌ अहेति केवलम्‌ ॥ १६॥ 88 


5800 7. वप्र "^ 07 (प्र 608 ^) पत 0 "1.5. 


ए12116 8101: $ दा ० 0 नञ 2110 ०18. 


कूमसंकोचम्‌ आसाद्य ' प्रहारान्‌ अपि म्षैयेत्‌। 

काले काले च मतिमान्‌ ' उत्तिष्ठेत्‌ छष्णस्पवत्‌ ॥ १७॥ 
तथा च। बलिना सह योद्धव्यम्‌ ' इति मे नासि द्‌ शनम्‌ । 

प्रतिवातं न हि घनः ' कद्‌ाचिट्‌ उपसर्पति ॥१८॥ 


अथ तच्‌ कूला संजी विनम्‌ आह । भद्र । तवाुभिप्रायम्‌ अपि ओतुम्‌ इच्छामि। स 


176 


आह । देव । न मभैतत्‌ प्रतिभाति । यतः स क्रूरो लुब्धो धर्मरहितः तत्‌ ते विशेषाद्‌ ५ 


असंधेयः । उक्त च । 

*ध्मसत्यविहीनेन । संदध्यान्‌ न कथंचन । 

सुसंधितो ऽप्य असाधुलाट्‌ ' अचिराद्‌ याति विक्रियाम्‌ ॥ १९॥ 
तस्मात्‌ ' तेन सह योद्धव्यम्‌ ' इति मे मतिः । उक्तं च । 

क्रूरो लुब्धो ऽलसो ऽ सत्यः । प्रमादी भीरुर्‌ अस्थिरः । 

मूढो योधावमन्ता च ' सुखोच्छव्यो भवेद्‌ रिपुः ॥ २०॥ 


अपरम्‌ । तेन पराभूता वयम्‌ । तद्‌ यदि संधानकीर्तेनं करिष्यथ , तद्‌ भूयो $पि 


सकोपो बलं करिष्यति । उक्तं च। 
चतुर्थोपायसाध्ये तु ' रिपौ सान्वम्‌ अपक्रिया । 
सेयम्‌ आमज्वरं प्राज्ञः ' को ऽम्भसा परिषिञ्चति ॥२१॥ 
शमोपायाः सकोपस्य ' तस्य प्रत्युत दीपकाः । 
सुतप्तस्यैव सहसा ' सर्पिषस्‌ तोयविन्द वः ॥२२॥ 
*+यच्‌ चैष वदति ' बलवान्‌ रिपुः ' तद्‌ अप्य्‌ अकारणम्‌ । 
उत्साह शक्तिसंपन्नो ' हत्वा शं लघुर्‌ गुरुम्‌ । 
यथा कण्ठीरवो नागं  मुसाम्राज्यं प्रपद्यते ॥ २३॥ 
अनु च। मायया शचवः साध्याः , अवध्याः स्वबलेन ये। 
यथा स्त्रीरूपम्‌ आसाद्य ' हता भीमेन कीचकाः ॥ २४॥ 
तथाच। मत्योर्‌ इवोयदण्डस्य ' राज्ञो यान्ति दिषो वशम्‌ । 
सवं ते हन्तुम्‌ इच्छन्ति । दयालुं रिपवशा च तम्‌ ॥ २५॥ 
प्रयात्य उपशमं यस्य ' तेजस्‌ तेजस्वितेजसा । 
वृथा जातिन किं तेन ' मातुर्‌ यौवनहारिणा ॥ २६॥ 
या लच्लीर्‌ नुनुलिप्ताङ्गो ' वैरिशोणितकुङ्कभेः । 
कान्तुपि मनसः प्रोतिं। न सा धत्ते मनस्विनाम्‌ ॥ २७॥ 
रिपुरक्तेन संसिक्ता , वैरिस्त्रीनेचवारिणा । 
न भूमिर्‌ यस्य भूपस्य । का स्राघा तस्य जीविति ॥२८॥ 
तच्‌ छूलानुजीविनम्‌ अपृच्छत्‌ । भद्र । त्रम्‌ अप्य आत्माभिप्रायं वद । स आह । 


9 


12 


15 


18 


91 


24 


27 


80 


प भ^ 8 07 प्त 6008 ^ प्रा) (पए 0 ष्ा,8., 500४ या. ६1 


07871680: पप्रा 608 20 ०18. 


देव ' दुष्टः स बलाधिको निर्मयांदश्‌ च। तन्‌ न तेन संधिर्‌ विग्रहो वा युक्तः । केवलं 
यानम्‌ अहँ खात्‌ । उक्तं च । यतः 


बलोत्कटेन दुष्टेन ' मर्यादारहितेन च । 8 
न संधिर्‌ विग्रहो नैव विना यानं प्रशस्यते ॥२९॥ 

दिधाकारं भवेद्‌ यानं । भये प्राणप्ररत्तणम्‌ । 

एकम्‌ अन्यज्‌ जिगीषोश्‌ च ' याचालच्षणम्‌ उच्यते ॥ 3० ॥ 6 
कार्तिके वाथ चैत्रे वा ' विजिगीषोः प्रशस्यते । 

यानम्‌ उत्कृष्टवीयस्य  शचुदेशे न चान्यद्‌ ॥ ३१॥ 

अवस्कन्द प्रदानस्य ' स्व कालाः प्रकीर्तिताः। 9 
व्यसने वतमानस्य › शचोश दछिटद्रान्ितस्य च ॥ ३२॥ 

सखस्थानं सुदृढं छलया , गरि श चूर महाबलैः । 

परदेशं ततो गच्छत्‌ ' प्रणिधिव्याप्तम्‌ अगतः ॥ ३३॥ 19 
तच्र युक्तं प्रभो कतु । द्वितीयं यानम्‌ अद्य वः। 

न विग्रहो न संधानं ' बलिना तेन पापिना ॥ ३४॥ 


अपरम्‌ । कार्यकारणपिच्यपसरणं क्रियते । इति नीतिः । उक्तं च । 15 


अनु च। 


तया । 


यद्‌ अपसरति मेषः कारणं तत्‌ प्रहरत 

मृगपतिर्‌ अतिकोपात्‌ संकुचत्य उत्पतिष्णः । 

हदयनिहितवेरा गृढमन्त्रप्रचाराः 18. 
किम्‌ अपि विगणयन्तो बुचिमन्तः सहन्ते ॥ ३५॥ 11 
बलवन्तं रिपुं दृष्टा ' देशत्यागं करोति यः। 

युधिष्ठिर इवाप्नोति ' पुनर्‌ जीवन्‌ स मेदिनीम्‌ ॥ ३६॥ 21 
युध्यते ऽ हंकृतिं कृतवा ' दुबेलो यो बलीयसा । 

स तस्य वाञ्डतं कुर्यांट्‌ । आत्मनश्रा च कुल्यम्‌ ॥ ३७॥ 


तद्‌ बलवताभियुक्तस्यापसरणंसमयो ऽयम्‌ ' न संधिविग्रहकालः । इति । 24 
अथ तस्य वचनम्‌ आक्यं प्रजी विनम्‌ आह । भद्र । त्वम्‌ अप्य आत्माभिप्रायं वदस्व । 

इति । सो ऽब्रवीत्‌ । देव ' मम संधिविग्रहयानानि चीख अपि न प्रतिभान्ति । विशेषतश्‌ 

च यानम्‌ । यतः। 27 


अनुच) 


नक्रः सस्थानम्‌ आसाद्य ' गजेन्द्रम्‌ अपि कर्षति। 

स एव प्रच्युतस्‌ तस्माच्‌ ' कूनापि परिभूयते ॥३८॥ 

अभियुक्तो बलवता ' दुर्गे तिरेत्‌ प्रयत्नवान्‌ । 80 

तचस्थः सुहदाङ्भानं ' प्रकुर्वोत्त्मसुक्तये ॥ ३९॥ 

यो रिपोर्‌ आगमं श्रुता ' भयसंचस्तमानसः । 

स्वस्थानं संत्यजेत्‌ तच । न भूयो ऽपि विशेच्‌ च सः ॥४०॥ 88 
4 ४ 


8007 7717, (पए ^ 07 (पए 6806 ^ प्रा) प्र 0018. 178 


ए1-2116-85101 9 : पद 2 0०8 21 018. 


निजस्थानस्थितो ऽप्य्‌ एकः । शतं योद्धं सहो नरः । 

शक्तानाम्‌ अपि शत्रूणां । तस्मात्‌ स्थानं न संत्यजेत्‌ ॥ ४१॥ 

तस्माट्‌ दुर्गे दृढं छत्रा । वीवधासारसंयुतम्‌ । 8 
यन्त्प्राकारपरिखा'शरादिभिर्‌ अलंकृतम्‌ ॥४२॥ 

तिष्ठन्‌ यो मध्यगो नित्यं ' युद्धाय छकतनिशयः । 


जीवन्‌ स लप्स्यते कीर्तिं । मृतः स्वगेम्‌ अवाप्स्यति ॥४३॥ 6 
उक्तं च। बलिनापि न बाध्यन्ते ' लघवो ऽप्य्‌ एकसंश्रयात्‌ । 

विपक्तेणपि मरुता ' यथैकस्थानवीरुधः ॥ ४४॥ 

महान्‌ अप्य्‌ एकको वृत्तः ' स्वेतः सुप्रंति्ठितः। 9 


परसद्यैव हि वातिन । शक्यो धषेचितुं चतः ॥४५॥ 

अथ ये संहता वृक्षाः ' सर्वतः सुप्रतिष्ठिताः । 

न ते शीघ्रेण वातेन हन्यन्ते ह्य एकसंश्रयात्‌ ॥ ४६॥ 12 

एवं मनुष्यम्‌ अप्य एकं । शौर्येणापि समन्वितम्‌ । 

शक्यं दिषन्तो मन्यन्ते । हिंसन्ति च ततः परम्‌ ॥४७॥ 

तस्मा अण आकण चिरजीविनम्‌ आह । भद्र । लम्‌ अप्य्‌ आत्मामिग्रायं बद । 16 

सो ऽव्रवीत्‌ । देव । षाहुण्यमध्ये मे संश्रयः प्रतिमाति । तत्‌ तस्यानुष्टानं कार्यम्‌ । उक्तं च । 
यतः। असहायः समर्थो ऽपि ' तेजख्य्‌ अपि करोति किम्‌ । 

निवाते पतितो वद्धिः ' स्यम्‌ एवोपशाम्यति ॥४८॥ 18 
तद्‌ अचख्ितिनैव त्या कित्‌ समर्थः समाश्रयणीयः । यो विपन्प्रतीकारं करोति । 
यदि पुनस्‌ तवं खानं त्यत्का प्रयास्यसि । तत्‌ को ऽपि न वाद्याचेणापि सहायलवं 
करिष्यति । उक्तं च । 21 

वनानि दहतो वहिः । सखा भवति मारुतः। 

स एव दीपनाशाय । कृशे कस्यास्ति गौरवम्‌ ॥ ४९॥ 
अथवा नायम्‌ एकान्तः । यद्‌ बलिनं समाश्रयेत्‌ । लघुनाम्‌ अपि संश्रयो रक्षायै २५ 
मवति । उक्तं च। 

संपातवान्‌ यथा वेशुर्‌ ' निबिडो वेगुभिर्‌ वृतः । 

न हि शक्यः समुच्छेत्तुं ' दुर्वेलो ऽपि तथा नृपः ॥५०॥ 27 
यदि पुनर्‌ उत्तमसंश्चयो भवति ' तत्‌ किम्‌ उच्यते । उक्त च । 

महाजनस्य संपकैः ' कस्य नोन्रतिकारकः। 

पद्यपत्चश्ितं वारि । धत्ते सुक्ताफलथियम्‌ ॥५१॥ 80 
तत्‌ । देव । संश्रयं विना न कञ्चित्‌ प्रतीकारो भवति । तस्मात्‌ संश्रयः कार्यः । इति मे 
$भिप्रायः। | 

अधचैवम्‌ अभिहति मेघवणं श्रा चिरं तनं पितुसचिवं दीधंद शिनं सकलनीतिशास्त्रपारगं 8 


प्रप ^ 08 पए 08 ^ प्र? वप्त 08. 504० गा, 179 


ए78116-8107 ए: पप 0 €0 8 21 ०18. 


*"ख्िरजीव्यभिधानं प्रणम्योवाच । तात । एते यन्‌ मया पृष्टार्‌ तवाचख्ितसख्यापि । तत्‌ 
परीक्षार्थम्‌ । येन त्वं सकलम्‌ अपि श्ुला यद्‌ उचितम्‌ । तन्‌ मे समादिशसि । तद्‌ 
यद्‌ युक्तं भवति । तत्‌ समादिश्यताम्‌ ' इति । सो ऽत्रवीत्‌ । वत्स । एतैर्‌ अपि नीतिशा- 
स्त्रा्ितं सर्वम्‌ अभिहितम्‌ । तच्‌ च युक्तम्‌ एव स्वसखकाले । परम्‌ एष देधीमावस्य 
कालः । उक्तं च । 
अविश्वासं सदा तिंटेत्‌ ' संधिना वियहेण च । 6 
दैधीभावं समाथित्य ' पापे शचौ बलीयसि ॥५२॥ 
ततः खयम्‌ अविश्वसेर लोमं द शंयद्धिः शुर विश्वास्य सुखेनोच्छिद्यते । उक्तं च । 
उकच्छेव्यम्‌ अपि विद्वांसो ' वधैयन्त्य्‌ अरिम्‌ एकदा । 9 
गुडेन वर्धितः शचेष्मा । यतो निःओेषतां व्रजेत्‌ ॥ ५३॥ 
तथाच। स्त्रीणां शोः कुमिचस्य । पण्यस्त्रीणां विशेषतः । 
यो भवेद्‌ एकमावो ऽच । न स जीवति मानवः ॥ ५४॥ 12 
छत्यं दे वदिजातीनाम्‌ ' आत्मनश्‌ च गुरोस्‌ तथा । 
एकभावेन कर्तव्यं । शेषं भावदयाभरितिः ॥ ५५॥ 


एको भावः सदा शस्तो । यतीनां मावितात्मनाम्‌ । 15 
ओरीलुब्धानां न लोकानां । विशेषेण महीसुजाम्‌ ॥ ५६॥ 

ततः। दधीभावसंथितस्‌ त्वं ' खस्थाने वासम्‌ आप्स्यसि । 
*"लोभाश्रयाट्‌ द तं मृत्युः शतम्‌ उच्चाटयिष्यति ॥५७॥ 18 


अपरम्‌ ' यदि किंचिच्‌ छिद्रं तस्योत्यव्यते ' तज्‌ ज्ञाता व्यापादयिष्यसि ! इति । मेघवणं 
आह । तात ' अहम्‌ अविदितसं्यस्‌ तस्य । तत्‌ कथं द्रं ज्ञास्यामि । सिरजीव्य्‌ 
आह । वत्स । न केवलं स्थानम्‌ ' छिद्रम्‌ अपि प्रकरीकरिष्यामि प्रणिधिभिः। यतः। 2 
गन्धेन गावः पश्यन्ति । वेदैः पश्यन्ति ब्राह्मणाः । 
चरेः पश्यन्ति राजानश ' चनुर्याम्‌ इतरे जनाः ॥५८॥ 
तथा चोक्तम्‌ अचर विषये । अ 
यस्‌ तीर्थानि निजे पत्ते । पर पत्ते विशेषतः । 
आश चरर नृपो वेत्ति । न स दुगेतिम्‌ आभ्रुयात्‌ ॥५९॥ 
` मेघवणै आहः। तात , कानि तानि तीर्थानि ' कतिसंख्यानि ' कीदृशाश्‌ च गुप्तचराः । 27 
सर्वै निवेद्यताम्‌ । स आह । अथा विषये युधिष्ठिरेण प्रोक्तो नारदः प्रोवाच । यथा । 
शचुपक्ते ऽषछटादश तीर्थानि ' स्वपत्चे पञ्चदश । चिमिस्‌ चिभिर गुप्तचरेस तानि ज्ञेयानि। 
तैश्‌ च सपरपक्तौ वश्यौ भवतः । उक्तं च । 80 
रिपोर अष्टादशैतानि ' खपे रश पञ्च च। 
चिभिस्‌ चिभिर अविज्ञतिर्‌ ' वेत्सि तीर्थानि चारकैः ॥ ६०॥ 
तीर्थशब्देन] चरायुक्तकम} भिधीयते । तड्‌ यदि कुत्सितं मवति ! तत्‌ सखाभिनो ऽपघाताच । ॐ 


58001 777. पए "^ ए 0 4८ 408 ^ परा) 0४ 05. 180 
2716-8 0 ङ, ¶&16 1: 5168 €166६ 8 108. 


प्रधानं चेद्‌ मवति ' तदा नृपस्याभ्युदयाय । तद्‌ यथा । मन्रिपुरोहित॑सेनापतिंयुवराज॑- 
दौवारिकान्तर्वशिकप्रशास्त॑समाहतै संनिधातुं्रे प्रं ्ाध्यच्तंको शाध्यत्तंगजाध्यच्च॑पारिषदंब- 
लाध्यचदुगैपालंप्रोत्करमृत्यारविकौटरयः परपक्षे । एतेषां भेदेन रिपुः साध्यते । स्वपे । 8 
यथा। देवींजननी*कञ्चुकिंमालिकंशव्थापालकंस्पशाध्वच्त सां वत्सरिकमिषग्जलवाहकताम्बूल- 
वाहकाचायौङ्रचकस्थानचिन्ताकरच्छच्धार विलासिन्यश च ' इति । एतेषां इरिण 
स्वपत्ते विघातः । ततश्‌ च । 6 
>वेदयसांवत्सराचा्यौः । स्वपत्ते ऽधिकताश्‌ चराः। 
तथुाहितुण्डिकोन्मत्ताः । सर्वे जानन्ति शुषु ॥ ६१॥ 
भेघवणं आह । तात । किंनिमित्तम्‌ एवं प्राणान्तकरं वेरं वायसोलुकानाम्‌। स आह । 9 ` 
श्रूयताम्‌ । 


॥ क्था १॥ 


कदाचित्‌ पूवं हंससारसकोकिलमयूरचातकों लू ककपोतपाराप- 
त॑तित्तिरचाषभासभारद्वाजकरायिकाश्यामंकाष्टक्टपभृति*पिगिणेः 
समेत्य मन्त्रयितुम्‌ आण्यम्‌ । अस्माकं तावट्‌ वेनतेयः स्वामी । 
परम्‌ असो श्रीमन्नारायणपरिचर्यापरवशो ऽस्माकं चिन्तां न 
करोति । तत्‌ किं तेन वृथास्वामिना ' यो ऽस्माकं पाश्वन्धना- 
दिव्यसनव्याकुलिततानां रसां न विधन्त । उक्तं च । 
एको ऽपिको ऽपि सेव्यो यः ' स्षीणं पछ्षीणं पुनर्‌ नवम्‌ । 
अनुग्रं करोत्य्‌ एव ' सूयेण चन्द्रमसं यथा ॥६२॥ 
अन्यस्‌ तु स्वामी नाममातरेशेव ' यथाह । 
यो न रक्षति विचस्तान्‌ " पीडयमानान्‌ परेः सदा । श 
जनान्‌ पाथिवरूपेण ' स कृतान्तो न संशयः ॥६३॥ 
तणा च। 
षड इमान्‌ पुरूषो जल्याट्‌ ' भिन्नां नावम्‌ इवाम्भसि । २५ 
अप्रवक्तारम्‌ आचायेम्‌ ' अनधीयानम्‌ ऋत्िजम्‌ ॥६४॥ 


१0८ प्र^ ए 0 तए 706 ^? 0४ 0 णा. 8005 गा. 181 
¶816 3; 81:05 6166६ 2. 1112. 


अरसित्तारं राजानं ' भायौ चाप्रियवादिनीम्‌ । 

मामकामं च गोपालं ' धनकामं च नापितम्‌ ॥६५॥ अुग्मम॥ 
तच्‌ चिन्तनीयो ऽन्यः कश्चिट्‌ विहंगमानां राजा । अथ तेर्‌ 9 
भद्राकारम्‌ उत्कृकम्‌ अवत्मोक्य सर्वे अभिहितम्‌ । एष कौशिको 
ऽस्माकं राजा भवतु ' इति । तट्‌ आनीयतां नुपाभिषेकोचितः 
समस्तवस्तुसंभारसारः । अथानीतेषु तीर्थोदकेषु ' प्रगुणीकृते च ५ 
चकराङड्धितांसहदेवींप्रभृत्य्ोत्तरशतमूलि का संघाते ' स्थिरीकृते च 
सिंहासने ' वर्तिते च +सप्रद्ीप॑समुद्रभूधरंविचितरे धरणीमण्डत्ते " 
प्रसासि च व्याप्रचमेणि ' पञ्चपल्लव॑कुसुमाकषतापूरितेषु कनक- ° 
कत्शेषु ' सन्नीकृतष्व्‌ अर्धेषु ' पठत्सु वन्दिमुख्येषु ' चतर्वेदोचा- 
रणचतुरेषु पठत्सु विप्रेषु ' कल्मङ्गलगीतप्रधाने युवत्तीजने ' सि- 
तसिदाथंत्ाजाक्तरोचनांमथितकुसु म॑शङ्धादिविचिचे पुरः सज्जी- 
कृते ऽछ्षतपाचे ' उपढठोकिते नीराजनादिविधो " निनदत्सु मद्ध- 
तततूर्येषु " यवारकाल्टंकृतवेदिकामध्ये तिष्ठन्तं सिंहासनम्‌ अभि- 
षेकाथेम्‌ उलूको यावत्‌ समलंकरोति ' तावत्‌ कुतो ऽपि” 
कूरकरेड्ारसंसूचितनिजम्रवेशे वायसस्‌ तं समाजं समाजगाम । 
अचिन्तयच्‌ च । अहो ' किम्‌ एष सकलपकिसमागमो मदो- 
त्सवश. च । अथ ते पक्िणस्‌ तं दुष्टा मिथः प्रोचुः । अयं 
पक्षिणां मध्ये ऽ तिचतुरः शरूयते । तट्‌ अस्यापि वचनसमवायो 
गृह्यते । उक्तं च । 

नराणां नापितो धूते: ' पक्षिणां चैव वायसः । धा 

चतुष्पदां शुगात्स्‌ तु ' श्वेतभिष्षुस्‌ तपस्विनाम्‌ ॥ ६६॥ 


8००४ 717. (पए ^ 0 (0४ 6098 ^ पा) पए 0018. 1828 
¶ 16 +; 21508 €16८६ 2 7६. 


अन्यच्‌ च । 
बहुधा बहुभिः साधे ' चिन्तिताः सुनिरूपिताः । 

न कथंचिद्‌ वित्ठीयन्ते ' विदन्धिर्‌ योजिता नयाः ॥६७॥ ४ 
इति विचिन्य पकिणस्‌ तं वायसं प्रत्य्‌ आहुः । भोः ' नस्ति 
कथ्चिट्‌ विहंगमानां राजा । तट्‌ अस्येवोलूकस्य सकलविहगर- 
ज्याभिषेकः समस्तपक्िभिर्‌ निरूपित आस्ते । तत्‌ त्वम्‌ अपि ° 
स्वमतं देहि । समये प्राप्नो ऽसि । अणासो विहस्य प्राह । भोः ' 

न युक्तम्‌ एतत्‌ । हंसंमयूर॑को किल'चकोरचकवाकहारीतंसारसादिषु 
प्रधानेषु विद्यमानेष्व्‌ अस्य दिवान्धस्य कराल वदनस्य यट्‌ अभि- ° 
षेकः क्रियते ' तन्‌ न मम मतम्‌ । यतः । 

*वक्रनासं सुजिह्माक्षं ' क्रूरम्‌ अप्रियदशेनम्‌ । 


अङुस्येदृशं वक्त । भवेत्‌ कुद्धस्य कीदृशम्‌ ॥ ६४॥ 19 
तथा । 

स्वभावरोद्रम्‌ अन्युयं ' क्रूरम्‌ अप्रियवादिनम्‌। 

उल्टूकं नृपतिं कृतवा ' का नु सिद्धिर्‌ भविष्यति ॥६९॥ 6 


अपरम्‌ ' वेनेये स्वामिनि सति किम्‌ अनेन प्रयोजनम्‌ ॥ .. 
यद्य्‌ अपि गुणवान्‌ भवति " तथाप्य्‌ एकस्मिन्‌ सति नान्यो 
भूपः प्रशस्तः । उक्तं च । ` 18 
एक एव हित्ताथोय ' तेजस्वी पायिवोश्चुवः। | 
युगान्त इव भास्वन्तो ' बहवो ऽ विपत्तये ॥७०॥ 
तत्‌ तस्येव नाम्ना यूयं परेषाम्‌ अगम्याः । उक्तं च ' यतः । = 
गुरूणां नाममात्र ऽपि ' गुहीति स्वामिसंभवे । 
दुष्टानां पुरतः सेमं ' ततकछषणाट्‌ एव जायते ॥७१॥ 


(प्र "^ 07 1८ 708 ^ प्रा) ४ 0 नाऽ. 800 पा, 183 
¶ 216 1: 81708 €16 ८४ 2 1118. ¶216 1: 160181४ 21 8991६ 2 100. 


उक्तं च । 
व्यपदेशेन महतां ' सिद्धिः संप्राप्ते परा । 
शशिनो व्यपदेशेन ' वसन्ति शशकाः सुखम्‌ ॥७२॥ 8 


पक्षिणः पृच्छन्ति । कथम्‌ एतत्‌ । वायसः कथयति । 


॥ कया २॥ 


^"कस्मिश्चिट्‌ वनोदेशे चतुदेन्तो नाम हस्तिराजो ऽनेकगजेः परि- ° 
वृत्तः प्रतिवसति स्म । तस्य च गजयूथं परिपात्यतः कालो 
ऽतिवतेते । अथ कदाचिट्‌ हादश्वाषिक्य्‌ अवृष्टिः संजाता ' यया 
तडागहूदपत्वल्सरांसि शोषम्‌ उपगतानि । अय तेः समस्तगजेः ° 
स युूथाधिपतिः प्रोक्तः । देव ' पिपासाकुत्ाः कलभाः केचिन्‌ 
मृतावस्थाः सन्ति ' मृताश् चापरे । तच्‌ चिन्त्यतां कश्ित्‌ पिपा- 
सापनयनायोपायः । ततस्‌ तेना्टास्व्‌ अपि दिर्छूदकान्वेषणाय "° 
वेगचरडानुचराः प्रेषिताः । अथ ये प्रूवेदिग्भागे गताः ' तेर्‌ 
उपलब्धं मुनिनिचयसं निकृष्टे ऽध्वनि हंस॑सारस॑कुररं काररडव॑ चकर 
वाक॑वत्छराकांजलत्चरोपशोभितं विविध॑तरकुसुम॑भरांवनत॑श्खां- 
किसत्करयनिकरान्वितं पाद्पेर अलत्छकृतोभयतटं पवन॑तरलतटंस्व- 
लितविमलजल्लों भिंसंघटंजायमानफेन॑निकरों पसेवित॑ पारं गजप- 
तिंसलिलांवगाहनोंत्यतितं मधुप॑निर्धोतिकरट॑तट॑च्युतमदसलिर्त्र वा- ७ 
सितजले तटरुहंत रूद्त्ठनिकरातपच॑शत॑ंसततंनिवारित॑ तरणिं तापं 
मज्जत्पुलिन्दयुवतिपृथुजघननितन्वस्तन॑तटाघातंव्यावर्तितं वीचिनि- 
च्यविरचितंगम्भीरंरवं विमलजलसंपूणे प्रोत्फुल्लकमर्तवनंगहनों- ° 
पशोभितम्‌ ' किं बहुना ' व्योमेक्देशपरिमाणं चन्द्रसरो नाम 
सरः । तच्‌ च दुष्टा त्ररिततरम्‌ आगत्य निवेदितं हस्तिराजाय । 


50० 7171. {1 ^ 8 07 वप्त 006 ^ प्रा) प 05. 184 
¶ 216 आ: लाक दप६ व्ाति 2091६ शाति 71000. 


अथ तच्‌ छूत्वा चतुदेशनस्‌ तेः सह कमेण प्राप्त चन्द्रसरः। 

अवतरद्धिश. च तैः समन्तात्‌ सुखावतारे सरसि तत्तटपूवेकृता- 
लयाः संपिष्टश्रिपीवाकरचरणाः सहस्रशः शशकाः कृताः । ४ 
पीत्वावगाद्य च पयः सपरिवार एव िरदपत्तिर्‌ अपक्रम्य स्वव- 
नगहनम्‌ अनुप्रविवेश । अथ ते हतशेषाः शशकाः परं संप्रहार 
चक्रः । किम्‌ अधुनास्माभिः कतेव्यम्‌ । दृष्टमागाः प्रत्यहम्‌ अमी ° 
समागमिष्यन्ति । यावच्‌ च पुनर्‌ इह नायान्ति ' तावन्‌ निवा- 
रणोपायण चिन्यताम्‌ । अथ त्र विजयो नाम शशकस्‌ तान्‌ 
भीतान्‌ प्रपिष्टपुचकतत्रवान्धवान्‌ सुदुःखितान्‌ वीष्यानुकम्पये दम्‌ ° 
आह । न भेतव्यं भवद्िः । न ते पुनर्‌ इहागमिष्यन्ति ' इति मे 
प्रतिज्ञा । यत्तो मम कमेसाक्षिणा प्रसादः कृतो ऽस्ति । तच्‌ 
च श्युत्वा श्त्टीसुलो नाम शशकराजो विजयम्‌ अव्रवीत्‌ । भदू ' “ 
असंशयम्‌ एतत्‌ । यत्कारणम्‌ । 

नीतिशस््राथेतखज्लो ' देश्कात्विभागवित्‌ । 

विजयः प्रेष्यते यत्र ' तच सिद्धिर्‌ अनुच्चमा ॥७३॥ 15 
अपिच। 

हितवक्ता मितवक्ता ' संस्कृत वक्ता न चापि बहुवक्ता । 

अर्थान्‌ विमृश्य वक्ता ' स हि वक्ता सवेकायेकरः ॥७४॥ = 28 
भवतो बुद्धिप्रागर्भ्यम्‌ उपलभ्य मम दूरस्थस्यापि शक्तिचयं 
हस्तिनो ज्ञास्यन्ति ' यतः । 

दूतं वा लेखं वा ' दुष्टहं नरपतेर्‌ अदुष्टस्य । श 

जानामि तं नरेन्द्रं ' प्राज्ञ प्रज्ञाविहीनं वा ॥७५॥ र 


एप "^ 07 (८८ 0 6 ^ प्रा) वप्र 013. 800 गा. 185 
¶816 #: 2160081६ 2.06 8091६ 20 11001. 


उक्तं च । 

दूत एव हि संद्ध्याट्‌ ' दूतो भिन्द्याच्‌ च संहतान्‌ । 

टूतस्‌ तत्‌ कुरूते कमे ' येन सिध्यन्ति शचवः ॥७६॥ ४ 
त्वयि च गते स्वयम्‌ एवाहं गत इवं ' इति । यत्कारणम्‌ । 

यट्‌ व्याकरणसंयुक्तं ' यच्‌ च मन्येत साधुभिः । 

व्रयाट्‌ अनुमतः सवेम्‌ ' अस्मद्चनम्‌ एव तत्‌ ॥७७॥ ० 
किं च। 

अयं टूताथेसंस्तेषः ' प्रत्यथेनियता गिरः । 

प्रयोजनं क्रियोत्पादि " कियच्‌ डक्येत भाषितुम्‌ ॥७४॥ ५ 
तत्‌ ' भद्‌ ' गम्यताम्‌ । अयम्‌ एव ते हितीयः कमेसाक्षी भवतु ' 
इति। 

अथ स गत्वा पुष्पित॑कणिकारंश्णाखांमंकिसत्ठ य॑रचित्तंखस्तरं - 
रजःपुज्ञ पिज्रित॑शरीरं विद्यु्मभापटत्न॑संशिष्टसजलंजलदसदृशं 
प्रावृदालंप्रबलचपलंमरीविविद्युनिवह॑सं घट गम्भीरंभेर व॑रवं वि- 
मलत्कुवत्ः य॑पटल्॑दर्त्ठच्छविं प्रवर॑भुजगेन्दराकारंसं वेितत॑करम्‌ रेरा- 5 
वत॑सम॑महिमानं मधुवणेसुजातंल्िग्धों पचितोभयविषाणं करटतटों- 
द्वान्तंमर्दजत्वसुरभिंपरिमल्ाकृषटचमरंगणंगीत॑रमणीयमुखंमरडत्ये 
तार्डवितत॑कणंपल्लवानां यूयपतीनां च सहसः परिवृतं तं गजेन्द्रं 
तस्यैव सरसो ऽभिमुखम्‌ आयान्तं दुरा विजयः चिन्याम्‌ 
आस । अशक्यो ऽनेन सहास्मदिधानां समागमः ' यत्कारणम्‌ ' 
स्पृशन्‌ अपि गजो हन्ति ' इत्य उक्तम्‌ एव । (०.४. 7०) श 

तत्‌ सवैथाप्रधुष्यायां भूमो संदशैनम्‌ अस्य प्रयच्छामि । इति 
विचिन्योचेस्तरविषमशित्तासंघातोपरि स्थितवा्रवीत्‌ । बिरदपते ' 
अपि भवतः शिवम्‌ । तच्‌ छूा सुनिपुणं वीष्य गजपतिर्‌ ५ 


5००1 7117. (प्र "^ ६ 07 1 005 ^ प्रा) पए 018. 186 
अव्रघीत्‌ । को भवान्‌ । शशक आह । दूतो ऽहम्‌ ' इति । स 
आह । केन भवान्‌ प्रेषितः । टूत आह । भगवता चन्द्रेण ॥ 
गजपतिः पृष्टवान्‌ । कथय कायेम्‌ इति । शशकः कथयति । 
जानात्य्‌ *एव भवान्‌ ' यथाथेवादिनो दूतस्य न दोषः करणीयः। 
दूतमुखा हि राजानः सवे एवः। उक्तं च । 

उङ्खेष्व्‌ अपि शस्त्रेषु ' बन्धुवगेवधेष्व्‌ अपि । ° 

परूषाण्य्‌ अपि जल्पन्तो ' वध्या दूता न भूभुजा ॥७९॥ 
सो ऽहं भवन्तं चन्दराज्ञया ब्रवीमि । कथं नाम ' मनुष्य , आत्मानं 
परं चापरिच्छिद्य शक्तितः परापकारेर वततितः ' इति । उक्तं च । ° 

परेषाम्‌ आत्मनश चेव ' यो ऽ विचाये बलाबलम्‌ । 

कायां योलिष्ठते मोहाट्‌ ' आपदः स समीहते ॥४०॥ 

{तत्‌ त्वयास्मन्नामप्रसिद्धं चन्द्रसरो ऽन्यायेन धषिंतम्‌ ' ततर चा- "५ 
स्मदीयाङ््‌त्ालितशशकेन्दजातीया अस्मत्संरक्षणीयाः शशका 
व्यापादिताः । तट्‌ एतट्‌ अयुक्तम्‌ । अन्यच्‌ च । किं न ज्ञातवान्‌ 
असि ' यतर्‌ ल्कोके प्रख्यातनामास्मि ' शशाङ्कः " इति । तत्‌ किं 
बहुना प्रलपितेन । यदि त्वम्‌ अस्माट्‌ व्यापारान्‌ न निवतेसे ' 
ततो 5 स्मत्सकाशन्‌ महान्तम्‌ अने प्राप्स्यसि ' इति । यदि 
त्म्‌ अद्यदिवसाट्‌ आरभ्य निवतेसे * तत्‌ ते महान्‌ विशेषो 
भविष्यति । यत्कारणम्‌ ' अस्मत्सक्तया ज्योत्लयायायितशरीरः 
सपरिवारः सुखेनास्मिन्‌ वने यथेष्टचेष्टं विहरिष्यसि । अन्यथा- 
स्मत्कृतरश्िसंरोधाट्‌ धर्मेण परित्तापिततशरीरः सपरिवारो वि- 
नाशम्‌ एसि । इति श्चुता हस्तिराजो ऽतीवकषुभितहदयश् चिरं 
विचिन्याब्रवीत्‌ । भद्‌ ' सत्यम्‌ । मयापकृतं भगवतत चन्द्रमसः । 
सो ऽहम्‌ अधुना तेन सह विरोधं न करिष्यामि 1 तट्‌ आभु ५ 


१ (^ 07 1४४८ 008 ^ पा) (प्ट 0018. 500४ प. 18प 
216 11: 2160187६ 87 7 द 997४ 2.0 71001. 216 3: 81705 616८६ 8 ६10. 


दशेय पन्थानम्‌ ' येनाहं तच गत्वा भगवन्तं चन्द्रमसं छषमयामि । 
शशको ऽब्रवीत्‌। आगच्छतु भवान्‌ एकाकी ' येनाहं तं दशेयामि। 
इत्य्‌ उक्ता चन्द्रसरो. गता स्फुरितप्रभामण्डतं रूचिरच्छायं विपु- ४ 
ल॑गगन॑तलोंल्लासित॑मह॑सप्रभितारकंगणंपरिवृतं संपरूणंकल्ाकला- 
पांखणडंमरडत्रम्‌ उटकप्रतिबिषितं राचौ चन्द्रमसम्‌ अदशेयत्‌ । 
असाव्‌ अपि दुष्टा ' भुचिर्‌ भूत्वा देवताप्रणामं करोमि ' इति ऽ 
पुरुषद्चयबाहुमराद्यप्रमाणं करम्‌ अम्भसि धिप्रवान्‌ । अथ संस्ुभि- 
तोट्कवशाट्‌ इतश चेतश च चक्रारूढ इव भ्रमति चन्द्रमण्डले 
चन्द्रसहखम्‌ अपश्यत्‌ । अथय विजयः सुतराम्‌ उदिग्रहृट्यः प्रति- » 
निवृत्य हस्तिराजम्‌ अव्रवीत्‌ । देव ' कष्टं कष्टम्‌ । भवता * ि- 
गुणम्‌ आरोषितश चन्द्रः । स आह । केन हेतुना भगवांश चन्द्रो 
¦ मयि प्रकुपित्तः । विजयो ऽब्रवीत्‌ । स्पशेनाट्‌ अस्य पानीयस्य । 
अथ तच्‌ छूूत्वा संत़्ीनकर्णो गजपत्तिर अवनित्तल नतशिरा 
प्रणम्य भगवन्तं चन्द्रमसं छमयाम्‌ आस ' भूयश च विजयं 
प्रत्य्‌ एवम्‌ आह । भद्र ' अशेषकार्येष्व्‌ अपि मद्वचनाट्‌ भगवांश 
चन्द्रो ममोपरि प्रसादयितव्यः ' न चाहं पुनर इहागमिष्यामि ' 
इति । एवम्‌ उक्ता यथागतम्‌ एव प्रायात्‌ ॥ 

अतो ऽहं ब्रवीमि । व्यपदेशेन महताम्‌ ' इति । अपि च "5 
शुद्र ऽयं दुरात्मा पापबुद्धिः ' अशक्त च प्रजां पातयितुम्‌ । 
तट्‌ ट्रे तावद्‌ अस्माद्‌ रक्षणम्‌ ' यावट्‌ इत एव भयम्‌ अपि 
संभाव्यते । उक्तं च । + 

द्रम्‌ अथेपति प्राय ' कुतो विवदतां सुखम्‌ । 
उभाव्‌ अपि सयं प्रापो ' माजांराच्‌ छशतिल्तिरी ॥४१॥ 

पक्षिण ऊचुः । कथय ' कथम्‌ एतत्‌ । वायस आह । ९५ 


क छ क क क छ । 


> शक्कर छ क छ ० ॐ चक क क" च 


80०1 711. 1 "^ 07 ¶प् 606 ^) (८ 0918. {88 
¶ 816 14: €६६ 28 1८4६९ ४०४66) 2814066 2116 126, 


॥ कथा 3 ॥ 


अस्ति " कस्मिंश्चिट्‌ वृषे पुरा स्वयम्‌ अहम्‌ अवसम्‌। अय तस्येव 
वृक्षस्याधस्तात्‌ तित्तिरिपक्षी प्रतिवसति । तत आवयोर्‌ एकावा- » 
सगुणाट्‌ अभेद्या प्रीतिर्‌ उत्पन्ना । प्रतिदिनं च कृताहारविहार- 
योः प्रदोषसमये ऽनेकसुभाषितंपुराणादिंकयाप्रचनप्रहेलिकादाना- 
दिभिर्‌ विनोदः कात्र ऽ तिवतेते। अथ कदाचिट्‌ अन्येः पिभिः ® 
सह तित्तिरिः पक्कशणलििप्रायं कम्‌ अपि देशं प्राणयाच्ाथं गतो 
वेत्छरायां न समायातः । तट्‌ अहम्‌ अपि तदियोगदुःखित्तश 
चिन्तितवान्‌ । अहो ' किम्‌ अद्य मम मिं ति्लिरिर्‌ नायात्तः। ° 
तत्‌ किं केनापि पाशेन बद्खो व्यापादितो वा भविष्यति । इति 
मम व्याकुलितमनसो बहूनि दिनानि व्यतिचक्रमुः । अथ कदा- 
चित्‌ तनैव कोटरे ऽस्तसमये शीघ्रगो नाम शशकः प्रविष्टः ! 
मयापि तित्तिरिसमागमनिराशेन न निवारितः । अयान्यस्मिन्‌ 
अहनि स ति्चिरिः शल्ठिभक्षणाट्‌ अतीव पीवरतनुः स्वाश्रयं 
संस्मृत्य तनैव समायातः । युक्तं चेतत्‌ । , 

न तादृग्‌ जायते सोख्यम्‌ ' अपि स्वर्गे शरीरिणाम्‌ । ` 

दार्प्धि ऽपि हि यादृक्‌ स्यात्‌ ' स्वदेशे स्वगृहे पुरे ॥४२॥ ` 
अथासौ कोटरगतं शशकं दृष्टा साक्षेपम्‌ इदम्‌ आह । भो भीः + 
शशक " न त्वया सुन्दरं कृतम्‌ ' यन्‌ मम वसथे प्रविष्टो ऽसि । 
तच्‌ दीघ्रम्‌ अपगम्यताम्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । मूखे ' किं न ते विदि- 
तम्‌ ' यद्‌ उपस्यानमा्रभोग्य एवावासः । ति्लिरिर्‌ अनवीत्‌ । 
यद्य्‌ एवम्‌ ' तहि ' प्रातिवेभ्मिकाः पृ्छ्यन्ताम्‌ । उक्तं॑च 
धमेश स्ते । | 


प्रप्र ^ 07 (02 408 ^ पा) पए 008. 5800 म, 189 
¶"216 111; ८2६ 28 1४६6 एकरा एक्ा्तत € ॐत 02९. 

वापीकूपतडागानां ' गृहस्योपवनस्य च । 

सामन्तप्रत्यया सिद्धिर्‌ ' इत्य्‌ एवं मनुर्‌ अब्रवीत्‌ ॥४३॥ 
तथा च। ४ 

गृह्षेचविवादेषु ' कूपोपवनभूमिषु । 

समुत्पन्ने विवादे तु ' सामन्तात्‌ प्रत्ययो भवेत्‌ ॥४४॥ 
अथ शशकः प्राह । मूखे ' किं त्वया न श्युतं स्मृतिवचः ! ° 
यट्‌ आह । 

प्रत्यस्षं यस्य यद्‌ भुक्तं ' टोचाद्यं टश वत्सरान्‌ । 

प्रमाणं नाक्षराणय्‌ अचर " सारी वा तस्य तट्‌ भवेत्‌ ॥४५॥ » 
तथा ' मूखे ' त्वया न श्रुतं नारदस्य मतम्‌ । | 

मानुषाणां प्रमाणं स्याट्‌ ' भक्तिर्‌ वे दशवार्षिकी । 

विहगानां तिरश्चां च ' यावद्‌ एव समाश्रयः ॥४६॥ 49 
तट्‌ यद्य अपि तवायम्‌ आश्रयः ' तयापि भून्यः सन्‌ मयूाश्ितः। 
इति मदीय एवायम्‌ । ति्िरिः प्राह । भोः ' यदि स्मृतिं प्रमा- 
णीकरोषि ' तट्‌ आगच्छ मया सह । स्मातान्‌ पृच्छावः । तेर "° 
टलं तव मम वा भवतु । तथा ' इति प्रतिपद्य व्यवहारप्रत्ययाथेम्‌ 
अभिप्रस्थितो । अहम्‌ अपि कोतुकात्‌ तयोर्‌ एव पृष्ठतो तप्र: ' 
पश्याम्य्‌ अच किं भविष्यति ' इति । अथ नातिदूरं गत्वा शशकस्‌ 15 
तित्चिरिम्‌ अपृच्छत्‌ । भद्र " को नामावयोर्‌ व्यवहारं दरष्यति । 
सो ऽजवीत्‌ । नन्व्‌ अयं प्रनलमास्तोडूतंसलिल चल तरद्गभ द्गस 
घटरजनित॑कठकत्छारवाया भगवत्या गङ्गायाः पुलिने गतस्‌ 
तपोनियमव्रतयोगसंस्थितः सखजातानुकम्यो द्धिकर्णो नाम 
माजीरः ' इति । अथ दुष्टा च तं भयप्रणोदितान्तरात्मा शशकं 
पुनर अब्रवीत्‌ । अलम्‌ अनेन सदरेण । उक्तं च। २५ 


50००४ 777. (ए ^ 07 ¶प४ 408 ^ प? त 0 णा; 190 
¶ 216 114: € 2६ 25 1००६6 ०८९६०660 ए 21086 200 11816. 

न हि विश्वसनीयं स्यात्‌ ' तपण्ड्मस्थिते ऽ धमे । 

दृश्यन्ते चेव तीर्थेषु " *गत्कवातांस्‌ तपस्विनः ॥४७॥ 
तदुक्तं श्चुता सुखोपायवृ्तिप्रसाधनच्छद्यरूपो दधिकणेस्‌ तयोर्‌ » 
विश्वासनाथे सुतराम्‌ आदित्याभिमुखो भूत्वा हिपादावस्थित् 
ऊ्वेवाहुर निमीलिितनयनः भुभवुद्धा तयोर्‌ वश्वनाथेम्‌ एवं 
धमेदेशनाम्‌ अकरोत्‌ । अहो ' असारो ऽय॑ संसारः । सणभङ्गुराः ९ 
प्राणाः । स्वप्रसद््णः प्रियसमागमः । इन्द्रनालवत्‌ कुटच्रपरि- ` 
पहः । तट्‌ धम मुक्कान्या गतिर नास्ति । उक्तं च। 


यस्य धमेविहीनानि ' दिनान्य्‌ आयान्ति यान्तिच। ` ५ 
स लोहकारभस्त्रेव ' सन्‌ अपि न जीवति ॥४४॥ 

तथा च। 
ना्धादयति कौपीनं " न दंशमशकापहम्‌ । ` 


भुनः पुच्छम्‌ इवान धं ' पारिहत्यं धमेवजिंतम्‌ ॥४९॥ 
अनु च। | 
पुलाका इव धान्येषु ' कूतिका इव पक्िषु। `. 25 
मश्का इव मर्ष ' येषां धर्मो न कारणम्‌ ॥९०॥ 
रेयः पुष्पफल्ठे वृक्षाट्‌ ' दधः च्रेयो धुतं सतम्‌ । | 
यस्‌ तेतं च पिश्याकाच्‌ ' देयो धमेश च मानुषात्‌ ॥९१॥ ;5 
स्थेयं सर्वेषु कृत्येषु ' शंसन्ति नयपरिडताः 
बड्न्तराययुक्तस्य , धमेस्य त्वरिता गतिः ॥९२॥ 
संसेपात्‌ कथ्यते धमो ' जनाः किं विस्तरेण वः । ` ४ 
परोपकारः पुण्याय ' पापाय परपीडनम्‌ ॥९३॥ 
अथ तस्य तां धमेदेशनां शरुता शशक आह । भोस्‌ तित्तिरे। एष . 
नदीतीरे तपस्वी धमेवादी तिष्ठति । तट्‌ एनं पृच्छावः । ति्लिरिः 


१६८५८ ^ 07 1८ 08 ^ पा) वप 0015. 800६ गा. 191 
¶ 216 4: ८2४ 28 1००६८ १४ €€&0 एव 1086€ 210 1276. 


प्राह । ननु स्वभा वशचुभूतो ऽयम्‌ अस्माकम्‌ । तट्‌ दूरे स्थितो 
पृच्छावः । ततत उभाव्‌ अपि तं प्रम्‌ आख्यो । भोस्‌ तपस्विन्‌ 
{ धमेदेशक › आवयोर्‌ विवादो वतेते । तट्‌ धमेशस््ेणावयोर्‌ 
निशेयं देहि । यो टि मिथ्यावादी भवति ' स ते भ्यः इति । 
सो ऽब्रवीत्‌ । भदौ ' मा मेवं वदतम्‌ । निविखो ऽहं नरकमागं- 
प्रदशेयितुर्‌ हिसा कमेणः । उक्तं च । ¢ 
अहिसापू वेको धमो ' यस्मात्‌ सवेहिते रतः । 
यूकामत्कु णद्शदींस्‌ ' तस्मात्‌ तान्‌ अपि रक्षयेत्‌ ॥९४॥ 
हिंसकान्य्‌ अपि भूतानि ' यो हिनस्ति स निधृंणः । “ 
स याति नरकं घोरं ' किं पुनर यः शुभानि च ॥९५॥ 
एते ऽपि ' ये यज्ञकमेणि पमन्‌ व्यापादयन्ति ! ते ऽपि मुग्धाः 
परमाये श्रुतेर न जानन्ति । यच्‌ च केनचिट्‌ उक्तम्‌ ' अजेर 
यष्टव्यम्‌ ' इति › तचाजा वीहयः सप्रवाषिंका उच्यन्ते ' न जायन्ते ' 
इत्य्‌ अन्वथेवत्छात्‌ । उक्तं च । . 
वृक्षांश छित्वा पण्‌न्‌ हत्वा ' कृत्वा रुधिरकदेमम्‌ । 15 
यद्य्‌ एवं गम्यते स्वर्ग ' नरके केन गम्यते ॥९६॥ 
तन्‌ नाहं भछयिष्यामि । किं त््‌ अहं वृद्धो दूराद्‌ युवयोर्‌ भाषा- 
न्तरं न सम्यक्‌ श्पृणोमि । तत्‌ कथं जयपराजयं करिघ्यामि । एवं 
ज्ञात्वा *समीपवतिनो भूता मम न्यायं निवेदयतम्‌ ' येन विज्ञा- 
तविवाद्परमाथं +*वचो वदतो मे परतोकवाधा न भवति । 
उक्त च| 21 
मानाट्‌ वा यदि वा त्कोभात्‌ ' क्रोधाद्‌ वा यदिवा भयात्‌। 
यो न्यायम्‌ अन्यया व्रते ' स याति नरकं नरः ॥९७॥ 


500४ 7171. (प "^ 8 0 वप 08 ^ परा) (४ 0 गा. 192 
¶ 216 14: €&६ 825 102 € ८६6१ ४8106 20 1876, 816 1: 81168 &16८४ 8 ४10. 


तथा च । 

पञ्च पश्वनृते हन्ति ' दश हन्ति गवानृते । 

शतं कन्यानृते हन्ति ' सहखं पुरुषानृते ॥९४॥ ॐ 
तस्माट्‌ विश्रब्धो भूत्वा मम कणोपान्तिके स्फुटम्‌ आवेटयतम्‌ । 
किं बहुना ' तथा तेन क्षुद्रेण तौ विश्वासितौ ' यथा तदन्तिकम्‌ 
उपगतौ । ततश च समकात्छम्‌ एकः पदेनाकान्तः ' हितीयो ° ` 
टष्टाककचेन । एवं हाव्‌ अपि गतप्राणो भसित ॥ 

अतो ऽहं ब्रवीमि । क्षुद्रम्‌ अथेपतिं प्राय ' इत्यादि । तट्‌ 

` भवन्तो ऽप्य्‌ एनं दिवान्धं छुद्रम्‌ अधिपतिं कृत्वा * राच्यन्धाः सन्तः ° 
शश्ति्तिरिमार्गेण यास्यन्ति । इति विचाये यट्‌ उचितम्‌ ' तट्‌ 
विधीयताम्‌ । अथ तस्य वचनम्‌ आकण्ये ' साध्व्‌ अनेनाभिहितम्‌' 
इत्य्‌ उक्का ' भूयो ऽपि नुपार्थे समेत्यान्योन्ये मन्रयिषयामहे " इति 
ब्रुवाणाः सवंपक्षिणो यथागतं जग्मुः । केवलं भदरासनोपविष्टो 
ऽ भिषेकाभिसुखो दिवान्धः कृकालिकया सहास्ते ' आह च । कः 
को ऽ, भोः। किम्‌ अद्याण्‌ अभिषेको न क्रियते । इति श्युता ८ 
कृकालिकयाभिहितम्‌ । भद्र ' कृतस्‌ ते ऽभिषेकविघ्रोपायो वाय- 
सेन ' गताश् च ते विहगा यथेष्टं िष्षु । केवत्म्‌ अयम्‌ एव 
वायस एकाकी केनापि हेतुना तिष्ठति । तत्‌ त्वरितम्‌ उ्चिष्ठ । 25 
येन त्वां स्वाश्रयं प्रापयामि । तच्‌ छत्रा सविषादम्‌ उत्ूकः 
प्राह । भो दुष्टात्मन्‌ ' किं मया ते ऽ पकृतम्‌ " येन राज्याभिषेक 
विध्धितस्‌ त्वया । तट्‌ अद्यप्रभृत्य्‌ आवयोर्‌ वैरम्‌ । उक्तं च । 

रोहति सायकविद्धं ' वनं परणुना हतम्‌ । 

वाचा "दुरुक्तं बीभत्सं ' न प्ररोहति वाक्कृतम्‌ ॥९९॥ 


(प्र ^ 07 पए 06 ^ पा) प 018. 500४ क, 193 
¶ 816 3: 81708 616८४ 2 ए. एवा16.801. 


अथ कृकाए्टिकया सह तस्मिन्‌ स्वाश्रयं गते वायसो ऽप्य्‌ अचि- 
न्तयत्‌ । अहो ' अकारणवेरम्‌ आसादितम्‌ ' यद्‌ इदं व्याहृतं 
मया । उक्तं च । ॥ 

उदेशकात्रक्लम्‌ अनायतिक्षमं 

यद्‌ अप्रियं त्ाधवकारि चात्मनः । 

यो भाषते कारणवजितं वचो 6 

न तट्‌ वचः स्याट्‌ विषम्‌ एव तट्‌ भवेत्‌ ॥१००॥ णः 
तथा । 

बल्लोपपन्रो ऽपि हि बुद्धिमान्‌ नरः * 

परं नयेन्‌ न स्वयम्‌ एव वेरिताम्‌ । 

भिषग्‌ ममास्तीति विचिन्य भक्षयेद्‌ 

अकारणे को हि विचक्षणो विषम्‌ ॥१०१॥ भ, 9 

परपरिवाट्‌ः परिषदि ' न कथंचित्‌ पणिडतेन कतेव्यः । 

सत्यम्‌ अपि तन्‌ न वाच्यं ' यट्‌ उक्तम्‌ असुखावहं भवति ॥१०२॥ 
कि च । द्राः 15 

सुहद्धिर आघरेर असकृट्‌ विचारितं 

स्वयं च बुद्धा प्रविचारिताश्रयम्‌ । 

करोति काये सत्तु यः स वुद्धिमान्‌ ५: 

स ण्व लृष्म्या यश्सां च भाजनम्‌ ॥१०३॥ र 
एवं विचिन्त्य काको ऽपि ततः स्थानात्‌ प्रायात्‌ ॥ 


तत्‌ । वत्स । अस्माकम्‌ इत्थं कौशिकैः सहान्वयवैरम्‌ । इति । मेघवणं आह । तात । 21 
एवं गते किं छत्यम्‌ अस्माभिः । स प्राह । एवं गते ऽपि बषाङ्खणाद्‌ अपरः स्थूलो ऽभिप्रायो 
$स्ति । तम्‌ अङ्गोरत्य खयम्‌ एवाहं तदिजयाय यास्यामि । वञ्चयित्वा तान्‌ रिपून्‌ 


वध्यान्‌ करिष्यामि । चक्तं च। 2५ 
^ ९ 


500 117. (प्र ५4 07 वप्त 608 ^ वप्र 018. 194 


7 78116-807 $, ¶216 ण: एदा, &०२६, 2110 (0166 70८६8. 


बङ्वबु्चिसमायुक्ताः ' सुविन्नाना बलोत्कटाः । 
शक्ता वञ्चयितुं भूतांश । क्ागकत्राह्मणं यथा ॥ १०४॥ 
मेघवणं आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । ४ 


॥ कथया ४ ॥ 


कस्मिंधिट्‌ अधिष्ठाने मिच्रश्मो नाम ब्राह्मणः कृताप्रिहोचपरि- 
रमः प्रतिवसति स्म । तेन कदाचिन्‌ माघमासे प्रवाति सोम्या- ° 
निले मेघा्छादितगगने मन्दं मन्दं वेति पजेन्ये पशुयाचना्ं 
किंचिद्रामान्तरं गत्वा कश्चिट्‌ यजमानो याचितः । भो यजमान 
आगामिन्याम्‌ अमावास्यायाम्‌ अहं यष्यामि यज्ञम्‌ । तट्‌ देहि » 
पुम्‌ एकम्‌ । अथ तेनापि तस्य शस््रोक्तः पी वरः पशुर्‌ द्ः। 
तम्‌ अपि समथेम्‌ इतश चेतश च गच्छन्तं विज्ञाय स्कन्धे कृत्वा 
सत्वरं स्वपुराभिसुखः प्रतस्थे । अथ तस्य मार्गेण गच्छतस्‌ चयो 
धूर्ताः सुतक्षामकणदाः संमुखा बभूवुः । तेभ च तं पीवरपशुं 
स्कन्धारूढम्‌ अवलोक्य भियो ऽभिहितम्‌ । अहो ' अस्य पशोर्‌ 
भकछषणाट्‌ अद्यदिनजो हिमपातो व्यथेतां नीयते । तद्‌ एनं 
वञ्चयिवा पुम्‌ आदाय शीतत्राणे कुमः । अथ तेषाम्‌ एकतमो 
वेषप्रावतेनं विधाय संमुखो भूत्वापमार्गेण तम्‌ आहिताग्रिम्‌ 
ऊचे । भो भो अग्रिहोचिन्‌ ' किम्‌ एवं जनविरडं हास्यकरम्‌ + 
अनुष्ठीयते ' यट्‌ एष सारमेयो ऽ पविः +स्कन्धाधिरूढो नीयते । 
उक्तं च ' यतः 

ानकुकुटचार्डात्काः ' समस्पशैः प्रकीतिताः । + 

रासभोष्टाविरषेण ' तस्मात्‌ तान्‌ न तु संस्पृशेत्‌ ॥१०५॥ 
ततश च तेन कोपाभिभूतेनाभिहितम्‌ । किम्‌ अन्धो भवान्‌ " 
यत्‌ परशोः सारमेयलं प्रतिपादयसि । सो ऽब्रवीत्‌ । बद्यन्‌ । ५ 


गप्र ^ 07 प 08 ^ प्रा) प्र 018. 2800 या. 195 
ग्‌ा ३४६ 8178 01118.9, ६०३६, 87 66 7००९३. ए क्16-801४, 
कोपस्‌ त्वया न कायैः । यथेच्छ गम्यताम्‌ ' इति । अथ यावत्‌ 
विंचिट्‌ अध्वान्तरं गच्छति ' तावद्‌ इहितीयो धूतैः संमुखम्‌ 
अभ्येत्यो वाच । अहो कष्ट कष्टम्‌ । भगवन्‌ ' यद्य्‌ अपि वल्लभो 3 
ऽयं ते मृत्तवत्सः ' तट्‌ अपि स्कन्धम्‌ आरोपयितुं न युक्तः । उक्तं 
च ' यतः। 

तियेज्च पुरुषं वापि ' यो मृतं संस्ुशेत्‌ कुधीः । 6 

पञ्चगव्येन शुद्धिः स्यात्‌ ' तस्य चान्द्रायणेन च ॥ १०६॥ 
अथासौ सकोपम्‌ आह । अहो ' किम्‌ अन्धो भवान्‌ ' यत्‌ पमं 
वत्सं वदसि । सो ऽब्रवीत्‌ । भगवन्‌ ' मा कोपं कुर । अज्ञानान्‌ ° 
मयाभिहितम्‌ । तत्‌ त्वम्‌ आत्मरूचितं समाचर ' इति । अथ 
यावत्‌ स्तोकं वनान्तरं गच्छति ' तावत्‌ तृतीयो धूर्तो वेषपरि वति 
कृत्वा संमुखम्‌ उपेत्योवाच । भोः ' अयुक्तम्‌ एतत्‌ ' यत्‌ त्वं रासभं “ 
स्कन्धारूढं नयसि । उक्तं च । 

यः स्पृशेद्‌ रासभं मत्येस्‌ ' त्र्‌ अज्ञानाज्‌ ज्ञानतो ऽपि वा। 

सचेत्ठं लानम्‌ उद्दिष्टं " तस्य पापस्य शन्तये ॥१०७॥ 15 
तत्‌ त्यज्यताम्‌ अयम्‌ ' यावद्‌ अन्यः कश्चिन्‌ न पश्यति । अथासौ 
तं पणुरूपं रासं मत्वा भूमो प्रक्षिप्य भयाट्‌ गृहम्‌ उदिश्य 
प्रपलायितः । ते ऽपि च चयो ऽपि भित्वा तं पशुम्‌ आदाय" 
यथाचिन्तितं कृतवन्तः ॥ 


अतोऽहं त्रवीमि । बहनवुद्धिसमायुक्ताः इति । अथवा साष्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 


अभिनवसेवकविनयैः ' प्राघुणकोक्तेर विलासिनी रुदितैः । 21 

धूर्तजनवचननिकरेर्‌ । इह कञ्चिद्‌ अवञ्चितो नास्ति ॥ १०८॥ ५, 
किं च। दुबेलैर अपि बङ्भिः सह विरोधो न कार्यः । उक्तं च। 

बहवो न विरोदव्या ' दुजेयो हि महाजनः । 24 


स्फुरन्तम्‌ अपि नागेन्द्रं ' भक्षयन्ति पिपोलिकाः 1 १०९॥ 
मेघवणे आह । कथम्‌ एतत्‌ । खिरजीवी कथयति । 


5001 777. ¶प् ए "4 ६ 07 वप्र 008 ^ पा) वप्त 0 "8. 196 


¶ 216 9; ऽ€6€६ 21 2108. एद116 8६0, 


॥ कथया ५॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिट्‌ वर्मीके महाकायः कृष्णसर्पो ऽतिदपों नाम । 
स कदाचिद्‌ बिल्ानुसारमागेम्‌ उत्सुज्यान्येन ल धुद्धारेण निष्क- » 
मितुम्‌ आरब्धः । निष्करामतश च तस्य महाकायत्वाट्‌ टेववश्णच्‌ ` 
च लधुविवरतया शरीरे ब्रणः समुत्पन्नः । अथ व्रण्शणोणिततग- 
न्धानुसारिणीभिः पिपीलिकाभिः स्वेतो व्याप्रो व्याकुत्दी कृतश ऽ 
च । कति व्यापाट्यति " क्ति वा ताडयति । अतिप्रभूतत्वाट्‌ 
विस्तारितवहूव्रणाभिः सतस वाङ्गो ऽ तिदपंः पञ्चत्वम्‌ उपगतः ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि। बहवो न विरोडव्याः ' इति । अपरं च । देव । अस्ति किंचिन्‌ 9 
मे वक्तव्यम्‌ । तच्‌ च]वधायं विचायं चानुष्ठेयम्‌ । मेघवशं आह । तात । ब्रूहि ' यत्‌ ते 
हदि स्थितम्‌ । स्थिर जीव्य्‌ आह । वत्स । आकर्णय । तर्हिं , सामादीन्‌ अतिक्रम्य यः 
पञ्चमोपायो मया निरूपितः । यथा । मां विपच्तीकृत्यातिजिषटुरवचनेर्‌ निभ॑त्छं विप- 12 
चप्रयुक्त^प्रणिधीनां प्रत्ययार्थम्‌ आहतरुधिरेर आलिष्या्यैव न्यय्ोधस्याधस्तात्‌ प्रकिप्य- 
*युमूकपर्वते गम्यताम्‌ । तच्रैव च सपरिवारेण भवता स्थातव्यम्‌ , यावद्‌ अहं समस्तान्‌ 
रिपून्‌ सुप्रणीतिन विधिना विश्वास्य ज्ञाततहगैमध्यो दिवसान्धान्‌ व्यापादयामि । अनु- 15 
मानतो $पि ज्ञातं मयेदम्‌ ' यत्‌ तदीयदु्गेम्‌ अपसाररहितं केवलं भविष्यति । उक्तं च । 

अपसारसमायुक्तं ' नयन्नैर्‌ दुर्गम्‌ उच्यते । 

अपसारपरित्यक्तं ' दुर्ेव्याजेन बन्धनम्‌ ॥ ११०॥ 18 
नच त्वया मां प्रति कृपा कायां । उक्तं च। 

अपि प्राणसमान्‌ इष्टान्‌ ' पालितांल्‌ लालितान्‌ अपि। 

भृत्यान्‌ युद्धे समुत्यत्ने । पश्येच्‌ कष्कम्‌ दवेन्धनम्‌ ॥ १११५ 21 
तत्‌ त्वया विषये नाहं निषेधनीयः ' यतः । 

रक्तेट्‌ भृत्यान्‌ यथा प्राणान्‌ ' खकाचम्‌ इव पोषयेत्‌ । 

सहैकदि वसस्या्थे ' यच खाद्‌ रिपुसंगमः ॥ ११२॥ 24 
इत्य उत्का तेन सह गुष्ककलहं कर्तुम्‌ आरब्धः । अथान्ये तस्य भूत्याः स्थिर जीविनम्‌ 
उच्छरङ्कलतया राजानं प्रति जल्यन्तम्‌ आलोक्य तद्वधाय समुद्यता मेघवर्णेनाभिहिताः। 
अहो । अपसपेत यूयम्‌ । अहम्‌ एवास्य शुपच्चपातिनो दुरात्मनः खयं निग्रहं करि- 27 


१ ^ 07 वप ८08 ^) प्प 0.8. 500 ग. 197 


ए7216-8॥01 ए : ¶प् दा 0 €70 5 210 ०18, 


ष्यामि । इत्य्‌ अभिधाय तस्योपरि समार्य लघुमिश्‌ चचचुप्रहरिः प्रह्यूहतरुधिरा- 
लोडितं छत्वा तदुपदिष्टम्‌ छष्यमूकपर्वेतं सपरिवारो जगाम । 
एतसित्न्‌ अन्तरे छकालिकया *+शतुप्रणिधिमूतया तत्‌ सर्व मेघवणेस्यामात्यव्यसनम्‌ 3 
उलूकाधिपतेर गत्वा निवेदितम्‌ । अथोलूकाधिपो ऽपि तद्‌ आकणयसखलमनवेलायां 
सपरिवारो वायसवधार्थं छतप्रयाणकः प्रोवाच । अहो । त्रयैतां वर्यताम्‌ । भीतः शुः 
पलायनपरः पुण्यैर लभ्यते । उक्तं च । 6 
चोः पलायने छिद्रम्‌ । एकम्‌ अन्यच संश्रयम्‌ । 
कुर्वाणो जायते वश्यो व्यग्रत्वे राजसेविनाम्‌ ॥ ११३॥ 
एवं ब्रुवाणाः समन्तान्‌ न्यग्रोधपादपाभिमुखं प्रसिता । यावन्‌ न कश्चिद्‌ वायसो दृश्छते । 9 
तावद्‌ वृच्षशाखाम्‌ अधिरुह्य *हृष्टमना वन्दिभिः स्तूयमानो ऽरिमदेनः प्रोवाच । अहो । 
ज्ञायते तेषां मा्गक्रमणम्‌ । कतमेन मार्गेण ते नष्टा; । यावट्‌ दुर्गं नाश्रयन्ति ' तावद्‌ 
एव पृष्ठतो गत्वा व्यापादयामि । 12 
अधैतस्खिन्‌ प्रस्तावे स्थिरजीवी चिन्तयाम्‌ आस । यद्य्‌ एते शवो ऽनुलब्धासखमदुत्तान्ता 
यथागतम्‌ एव यान्ति । ततो मया न किंचित्‌ छतं भवति । उक्तं च । 
अनारममो हि कार्याणां । प्रथमं बुद्धिलक्षणम्‌ । 18 
प्रारब्धस्यान्तगमनं । द्वितीयं बुद्धिलच्षणम्‌ ॥ ११४॥ 
तट्‌ वरम्‌ अनारम्भः । न चूारग्मविघातः। तद्‌ अहम्‌ एताञ्‌ शब्दं संश्राब्यात्मानं 
दर्शयामि । इति विचायं मन्दं मन्दं शब्दम्‌ अकरोत्‌ । तं च रुला त उल्‌कास्‌ 15 
तद्रघार्थम्‌ अभ्युयताः । खिरजीविनुभिहितम्‌ । अहो । अहं मेघवणेमन्ती स्थिरजीवी 
नाम मेघवैनवे दृशीम्‌ अवस्थां नीतः । तन्‌ निवेद्यताम्‌ आत्मस्वामिनः । तेन सह ब्‌ 
वक्तव्यम्‌ अस्ति । अथ तैर अविदित उलूकराजः सविख्यो बह्व्रणकिणाङ्कितस्य 21 
समीपं गत्वा प्रोवाच । भोः ' कथम्‌ एतां दशां गतो ऽसि ' तत्‌ कथ्यताम्‌ । खिरजीवी 
प्राह । देव ' श्रूयताम्‌ । अतीतदिवसे युष्माभिर्‌ व्यापादितान्‌ अनेकवायसान्‌ दृष्टा 
कोपशोकाकृुलमतिः स दुरात्मा मेघवणों युष्महरग प्रति चलितः । ततो मयाभिहितम्‌ । २५ 
न युक्तं भवतस्‌ तं प्रति गन्तुम्‌ ' यतो बलवन्त एते । ही नबलाश्‌ च वयम्‌ । उक्तं च । 
बलीयसा हीनबलो विरोधं 
न भूतिकामो मनसापि कुयात्‌ । 27 
न वध्यते ऽ त्यन्तबलो हि यसाट्‌ 
एकान्तनाशो ऽसि पतङ्कवुत्तेः ॥ ११५॥ पा४ 
तत्‌ तस्योपप्रदानेन संधिर्‌ एव युक्तः । तच्‌ हूत्वा दुजजंनजनप्रकोपितिन त्वत्पक्षपातिनं 0 
माम्‌ आशङ्कमनेनेयं दशा मे विहिता । तत्‌ तव पादाः सांप्रतं शरणं मे। किं बङना। 
यावद्‌ अहं प्रचलितुं शक्तः ' तावत्‌ त्वां तस्यावासे नीत्वा सर्ववायसक्षयं विधास्यामि । 
इति श्रतारिमर्दनः पितुपितामहक्रमागतमन्तिभिः सार्धं मन्त्रयां चक्रे । तस्य च पञ्च 5 


50० ग. ग्ट ^ 07 पप्र 008 ^ प्रा) वप्त 08. 198 


ए781116-51019. ¶216 91: ©016-&4910£ 5€0€1६. 


मन्त्रिणः ' तद्‌ यथा । रक्ताषः ' क्रूराक्षः ' दीप्ताः \ वक्रनासः ' प्राकारकरणश्‌ 
च । इति। 
तच्रादौ रक्तां पृष्टवान्‌ । मद्र ' किम्‌ एवं गते कायम्‌ । सो ऽत्रवीत्‌ । देव ! किम्‌ 3 

अचर चिन्त्यते । अविचारम्‌ अयं हन्तव्यः । यतः । 

हीनः शुर निहन्तव्यो ' यावन्‌ न बलवान्‌ भवेत्‌ । 

संजातपौरुषबलः ' पञ्चाठ्‌ भवति दुजंयः ॥ ११६॥ 6 
किं च ' स्वयम्‌ उपगता ओस्‌ त्यज्यमाना शपति । इति लोकप्रवादः । उक्तं च । 

कालो हि सल्‌ अभ्येति ' यन्‌ नरं कालकाङ्किणम्‌ । 


दुलभः स पुनस्‌ तेन । कालः कमं *चिकीर्षता ॥ ११७॥ 9 | 
श्यते च , यथा । 

चितिकां दीपितां पश्च । स्फुटां भयां ममेव च। 

भित्रशिष्टातुया प्रीतिर्‌ ' न सा सेहेन वर्धते ॥११८॥ 12 


अरिमदंन आह । कथम्‌ एतत्‌ । रक्ताः कथयति । 


॥ क्था & ॥ 


अस्ति कस्मिश्चिट्‌ अधिष्ठाने को ऽपि ब्राह्मणः । तस्य च कृषिं 
कुवैतः सदेव निष्फले एव कात्ो ऽतिवर्तते । अथेकस्मिन्‌ 
दिवसे ब्राह्मण उष्णएकात्ावसाने घमातेः स्वसेचमध्ये वृक्षच्छा- 
यायां प्रसुप्रः । अनतिदूरे वल्मीकोपरि प्रसारित्तवृहत्फटाटोपं 
भीषणं भुजंगमं दृष्टा चिन्तयाम्‌ आस । नूनम्‌ एषा सेचंदेवता 
मया कदाचिद्‌ अपि न पूजिता । तेनेदं मे कृषिकमे विफली- 
भवति। तट्‌ अस्याः पूजाम्‌ अहं करिष्यामि । इत्य्‌ अवधाय कुतो 
ऽपि छीर याचित्वा शरावे निक्षिप्य वल्मीकान्तिकम्‌ उपगम्यो- 
वाच । भोः सेचपाल ' मयेत्तावन्तं कालं न ज्ञातम्‌ ' यत्‌ त्वम्‌ 
अच वससि । तेन पूजा न कृता । तत्‌ सांप्रतं छसमस्व ' इति । 
ण्वम्‌ उक्ता दुग्धं च निवेद्य गृहाभिमुखं प्रायात्‌ । अथ प्रातर्‌ 
यावद्‌ आगत्य पश्यति ' तावद्‌ दीनारम्‌ एकं शरावे दृष्टवान्‌ । 


(प ^ 07 प (08 ^ प्र वप्त 0013. 800 पा. 199 
¶ € + : 6७०10.£1010& 8€7€०४६. 816 ०५: ©०1त हा णण 91705. 
एवं प्रतिदिनम्‌ एकाकी समागत्य तस्मे सीरं ददाति ' एकेक- 
दीनार च गृहात । अथेकस्मिन्‌ दिवसे वल्मीके छषीरान यनाय 
पुचं निरूपण ब्राह्यणो मामं जगाम । पुचो ऽपि तच सीर नीत्वा $ 
संस्थाण च पुनर्‌ गृहं समायातः । दिनान्तरे तत्र गता दीनाम्‌ 
एकं च दषा चिन्तितवान्‌ । नूनं दीनार पूर्णो ऽयं वर्मीकः। तट्‌ 
एनं हत्वा सवे *महीष्यामि । एवं संप्रधायान्यद्युः सीरं ददता ° 
ब्राद्यणएपुचेण सपो त्गुडेन शिरसि ताडितः । कथम्‌ अपि देव- 
वशाट्‌ अमुक्तजीव एव रोषात्‌ तम्‌ एव तीषणायदश्नेस्‌ तणा- 
द्श्त्‌ , यथा सद्यः पञ्चत्वम्‌ उपगतः । स्वजनेश च नातिदूरे ° 
सेचस्य काष्ठसं चयेः संस्कृतः । अथ हिततीयदिने तस्य पिता 
समायातः । स्वजनेभ्यः सुतविनाशकारणं श्रुत्वा तथेव समथित- 
वान्‌ । अब्रवीच्‌ च । 19 

भूतान्‌ यो नानुगृह्धाति ' गृह्दाति शरणागतम्‌ । 

भूताथोस्‌ तस्य नश्यन्ति ' हंसाः पद्मवने यथा ॥११९॥ 
मानुषेर्‌ उक्तम्‌ । कथम्‌ एतत्‌ । ब्राह्मणः कथयति । 15 


॥ कया अ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिट्‌ अधिष्ठाने राजा चिचरथो नाम । तस्य योधैः 
सुर्यमाणं पद्मसरो नाम सरस्‌ तिष्ठति । तच च प्रभूता जान्बू- 
नदमया हंसास्‌ तिष्टन्ति । षरमासे षण्मासे पिच्छम्‌ एकेकं 
त्यजन्ति । अथ तच सरसि सौवर्णो बृहत्पछ्षी समायातः ' तेण 
चोक्तः । अस्माकं मध्ये त्रया न वास्तव्यम्‌ ' येन कारणेनास्माभिः " 
षर्मासान्तपिदछे कदान^दात्या गृहीतम्‌ एतत्‌ सरः । एवं च ' 


500 11. वप्त ^ 0 पए 08 ^) प 008. 200 
416 श: 6०14. णणषठ इल्ला. ए76-81079. ¶ 416 भच : 3ना६58<19619& १०४९. 
किं बहूना ' परस्पर धम्‌ उत्मन्रम्‌ । स च राज्ञः शरणं गतो 
ऽब्रवीत्‌ । टेव ' रखे पश्िण एवं वदन्ति ' यट्‌ अस्माकं राजा 
किं करिष्यति । न क्स्याप्य्‌ आवासं दद्यः । मया चोक्तम्‌ । न° 
प्नोभनं युष्माभिर्‌ अभिहितम्‌ । अहं गत्वा राज्ञे निवेदयिष्यामि । 
एवं स्थिते देवः प्रमाणम्‌ । ततो राजा भृत्यान्‌ अब्रवीत्‌ । भोः ' 
गच्छत । स्वान्‌ पश्िणो गतासून्‌ कृत्वा शीघ्रम्‌ आनयत । राजञा- ° 
देशनन्तरम्‌ एव प्रचेत्टृस्‌ ते । अथ त्गुडह्तान्‌ राजपुरुषान्‌ ` 
दृष्टा तनरकेन परिणा वृद्धनोक्तम्‌ । भोः स्वजनाः ' न शेभनम्‌ 
आपतितम्‌ । ततः सर्वैर्‌ एकमतीभूय शीघ्रम्‌ उत्पतिततव्यम्‌ । तेष ° 
च तथानुष्ितम्‌ ॥ 
अतो ऽहं ्रवीमि। भूतान्‌ यो नानुगृह्ाति । इत्य्‌ उक्तवा पुनर्‌ 
अपि ब्राद्यणः प्रत्यूषे छीर गृहीत्वा तच गत्वा सपेप्रत्यायना्थं 
निवेदितवान्‌ " यन्‌ मदीयपु्ः स्ववुद्धा पञ्चत्वम्‌ उपगतः । 
ततो भुजंगो ऽब्रवीत्‌ । चितिकां दीपितां पश्य " इत्यादि ॥ 


तट्‌ अस्मिन्‌ हति ऽयन्ना्‌ एव राज्यम्‌ अकण्टकं भवतो भवति । 15 
तच्चैतद्‌ वचनं श्रुता क्रूरां पम्रच्छ । भद्र । लवं तु किं मन्यसे। सो ऽ्रवीत्‌ । देव । 
निदेयम्‌ एतत्‌ ' यद्‌ अनेनभिहितम्‌ । यत्कारणम्‌ । शरणागतो न वध्यते । सुष् खल्व 
इदम्‌ आख्यानम्‌ । 18 
श्रूयते हि कपोतिन । शतुः शरणम्‌ आगतः । 
पूजितश च यथान्यायं खशा च मांसैर्‌ निमन्त्रितः ॥ १२०॥ 
अरिमदेनो ऽब्रवीत्‌ । कथम्‌ एतत्‌ । क्रूराक्षः कथयति । ~ 


॥ कथा ४॥ 


कश्ित्‌ +सुद्रसमाचारः ' प्राणिनां कालसंमितः। 
विचचार महारण्ये ' घोरः शकुनित्तुब्धकः ॥१२१॥ २५ 


१८४ ^ 2 0 वप 08 ^ प्राण प 08. 53001 1. 201 
216 911: 5€1-386710610& ००४९. 


नेव कश्चित्‌ सुहृत्‌ तस्य ' न संबन्धी न बान्धवः । 
स नैः सर्वेः परित्यक्तम्‌ ' तेन रौद्रेण कमणा ॥१२२॥ 

अथवा । ४ 
ये नृश्सा दुरात्मानः ' प्राणिनां प्राणनाशकाः । 
उद्वेजनीया भूतानां ' व्याला इव भवन्ति ते ॥१२३॥ 
स पज्ञरकम्‌ आदाय ' पाशं च गुड तथा । ¢ 
नित्यम्‌ एव वनं गच्छेत्‌  सवेप्राणिविहिसकः ॥१२४॥ 
अथ कृष्णा दिशः सवां ' वनस्थस्याभवन्‌ घनेः । 
वातवृषटि् च महती ' छषयकाल्ठे इवाभवत्‌ ॥१२५॥ 9 
ततः संचस्तहटयः ' कम्पमानो मुहुर्‌ सुहुः । 
अन्वेषयन्‌ परिब्राणम्‌ ' आससाट्‌ वनस्पतिम्‌ ॥१२६॥ 
यावद्‌ आस्ते सुहूर्तेकं ' वियट्‌ विमलतारकम्‌ । ५ 
सतु प्रायावदट्‌ बुद्धा ' देवता शरणं मम ॥१२७॥ 
अथ तस्य तरोः स्कन्धे ' कपोतः सुषिरोषितः । 
भायाम्‌ अपश्यन्‌ सुचिराद्‌ ' विललाप सुदुःखितः ॥१२४॥ 
वातवर्षो महान्‌ आसीन्‌ ' न चागच्छति मे प्रिया । ` 
तया विरहितं ह्य्‌ एतच्‌ ' इून्यम्‌ अद्य गृहं मम ॥१२९॥ 
न गृहं गृहम्‌ इत्य्‌ आहुर्‌ ' गृहिणी गृहम्‌ उच्यते । ७ 
गृहं च गृहिणीहीनम्‌ ' अरण्यसद्‌शं मम्‌ ॥१३०॥ 
पतिव्रता पतिप्राणा ' पत्युः प्रियहिते रता । 
यस्य स्याट्‌ इदृशी भायां ' धन्यः स पुरूषो भुवि ॥१३१॥ 
पञ्ञरस्या ततः च्युता ' भतुर्‌ दुःखान्तं वचः । 
कपोतिका सुसंतुष्टा ' वाक्यं चेदम्‌ अथाह च ॥१३२॥ 


ष 


५1 
नै 


500४ 1. (प "+^ 07 वप 608 ^ पा) वप्र 0 चा. 


¶ 216 9111: 56158 €10 तध १०४६. 


न सा स्त्य्‌ अभिमन्तव्या ' यस्या भतां न तुष्यति । 
तुष्टे भेरि नारीणां ' तुष्टाः स्युः सवेदेवताः ॥१३३॥ 
दावाग्रिनेव निदेग्धा ' सपुष्पस्तबका त्ता । 
भस्मीभवतु सा नारी ' यस्या भतो न तुष्यति ॥१३४॥ 


पुनश चात्रवीत्‌ । 


प्णोत््‌ अवहितः कान्तो ' यत्‌ ते वष्याम्य्‌ अहं हितम्‌ । 


प्राणेर्‌ अपि त्रया नित्यं ' संरष्यः शरणागतः ॥१३५॥ 
एष शाकुनिकः शते ' तवावासं समाधितः । 


शीतातेण च क्षुधातेश च ' पूजाम्‌ अस्मे समाचर ॥१३६॥ 


श्रूयते च । 

यः सायम्‌ अतिथिं प्राप्र ' यथाशक्ति न पूजयेत्‌ । 
तस्यासो दुष्कृतं दा ' सुकृतं चापकषेति ॥१३५॥ 
मा चास्मे तवं कुथा इेषं ' बद्ानेनेति मत्मिया । 
स्वकृतिर एव बद्धाहं ' प्राक्तनैः कमेबन्धनैः ॥१३४॥ 


यत्तः । 


दारिद्धरोगदुःखानि ' बन्धनव्यसनानि च । 
आत्मापराधवृष्छस्य ' फलान्य्‌ एतानि देहिनाम्‌ ॥१३९॥ 
तस्मात्‌ त्वं देषम्‌ उत्सृज्य " मडन्धनसमुद्धवम्‌ । 

धम मनः समाधाय ' पूजयेनं यथाविधि ॥ १४०॥ 
ततस्‌ तद्वचनं श्चुता ' धमेयुक्तिसिमन्वितम्‌ । 

उपगम्य ततो धृष्टः ' कपोतः प्राह त्ठुग्धकम्‌ ॥१६४१॥ 
भद्र सुस्वागतं ते ऽस्तु ' ब्रूहि किं करवाणि ते। 
संतापश च न कतेव्यः ' स्वगृहे वतेते भवान्‌ ॥१४२॥ 


20 


18 


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१2 ^ 07 त 06 ^ पा) 10८ 0 ्ना,5. 280० 1. 
¶ 216 ग; 56152611 ००४९. 


तस्य तट्‌ वचनं श्रुत्वा ' प्रत्युवा च विहगहा । 

कपोत खल्र शीतं मे ' हिमचाणं विधीयताम्‌ ॥ १४३॥ 
स गव्वाद्भारकमान्तम्‌ ' आनयाम्‌ आस पावकम्‌ । 

ततः भुष्केषु पर्णेषु ' तम्‌ आमु समदीपयत्‌ ॥ १६४४॥ 
प्रतापयस्व विश्रब्धं ' स्वगाचराणएय्‌ अचर निभेयः। 

न चास्ति विभवः कश्चिल्‌ ' येन ते *नाश्ये छुधम्‌ ॥ १४५॥ 
सहसरं विभति कश्चिच्‌ ' छतम्‌ अन्यो दशूपरः । 

मम त्व्‌ अकृतपुणयस्य ' ्ुदरस्यात्मापि दुभैरः ॥ १४६॥ 
एक्स्याप्‌ अतिथेर अन्नं " यः प्रदातुं न शक्तिमान्‌ । 
तस्यानेकपरिङ्केशे ' गृहे किं वसतः फलम्‌ ॥१४७॥ 

तत्‌ तथा साधयाम्य एतच्‌ ' छरीर टुःखजी वितम्‌ । 
यथा भूयो न वश्यामि ' नास्तीत्य्‌ अथिसमागमे ॥१४५॥ 
स निनिन्द कित्वरौत्मानं ' न तु तं त्हुब्धकं पुनः । ` 
उवाच तपेयिषे त्वां ' मुहूत प्रतिपालय ॥१४९॥ 

एवम्‌ उक्ता स धमोत्मा ' प्रहृेनान्तरात्मना । 

तम्‌ अभ्रिं संपरिक्रम्य ' प्रविवेश स्ववेप्मवत्‌ ॥ १५०॥ 
ततस्‌ तं ल्ुब्धको दुष्टा ' कृपया भृशपीडितः । 

कपोतम्‌ अस्मो पतितं ' वाक्यम्‌ एतट्‌ अभाषत ॥१५१॥ 
यः कंरोति नरः पापं ' न तस्यात्मा भ्रुवं प्रियः । 
आत्मना हि कृत्तं पापम्‌ " आत्मनेव हि भुज्यते ॥ १५२॥ 
सो ऽहे पापमतिश्चैव ' पापकमेरतिः सदा । 
पतिघामि महाघोरे ' नरक नाच संशयः ॥१५३॥ 

नूनं मम नृशंसस्य ' प्रत्यादशेस्‌ तु दितः । . 

प्रयच्छता स्वमांसानि ' कपोतेन महात्मना ॥१५४॥ 


203 


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5001 7117. 1४ "^ ए 07 1८ 708 ^ परा) 0४ 08. 
¶ 216 9111: 56182610 610& १००९. 


अद्यप्रभृति देहं स्वं ' सवेभोगविवजिंत्तम्‌ । 

तोयं स्वल्पम्‌ इव *"पीष्मे ' शेषयिष्याम्य अहं तततः ॥१५५॥ 
श्रीतवातातपसहः ' कृशाङ्गो मल्ठिनस्‌ तथा । | 
उपवासेर बहुविधे" चरि धमम्‌ उत्तमम्‌ ॥१५६॥ 

ततो भयष्टिं श्त्ाकां च ' जात्टकं पज्ञरं तथा । 

बभन्न त्टूग्को दीनां ' कपोतीं च सुमोच ताम्‌ ॥१५७॥ 
त्तुग्धकेन ततो मुक्ता ' दुषटुाम्रो पतितं पतिम्‌ । 

कपोती वित्छत्छापाता ' शेकसंचस्तमानसा ॥१५४॥ 

न कायेम्‌ अद्य मे नाथ ' जीवितेन चया विना । 

दीनायाः पतिहीनायाः ' किं नाया जीविते फत्ठम्‌ ॥१५९॥ 
मानो देस्‌ त्र्‌ अहंकारः " कुत्टपूजा च बन्धुषु । 
दासभृत्यजनेष्व्‌ आज्ञा ' वेधव्येन प्रणश्यति ॥१६०॥ 

एवं वित्र बहुशः ' कृपणं भृशदुःखिता । 

पतिता सुसंदीप्र ' तम्‌ रवाम्मिं विवेश सा ॥१६१॥ 

ततो दिव्याश्वरधरा ' दिव्याभरणभूषिता । 

भतरं सा विमानस्थं ' ट्द्शे च कपोतिका ॥१६२॥ 

सो ऽपि दिव्यतनुर्‌ भूत्वा " यथाथेम्‌ इद्म्‌ अव्रवीत्‌ । 

अहो ममानुगच्छन्त्या ' कृतं साधु शुभे त्वया ॥१६३॥ 

तिञखः कोटयो ऽधेकोटी च ' यानि रोमाणि मानवे। 
तावत्कालं वसेत्‌ स्वर्गे ' भतरं यानुगच्छति ॥ १६४॥ 


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18 


एवं हषाविष्टस्‌ तां विमानम्‌ आरोण परिष्वज्य च सुखेन तस्थौ । 


लुब्धको ऽपि परमनिर्वेदं कृवा मरणाभिमुखो महट्‌ वनं विवेश । 


तच दावानलं दुष्टा ' निविष्टो विरताशयः । 
निदेग्धकल्मषो भूत्वा ' देव वट्‌ टिवि मोदते ॥१६५॥ 


24 


पप्र "^ 07 वप्त 0५6 ^ प्रा) ¶प्ए 0 "्ा,3. 5300६ या. 205 
ए 181116-51079. 8163: 01 72, अ0पाहि स, 21 ८०१४. 


अतो ऽदं व्रवीमि । श्रूयते च कपोतिन । इति । 
तच्‌ इूत्वुरिमदेनो दीप्तां पृष्टवान्‌ । एवम्‌ अवस्थिते किं भवान्‌ मन्यते । सो 
$त्रवीत्‌ । 8 
या ममोद्दिजते नित्यं । सा माम्‌ अद्य] वगहति । 
प्रियकारक मद्रं ते। यन्‌ ममासि हरस्व तत्‌ ॥ १६६॥ 
चौरेणाप्य उक्तम्‌ । 6 
हरतेव्यं ते न पश्यामि ' हर्तव्यं चेद्‌ भविष्यति । 
पुनर्‌ अप्य्‌ आगमिष्यामि ' यदीयं नावगूहति ॥ १६७॥ 
अरिमदेनः पृष्ठवान्‌ । का च नावगूहते । कश चायं चौरः । इति विस्तरतः ओतुम्‌ ? 
इच्छामि, दीप्ताः कथयति। 


॥ क्या ९॥ 


अस्ति कस्मिश्चिट्‌ अधिष्ठाने कामातुरो नाम वृद्धवणिक्‌। तेन च " 
कामोपहतचेतसा मृतभार्येण काचिन्‌ निधेनवणिक्सुता प्रभूतधनं 
टच्लोाहिता । अथ सा दुःखाभिभूता तं वृद्धवणिजं दुम्‌ अपिन 
शशाक । युक्तं चैतत्‌ । 18 

श्वेतं पदं शिरसि यत्‌ तु शिरोरुहाणां 

स्थानं पर परिभवस्य तट्‌ एव पुंसाम्‌ । 

आरोपितास्थिशकलं परिहृत्य यान्ति 15 

चार्डाल्कूपम्‌ इव टूरतर तरुण्यः ॥१६४॥ ` प 
तथा च। 

गाचं संकुचितं गतिर्‌ विगलिता दन्ता च नाशं गता भ 

दृष्टिर्‌ भश्यति रूपम्‌ अप्य्‌ उपहतं वक्तं च लालायते । 

वाक्यं नेव करोति बान्धवजनः पत्नी न शुश्रूषति 

हा कष्टं जरसाभिभूतपुरूषं पुचो ऽ पय्‌ अवज्ञायते ॥१६९॥ ४४०९ ५ 
अथ कदाचित्‌ सा तेन सहैकशयने पराङुनुखी यावत्‌ तिष्ठति ' 


७००1 77171. (पए +^ ए 07 ¶॥प्ए 606 ^ पा) पए 0015. 206 
न16 अ: 01 21, अकप्ह क, त्‌ चला = एक्षपालञणाङ, तथाल ड: 0९, पपा, 2० छता. 
तावत्‌ तत्रह चोरः प्रविष्टः सापितं चोर 4 
वृद्धम्‌ अपि तं पतिं समालिलिङ्गः। सो ऽपि पुठका- 
ङ्भितिसवेगाचश् चिन्तयाम्‌ आस । अहो ' किम्‌ एषा माम्‌ » 
अद्या वगूहते । यावन्‌ निपुणतया पश्यति ' तावद्‌ गृहकोशेक्देशे 
चौरं दुष्टा व्यचिन्तयत्‌ । नूनम्‌ एषास्य भयान्‌ +माम्‌ आलि- 
ङ्गति । इति ज्ञात्वा तं चोरम्‌ आह । या ममोद्विजते नित्यं " सा ® 
*"माम्‌ अद्यवगूहते " इति । तच्‌ छत्रा चोरो ऽप््‌ आह । हरतेव्यं ` 
ते न पश्यामि ' इति ॥ 


तस्माच्‌ चौरस्याप्य्‌ उपकारिणः ज्रेयश्‌ चिन्त्यते । किं पुर्भ॑र्‌ नै शरणागतस्य । अपि 9 
च । अयं तैर विप्रकृतो ऽ खाकम्‌ एव पुष्टये भविष्यति तदीयरन्ध्रद्‌ शंनौय वा , इति। 
अनेन कारणेनायम्‌ अवध्यः ' इति । 
एतद्‌ आकण्यरिमदेनो ऽन्यं सचिवं वक्रनासं पग्रच्छ । भद्र । सांप्रतम्‌ एवं स्थिते किं 12 
कर्तव्यम्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । देव । अवध्यो ऽयम्‌ । यतः। 
शचवो ऽपि हिताधैव । विवदन्तः परस्परम्‌। 
चौरेण जीवितं दत्तं ' रा्सेन तु गोयुगम्‌ ॥ १७०॥ 15 
अरिमदंनः प्राह । कथम्‌ एतत्‌ । वक्रनासः कथयति । 


॥ क्या १० ॥ 


अस्ति कस्मिंश्िट्‌ अधिष्ठाने दष ब्राह्मणः प्रतियहधनः सततं 
विशिष्टवस्त्रानुलेपनंगन्धंमाल्यांल्े कारताबबूलादिभोग॑परिवजितः 
प्ररूद॑केश्॑म्रंनखरोमोंपचितः शीतोष्ण वादिभिः परिशेषित- 
शरीरः । तस्य च केना अनुकम्पया शिणुगोगुगं दत्तम्‌ ' बाद्यणेन 
च वालवाट्‌ आरभ्य याचितधुततेलयवसादिभिः सं वध्य सुपुष्टं 
कृतम्‌ । तच्‌ च दुष्टा सहसैव कश्चिच्‌ चौर चिन्तितवान्‌ । अहम्‌ 
अस्य ब्राह्मणस्य गोयुगम्‌ इदम्‌ अपहरिष्यामि । इति निश्चित्य ५ 


¶ ८४ ^ 8 07 कप 0४8 ^ पा) वप्र 0915. 2800 गा. 20१ 
¶ 216 ॐ: 0816, ४01 204 87202. 


निशायां बन्धनपाशं गृहीत्वा यावत्‌ प्रस्थितः ' तावद्‌ अधेमार्गे 
प्रविरत्रतीष््णटन्त पङ्कर उन्नतनासावंशविषमीकृतनयन +उप- 
चितलायुसंततगाचः भुष्ककपोत्ठः सुहुतहुतवहपिङ्गश्मश्चुशरीरः » 
कश्चिद्‌ दृष्टः दृष्टा च तं तीव्रभयोच्रस्तण चोरो ऽवीत्‌ । को 
भवान्‌ " इति । स आह । सत्यवचनो ऽ हं ब्रह्मराशसः । भवान्‌ 
अष्‌ आत्मानं निवेदयतु । सो ऽब्रवीत्‌ । अहं क्ूरकमां चौरः । ० 
ददद्रिबाह्यणगोयुगं हतु प्रस्थितो ऽस्मि । 

अथ जातप्रत्ययो राक्षसो ऽब्रवीत्‌ । भद्‌ ' षष्ठान्नकाल्तिको 
ऽहम्‌ । अतस्‌ तम्‌ एव न्राद्यणम्‌ अद्य भयिष्यामि । तत्‌ 9 
सुन्दरम्‌ इदम्‌ । एककायाव्‌ एवावाम्‌ । अथ तौ तच गत्वैकान्ते 
कालम्‌ अन्वेषयन्तो स्थितौ । प्रसुपरे च ब्राह्मणे तद्घछणा्ं प्रस्थितं 
राक्षसं दुष्टा चोगो ऽब्रवीत्‌ । भद्‌ ' नेष न्यायः ' यतो गोयुगे 
मयापहृते पश्चात्‌ त्वम्‌ एनं ब्राह्यणं भ्य । सो ऽब्रवीत्‌ । कदा- 
चिद्‌ अयं प्रतिशब्देन ब्राह्यणो बुध्येत। तदानथेको ऽयं ममारम्भः 
स्यात्‌ । चोरो ऽबवीत्‌ । तवापि यदि भक्षणायो पस्थितस्यान्तरा 
को ऽष्‌ अन्तरायः स्यात्‌ ' तदाहम्‌ अपि न शक्रोमि गोयुगम्‌ 
अपहतुम्‌ । अतः प्रथमं मयापहृते गोयुगे पश्चात्‌ त्या ब्राह्मणो 
भष्यितव्यः । इत्यं चूहमहमिकया तयोर्‌ विवदतोः समुत्पन्ने 5 
देधे प्रिरववशट्‌ ब्राह्यणो जजागार । अथ तं चौरो ऽब्रवीत्‌ । 
ब्राह्मण ' त्वाम्‌ अयं राक्षसो भक्षयितुम्‌ इच्छति । राक्षसो ऽप॒ 
आह । ब्राह्मण ' चोरो ऽयं गोयुगं ते ऽपहतुम्‌ इच्छति । एवं 
श्रुत्वोत्थाय ब्राह्मणः सावधानो भूतवे्टदेवतामन्तध्यानेनात्मानं 
रा्साट्‌ उद्रूणेतगुडेन च चौराद्‌ गोयुगं रर ॥ 


50०० 7717. प्र ^ 07 02 068 ^ प्रण त 0 णा. 208 
07168६07. 216 असः 71066 111 8€1€ा1६ 40 018 एला 


अतो ऽहं व्रवीमि । शवो ऽपि हितायैव ' इति । अपि च। 
शिबिनापि खमांसानि ' कपोता्थे महात्मना । 
श्येनाय किल दत्तानि ' श्रूयन्ते पुखकाम्यया ॥ १७१॥ 8 
तन्‌ नयं धमः ' यच्‌ रणागतो हन्यति ' इति ॥ 
अथ तस्य वचनम्‌ अवधाय प्राकारकणंम्‌ अपृच्छत्‌ । कथय । किम्‌ अच मन्यते 
भवान्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । देव ' अवध्य एवायम्‌ ' यतो रदितेनानेन कदाचित्‌ परस्यरग्रीत्या ¢ 
कालः सुखेन गच्छति । उक्तं च । 
परस्परस्य मर्माणि । ये न रक्तन्ति जन्तवः। 
त एव निधनं यान्ति ' वद्मीकोद रसवत्‌ ॥ १७२॥ 9 8 
अरिमदनो ऽब्रवीत्‌ । कथम्‌ एतत्‌ । प्राकारकणैः कथयति ॥ 


॥ कया ११ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिन्‌ नगरे राजा देवशक्तिर नाम । तस्य च पुचो 
जटरवल्मीकाश्रयेणोरगेण प्रतिदिनं प्रत्यङ्गं सीयते । अयासो 
राजपु्ो निर्वेदाट्‌ देश्णन्तर गतः । कस्मिंशिन्‌ नगरे भिक्षाटनं 
कृत्वा महति देवात्छये काल्छं यापयति । अथ तत्र नगरे बलिर्‌ 
नाम राजास्ते । तस्य च बे दुहितरौ योवनस्थे तिष्ठतः । अथ 
तयोर्‌ एका प्रतिदिवसं पितुः पादान्तिकम्‌ आगत्य ' विजयस्व 
महाराज ' हितीया तु ' विहितं भुङ्क महाराज ' इति रवीति । 
तच्‌ त्वा प्रकुपितो राजाब्रवीत्‌ । भो मन्विणः ' एनां दु्भा- 
षिणीं कुमारिकां कस्यचिट्‌ वेदेशिकस्य प्रयच्छत ' येन विहितम्‌ 
इयम्‌ एव सुङ्क । अथ ' तथा ' इति प्रतिपद्यास्यपरिवारया सा ° 
कुमारिका मन्विभिस्‌ तस्य देवकुत्राितराजपुचस्य प्रतिपा- 
टिता। 

सापि हृष्टमानसा तं पतिं देववत्‌ प्रतिपद्यादाय चान्यविषयं 
गत्ता । ततः कस्मिंिट्‌ टूरतरनगरप्रदेशे तडागतटे राजपुचम्‌ 


पप ^ 07 व 08 ^ पा) प 0ण्ा8. 800६ पा. 209 
आवासरछ्षणे निरू स्वयं च घु्ततै ल वणं॑तरडुत्कार्दिकर्यनिमितं 
सपरिवारा गता । कृत्वा च कऋयविक्रयं यावट्‌ आगच्छति ' तावत्‌ 
स राजपु्ो वल्मीकोपरिकृतमूधां प्रसुप्रः ' तस्य च मुखाट्‌ भरुज- 9 
गफणा निष्कम्य वायुम्‌ अश्नाति । तनैव च वल्मीके ऽपरः सपों 
निष्कम्य तथे वासीत्‌ । अथ तयोः परस्यरदशेनेन कोधसंरक्तलो- 
चनयोर्‌ मध्याट्‌ वल्मीकस्थेन सर्पेणोक्तम्‌ । भो दुरात्मन्‌ ' कथं ° 
सुन्दरसवा ङ्गं राजपुचम्‌ इत्यं कटथेयसि । मुखस्थो ऽब्रवीत्‌ । 
त्वयापि दुरात्मना कथम्‌ इदं दूषितं हाटकपूणे कल्कृशयुगत्म्‌ " 
इति । एवं परस्परममाण्य्‌ उद्वाटितवन्तौ । पुनर वस्मीकस्यो ° 
ऽब्रवीत्‌ । भो दुरात्मन्‌ ' किं को ऽपि भेषजम्‌ इट्‌ न जानाति ' यट्‌ 
राजिकापानेन भवान्‌ विनाशम्‌ उपयाति । अथोद्रस्थो ऽ वीत्‌ । 
तयापण्‌ एतद्‌ भेषजं किं कश्चिद्‌ अपि न वेत्ति ' यथोष्णोदकेन 
तव विनाशः स्यात्‌ ' इति । एवं च सा राजकन्या विटपान्तरिता 
तयोः परस्यगलापम्‌ आकण्ये तथे वानुष्ठितवती । विधायाव्यङ्ग 
भतारम्‌ ऋद्धिं च पराम्‌ आसाद्य स्वदेष्णभिमुखं प्रायात्‌ । ऽ 
पितृमातृस्वजनेः प्रतिपूजिता विहितोपभोगं प्राण सुखेनाव- 
स्थिता ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि । परस्परस्य ममांणि ' इत्यादि । 18 
तच्‌ च श्रुत्ारिमदेनो ऽप्य्‌ एवं समर्थितवान्‌ । तथा चानुष्ठितं दृष्टान्तर्लो नम्‌ अवहस्य 
रक्ताः पुनर्‌ अत्रवीत्‌। कष्टं कष्टम्‌ ' विनाशितो ऽयं भवद्खिर अन्यायेन खामी । उक्तं च। 
अपूज्या यच पुनज्यन्ते ' पुन्यानां तु विमानना । 21 
चीणि तच प्रवतेन्ते । दुर्भिक्तं मरणं भयम्‌ ॥ १७३॥ 
तथा च। प्रत्यक्ते ऽपि कते पापे ' मूखैः सान्ना प्रतुष्यति । 
रथकारः स्वकां भार्यो । सजारां शिरसावहत्‌ ॥ १७४॥ , ४4 
मन्त्रिणः प्राङ्ः। कथम्‌ एतत्‌ । रक्ताक्तः कथयति । 


5800 1711. वप ए "^ 0 1८ 06 ^ परा) 1४८ 0016. 210 
216 उ: ©पलद्गत्‌ कल्ला हा, ` 


॥ कया १२ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्ित्‌ स्थाने रथकारः । तस्य भायां पुंश्वत्टी जनाप- 
वादसंयुक्ता च । सो ऽपि तस्याः परीक्षणाथंम्‌ अचिन्तयत्‌ । कथं 
मयास्याः परीसणं कतेव्यम्‌ । उक्तं च ' यतः । 

यदि स्यात्‌ पावकः शीतः ' प्रोष्णो वा शशलाञ्छनः । 

स्तीणं च तत्‌ सतीव स्याट्‌ ' यदि स्याट्‌ टुजेनो हितः ॥१७५॥ ° 
जानामि चेनां लो क्वचनाट्‌ असतीम्‌ । उक्तं च । 

यच्‌ च वेदेषु शस्त्रेषु ' न दष्टं न च संश्रुतम्‌ । 

तत्‌ सवै वेचि त्ोको ऽयं ' यत्‌ स्याट्‌ ब्रह्यारडमध्यगम्‌ ॥ १७६॥ 
एवं संप्रधाये भायाम्‌ अवोचत्‌ । प्रिये ' प्रभाते ऽहं सामान्तरं 
यास्यामि । तच दिनानि कत्तिचिल्‌ ठगिषयन्ति । तत्‌ त्वया 
किंचित्‌ पाथेयं मम योग्यं विधेयम्‌ । तस्य वचनं श्रुत्वा हषित- 
चित्ता सोत्सुका सवंकायांणि संत्यज्य सिम्‌ अन्नं धृतश्केराप्रायम्‌ 
अकरोत्‌ । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 

टुदिवसे घनतिमिरे ' दुःसं चारेषु नगरमार्गेषु । 25 

पत्युर्‌ विदेशगमने ' परमसुखं जघनचपलायाः ॥१७७॥ 
अयासो प्रत्यूष उत्थाय स्वगृहान्‌ निगेतः । सापि तं प्रस्थितं 
विज्ञाय प्रहसितवदनाङ्गसंस्कारकमे कुवांणा कथंचिद्‌ दिनम्‌ " 
अत्यवाहयत्‌ । अथ पूव परिचितविटगृहे गत्वा तं प्रत्य्‌ उक्तवती । 
स दुरात्मा मे पतिर्‌ यामान्तरं गतः । तत्‌ त्वयास्मदृहे प्रसु् 
जन आगन्तव्यम्‌ । तथानुषिते स रथकारो ऽरण्ये दिनम्‌ अत्ति- 
वाह्य प्रदोषे स्वगृहे ऽ पद्वारेण प्रविश्य शय्याधस्तले निभृतो 


प्र ^ 07 1४ 008 ^ प्रा) प 0018. 500 1. 211 


¶216 उपा: एप्थ्गत क6्नाक ६६, 


भूत्वा स्थितः । एतस्मिन्‌ अन्तरे स देवदच्नः समागत्य तच शयन 
उपविष्टः । तं दुष्टा कोपाविष्टचिन्ञो रथकारो व्यचिन्तयत्‌ । किम्‌ 
एनम्‌ उत्थायं हन्मि " अथ हेत्छयेव प्रसुप्रो इाव्‌ अपि व्यापाट्‌- ४ 
यामि। यट्‌ वा ' पश्यामि तावद्‌ अस्याश् चेष्टितम्‌ ' णृणोम्य्‌ 
अनेन सहात्करापान्‌ । एतस्मिन्‌ अन्तरे सा गृह्लारं निभृतं 
श्पिधाय शयनतल्म्‌ आरूढा । 6 
अथारोहन््या रथकारशरीरे पाटो विल्छग्रः । ततो व्यचि- 
न्यत्‌ । नूनम्‌ एतेन दुरात्मना रथकारेण मत्परीष्ाथ भाव्यम्‌ । 
तत्‌ स्वीचरितविज्ञानं किम्‌ अपि करोमि । एवं तस्याश्‌ चिन्त- ? 
यन्या देवदन्नः स्यत्सुको बभूव । अथ तया कृताज्ञलिपुटयाभि- 
हितम्‌ । भो महानुभाव ' मे शरीरं त्वयास्पशेनीयम्‌ । स आह । 
यद्य्‌ एवम्‌ ' तहि ' किम्‌ अहं त्रयूहूतः । साब्रवीत्‌ । भोः ' अहं 
प्रत्यूषे देवतादशशेनाथं चरिडिकायतनं गता । तच्राकस्मिकी से वाचा 
संजाता । पुचि ' किं करोमि । भक्तासि मे त्म्‌ । परं षण्मासा- 
भ्यन्तरे विधिनियोगादट्‌ विधवा भविष्यसि । ततो मयाभिहितम्‌ । 
भगवति ' यथा त्वम्‌ आपदं वेत्सि ' तथा प्रतीकारम्‌ अपि 
जानासि । तद्‌ अस्ति कश्चिट्‌ उपायः ' येन मे पतिः शतसं- 
वत्सरजी वी भवति । ततस्‌ तयाभिहितम्‌ । अपि चास्ति ' यतस्‌ 
तवूायत्चः स प्रतीकारः । तच्‌ छरुत्वा मयाभिहितम्‌ । देवि ' यदि 
मम प्राणेर भवति ' तद्‌ आदिश ' येन करोमि । अयथ देव्याभि- 
हितम्‌ । यद्य्‌ *अन्येन पुरुषेण सहेकस्मिञ्‌ शयनीय आर्द्या- 
लिङ्खनं करोषि ' तत्‌ तव भतुः सक्तो ऽपमूत्युर अस्य सं चरति ' 
भतो च पुनर वषशतं जीवति । तेन त्वं मयान्यथितः । तट्‌ यत्‌ 
किचित्‌ कतमनाः ' तत्‌ कुर । न हि देवतावचनम्‌ अन्यथा 


5001 1717, पए न ^ 07 गप्र &0 8 ^ प्रा) (प्त 04148. 212 
भविष्यति ' इति निश्चयः । ततो ऽन्तहीसविकाशमुखः स तदु- 
चितम्‌ आचचार । 

सो ऽपि रथकारो मूखेस्‌ तस्या वचनम्‌ आकण्ये पुलकि- 
ततनुः शय्याधस्तलान्‌ निष्कम्यो वाच । साधु ' पतित्रते । साधु ' 
कुत्नन्दनि । अहं टुजेन वचनशङ्कितहदयस्‌ त्वत्परीक्षानिमित्ं 
मामव्याजं कृच खदाधस्तले निभृतं लीनः स्थितः । तट्‌ एहि " ° 
आङ्ग माम्‌ । एवम्‌ उक्ता ताम्‌ आलिङ्कघ स्कन्धे कृवा तम्‌ 
अपि देवदतम्‌ उवाच । भो महानुभाव ' मन्पुण्येस्‌ लम्‌ 
इहागतः । त्व््रसादान्‌ मया प्राप्तं वषेशतप्रमाणम्‌ आयुः । तत्‌ ° 
त्रम्‌ अपि स्कन्धे समारुह । अनिच्छन्तम्‌ अपि तं बलत्ठात्‌ स्कन्ध 
आरोपितवान्‌ । ततश च नृत्यन्‌ सकट स्वजनगुहदयारेषु बभ्राम ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि । प्रत्यक्ते ऽपि रति *दोषे ' इत्यादि । तत्‌ सर्वेथा मूलोत्खाता वयं 12 
विनष्टाः स्मः । सुष् खल्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 
भिचरूपा हि रिपवः ' संभाव्यन्ते विचक्षणैः । 
ये हितं वाक्यम्‌ उत्सुज्य । विपरीतोपसेविनः ॥ १७८॥ 15 
तथाच। सन्तो ऽष्‌ अर्थां विनश्यन्ति ' देशकालविरोधिताः । 
अप्राज्ञान्‌ मन्त्रिणः प्राप्य ' तमः सूर्योदये यथा ॥ १७९॥ 
ततस्‌ तद्वचो ऽनादृत्य सवं ते स्थिरजी विनम्‌ उत्किप्य खदु्गेम्‌ आनेतुम्‌ आरब्धाः । 18 
अधूनीयमानः स्थिरजीच्य्‌ आह । देव ' अद्याकिंचित्करे तद वस्येन किं मयोपसंगुहीतिन । 
यत्कारणम्‌ ' इच्छामि दीप्रं वह्िम्‌ अनुप्रवेष्टम्‌ । तट्‌ अहेसि माम्‌ उद्धतम्‌ अभ्मिद्‌ानेन । 
दति । अथ रक्ताक्षस्‌ तस्यान्तगेतमावं ज्ञातवात्रवीत्‌। किमर्थम्‌ अन्निपतनम्‌ इच्छसि । सो 21 
$त्रवीत्‌ । अहं *भवद्थं इमाम्‌ आपदां मेघवणँन प्रापितः । तट्‌ इच्छामि तेषां +वैरया- 
तनाम्‌ उलूकल्वम्‌ ' दति । तच्‌ च श्रुत्वा राजनीतिकुशलो रक्ताः प्राह । भद्र । कुटिलस्‌ 
त्वं कृतकवचनचतुर श्‌ च । तत्‌ त्वम्‌ उलूृकयोनिगतो ऽपि खकीयाम्‌ एव वायसयोनिं २५ 
ब मन्यसे । श्रूयते चैतद्‌ आख्यानकम्‌ । 
सूर्यं भर्तारम्‌ उत्सुज्य । पर्जन्यं मारुतं गिरिम्‌ । 
स्वयोनिं मूषिकी प्राप्ता ' स्वजातिर्‌ दुरतिक्रमा ॥१८०॥ 27 
सो ऽब्रवीत्‌ । कथम्‌ एतत्‌ । रक्ताः कथयति । 


वप ^ 07 पए 6008 ^ प्र वप्र 0 ण1,8. 200 वपा. 


¶ 8216 अ; 01ठण5€-718 तला 11 € 2. 10८86. 


॥ कया १३ ॥ 


अस्ति विषमशिल्तांतटस्वल्िताशुनिघोंष॑श्रवण॑संचस्तंमत्सयपरिव- 
तेनासंजनितसितंफेन॑शव्ल तरङ्गाया गङ्कायास्‌ तटे जप॑नियम॑त- 
पःस्वाध्यायोंपवासंयाग॑करियांनुष्ठान॑परायणेः परिपूत॑परिमितंजल- 
जिधुक्ुभिः कन्दमूर्फरल+^शेवात्दाभ्यवहारं कट्थित॑शरीरेर वस्क- 
लकृत॑को पीन॑माचप्रच्छादनेस्‌ तपस्विभिर आकीणैम्‌ आश्रम- 
पटम्‌ । तच याज्ञवर्क्यो नाम कुपतिः । तस्य जाहृव्यां लात्वो- 
पस्प्रहुम्‌ आरख्धस्य करतले श्येनमुखात्‌ परिथिष्टा मूषिकी पतिता । 
तां दुष्टा न्ययोधपन््ने ऽवस्थाप्य पुनः लात्वोपस्युश्य च प्रायश्ि- 
त्ञादिक्रियां कृत्वा च तां मूषिकीं स्वतपोबत्ठेन कन्यकां कृत्वा 
समादाय स्वाच्रमम्‌ आशिश्राय ' अनपत्यां च जायाम्‌ आह । 
भद्र ' गृह्यताम्‌ ' इयं तव दुहि तोत्पन्ना प्रयत्नेन संवधेनीया ' 
इति । ततस्‌ तया संवधिता त्ाल्िता च " यावद्‌ इादटशवषां 
संजज्ञे । अथ विवाहयोग्यां दुष्टा भतारम्‌ एवम्‌ ऊचे । भो 
भतेः ' किम्‌ इदं नावबुध्यसे ' ययास्याः स्वदुहितुर विवाहसम- 
यातिक्रमो भवति । असाव आह । प्रिये ' साधूक्तम्‌ । उक्तं च । 

स्ियः पूवं सुरेर्‌ सक्ताः ' सोमगन्धवेवह्िभिः । 

भुञ्जते मानुषाः पश्चात्‌ ' तस्माट्‌ दोषो न विद्यते ॥ १४१॥ 

सोमस्‌ तासां ददो शचं ' गन्धवाः शश्ितां गिरम्‌ । 

पावकः सववेमेध्यत्वं ' तस्मान्‌ निष्कल्मषाः स्तियः ॥ १४२॥ 

असंप्राप्ररजा गोरी ' प्राप्रे रजसि रोहिणी । 

अव्यज्ञना भवेत्‌ कन्या ' कुचहीना च न्रिका ॥१४३॥ 


213 


3 


6 


9 


12 


15 


18 


5001 717. 1 ए ^ 8 07 (पत्र 608 ~^ पमा वप्त 0 "्ना.8. 214 

व्यज्ञनेस्‌ तु समुत्पन्नैः ' सोमो भुङ्के हि कन्यकाम्‌ । 

पयोधरेषु गन्धवा ' रजस्य्‌ अग्निः प्रतिषितः ॥१४४॥ 

तस्माट्‌ विवाहयेत्‌ कन्यां " यावन्‌ नतु मती भवेत्‌ । ४ 

विवाह चाष्टवषां याः ' कन्यायास्‌ तु प्रशस्यते ॥१४५॥ 

व्यज्ञनं हन्ति वे पूव ' परं चेव पयोधरो । 

रतिर्‌ इष्टांस्‌ तथा ल्लोकान्‌ ' हन्याच्‌ च पितरं रजः ॥१४६॥ ° ` 

ऋतुमत्यां तु तिष्ठन्यां ' स्वे च्छादानं विधीयते । 

तस्माद्‌ उह्ाहयेन्‌ नम्रां " मनुः स्वायंभुवो ऽब्रवीत्‌ ॥ १४७॥ 

पितृवेश्मनि या कन्या ' रजः पश्यत्य्‌ असंस्कृता । 

अविवाद्या तु सा कन्या ' जघन्या वुषत्टी स्मृता ॥१४४॥ 

शेष्ेभ्यः सदृशेभ्य च ' जघन्येन्यो रजःस्वत्का । 

पिचा देया विनिश्चित्य " यतो दोषो न विद्यते ॥१४९॥ 
अतो ऽहम्‌ एनां सदृश्णय प्रयच्छामि । उक्तं च । 

ययोर्‌ एव समं विन्नं " ययोर्‌ एव समं कुतम्‌ । 

तयोर्‌ विवाहः सख्यं च ' न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ १९०॥ 15 
तथा । 

कुतं च शीत्ठं च सनायता च 

विद्या च वित्तं च वपुर्‌ वयश च॑ । 18 

एतान्‌ गुणान्‌ सप्र विचिन्य देया 

कन्या वुधेः शेषम्‌ अचिन्तनीयम्‌ ॥१९१॥ पा 
तट्‌ यद्य्‌ *अस्या रोचते ' तदा भगवन्तम्‌ आदित्यम्‌ आहूय तत्‌ 
तस्मे प्रदीयते । साह । को दोषः । क्रियताम्‌ रुतत्‌ । अथ मुनिना 
सवितृाहूतः । तत्कषणाट्‌ रवाभ्युपगत्य प्रोवाच । भगवन्‌ ' किम्‌ 
अहम्‌ आहूतः । सो ऽ वीत्‌ । एषा मदीया कन्यका तिष्ठति । ५ 


॥ = 


~~ 


2 


पप्र ^ 8 07 (पए 08 ^ प्र (पए 0018. 5001 वा. 215 


¶ 216 41; 0056-2 स111 6त 2 71086, 


तत्‌ त्वम्‌ उद्वहस्व ' इति । एवम्‌ उक्ता स्वदुहितरम्‌ उवाच । 
पुचि ' किं तव रोचत एष भगवांस्‌ चेतोक्यदीपकः । पुचिका- 
ब्रवीत्‌ । तात ' अतिदहनात्मको ऽयम्‌ । नाहम्‌ एनम्‌ अभिल- ° 
षामि । तट्‌ अस्माट्‌ अन्यः कश्चिद्‌ उत्कृष्टतर आहूयताम्‌ । अथ 
तस्यास्‌ तद्‌ वचनं श्रुत्वा मुनिर्‌ भास्करम्‌ उवाच । भगवन्‌ ' 
त्वद्‌ अधिको ऽस्ति कथित्‌ । भास्करः प्राह । अस्ति मट्‌ अष्‌ ८ 
अधिको मेधः ' येनूच्छादितो ऽहम्‌ अदृष्टो भवामि । अथ 
सुनिना मेधम्‌ अप्य्‌ आहूय कन्याभिहिता । पु्िके , अस्मे 
प्रयच्छामि । साह । कृष्णवर्णो ऽयं जडात्मा च । तट्‌ अस्य 
सकाशाद्‌ अन्यस्य प्रधानस्य मां प्रयच्छ । अथ मुनिना मेधः 
पृष्टः । भो मेध ' त्वद्‌ अप्य्‌ अधिको ऽस्ति कश्चित्‌ । मेधेनो क्तम्‌ । 
मत्तो ऽप्य्‌ अधिको ऽस्ति वायुः। अथ तेन वायुर्‌ आहूतः । पिके ' "° 
अस्मे प्रयच्छामि । सात्रवीत्‌ । तात ' अतिचपतो ऽयम्‌ । तट्‌ 
अस्माद्‌ अप्‌ अधिकः कश्चिद्‌ आनीयताम्‌ । मुनिर्‌ आह । 
भो वायो ' तवत्नो ऽप्य्‌ अधिको ऽस्ति कश्चित्‌ । पवनेनो क्तम्‌ । 
मत्तो ऽप्य्‌ अधिको ऽस्ति पवेतः। अथ मुनिः पवे्म्‌ आहूय 
कन्याम्‌ उवाच । पुचिके ' अस्मे लां प्रयच्छामि । साह । तात 
कटठिनात्मको ऽयं स्तन्धश् च । तट्‌ अन्यस्मे देहि माम्‌ । मुनिना 
पवेतः पृष्टः । भोः पवेतराज ' त्वट्‌ अप्‌ अधिको ऽस्ति कश्चित्‌ । 
गिरिणोक्तम्‌ । मत्तो ऽप्य्‌ अधिकाः सन्ति मूषकाः। मुनिना मूषकम्‌ 
आहूय तस्या अटदशेयत्‌ ' आह च । पुिके ' एष प्रतिभाति ते “ 
` - मूषकः । सापि तं दृष्टा ' स्वजातीयः ' इति मन्यमाना पुतको- 
इुषितशरीरोवाच । तात ' मां *मूषिकीं कृत्वास्मे प्रयच्छ ' येन 


50०1 1771. गप्र ^ 28 07 2 06 ^ पा) प 05. 216 
78711680, ¶ 216 अप : 810 11086 0 प& 28 ६0०10. 


स्वजातिविहितं +गृहिणीधमेम्‌ अनुतिष्ठामि । सो ऽपि स्वतपो- 
बलेन तां मूषिकीं कृत्वा तस्मे प्रादात्‌ ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि । सूर्य भतांरम्‌ उत्सुज्य ' इत्यादि । अथ रक्ताचचवचनम्‌ अनादृत्य 8 
तैः स्ववंशविनाशाय स स्वदुगेम्‌ उपनीतः । नौयमानश चान्तर्लोनम्‌ अवहस्य सिरजीवी 


व्यचिन्तयत्‌ । 
हन्यताम्‌ इति येनोक्तं । स्वामिनो हितवादिना । 6 


स एवैको ऽ च सर्वेषां ' नोतिशास्तरार्थतत््ववित्‌ ॥ १९२॥ 
तद्‌ यदि तस्य वचनम्‌ +अकरिष्यत्न एते । ततो न स्वल्यो ऽप्य्‌ अनर्थो ऽभविष्यद्‌ 
एतेषाम्‌ । अथ दुगेद्वारं प्राप्यारिमदेनो ऽब्रवीत्‌ । भो भो हितिषिणो ऽस्य श्थिरजोविनो 9 
यथासमीहितं स्थानं प्रयच्छत । तच्‌ च श्रुता स्थिरजीवी व्यचिन्तयत्‌ । मया तावद्‌ 
एतेषां वघोपायश्‌ चिन्तनीयः । स च मध्यस्येन न साध्यते ' यतो मदीयम्‌ इङ्कितादिकं 
विचारयन्तस्‌ ते ऽपि सावधाना मविष्यन्ति । दुगेद्ारम्‌ एवातो ऽभिपरितं साधयामि । 19 
इति निित्योल्‌कपतिम्‌ आह । देव ' युक्तम्‌ इदम्‌ । यत्‌ स्वामिना प्रोक्तम्‌ । परम्‌ 
अहम्‌ अपि नोतिन्नस्‌ ते हितश च । यद्य अप्य्‌ अनुरक्तः सुचिः । तथापि दुगेमध्य 
आवासो नहः । तद्‌ अत्रैव दुगेद्वारस्थः प्रत्यहं भवत्पाद पद्य रजःपविच्ीकृततनुः सेवां 15 
करोमि । तथा । इति प्रतिपत्नै प्रतिदिनम्‌ उल्‌कपतिसेवकास्‌ ते प्रकामम्‌ आहारं 
छल्वोल्‌कराजादे शात्‌ प्रृष्टमांसाहारं खिर जीविने प्रयच्छन्ति । अथ कतिपयैर एवा- 
होमिर्‌ मयूर इव स बलवान्‌ संवृत्तः । अथ रक्ताक्षः स्थिरजीविनं पोष्यमाणं दृष्टा 18 
सविस्मयो मन्त्रिजिनं राजानं च प्रत्य्‌ आह । अहो ' मूख ऽयं मन्त्रिजनो भवांश चैति । 
एवम्‌ अहम्‌ अवगच्छामि । उक्तं च । 

पर्वं ताव्‌ अहं मूर्खो । दितीयः पाशबन्धकः। 21 

ततो राजा च मन्त्री च ' सर्वे वै मूखंमण्डलम्‌ ॥ १९३॥ 
ति प्राङ्गः। कथम्‌ एतत्‌ । रक्ताः कथयति । 


॥ कया १४ ॥ ं € 24 


अस्ति कस्मिंशित्‌ पवेतेकदेशे महावृषः । तच च को ऽपि पक्षी 
प्रतिवसति ' यस्य पुरीषे सुवणेम्‌ उत्मद्यते । अथ कदाचित्‌ तम्‌ 
उदेशं व्याधः को ऽपि समाययौ । स च पक्षी तटयत एव 
पुरीषम्‌ उत्ससजं । अथय पातसमकाल्म्‌ एव तत्‌ सुवणीभूतं दृषा 


वप ^ 07 (प 05 ^ प्राः) प 0015. 5800६ वा. 21 
व 216 ऋः 8170 1086 0४& 28 2०1. 2 78116-8६07 ४, 


व्याधो विस्मयम्‌ अगमत्‌ । अहो ' मम शभुकालाट्‌ आरभ्य 
शकुनि बन्धव्यसनिनो ऽ शीति वाणि समभूवन्‌ " न च कटाचिट्‌ 
अपि प्िपुरीषे सुवे दृष्टम्‌ । इति विचिन्य तत्र वृक्षे पाशं * 
बबन्ध । अथासाव्‌ अपि पक्षी मूखों विश्वस्तचित्तो यथापूवेम्‌ 
उपविष्टः । तत्कालम्‌ एव पाशेन बद्धः । व्याधस्‌ तु तं पाशट्‌ 
उन्मुच्य पञ्ञरके संस्थाय निजावासं नीत्वा चिन्तयाम्‌ आस । 
किम्‌ अनेन सापायेनाहं करिथामि । यदि कदाचित्‌ को ऽप्‌ 
असुम्‌ इदृशं ज्ञात्वा राज्ञे निवेदयियति ' तन्‌ नूनं मम प्राणसं- 
श्यो ऽपि भवेत्‌ । अतः स्वयम्‌ एव पक्षिणं राज्ञे निवेदयामि । ° 
इति विचाये तथेवानुष्ितवान्‌ । अथ राजापि तं पर्णं दृष्ट 
विकसितनयनकमत्ठः परां तुष्टिम्‌ उपागतः प्राह । हंहो ' आरघ््‌- 
कपुरूषाः । एनं पिणं यत्नेन रत ' अश्नपानादिकं चास्य 
यथेच्छ प्रयच्छत । अथ मन्तिणाभिहितम्‌ । किम्‌ अनेनाखड्धेय- 
व्याधवचनंप्रत्ययमाचरपरिगृहीतेनाण्डजेन । किं कदाचित्‌ पसि- 
पुरीषे सुवणे संभवति । तन्‌ मुच्यतां पज्ञरबन्धनाट्‌ अयं पक्षी । ८ 
इति मन्विवचनाट्‌ राज्ञा मोचितो ऽसो पष्य उन्नतद्वारतोरणे 
समुपविश्य सुवणेमयीं विष्ठां कृत्वा ' पूवे तावद्‌ अहं मलों 
इति शछ्रोकं पटित्वा यथासुखम्‌ आकाशमार्गेण प्रायात्‌ ॥ 18 


अतो ऽहं ब्रवीमि । पूर्वे तावड्‌ अहम्‌ । इत्यादि । अथ ते पुनर्‌ अपि प्रतिकूलदेवतया 
हितम्‌ अपि रक्तारवचनम्‌ अनादृत्य भूयस्‌ तं प्रभूतमांसादिविविघाहारेण पोषयाम्‌ 
आसुः । 21 
े अथ रक्ताः स्ववग्यांन्‌ आद्य रहः प्रोवाच । अहो । एतावद्‌ एवखन्चुपतेः कुशलं 
दुर्गे च । तद्‌ उपदिष्टं मया ' यत्‌ कुलक्रमागतः सचिवो ऽभिधत्ते । तद्‌ वयम्‌ अन्यत्‌ 


पर्वेतदुर्गं संप्रति समाश्रयामः । उक्तं च । यतः। 24 
१ +: 


5001९ 717. ग्ट (^ 8 07 (पत 06 ^ परा) प्त 0015. 218 


ए12116-3101 ४. 216 डरः 1401 शात्‌ शवा 1261६81. 


अनागतं यः कुरूते स शोभते 

स *+शोचते यो न करोत्य्‌ अनागतम्‌ । 

वने वसन्न्‌ एव जराम्‌ उपागतो 8 

बिलस्य वाचा न कदापि हि श्रुता ॥ १९४॥ एप्‌ 
ति प्रोचुः । कथम्‌ एतत्‌ । रक्ताः कथयति । 


॥ कया ५१ ॥ € 


अस्ति कस्मिश्चिट्‌ वनोदेशे खरनखरो नाम सिंहः । कदाचिद्‌ ` 
इतश चेतश. च परिथिमन्‌ सुत्छामकण्ठो न किंचिद्‌ अपि सम्‌ 
आससाद । ततो ऽ स्तसमये महतीं गिरिगुहाम्‌ आसाद्य प्रविष्ट १ 
चिन्तयाम्‌ आस । नूनम्‌ एतस्यां गुहायां रचो केनापि सखेना- 
गन्तव्यम्‌ । तन्‌ निभृतो भूत्वा तिष्ठामि । अय गुहास्वामी दधि- 
सुखो नाम भृगालो इारि +फत्कतुम्‌ आरेभे । अहो *विला३ । 
अहो "+"वित्छा३ । इत्य्‌ उक्ता त्ष्णीभूय भूयो ऽपि तथेव प्रत्य 
भाषत । भोः ' किं न स्मरसि" यन्‌ मया त्या सह समय 
कृतो ऽस्ति ' यन्‌ मया बाह्यायातेन त्वं वक्तव्यः ! त्वया चाहम्‌ + 
आकारणीयः ' इति । तट्‌ अद्य मां नाद्धयसि । ततो ऽहं हितीयं 
तद्‌ एवं ॒वबिल्टं यास्यामि ' यत्‌ पश्चान्‌ माम्‌ आद्धास्यति । 
अथ तच्‌ त्वा सिंहशण चिन्तितवान्‌ । नूनम्‌ अस्यायातस्येषा 1 
गुहा सदा समाड्वानं करोति ' परम्‌ अद्य मट्‌ भयान्‌ न किंचिद्‌ 
ब्रूते । युक्तं चेतत्‌ । 

भयसंचस्तमनसां ' हस्तपादादिका क्रिया । 

प्रवतेते न वाणी च ' वेपथुश चाधिको भवेत्‌ ॥१९५॥ 
तट्‌ अहम्‌ अस्याद्धानं करोमि ' येन तदनुसारेण प्रविष्टो ऽयं मे 
भोज्यताम्‌ एति । णवं संप्रधाय सिंहम्‌ तस्याद्धानम्‌ अकरोत्‌ । 


प्र ^ 07 ¶1प्ए 08 ^ प्र) वरप 0018. 500 गा. 219 


¶816 ऋ: 1.10 20 कद 12621. ए7व7116 51019. 


अथ सिंहश्ब्देन सा गुहा प्रतिरवप्रणेदिगाभोगान्यान्‌ अपि 

दूरस्थान्‌ अरण्यजीवांस्‌ चासयाम्‌ आस । णुगात्ो ऽपि पला- 

यमान इमं शछ्चोकम्‌ अपठत्‌ । अनागतं यः कुरूते स शोभते ' २ 
इत्यादि ॥ 


तट्‌ एवं मत्वा युष्माभिर्‌ मया सहागम्य्ताम्‌ । इत्य्‌ अर्वेधायूत्मानुयायिपरिवारा- 
नुगतो रक्तात्लो दूरदेशान्तरं जगाम। 6 
अथ रक्ताक्ते गते खिरजीव्य्‌ अतिहृष्टमना व्यचिन्तयत्‌ । अहो ' कल्याणम्‌ अस्माकम्‌ 
उपस्थितम्‌ । यड्‌ रक्तात्ञो गतः । यतः स दींदर्शो । एते च मूढमनसः । ततो मम 
सुखधघात्याः संजाताः । उक्तं च । यतः । 9 
न दीर्धदरशिनो यस्य ' मन्त्रिणः स्युर महौपतेः। 
क्रमायाता धुवं तस्यं ' न चिरात्‌ सयात्‌ परि षयः ॥ १९६॥ 
अथवा साध्व्‌ इद्म्‌ उच्यते। 12 
मन्िरूपा हि रिपवः । संभाव्यन्ते विचक्षणः । 
ये सन्तं नयम्‌ उत्सुज्य । सेवन्ते प्रतिलोमतः ॥ १९७॥ 
एवं विचिन्त्य स्वकुलाय >*एकेकां वनकाष्ठिकां गुहादीपनार्थं दिने दिने म्रकिपति । न 15 
च ते मृखां उलूका जानन्ति ' यद्‌ एष कुलायम्‌ अस्महाहाय वचिं नयति । अथवा 
साध्व इद्म्‌ उच्यते। 
अमिचं कैरते मिचं ' मिचं दष्ट हिनस्ति यः। 18 
भिचाणि तसं नश्यन्ति ' अमितं नष्टम्‌ एव च ॥१९८६॥ 
अथ कुलायव्याजेन दुरगदवारे छते काष्टनिचये संजाते सूर्योदये ऽन्धतां प्रा्िषुल्केषु स्थिर 
जीवी शीघ्रं गला मेघवर्ण॑म्‌ आह । सामिन्‌ । द्‌ाहसाध्या कतां मया रिपुगहा । तत्‌ 21 
सपरिवारः समेधकेकां वनकाष्ठिकां ज्वलन्तीं गृहीत्वा गुहादरि ऽस्मत्कुलाये प्रतिप । 
येन सर्वशचवेः कृ्मीपाकनरकप्रायेण दुःखेन सरियन्ते । तच्‌ कूत्वा प्रहृष्टो मेघवणं आह । 
तात ' कथयूत्मवृत्तान्तम्‌ । चिराद्‌ दृष्टो ऽसि। स आह । वत्स । नयं वक्तव्यस्य कालः । 24 
कदाचित्‌ तस्य रिपोः कञ्चित्‌ *+प्रणिधिर्‌ मनमेहागमनं निवेदयिष्यति । तज्ज्ञानाद्‌ अन्धो 
ऽन्यच्रापसरणं करिष्यति । तत्‌ लयैतां त्वर्यताम्‌। उक्तं च । 


शीघ्रहृत्येषु कर्यिषु ' विलम्बयति यो नरः । 7 
तत्‌ क्त्यं देवतास्‌ तस्य ' कोपाद्‌ विच्धन्त्य असंशयम्‌ ॥ १९९॥ 

तथाच। यस्य तस्य हि कार्यस्य ' फलितस्य विशेषतः । 
सिप्रम्‌ अक्रियमाणस्य ' कालः पिबति तद्रसम्‌ ॥ २००॥ 80 


तड्‌ *गृहायातस्‌ ते हतशचोः सर्वे निर्व्याकुलतया कथयिष्यामि । 


500 77. (पए ^ 07 (पए €0 8 ^ पा) वप्त 0.5. 220 


एि7व16-5॥0ा ष: चष्रदा ा €0 5 870त्‌ ०15. 


अथसौ तद्वचनम्‌ आकण्यं सपरिजन एकैकां ज्वलन्तीं वनकाष्ठिकां चञ्चुथेण गृहीत्वा 
तद्नृहादारे प्राप्य सिरजीविकृलाये प्राक्षिपत्‌ । ततः सवे ते दिवान्धा रक्ताचवाक्यानि 
सखरन्तः कुम्मीपाकन्यायम्‌ आपन्नाः । एवं शत्रून्‌ निःशेषतां नीत्वा भूयो ऽपि मेघवशंस्‌ 3 
तट्‌ एव न्यग्रोधपाद पदुरगे जगाम । 
ततः सिंहासनस्थो भूत्वा सभामध्ये प्रमुदितमनाः खिरजीविनम्‌ अपच्छत्‌ । तात । 
कथं त्या शचुमध्ये गतेन कालो यापितः । चतः। 6 
वरम्‌ अमरौ प्रदीप्रे *तु ' प्रपातः पुण्यकर्मणाम्‌ । 
न चारिजनसंसर्गो ' सुद्धर्तम्‌ अपि सेवितः ॥ २०१॥ | 
तद्‌ आकण स्थिरजीव्य्‌ आह । भद्र । 9. 
उपनतमयैर यो यो मागो हितार्थकरो भवेत्‌ 
स स निपुणया बुद्धा सेव्यो महान्‌ कृपणो ऽपि वा । 
करिकरनिभौ ज्याघाताङ्ौ महास्त्रविशारदौ 12 
रचितवलयैः स्त्रोवट्‌ बद्धौ करौ हि किरीटिना ॥ २०२॥ (१1 
शक्तेनापि सदा नरेन्द्र विदुषा कालान्तरापिक्षिणा 
वास्तव्यं खलु वाक्यवज्विषमे चुद्धे ऽपि पापे जने। 15 
दर्वीव्ययकंरेण धूममलिनेनायासयुक्तेन च 
भीमेनातिबलेन +मत्छभवने किं नो षितं सुद वत्‌ ॥ २०३॥ दद्ध 
यद्‌ वा तद्‌ वा विषमपतितं साधु वा गरहिंतं वा 18 
कालपिच्ती हृदयनिहितं बुद्धिमान्‌ कर्मं कुयात्‌ । 
किं गाण्डीवस्फुरदुरगुणास्फालनक्रूरपाणिर्‌ 
नासील्‌ लीलानटनविलसन्मेखलः सव्यसाची ॥ २०४॥ ९09पवह 21 
सिद्धिं प्रार्थयता जनेन विदुषा तेजो निगृह्य स्वकं 
सत्त्वोत्साहवतापि दैवविधिषु स्थेयं समीच्य क्रमम्‌ । 
देवेन्द्र द्र विणेश्चरान्तकसमैर अप्य्‌ अर्चितो भातुमिः 24 
किं क्किष्टं सुचिरं चिदण्डम्‌ अवहच्‌ द्ीमान्‌ न धर्मा्जः॥२०५॥ ष्व 
रूपाभिजनसंपत्नौ *कुन्तोपुचौ बलान्वितौ । 
गोकर्मसंख्याव्यापरि विरारगरे्यतां गतौ ॥ २०६॥ ५ 
खूपेणप्रतिमेन यौ वनगुशेर वंशे शुभे जातया 
कान्त्या ज्रीर्‌ इव यु सापि विदशां कालक्रमाद्‌ आगता। 
सैरन्ध्रीति सगर्वितं युवतिभिः साक्ेपम्‌ आन्नप्तया 80 
द्रौपव्या ननु मत्छराजमवने घृष्टं न किं चन्द्‌ नम्‌ ॥ २०७॥ ` , धद 
मेघवर्णं आह । तात › असिधारात्रतम्‌ दव मन्ये ' यड्‌ अरिणा सह संवासः । सो 
$त्रवोत्‌ । एवम्‌ एतत्‌ । परं न तादृग मूखंसमागमः क्रापि मया दृष्टः! न च महाप्राज्ञम्‌ 8 


पप ^ 07 वप्त 08 ^ का (प्र 015. 50० या. 221 


081168८0. ¶ 816 ऋणं: 7028 1106 2. 5€7€ा1६. 


अनेकशास्त्रेष्व्‌ अप्रतिहतवु्चिं रक्तात्तं विना धीमान्‌ । यत्कारणम्‌ ' तेन मदीयं यथा- 
वस्थतं चित्तं ज्ञातम्‌ । ये पुनस्‌ तर अन्ये मन्त्रिणः ' ते महामुखां मन्तिमाचव्यपदेशोप- 
जीविनो ऽ तत््वकुशलाः । यैर इदम्‌ अपि न ज्ञातम्‌ । 8 

अरितो ऽभ्यागतो भृत्यो । दुष्टस्‌ तत्सङ्गतत्परः । 

अपसप्यै सधर्मत्वान्‌ । नित्योद्ेगो च दूषितः ॥ २०८॥ 

आसने शयने याने ' पानभोजनवस्तुषु । 6 

दृष्टादृष्टाः प्रमत्तेषु ' प्रहरन्त्य अरयो ऽरिषु ॥ २०९॥ 

तस्मात्‌ सर्वप्रयत्नेन । चिवगैनिलयं बुधः । 

आत्मानम्‌ आदृतो रचचेत्‌ । प्रमाद्‌ट्‌ धि विनश्यति ॥ २१०॥ 9 
साधु चेदम्‌ उच्यते। 

दुमन्तरिणं कम्‌ उपयान्ति न नीतिदोषाः 

संतापयन्ति कम्‌ अपथ्यभुजं न रोगाः । 19 

कंओ्रीर्‌ न दपयति कंन निहन्ति मृत्युः 

कं स्वीकृता न विषयाः परितापयन्ति ॥ २११॥ १४६४ 

स्तब्धस्य नश्यति यशो विषमस्य मेची 15 

नष्टक्रियस्य कुलम्‌ अर्थपरस्य धमः । 

विद्याफलं व्यसनिनः छकपणस्य सौख्यं 

राज्यं प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य ॥२१२॥ ४858. 18 
तत्‌ । राजन्‌ । असिधाराव्रतं मयुचरितम्‌ अरिसंसर्गांत्‌ ' इति यद्‌ भवतोक्तम्‌ ' तन्‌ 
मया सा्षाट्‌ एवानुभूतम्‌ । उक्तं च । 

स्कन्धेनापि वहेच्‌ छ वुं ' कालम्‌ आसाद्य बुद्धिमान्‌ । 21 

महता कृष्णसर्पेण ' मण्डूका बहवो हताः ॥ २१३॥ 
मेघवणं आह । कथम्‌ एतत्‌ । ख्िरजीवी कथयति । 


॥ कथा १६ ॥ २५ 


अस्ति कस्मिंश्चित्‌ प्रदेशे परिणतवया मन्दविषो नाम कृष्णसपेः । 
स एवं चित्तेन समथिंतवान्‌ । कथं नाम मया सुखोपायवृ्या 
वतितव्यम्‌ ' इति । ततो बहुमरद्कं हदम्‌ उपगम्याधृतिपरीतम्‌ ° 
इवात्मानं टशितवान्‌ । अथ तथा स्थिते तस्मिन्‌ उट्कप्रान्तगते- 
नैकेन मरट्केन पृष्टः । माम ' किम्‌ अद्य यथापूवेम्‌ आहाथ 


5001 717. (प ए "# ^ 07 वप्र 08 ^ प्रा) वप्त 0.5. ५22 
¶ 216 ऋणं : ए7088 1106 2. 3€7ए€ा1६, 
न विहरसि । सो ऽब्रवीत्‌ । भद्र ' कुतो मे मन्दभाग्यस्याहारे 
ऽभिल्ाषः । यत्कारणम्‌ ' अद्य राच प्रदोष एव मयाहाराथे 
विहरमाणेन दृष्ट एको मण्डूकः । तद्रूहणाथे मया कमः सज्जितः । * 
सो ऽपि मां दषा मृत्युभयेन स्वाध्यायप्रसक्तानां बाद्यणानाम्‌ 
अन्तर अपक्रान्तो न विभावितो मया क्रापि गतः । तत्सादुश्य- 
मोहितचितच्तेन मया कस्यचिद्‌ ब्राह्यणसूनोर्‌ हदतट^"जत्ठान्तःस्थो 5 
ऽङ्क्टो दष्टः । ततो ऽसौ सपदि पञ्चत्वम्‌ उपगतः । अथ तत्परा ¦ 
दुःखितेनाहं शः ' यथा । दुरात्मन्‌ ' त्वया निरपराधो यन्‌ 
मत्सुतो दष्टः ' तट्‌ अनेन दोषेण त्वं मरदकानां वाहनं भविष्यसि । ° 
तत्मरसादल्व्यजीविकया वतिष्यसे " इति । ततो ऽहं युष्माकं 
वाहनायेम्‌ आजगाम । 
तेन च सवेमर्डकानाम्‌ इटम्‌ आवेदितम्‌ । ततस्‌ तेः 

प्रहृष्टमनोभिः स्वैर एव गत्वा जलपादनाम्नो +टदुरराजस्य 
विज्लप्रम्‌ । अयासाव्‌ अपि मन्विपरिवृतः ' अत्यद्घुतम्‌ ' इति 
मन्यमानः ससंभ्रमं हूदाट्‌ उत्तीये मन्दविषस्य फणप्रदेशम्‌ अधि- 
रूढः । शेषा अपि यथान्ये तत्पृष्टोपरि समारुरुहुः । किं बहूना । 
तद्परे स्थानम्‌ अनाघ्रुवन्तस्‌ तस्यानुपदम्‌ एव धावन्ति । 
मन्दविषो ऽण्‌ आत्मपुच्यथेम्‌ अनेकप्रकारगतिविशेषान्‌ अदशे- 
यत्‌। अथ जलपादो ठब्धतटङ्कसंस्पशेमुखस्‌ तम्‌ आह । 

न तथा करिणा यानं ' तुरगेण रथेन वा । 

नरयानेन वा यानं ' यथा मन्दविषेण मे ॥२१४॥ भ 
अथान्येद्यु मन्दविष ख्ड्यना मन्दं मन्दं विसपेति । तद्‌ दुष्टा 
जलपादो ऽब्रवीत्‌ । भद्र मन्दविष ' यथाप्रूवे किम्‌ अद्य न 
सार्धृह्यते । मन्दविषो ऽ ब्रवीत्‌ । देव ' अच्याहारवेकस्यान्‌ न मे 


एप ^ 07 ¶प्2 405 ^ पा) ४ 0018. 800६ पा. 223३ 
वोढुं शक्तिर अस्ति । अथासाव्‌ अव्रवीत्‌ । भद्र ' भय सुद्रम- 
रडकान्‌ । तच्‌ छू्ा प्रहषितसवेगा्ो मन्दविषः ससंभमम्‌ 
अव्रवीत्‌ । ममायम्‌ एव *विप्रशापो ऽस्ति । तत्‌ तवानेनाज्ञाव- ४ 
चनेन प्रीणितो ऽस्मि । तततो ऽसो नैरन्तर्येण मर्डकान्‌ भयन्‌ 
कतिपयेर णवाहोभिर्‌ बलवान्‌ संवृत्तः ' प्रहृ्टश चान्तत्ठीनिम्‌ 
अ वहस्येदम्‌ अव्रवीत्‌ । # 

मण्डका विविधा दय्‌ एत"चललपूर्वोपसाधिताः । 

कियन्तं काठम्‌ अक्षीणा ' भवेयुः खादतो मम ॥२१५॥ 
जत्छपादो ऽपि मन्दविषेण कृतकवचनव्यामोहितचिचः किम्‌ अपि * 
नावबुध्यते । अचान्तरे ऽन्यो महाकायः कृष्णसपैस्‌ तम्‌ उदेशम्‌ 
आयातः । तं च मर्टूकेर वाह्यमानं दष्टा स विस्मयम्‌ अगमत्‌ ' 
आह च । वयस्य ' यट्‌ अस्माकम्‌ अशनम्‌ " तेर वाद्ये । 
विरूडम्‌ एतत्‌ । मन्दविषो ऽब्रवीत्‌ । 

सवेम्‌ एतद्‌ विजानामि ' यथावाद्यो ऽसि ""ददुरेः । 

किंचित्कालं प्रतीते ऽहं ' घृतान्धो ब्राह्यणो यथा ॥२१६॥ 5 
सो ऽब्रवीत्‌ । कथम्‌ एतत्‌ । मन्दविषः कथयति । 


॥ क्या १७ ॥ 


अस्ति कस्मिशिट्‌ अधिष्ठाने यज्ञटच्चो नाम ब्राह्मणः । तस्य :5 
भाय. पुंशचस्य्‌ अन्यासक्तमना अजलं विटाय सखरडघुत^पूरान्‌ 
कृत्वा भु चौरिकया प्रयच्छति । अथ कदाचिद्‌ भां दृष्टा ' 
उक्ता च । भद्र ' किम्‌ एतत्‌ परिपच्यते ' कुर वाजस्रं नयसि । 
कथय सत्यम्‌ । सा चोत्पन्नप्रतिभा कृतकवचनेर्‌ भतांरम्‌ अनवीत्‌। 


500४६ 7711. वप ^ 07 पए 4008 ^ प्रा) (0 08. 224 
व 816 उण: (ष्ठन § 16९60६९. ¶ 816 अण: ए088 716 2 86106४६. 
अस्त्य्‌ अचर नातिदूरे भगवत्या देव्या आयतनम्‌ । तचाहम्‌ उपो- 
षिता सती बल्कि भष्यविशेषांश च]पूरवीन्‌ नयामि । अथ तस्य 
पश्यतो गृहीत्वा देव्यायतनाभिमुखी प्रतस्थे । यत्कारणम्‌ ' देव्या 9 
निवेदितेनानेन मदीयो भर्तिं मंस्यते ' यन्‌ मम ब्राह्मणी 
भगवत्याः कृते भघ्यविश्षान्‌ नित्यम्‌ एव नयति ' इति । अथय 
देव्यायतने गत्वा स्रानाथें नद्याम्‌ अवतीये यावत्‌ सलानक्रियां ० 
करोति ' तावद्‌ भतां मागान्तरेणागत्य देव्याः पृष्ठतो ऽदृश्यो ` 
ऽ वतस्थे । अथ सा ब्राह्मणी लात्वा टेव्यायतनम्‌ आगत्य लाननु- 
त्ेपनधूप॑वबल्विक्रियादिकं कृत्वा देवीं प्रणम्य व्यजिज्ञपत्‌। भग वत्ति ' ° 
केन प्रकारेण मम भतो भविष्यति । तच्‌ छ्ूता स्वरभेदेन 
देवीपृष्टस्थितो ब्राद्यणो जगाद्‌ । यदि. तस्य त्वम्‌ अजस्रं धृतधुत- 
पूरादि भ्यं प्रयच्छसि ' ततः शीघ्रम्‌ अन्धो भविष्यति । सा 
तु बन्धुकी कृतकवचनवज्चितमनास्‌ तस्मे ब्राह्मणाय तट्‌ एव 
नित्यं प्रददौ । अथान्येद्यु ब्राह्मणेनाभिहितम्‌ । भद्रे ' नाहं सुत्तरं 
पश्यामि । तच्‌ छरुत्वा चिन्तितम्‌ अनया । देवीप्रसादो ऽयम्‌ \ 
इति । अथ “तस्या हदयवल्लभो विटस्‌ तत्सकाशम्‌ ' अन्धीभूतो 
ऽयं ब्राह्यणः किं मम करिष्यति ' इति निःशङ्क प्रतिदिनम्‌ 
अभ्येति । अयान्यदयुस्‌ तं प्रविश्न्तम्‌ अभ्याश्गतं दुष्टा केशेर्‌ 
गृहीत्वा त्दगुडपाण्णिप्रहरिस्‌ तावद्‌ अताडयत्‌ ' यावद्‌ असौ 
पञ्चत्वम्‌ आप । ताम्‌ अपि दुष्टपत्नीं छिजिनासिकां कृवा 
विससजे ॥ श 


अतो ऽहं ब्रवीमि । स्वैम्‌ एतट्‌ विजानामि ' इत्यादि । 
अथ मन्दविषो ऽन्तर्दरीनिम्‌ अवहस्य पुनर अपि ' मर्डका 
विविधाः स्वादाय ' इति तद्‌ एवाब्रवीत्‌ । अथय जलपादस्‌ 


वप्त "# ^ 07 पए 08 ^ दा) वप्र 0018. 80० या, 225 
1416 अशा: ए7०ह७ 7106 9 8676६. एद71€-8107४, 
तच्‌ छूत्वा सुतराम्‌ आविम्रहृदयः ' किम्‌ अनेनाभिहितम्‌ ' इति 
तम्‌ अपृच्छत्‌ । भद्‌ ' किं त्वयाभिहितम्‌ इट्‌ विरूडवचः । अथा- 
साव्‌ आकारप्रच्छादनाथेम्‌ ' न किंचित्‌ ' इत्य्‌ अब्रवीत्‌ । तथव » 
कृतकवचनव्यामोहितचित्तो जत्पादस्‌ तस्य दुष्टाभिसंधिं नाववु- 
ध्यते । किं बहुना \ तथा तेन ते सवै ऽपि भिताः ' यथा 
बीजमाचम्‌ अपि नावशिष्टम्‌ ॥ ९ 


अतो ऽहं त्रवीमि। खन्धेनापि वहेच्‌ छतम्‌ ' इति । तथा ' राजन्‌ ' यथा मन्द्‌ विषेण 
बुद्धिबलेन मण्डूका निहताः ' तथा मयापि संवे वैरिणः ' इति । साधु चेदम्‌ उच्यते । 
वने प्रज्वलितो वह्विर्‌ ' दहन्‌ मूलानि रक्षति । 9 
समूलो दलनं कुर्या ' वार्योधो मृदु शौ तलः ॥ २१७॥ 
भेघवणों ऽब्रवीत्‌ । एवम्‌ एतत्‌ । अपि च । 
महत्त्वम्‌ एतन्‌ महतां ' नयालंकारधारिणाम्‌ । 12 
न मुञ्चन्ति यट्‌ आरब्धं । छक्र ऽपि सनोदये ॥ २१८॥ 
सो ऽब्रवीत्‌ । एवम्‌ एतत्‌ । उक्तं च । 
ऋणशेषम्‌ः अभ्निशेषं । शचुशेषं तथेव च । 15 
व्याधिशेषं च निःशेषं ' छता प्राज्ञो न सीदति ॥ २१९॥ 
देव । भाग्यवांस्‌ लम्‌ एवासि ' यस्यारब्धं सर्वम्‌ अपि संसिध्यति । तन्‌ न केवलं शौय 
छृत्यं साधयति । किं तु प्रज्ञया यत्‌ क्रियते ' तद्‌ एव विजयाय भवति । उक्तं च । 18 
शस्त्रैर हता न हि हता रिपवो भवन्ति 
प्रन्नाहतास्‌ तु रिपवः सुहता भवन्ति । 
शस्त्रं निहन्ति पुरुषस्य शरीरम्‌ एकं 21 
प्रज्ञा कुलं च विभवं च यशश्‌ च हन्ति ॥ २२०॥ १०७४ 
तद्‌ एवं प्रन्नापुरुषकाराभ्यां युक्तस्यायत्नेन कार्यसिद्धयः संभवन्ति । यतः। 
प्रसरति मतिः कार्यारम्भे दृढीभवति स्मरतिः 2५ 
सखयम्‌ उपनमन््य्‌ अथां मन्त्रो न गच्छति विञ्चवम्‌ । 
स्फ़रति सफलस तकशा चित्तं समुन्नतिम्‌ अश्चुते 
मवति च रतिः खाघ्ये कृत्ये नरस्य भविष्यतः ॥ २२१॥ ए 27 
तथा नयल्यागशौयैसंपत्ने पुरुषे राज्यम्‌ ' इति । उक्तं च । 
त्यागिनि भूरे विदुषि च ' संस्गेरुचिर्‌ जनो गुणी भवति। 


गुणवति धनं धनाच्‌ छ्रीः ' ओ्रीमलत्य आज्ञा ततो राज्यम्‌ ॥ २२२॥ रा 30 
© & 


580० 17171. पत "४.८. 07 वप्त 08 ^ पा) ¶1प् ए 0018. /1.1741 


ए1्716-5६07 $: पप्र 07 ६70०8 271 ०१18. 


मेघवणं आह । नूनं सद्यःफलानि नोतिशास््राणि । चत्‌ त्वयूानुकृूल्येनानुप्रविश्यारिमदंनः 
सपरिजनो निःरेषितः। सिर जीव्य्‌ आह । 

तीच्णोपायप्रा्चिगम्यो ऽपि योऽर्थस्‌ 3 

तस्याप्य्‌ आदौ संश्रयः साधु युक्तः । 

उन्तुङ्गायः सारभूतो वनानां 

नानभ्यच्यं च्छिद्यते पादपेन्द्रः ॥ २२३॥ इमा 6 
अथवा ' स्वामिन्‌ ' किं तेनभिहितेन । यद्‌ अनन्तर काले क्रियार हितम्‌ असुखसाध्यं 
वा भवति । साधु चदम्‌ उच्यते। 


अनिधितिर अध्यवसायभीर्मिः 9 
पदे पदे दोषशतानि दशिभिः। 

फलैर विसंवादम्‌ उपागता गिरः 

प्रयान्ति लोके परिहासवस्तुताम्‌ ॥ २२४॥ पशपृ$8 12 


न च लघुष्व अपि कर्तयेषु धीमङ्धिर अनादरः कायः। यतः। 
>शच्यामि कतुम्‌ इदम्‌ अल्यम्‌ अयत्नसाध्यम्‌ 


अचराद्रः क इति छत्यम्‌ +“उपेच्तमाणाः। ` 15 

केचित्‌ प्रमत्तमनसः परितापदुःखम्‌ 

आपत्मरसङ्कसुलभं पुरुषाः प्रयान्ति ॥ २२५॥ २४३४ 
तट्‌ अव्य जितारेर्‌ मद्विभोर्‌ यथापूर्वं निद्रालाभो भविष्यति । उच्यते चैतत्‌ । 18 


निःसपें बद्धस वा ' भवने सुप्यते सुखम्‌ । 
दृष्टनष्टभुजंगे तु ' निद्रा दुःखेन लभ्यते ॥ २२६॥ 
तथा च। विस्तीणेव्यवसायसाध्यमहतां लिग्धैः प्रयुक्ताशिषां 21 
कायांणां नयसाहसोत्नतिमताम्‌ इ च्छांपदारोहिणाम्‌। 
मानोत्तेकपराक्रमव्यसनिनः पारं न यावट्‌ गताः 
सामे हृदये ऽ वकाश्विषया तावत्‌ कथं निवृतिः ॥ २२७॥ इत 24 
तद्‌ अवसितकायांरम्भस्य विश्राम्यतीव मे हदयम्‌ । तद्‌ इदम्‌ अधुना निहतकण्टकं 
राज्यं प्रजापालनतत्परो भूत्वा पु्रपौ चादि क्रमेणचलच्छच्तासनथ्री्रा चिरं भुं । अपि च। 
प्रजा न रज्ञयेद्‌ स्‌ तु ' राजा रक्षादिभिर्‌ गुणेः। र 
अजागलस्तनस्येव ' तस्य राज्यं निरर्थकम्‌ ॥ २२८॥ 
किं च। गुणेषु रागो वयसनेष्व अनादरो 
रतिः सुनीतेषु च यस्य भूपतेः । 80 
चिरं स भुङ्के चलचामरांशुकां 
सितातपचाभरणां नुपथियम्‌ ॥ २२९॥ 1 
न च तया, प्राप्तराज्यो ऽहम्‌ ' इति मता श्रीमदेनात्मा व्यसयितव्यः । यत्कारणम्‌ । 8 


व्र प् ^ 07 वप्त 0४8 ^) वप्र 0 ण्न8. 200 1. 


ए1व116-8(0ा ङ: पप्र 2 €0क5 2716 018. 


247 


चला हि राज्ञां विभूतयः । वंशारोहणवद्‌ राज्यलच्मोर्‌ दुरारोहा ' चषणविनिपातरता 
प्रयल्श्तेर अपि धार्यमाणा दुरधंरा ' स्वाराधिताप अन्ते विप्रलम्भिनी । वानरजातिर्‌ 
इवानिकचित्ता ' पद्यपत्चनोद कम्‌ इव]घरि तसंञ्चेषा । पवनगतिर्‌ इवातिचपला । +*अनायै- 3 
संगतम्‌ दवास्थिरा । आशीविष इव दुरुपचारा । संध्याथलेखव सुहर्तरागा । जलवुदुदा- 
लीव स्वभावभङ्गुरा । शरौरग्रृतिर्‌ इव छतघ्ना ' स्वभप्रलब्धद्रव्यराशिर इव ्षणदृष्टनष्टा । 


अपिच 


यदैव राज्ये क्रियते ऽभिषेकस्‌ 
तदैव बुच्चिर्‌ व्यसनेषु योज्या । 
घटा हि राज्ञाम्‌ अभिषेककाले 
सह]म्भसेवापदम्‌ उद्गिरन्ति ॥ २३०॥ 


न च कञ्चिद्‌ अनधिगमनीयो नामास्य आपद्‌ाम्‌ । उक्तं च । 


अपिच) 


अपिच। 


रामस्य त्रजनं बलेर नियमनं पाण्डोः सुतानां वनं 
वृष्णीनां निधनं नलस्य नृपते राज्यात्‌ परिथंशनम्‌ । 
नायाचार्यकम्‌ अजञुनस्य पतनं संचिन्त्य लङ्कश्वरे 

सर्वे कालवशाज्‌ जनो ऽच सहति कः कं परिचायते ॥ २३१॥ 
क्र स दशरथः स्वभे भूत्वा महन््र सुहृद्‌ गतः 

क्र स जलनिधेर्‌ वेलां बद्धा नृपः सगरस्‌ तथा । 

क्र स करतलाज्‌ जातो वैण्यः क सूर्यतनुर्‌ मनुर्‌ 

ननु बलवता कालेनेति प्रबोध्य निमीलिताः ॥ २३२॥ 
मान्धाता क्र गतस्‌ चिलोकविजयी राजा क्र सत्यत्रतो 
देवानां नृपतिर्‌ गतः क्र नघुषः सच्छास्त्रवित्‌ केशवः । 
मन्ये ते सरथाः सकुज्ञरवराः शक्रासनाध्यासिनः 

कालेनैव महात्मना ननु कृताः कालेन निनांिताः ॥ २३३॥ 


स च नुपतिस्‌ ते सचिवास्‌ ' ताः प्रमदास्‌ तानि काननवनानि। 
सचतेचताशच तानि च, कछतान्तदष्टानि नष्टानि ॥२३४॥ 


एवं मत्तकरिकणंचञ्चलां राज्यलच्सीम्‌ अवाप्य न्यायेकनिष्ठो भूत्व पसु ॥ 


समाप्तं चेदं 


6 9 


12 


1811 18 


संधिविग्रहादिषाङ्गणसंबद्धं काकोलूकोयं नाम तृतीयं तन्त्रम्‌ ' यस्यायम्‌ आद्यस्रोकः। 27 


न विश्वसेत्‌ पूर्वविरोधितसखय 

श चोस्‌ तु मिचरत्वम्‌ उपागतस्य । 
दुग्धां गुहां पश्चत घूकपूर्णी 
काकप्रणोतिन ज़ ता शनेन ॥ ३॥ 


30 


108 


॥ अहम्‌ ॥ 


अचेदम्‌ आरभ्यते लब्धप्रणाशं नाम चतुर्थं तन्त्रम्‌ ' यस्यायम्‌ आव्यश्रोकः। 
प्राप्तम्‌ अर्थं तु यो मोहात्‌ ' सान्त्नैः प्रतिमुञ्चति । 8 
स तथा वच्यते मूढो । मकरः कपिना यथा ॥१॥ 

राजपुचाः पृच्छन्ति । कथम्‌ एतत्‌ । विष्णशमां कथयति । 

असि समुद्रौपकण्डे महान्‌ सदाफलो जम्बृपादपः । तत्र रक्तमुखो नाम वानरः 

प्रतिवसति सख । अथ कद्‌ चित्‌ तख तरोर्‌ अधस्तात्‌ समुद्रसलिलान्‌ निष््रम्य विकरा- 

लसमुखो नाम मकरः सुकोमलवालुकासनाथे तीरोपान्ते न्यविशत । ततश्‌ च रक्तमुखेन 

प्रोक्तः । मवान्‌ अतिथिः । तद्‌ भक्षय मया द त्तान्य्‌ अमृततुल्यानि जम्बृफलानि । उक्तं च। 9 
प्रियो वा यदि बाद्ष्यो ' मूखैः पण्डित एव वा । | 
वैश्वदेवे तु संप्राप ' सो ऽतिथिः स्वगेसंक्रमः ॥२॥ 


न पृच्छेद्‌ गोचचरणं ' स्वाध्यायं देशम्‌ एव वा । । 19 
अतिधिं वैश्वदेवान्ते श्राद्धे च मनुर्‌ अव्रवीत्‌ ॥३॥ 

तथा च। दूरायातं पथश्रान्तं ' वेश्वदे वान्तम्‌ आगतम्‌ । 
अतिथिं पूजयेद्‌ यस तु ' स याति परमां गतिम्‌ ॥४॥ 15 


अन्यच्‌ च। अपूजितो ऽतिथिर्‌ यस्य ' गृहाद्‌ याति विनिःश्सन्‌ । 
गच्छन्ति पितरस्‌ तस्य । विमुखाः सह दै वतेः ॥५॥ 
एवम्‌ उत्का जम्बृफलानि तस्ये प्रददौ । सो ऽपि तानि भक्तयिला तेन सह चिरं 18. 
गोष्ठीसुखम्‌ अनुभूय भूयो ऽपि स्वगृहम्‌ अध्यासते । एवं नित्यम्‌ एव तौ वानरमकरौ 
जम्बूच्छायाधितौ विविधसाधुगोध्या कालं नयन्तौ सुखेन तिष्ठतः । सो ऽपि मकरो 
भक्षितशेषाणि जम्बूफलानि गृहं गत्वा सपत्न्याः प्रयच्छति । अथ तयन्यतमख्ित्न अहनि 21 
स पुष्टः । नाथ । क्ौवंविधान्य्‌ अमृतमयफलानि प्राप्नोषि । सो ऽब्रवीत्‌ । भद्रे । ममल्ि 
परमसुहृ्‌ रक्तमुखो नाम वानरः । स प्रीतिपूर्वम्‌ इमानि फलानि प्रयच्छति । अथ 
तयभिहितम्‌ । यः सदैवैदृशान्य्‌ अमृतफलानि भक्षयति । तस्य हदयम्‌ अमृतमयं भवि- २4 


पए 1088 07 0 पि" &एाणाकिल8. ८00 प. 229 


ए द16-8107४ : 4 € 81 €0८०त116. 


ष्यति । तद्‌ यदि मया भार्यया प्रयोजनम्‌ । तत्‌ तस्य हदयं मे प्रयच्छ । येन तद्‌ 
भक्षयिता जरादिरहिता तया सह क्रोडामि । सो ऽब्रवीत्‌ । भद्रे ' एकं तावत्‌ 
प्रतिपन्तभराता सो ऽस्माकम्‌ ' अपरं फलदाता । ततो व्यापादयितुं न शक्यते । तत्‌ 3 
व्यजासुं मिध्याय्यहम्‌ । उक्तं च । 

एका प्रसूयते माता । दितीया वाक्‌ प्रसूयते । 

वाग्जातम्‌ अधिकं प्रोचुः ' सोदर्यांड्‌ अपि बान्धवात्‌ ॥ ६॥ 6 
साब्रवीत्‌ । लया मद्चनं कदाचिन्‌ नान्यथा छतम्‌ । तन्‌ नूनम्‌ एषा वानरौ भविष्यति । 
तदनुरागतस्‌ तं सकलम्‌ अपि दिनं तत्र गमयसि । ततो मे वाञ्छितं न प्रयच्छसि । 
अतः कारणान्‌ मया सह संगमे प्राति राच्रौ प्रायो तवहजञ्वालासमं प्रोच्छरसिसि ! 9 
कण्ठाश्चेषे चुम्बने च मयि शिथिलताम्‌ आलम्बसे । तन्‌ नूनं तव हृदये काचिद्‌ अपरा 
महिला स्थिता । अथासौ सपत्न्याः पुरतः सुदीनम्‌ उवाच । 

मयि त्वत्पाद पतिते ' किंकरत्वम्‌ उपागते । 12 

त्वं प्राणवल्लभे कस्मात्‌ ' कोपने कोपम्‌ एष्यसि ॥७॥ 
सुपि तद्रचनम्‌ आकण्य]रुक्षतसुखी तम्‌ उवाच । 


साधं मनोरथशतेस्‌ तव धूतं कान्ता 15 
सेव सिता मनसि छृचिमभावरम्या । 

अस्माकम्‌ असि न च किंचिद्‌ इहवकाशस्‌ 

तस्मात्‌ कृतं चरणपातविडम्बनाभिः ॥८॥ २858 18 


अपरम्‌ । यदिते न वल्लभा सा। तत्‌ किं मया प्रोक्तो ऽपि न व्यापादयसि । अथ 
स मकरः । तत्‌ कस्‌ तेन सह तव सेहः । तत्‌ किं बहना । यदि तस्य हद्यं न भक्षयामि । 
तदा तवोपरि प्रायोपवेशनं छत्रा प्राणांस्‌ त्यच्यामि । 21 
एवं तस्या निश्चयं ज्ञात्वा चिन्ताकुलितचित्तः स प्राह । अहो ' साध्व इदम्‌ उच्यते । 
वज्रलेपस्य मूर्खस्य ' मारीणां ककंरस्य च । 
एको ग्रहस्‌ तु मीनानां । नीलीमव्यपयोस्‌ तथा ॥९॥ 24 
तत्‌ किं करोमि । कथम्‌ असौ मे वध्यः स्यात्‌ । इति विचिन्त्य वानरपा््च॑म्‌ अगमत्‌ । 
वानरो ऽपि तं चिरायातं सोद्वेगम्‌ इवूालोक्य प्राह । भो मिच। किम्‌ अद्य चिरवेलया 
समायातो ऽसि। कथं साद्हादं न्‌ालपसि ' न च सुभाषितादि पठसि । सो ऽत्रवीत्‌। 7 
भित्र ' अव्यां तव अातृजायया निष्ुरगिरुभिहितः । यथा । भोः छतघ्र । मामे 
त्वं स्वमुखं दशय । यतस्‌ तवं प्रतिदिनं भिचम्‌ उपजीवसि । न च तस्य सखगृहद्वारदशने- 
नापि प्रत्युपकारं करोषि। तत्‌ ते प्रायश्चित्तम्‌ अपि नासि । उक्तं च। 80 
ब्रह्मन्न च सुरापे च ' चौरे भम्रत्रते तथा । 
निष्कृतिर्‌ विहिता सद्धिः ' छतन्ने नास्ति निष्कतिः ॥ १०॥ 
तत्‌ स्वं मम देवरं प्रत्युपकारार्थं गृहम्‌ आनय । नो चेत्‌ ' तया सह मे परलोकि द शनम्‌ । ॐ 


5001 7४. (1 प 1085 07 08 @अ्णणा68 ; 230 


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तद्‌ अहं तया मरोक्तस्‌ तव सकाशम्‌ आगतः। तेन मे तया सह दर्थे कलहायमानस्येयती 
वेला बभूव । तद्‌ आगच्छ मे गृहम्‌ । तव भातृजाया रचितचतुष्का प्रगुणि्त॑वस््रमणिंमा- 
णिक्यीयुचित॑सत्कारद्वारंदे शं बद्धवन्द न॑मालिका सोत्कण्ठा तिष्ठति । मकेट आह । मो 8 
मिच्र । उचितम्‌ अभिहितं मे चातुपल्न्या । उक्तं च ' यतः। 
ददाति प्रतिगृह्णाति ' गृह्यम्‌ आख्याति पृच्छति । 
भुङ्क भोजयते चव । षद्धिधं प्रोतिल्षणम्‌ ॥ ११॥ 6 

परं वनचरा वयम्‌ । युष्मदीयं च जलान्तर्‌ गृहम्‌ । तत्‌ कथं तच गन्तं शक्यते । तस्मात्‌ 
ताम्‌ अपि भातुपत्नीम्‌ अच्रानय ' येन प्रणम्य तस्या आशीर्वादं गृह्णामि । सो ऽत्रवोत्‌। 
मित्र ' असि समुद्रान्तः सुरम्ये पुलिनप्रदेशे ऽ सखमद्गुहम्‌ । तन्‌ मम पुष्टम्‌ आरूढः सुखेनाकृं- 9 
तोभयो गच्छ । सो ऽपि तच्‌ छ्रूला सानन्दम्‌ आह । भद्र ' यद्य्‌ एवम्‌ । तहिं ' लर्यताम्‌ । 
किं विलम्बितेन । एषो ऽहं तव पृष्ठम्‌ आरूढः । तथानुष्ठिते ऽगाधे जलधौ गच्छन्तम्‌ 
आलोक्य भयचस्तमना वानरः प्रोवाच । भातः ' शनैर्‌ गम्यताम्‌ । ज्ञाव्यते जलकल्लोलैर्‌ 12 
मे शरीरम्‌ । तच्‌ कूत्वा मकरा चिन्तयाम्‌ आस ! एष तावन्‌ मत्पुषठच्युतो ऽगाधसलि- 
लतवात्‌ तिलमाचम्‌ अपि गन्तुं न शक्तः ' इति मम वशीभूतः । तत्‌ कथयाम्य्‌ अस्य 
स्वाभिप्रायम्‌ ' येनाभीष्टदेवताम्‌ अनुसरति । उक्तवांश च । भद्र । मया तवं भार्या- 15 
वाक्येन विश्वास्य वधार्थम्‌ आनीतः। तत्‌ स्मर्यताम्‌ अभीष्टदेवता । सो ऽब्रवीत्‌ । भातः । 
किं मयापकृतं तस्या भवतो वा । येन वधोपायश्‌ चिन्तितः । मकर आह । भोः । 
तस्यास्‌ तावद्‌ अमृतरसफलास्वाद नसुस्वाद तस्‌ तव हृदयस्य भक्षणे दौहदः संजातः । 15 
तिनेतद्‌ अनुष्ठितम्‌ । ततः प्रल्युत्पत्नमतिर्‌ वानरः प्राह । भद्र । चब्य्‌ एवम्‌ । किं तया 
+*तचरैव मम न कथितम्‌ येन जम्बृकोररान्तर स्थापितं सुस्वादु हदयं सहैव समानेष्यम्‌ । 
तद्‌ वृथाहं स्वादुहदयेन विना श॒न्यहृदयो ऽच्रानीतः । तच्‌ दरूला मकरः सानन्दम्‌ 21 
आह । भद्र । यद्य्‌ एवम्‌ । तद्‌ अर्पय मे तद्‌ एव हदयम्‌ । येन सा दुष्टपत्नी तद्‌ 
भक्षयित्वा त्र अनशनान्‌ निवर्तते । अहं च त्वां च तम्‌ एव जग्बूपादपं प्रापयामि । 

एवम्‌ उत्का निवृत्य तद्‌ एव जम्बृतर्तलम्‌ अगमत्‌ । वानरो ऽपि जल्यितविविध- 24 
देवतोपयाचितशतः कथम्‌ अपि जलधितीरम्‌ आसाद्य दीघदीघतरक्रमचङ्कमणेन तम्‌ 
एव जम्बूपाद् पम्‌ आरूढश्‌ चिन्तयाम्‌ आस । अहो । मया लब्धाः प्राणाः । अथवा साध्व्‌ 


इदम्‌ उच्यति । 9 
न विश्वसेद्‌ अविश्वस्ते ' विश्वस्ते ऽपि न विश्वसेत्‌ । 


विश्वासाद्‌ भयम्‌ उत्पन्नं ' मूलाद्‌ अपि निकृन्तति ॥ १२॥ 
तन्‌ मभैतद्‌ अद्य पुनजन्मदिनम्‌ इव संजातम्‌ । मकर आह । मो मिच । अपय मे 8 
हद यम्‌ । येन ते धातुपत्नी तट्‌ भक्षयिलुनशनाद्‌ उत्तिष्ठति । अथ विहस्य निभेत्संमानो 
मकैट आह । धिग. मूखं ' विश्चस्तघातक । किं कस्यचिद्‌ धृदयं द्वितीयं भवति । तद्‌ 
गम्यतां स्वस्थानम्‌ । अस्य जम्बवृत्तस्य]धस्तान्‌ न पुनर्‌ आगन्तव्यम्‌ । इति । उक्तं च । 8 


०, ¶प्् ^+ए7 ^ प्त) एप्त ©206071/ए. 8०0४ ए. 231 


078116-81079. ¶81€ 3: ए702*5 € १€०&€ ०१716898 1४861. 


सरट्‌ दुष्टं च यो मिचं । पुनः संघातुम्‌ इच्छति । 

स मृत्युम्‌ उपगृह्ताति ' गर्भम्‌ अश्वतरी यथा ॥ १३॥ 
तच्‌ कुला सविलच्तो मकरश्‌ चिन्तितवान्‌ । अहो । किं मूढेनास्य स्वाभिप्रायो निवेदितः। 8 
तद्‌ यदि कथंचित्‌ पुनर्‌ अपि विश्वासं गच्छति ' तद्‌ भूयो ऽपि विश्वास्यामि । इति 
विचिन्त्य प्रोवाच । मि, *+अस्या न किंचिद्‌ धुद्येन प्रयोजनम्‌ । मया तव हद्याभि- 
प्रायपरीक्णाथ हास्येनेदम्‌ अमिहितम्‌ । तद्‌ आगच्छं प्राघुणकन्यायेन]स्मद्‌ावासम्‌ । 6 
त्वद्खातुपत्नी लां प्रत्य उत्कण्टोत्कण्डा तिष्ठति । वानर आह । भो दुष्ट । गम्यताम्‌ 
अधुना । नहम्‌ आगमिष्यामि । यतः । 

बुभुल्तितः किं न करोति पापं 9 

त्ोणा नरा निष्करुणा भवन्ति । 

आख्याहि भद्रे प्रियदशंनस् 

न गङ्गदत्तः पुनर्‌ एति कूपम्‌ ॥ १४॥ ४९ 19 
मकर आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽत्रवोत्‌ । 


॥ कथा १॥ 


अस्ति कुचापि क्पे गङ्गटत्नो नाम मण्ुकराजः । स॒ कटाचिट्‌ "ऽ 
दायदेर उद्वेजितो ऽरघटषटीमालाम्‌ आरुह्य कूपात्‌ क्रमेण 
निष्कान्तः । अथ तेन चिन्तितम्‌ । कथं तेषां दायादानां मया 
प्रत्यपकरणी यम्‌ । उक्त च । 18 
आपदि येनो पकृतं ' येन च हसितं दशसु विषमासु । 
उपकृत्य तयोर्‌ उभयोः ' पुनर्‌ अपि जातं नरं मन्ये ॥१५॥ > 
इति । एवं चिन्यन्‌ स विले प्रविशन्तं प्रियदशेनाभिधं कृष्णसर्पम्‌ ? 
अपश्यत्‌ । तं दृष्टा भूयो ऽप्‌ अचिन्तयत्‌ । एनं कृष्णसर्पं तत्र 
कूपे नीवा सकलदायादानाम्‌ उच्छेदं करोमि । उक्तं च ' यतः । 
शचरुम्‌ उत्माटयेत्‌ प्राज्ञस्‌ ' तीर्णं ती स्णेन शचुणा । ५ 
*व्यथाकरं सुखाथांय ' करटकेनेव करटकम्‌ ॥१६॥ 
एवं संपरिभाव्य वित्वद्वारं गत्वा तम्‌ आहूतवान्‌ । ण्य्‌ एहि ' 


50०० 7४. (प 1.088 0 0224 अणा 268; 82 
प्रियदशेन ' एहि ' इति । तच्‌ छूतवा सपश चिन्तयाम्‌ आस । य 
एष माम्‌ आदयति ' स स्वजातीयो न भवति । नैषा च 
सपेवाणी । अन्येन केनपि सह मम मत्येत्ोके संधानं नास्ति । ° 
तट्‌ अनैव स्थितस्‌ तावट्‌ वेदि ' को ऽयं भविष्यति । उक्ती 
च ' यतः । 

यस्य न ज्ञायते शीत्टं' न कुलं न पराक्रमः । 6 

न तेन संगतिं कु्याट्‌ ' इत्य्‌ उवाच वृहस्यतिः ॥१७॥ | 
कदाचित्‌ को ऽपि मन्तवाद्य्‌ ओषधिचतुरो वा माम्‌ आहूय 
बन्धने सिपति । अथवा कश्चित्‌ पुरूषो वेरम्‌ अनुस्मृत्य कस्यचित्‌ ° 
पाक्षिकस्याे आदयति । आह च । को भवान्‌ । स आह । 
अहं गङ्कदच्लो नाम मणडकाधिपतिस्‌ तत्सकाशं मेच्यथम्‌ 
अभ्यागतः । तच्‌ छा सपे आह । भोः ' अश्रद्धेयम्‌ एतत्‌ ' ५ 
तृणानां बहूना सह प्रेमबन्धः । उक्तं च । 

यो यस्य जायते वध्यः " स स्वघ्ने ऽपि कथंचन । 

न तत्समीपम्‌ अभ्येति ' तत्‌ किम्‌ एतत्‌ प्रजस्यसि ॥१४॥ ७ 
गङ्खदत् आह । भोः " सत्यम्‌ सदम्‌ । स्वभाववेरी भवान्‌ अस्मा- 
कम्‌ । परं परिभवाद्‌ अहं त्रत्सकाशं प्राघ्रः । उक्तं च ' यतः। 

सवस्वनाशे संजाते ' प्राणानाम्‌ अपि संशये । 18 

अपि शच प्रणम्योचचे ' र छेत्‌ प्राणान्‌ धनानि च ॥१९॥ 
सपे आह । अथ कस्मात्‌ ते परिभवः । स आह । दायादेभ्यः । 
सर्पो ऽब्रवीत्‌ । तत्‌ क त आश्रयः ' हृदे ' कूपे ' वायाम्‌ ' तडागे 
वा । स आह । कूपे ममाच्रयः । सपे आह । तन्‌ नास्ति तच मे 
प्रवेशः । प्रविष्टस्य स्थानं नास्ति ' यच स्थितस्‌ ततव दायादान्‌ 
व्यापादयामि । तट्‌ गम्यताम्‌ इति । उक्तं च । २५ 


०१, व्र प् ^ ^) ¶1प् 606070711,2. 23001 1, %3ॐ 

यच्‌ छक्यं मसितुं मासं ' यस्तं परिणमेच च यत्‌ । 

हितं च परिणामे यत्‌ ' तट्‌ भ्यं भूतिम्‌ इच्छता ॥ २०॥ 
गङ्खटत्त आह । भोः ' समागच्छ त्वम्‌ । अहं सुखोपायेन तव तच ४ 
प्रवेशं करिष्यामि । तथा तस्य मध्ये जलो पान्ते रम्यतरं कोटरम्‌ 
अस्ति । तच स्थितस्‌ लवं त्ढरीलया तान्‌ दायादान्‌ साधयिषयसि । 
तच्‌ छत्रा सपों व्यचिन्तयत्‌ । अहं तावट्‌ वृद्धः । कदाचित्‌ 9 
कथंचिन्‌ मूषकम्‌ एकं प्राप्नोमि ' न वा । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ 
उच्यते। , 

यो हि प्राणपरिक्षीणः ' सहायः परिवजिंतः । ४ 

सो ऽति सवेसुखोपायां ' वृ्लिम्‌ आरभते बुधः ॥२१॥ 
एवं विचिन्य तम्‌ आह । भो गङ्गदत्त ' यद्य्‌ एवम्‌ ' तट्‌ अये 
भव ' येन तत्र गच्छावः । गङ्गद्च आह । भोः प्रियदशेन ' अहं “ 
त्वां सुखोपायेन तच नयामि स्थानं च दश्यिघामि । परं त्वया- 
स्मत्परिजनो रक्षणीयः । केवत्ठे यान्‌ अहं दशेयामि ' त एव 
भक्षणीयाः ' इति । सपं आह । भद्र ' सांप्रतं त्वं मे मिचत्वम्‌ 5 
उपागतः । तन्‌ न भेतव्यम्‌ । यट्‌ एव त्वाभिरूचितम्‌ ' तट्‌ 
एवाचरिष्यामि ' इति । एवम्‌ उक्ता वित्ठान्‌ निष्कम्य तम्‌ 
आलिङ्गय च तेनेव सह प्रस्थितः । अथ कूपान्तम्‌ आसाद्युरघटू- 
घटिकामार्गेण सपेस्‌ तेन सह तस्यात्छयं गतः । ततश च 
गङ्खदन्नेन कृष्णसपं कोटरे धृत्वा टशितास्‌ ते दायादाः । तेन 
च ते सर्वे शनैः शनैर भिताः । तदभावे केचित्‌ तदीया अपि 
साशङ् विश्वास्य निःशेषिताः । अथ सर्पेणाभिहितम्‌ । भद्‌ ' 
निःशेषितास्‌ ते रिपवः । तत्‌ प्रयच्छ मे किंचिद्‌ भोजनम्‌ ' 
यततो ऽहं त्वयानीतः। गङ्कदत्त आह । भद्‌ ' कृतं त्वया सिचकृत्यम्‌ । ५ 


प्र ॥ 


5001६ 70. (पए 1088 07 0 क्र 2*§ 6 णण 2868; 234 
तत्‌ सांप्रतम्‌ अनेनैव घटिकामार्गेण गम्यताम्‌ ' इति । सपं 
आह । भो गङ्कटच्च ' न सम्यग्‌ अभिहितं भवता । कथम्‌ अहं 
तच गच्छामि । मदीयविलदुगेम्‌ अन्ये र्डं भविष्यति । अच» 
स्थितस्य मे मरकम्‌ एकेकं स्वव्गीयम्‌ अपि प्रयच्छ । नो 
चेत्‌ , सवान्‌ अपि भर्यिष्यामि । तच्‌ छरुत्वा गङ्गदज्ञो व्याकु- 
ल्िितमना व्यचिन्तयत्‌ । अहो ' किम्‌ एतन्‌ मया कृतम्‌ एनम्‌ ® 
आनीय । तट्‌ यदि निषेधयिष्यामि ' तत्‌ सवान्‌ अपि भक्षयि- ` 
ष्यति । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । + 

यो ऽमित्रं कुरूते मित्रं ' वीयाभ्यधिकम्‌ आत्मनः । 9 
स करोति न संरिग्धम्‌ ' आत्मना विषभक्णम्‌ ॥२२॥ 
तत्‌ प्रयच्छाम्य्‌ अस्येकेकं दिनं प्रति सुहृदम्‌ अपि । उक्तं च। 
सवेस्वहरणे शक्तं ' शचुं वुद्धियुता नराः । २2 
तोषयन्‌ अस्यदानेन ' वाडवं सागरो यथा ॥२३॥ 
तथा च। 
सवेनाशे समुत्पन्ने ' अधं त्यजति परिडतः । 5 
अर्धेन कुरूते काये ' सवेनाशो हि दुःसहः ॥२४॥ 
तथा च। 
न स स्वस्यकृते भूरि ' नाशयेन्‌ मतिमान्‌ नरः । 18 
एतद्‌ एव हि पारिडत्यं " यत्‌ स्वस्पाट्‌ भूरिरक्षणम्‌ ॥ २५॥ 
एवं निश्ित्यूकेकं मणडवं नित्यम्‌ एवूादिश्त्‌ । सो ऽपि तं 
भक्षयित्वान्यम्‌ अपि तस्य परोक्षं भष्यति । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ ५ 
उच्यते । 
यथा हि मल्विनेर्‌ वस्त्रेर्‌ " यच तचो पविश्यते । 
एवं चल्ठितवृच्तस्‌ तु ' वृत्तशेषं न रसति ॥२६॥ ५ 


०४, वप्त ^? ^ पा) (प्र 60607011. 80०ह ए. 285 
अधथान्यस्मिन्‌ अहनि तेन मरद्कान्‌ भसयता गङ्गदत्तसुतः सुन- 
दन्लो नाम मरको भितः । तं दृष्टा गङ्गदत्तः सुतारस्वरेण 
वित्छत्ाप । ततः स्वपल्युभिहितम्‌ । ४ 

किं कन्दसि निराकन्द ' स्वपष्षक्षयकारक । 
स्व पक्षस्य क्षये जाते " परितरां कः करिष्यति ॥२७॥ 


तट्‌ अद्यापि चिन्यताम्‌ आत्मनो निष्कमणम्‌ ' अस्य वधोपायो ° 
वा । अथ गच्छता कालेन समस्ता अपि निःशेषितास्‌ ते 
मर्द्काः । केवल्टं गङ्गटच्स्‌ तिष्ठति । ततश च प्रियदशेनेनो क्म्‌ । 
भद्र. गङ्खट्च् ' वुभुशितो ऽहम्‌ । निःशेषितताः सर्वे मणदूकाः । तट्‌ » 
दीयतां किंचिद्‌ भोजनं मे ' यत्तो ऽहं त्वयानीतः। स आह । भो 
भित्र ' न त्वयाच विषये मयि विद्यमाने चिन्ता कायां । तट्‌ 
यदि मां प्रेषयसि ' तट्‌ अन्येषाम्‌ अपि कूपानां विश्वास्य सवान्‌ "2 
मरइकान्‌ अच्रानयामि । सो ऽब्रवीत्‌ । मम तावत्‌ त्वम्‌ अभध्यो 
अातृस्थाने। तट्‌ यद्य्‌ एवं करोषि ' तत्‌ सांप्रतं पितृस्थाने भवसि । 
तट्‌ एवं कृतोपायचिच्चस्‌ तस्मात्‌ कपान्‌ निष्कान्तः । प्रियदशेनो 
ऽपि तदागमनकाङ्कया तचस्यः *प्रतीक्माणस्‌ तिष्ठति । अय 
चिरात्‌ प्रियदशेनस्‌ तस्मिन्‌ एव कूपे ऽन्यकोटरवासिनीं गोधाम्‌ 
उवाच । भद्रे ' क्रियतां मे स्तोकं साहाय्यम्‌ ' यतश चिरपरिचितस्‌ "5 
ते गङ्खट्ः 1 तट्‌ गत्वा तत्सकाशं कुचचिज्‌ जत्रा श्ये मम संदेशं 
कथय ' यट्‌ आगम्यतां दुततरम्‌ एकाकिनापि भवता ' यद्य्‌ अन्य 
मरडका नागच्छन्ति । नाहं त्वया विना वस्तुं शक्रोमि । तथाहं 
यदि त्वां प्रति विरूडम्‌ आचरामि ' तन्‌ मदीयं जन्मसुकृतं तव 
इति । गोधा च तस्य वचनाद्‌ दुततरम्‌ अन्वि गङ्गदत्तम्‌ आह । 
भट \ तव सुहृत्‌ प्रियदणेनस्‌ तव मागे *समीसषमाणस्‌ तिष्ठति । 


5007 ४. (1 प 1088 07 08 अछा 768; 286 


¶ 216 1: ए708*5 € °€11&€ ०9९16208 1४६861४. एत716-8६07 ४, 216 1: 4.58 1४10६ 06€ का 270त €275. 


तततः शीघ्रम्‌ आगम्यताम्‌ । अपर च । तेन लां प्रति विरूपाच- 
रणा्थे जन्मसुकृतम्‌ अन्तरे धृतम्‌ । तन्‌ निःशङ्कन मनसा समा- 
गम्यताम्‌ ' इति । तच्‌ छूत्वा गङ्गदत्त आह । $ 
बुभुसितः किं न करोति पापं 
सीणा नरा निष्करुणा भवन्ति । ` 
आख्याहि भद्रे प्रियदशेनस्य 6 
न गङ्गट्तः पुनर्‌ रति कूपम्‌ ॥२४॥ 
एवम्‌ उक्कवा तां विसजेयाम्‌ आस ॥ 


तत्‌ ' भो दुष्ट जलचर ' अहम्‌ अपि गङ्गदत्त इव व्वव्गुहे न कथंचिद्‌ अष्य्‌ 9 
आयास्यामि । तच्‌ ह्रत्र मकर आह । भो मित्र ' नैतड्‌ युज्यते कर्तुम्‌ । सर्वधैव मे 
छृतघ्नतादोषम्‌ अपनय गृहागमनेन ' अन्यथा तवोपरि प्रायोपवेशनं करिष्यामि । वानर 
आह । मूढ । किम्‌ अहं लम्बकर्णो नाम *दृष्टापायो ऽपि स्वयम्‌ एव तत्रैव गलात्मानं 19 
व्यापादयिष्यामि । मकर आह । को ऽसौ लम्बकर्णो नाम । कथं +दृष्टापायो मृतः । तन्‌ 
मे निवेद्यताम्‌ ' इति । वानर आह । 


॥ कचा २॥ 18 


अल्ति कस्मिंशिट्‌ वनोदेशे करलकेसरो नाम सिंहः । तस्य च 
धूसरको नाम शृगालः सदानुयायी परिचारको ऽस्ति । अथ 
कटाचित्‌ सिंहस्य हस्तिना सह युध्यमानस्य शरीरे गुरुतरप्रहाराः + 
संजाताः । तैः पदम्‌ अपि चत्कितुं न शक्रोति । तस्य +चुचल नाट्‌ 
धूसरकः सुछषामकरटो टोबेस्यं गतो ऽन्यस्मिन्‌ अहनि तम्‌ 
अवोचत्‌ । स्वामिन्‌ ' बुभुक्षया पीडितो ऽहं पदात्‌ पदम्‌ अपि 
चत्टितुं न शक्रोमि । तत्‌ कथं ते भुश्वूषां करोमि । सिंह आह । 
भो धूसरक ' अन्वेषय विचित्‌ स्म्‌ ' येनेमाम्‌ अवस्थां गतो 
ऽपि व्यापादयामि । तच्‌ छरुत्वा भ्वृगात्नो ऽन्वेषणं कुवेन्‌ किंचित्‌ 


०१, प ^ ^) (7४ 060. 800 ण, 237 
समीपवतिनं मामम्‌ आसाद्य ठब्रकणेनामानं रासभं तडागोपान्ते 
प्रविरलदू वाङरणि कृच्छराट्‌ आस्वादयन्तं दृष्टवान्‌ । ततश च 
` तेन समीपवतिना भूत्वाभिहितः। माम ' मदीयो §यं नमस्कारः ऽ 
संभाव्यताम्‌ । चिराट्‌ दृष्टः। कथम्‌ एवं टुततं गतः । लष्कणे 
आह । भो भगिनीसुत ' किं करोमि । रजको ऽ तिनिदेयो माम्‌ 
अतिभारेण पीडयति ' घासमुष्टिम्‌ अपि न प्रयच्छति । केवत्ठ १ 
ममाच धूलिमिधिततानि दूवोङ्कराणि भक्षयतो नालि शरीरपु- 
टिः ' इति । णृगाल आह । माम ' यद्य्‌ एवम्‌ ' तट्‌ अस्ति 
"मरकतसदृश्श्ष्यप्रायो नदीसनायो रमणीयप्रदेशः । तत्रागत्य ° 
मया सह सुभाषितगोष्ठीसुखम्‌ अनुभवंस्‌ तिष्ठ । त्श्चकणे आह । 
भो भगिनीसुत ' युक्तम्‌ उक्तं भवता । परं साम्याः पश्वो 
ऽरण्यचराणां वध्याः । तत्‌ किं तेन भव्यप्रदेशेन । पुगात्ठ आह । 
मा मेवं वद्‌ । मद्धजपज्ञररधितः प्रदेशो ऽसो । तन्‌ नास्ति 
कस्यचिट्‌ अपरस्य तच प्रवेशः । परम्‌ अनेनव भवदीयविधिना 
रजककट्थितास्‌ तिस्रो रासन्यो ऽनाथा सन्ति । ता च पुष्टिम्‌ " 
आपन्ना योवनोत्कटा माम्‌ इदम्‌ आहुः । भो मातुल क ' त्वं कम्‌ 
अपि मामं गत्वास्मदुचितं पतिम्‌ आनय । तदये च त्वाम्‌ अहम्‌ 
आनेतुम्‌ आयातः । अथ भृगाल् वचनं श्रुत्वा कामपीडिताङ्खो 5 
लश्चकणेस्‌ तम्‌ उवाच । भद्‌ ' यद्य्‌ एवम्‌ ' तट्‌ अये भव । 
त्वरितं त्र गच्छावः । युक्तं चेतत्‌ । 

नामृतं न विषं किंचिद्‌ ' एकां मुक्ता नितबिनोम्‌ । 1 
जीव्यते सङ्कतो यस्या ' भियते च वियोगतः ॥२९॥ 
शृगालेन सहासो सिंहान्तिकम्‌ उपगतः । सिंहो ऽप्‌ अतिमूखे- 
तया कमान्तिकप्राप्रम्‌ अपि खरं दुष्टतिहषीट्‌ उत्ुत्य तदुपरि 


500 ४. प्र 1088 07 078 ल&प्यणाच€8); 238. 


¶21€ आ: 4.88 ग110 प 06281 2716 € 25, 


टूर गत्वा पपात । गदेभो ऽपि तं वजपातम्‌ इव मन्यमानः " 
किं किम्‌ इदम्‌ ' इति विचिन्तयन्‌ अछ्षततनुर्‌ ण्व देवात्‌ 
` कथम्‌ अपि तस्माट्‌ अपेतः । यावच्‌ च पश्चाट्‌ अवत्टोकयति ' * 
तावत्‌ क्रूरं रक्ताननयनम्‌ अतिभयानकम्‌ अदुष्टपूवे सचं दृषा 
भयातेस्‌ त्वरितपदं तट्‌ एव नगरं जगाम ' इति । 

अथ गोमायुना सिंहो ऽभिहितः । भोः " किम्‌ एतत्‌ । १ 
दृष्टस्‌ ते विक्रमो मया । अथ सिंहः सविस्मयम्‌ आह । भोः ' ` 
मया न क्रमः सज्जित आसीत्‌ । तत्‌ किम्‌ अहं करोमि । किं 
मत्कमाकान्तो गजो ऽपि गच्छेत्‌ । भृगात्ः प्राह । संप्रत्य अपि 
त्वया सज्जितक्रमेण स्थात्तव्यम्‌ ' यतः पुनर अष्य्‌ अहम्‌ णन 
त्वदन्तिकम्‌ आनेष्यामि । सिंहः प्राह । भद्र " यो मां प्रत्यक्षं 
दृष्टा गतः ' स कथं पुनर्‌ अच समेष्यति । तद्‌ अन्यत्‌ किंचित्‌ 
सच्म्‌ आनय । शृगालः प्राह । किं तवानया चिन्तया । अचार 
ऽहम्‌ एव जागरूकस्‌ तिष्ठामि । इत्य्‌ उक्ता णृगाल्ो रासभ- 
मार्गेण यावद्‌ गच्छति ' तावत्‌ तचैव स्थाने चरस्‌ तिष्ठति । 
अथय भुगाल दुष्टा रासभः प्राह । भो भागिनेय ' भव्यस्थाने 
त्वयाहं नीतः " यद्‌ देवान्‌ मृत्युवशं न गतः । तत्‌ कथय ' किं 
तत्‌ सखम्‌ अतिरोद्म्‌ ' यस्य वजोपमप्रहाराट्‌ अहं मुक्तः । तच्‌ ‡5 
छत्वा भुगालः प्रहसन्न्‌ आह । माम ' सा रासभी विहिताइूत- 
शृङ्गारा वाम्‌ अवलोक्य सानुणगालिद्धितुम्‌ उत्थिता ' त्वं च 
काततरतया नष्टः । तया पुनर्‌ नश्यतो भवतो ऽ बलखनाथे हस्तः 
प्रसारितः ' न चान्यद्‌ अचर कारणम्‌ । तट्‌ आगच्छ । सा त्वत्कृते 
प्रायोपवेशनकृतमतिर्‌ एतट्‌ वदति । यदि मे लब्वकणो भतो न 
भवति ' तद्‌ अहम्‌ अभ्रिं जके *वा प्रविशमि ' विषं वा 


०९, ¶ प्र ^? ^) ¶प्् 0600. 800४ क, 239 


¶ 216 31: 4.88 110४६ 1687६ 80 €275. 


भक्षयामि । तयापि तद्वियोगं सोहुं न शक्रोमि । तत्‌ प्रसादं कृत्वा 
तचागच्छ ' नो चेत्‌ ' स्त्रीहत्या ते भविष्यति ' मन्मथ च कोपं 
करिष्यति । उक्तं च। ध 

स्तीसुदां मकरध्वजस्य जयिनीं सवाथेसंपाटनीम्‌ 

एनां ये प्रविहाय यान्ति कुधियः स्वगापवर्गेच्छया । 

तदोषेर विनिहत्य ते दुततरं नस्रीकृता मुणिडताः कण 9 

केचिद्‌ रक्तपटीकृताश्च जटिलाः कापाल्किका् चापरे ॥३०॥ 
तथासौ तद्चनप्रत्ययितो भूयो ऽपि तेन सह प्रस्थितः । साध्व्‌ 
इदम्‌ उच्यते । 9 

जानन्‌ अपि नये देवात्‌ ' प्रकरोति विगहितम्‌ । 

कस्मेचित्‌ कमं किं ल्लोके ' गहितं रो चते कृतम्‌ ॥३१॥ 
अचान्तरे धूतेवचनश्तविप्रतारितो रासभः पुनर्‌ अय्‌ उपान्तिकम्‌ 
आगतः प्राक्सज्जितक्रमेण सिंहेन तत्कात्ठे व्यापादितः । तत्त च 
तं हत्वा भृगालं रक्षपालं विधाय स्वयं सानां नद्यां गते सिंहे 
प्ृगालेनातिल्लोस्यात्‌ खरस्य कणेहृदयं भधितम्‌ । लात्वा च " 
कृतयथो चित्तविधिः सिंहो सावट्‌ आगच्छति ' तावत्‌ कणेहृट्य- 
रहितं खरं दृष्टा कोपपरीतात्मा भृगालम्‌ आह । आः पाप ' 
किम्‌ इदम्‌ अनुचितम्‌ अनुष्ठितम्‌ ' यत्‌ कणेहृद्यभक्षणेनायम्‌ "5 
उच्छिष्टतां नीतः । णृगात्ः सविनयम्‌ आह । स्वामिन्‌ ' मा 
मेवं वद्‌ । कणेहृद यरहित एवायम्‌ आसीत्‌ । कथम्‌ अन्यथेहागत्य 
स्वयं त्वाम्‌ अवलोक्य भयाट्‌ गता भूयो ऽप्‌ आगतः । अत 
एवोच्यते । 
आगत च गतश चैव ' दुद्ुासौ त्रां भयानकम्‌ । 
अकणेहदयो मूख ' गत्वा यः पुनर्‌ आगतः ॥३२॥ ०५ 


500४ ए. पए 1088 07 08 अणा ४७8; 240 


216 आ: 438 काप 162६ 2 6875. ए व16-8107४. ¶ 816 14: ८०६८ 25 अश्मा१०४. 


अथ भृगात्वचनेन जातप्रत्ययः सिंहस्‌ तेनेव सह संविभज्याश- 
ड्ितिमनास्‌ तं भसितवान्‌ ॥ 


अतो ऽहं व्रवीमि । नाहम्‌ अपि लम्बकणो रासभः । इति । तत्‌ ' मूखं । कपटं छतं $ 
त्वया ' परं युधिष्ठिरेणेव सत्यवचनेन विनाशितम्‌ । साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 
स्वार्थम्‌ उत्सृज्य यो दम्भी ' सत्यं ब्रूते स मन्दधीः । 
स स्वाथांड्‌ ेश्चते नूनं । युधिष्ठिर इवापरः ॥ ३३॥ 6 
मकर आह । कथम्‌ एतत्‌ । वानरः कथयति । 


॥ कया 3 ॥ 


अस्ति कस्मिंधिट्‌ अधिष्ठाने को ऽपि कुम्भकारः । स कंटाचित्‌ 
प्रमच्तस्‌ तीष्टणयस्य भम्रभारडकपेरस्योपरि महता वेगेन धाव- 
मानः पपात । ततश च कपेरकोटया पाटितल्ल्ाटतटो रूधि- 
रा्रुतशरीरः कथंचिट्‌ उत्थितः । ततश चापथ्यसेवनात्‌ कपेर- ५ 
प्रहारः करात्छतां गतः । अथ कटाचिट्‌ दुभिषपीडते देशे 
छ्छषामो ऽसौ केश्चिट्‌ राजसेवंकेः सह देशान्तरं गत्वा राजसेवको 
बभूव । स च राजा तस्य लत्काटे ऽतिकरात्ाकारं कपेरप्रहारं ७ 
दष्टा चिन्तयाम्‌ आस । नूनं वीरपुरूषो ऽयं कश्चित्‌ । तेन ललाटे 
ऽस्य संमुखः प्रहारः । इति विचिन्त्य मानदानादिभिः सर्वेषाम्‌ 
अधिकं सप्रसाट्‌ तं पश्यति । ते ऽपि राजपुचास्‌ तस्य प्रसादा- ७ 
तिश्यं पश्यन्तः परम्‌ इषया वहन्तो ऽपि राजभयान्‌ न 
विंचिट्‌ ऊचुः । अथान्यस्मिन््‌ अहनि क्रियमाणायां वीरसंभाव- 
नायां *प्रकर्णमानेषु गजेषु संनद्यमानेषु वाजिषु विलोक्यमानेषु 
योद्ुषु भूभुजा स कुम्भकारः प्रस्तावे पृष्टः । भो राजपु ' किं ते 
नाम ' का च जातिः। कस्मिन्‌ संमामे प्रहारो ऽयं ते तत्काटे 


०, तृप्र ^ ^ प्रा) एप? ©२0607ा1.7ए. एत्र गए, 241 
¶ 816 4: ८०६ 28 क0ा. ¶ 216 3: वध्व 786 9 11071658. 
लग्रः। सो ऽब्रवीत्‌ । देव ' युधिष्ठिराभिधः कुलालो ऽहं जात्या । 
न चायं शस्त्रप्रहारः ' किं त्व्‌ अनेककपेरसंकुत्रे प्राङ्गणप्रदेशे 
मद्यपानविकल्रः प्रधावन्‌ कपंरोपरि पतितः । ततः कपेरप्रहारो 9 
ऽयं करात्ठतां गतः । ततो राजा व्यचिन्तयत्‌ । अहो ' वञ्चितो 
ऽहम्‌ अनेन राजपुच्ानुकारिणा कुलात्ठेन । तट्‌ दीयताम्‌ 
अस्याधेचन्दरः । तथानुष्ठिते कुम्भकारः प्राह । देव ' मेवं कुर । ¢ 
पश्य मे समरे हस्तत्राघवम्‌ । राजा प्राह । भोः ' सवेगुणनिधिर्‌ 
भवान्‌ । तद्‌ अपि गम्यताम्‌ । उक्त च ' यतः। ,. | 

भ्यरो ऽसि कृतविद्यो ऽसि ' टशेनीयो ऽसि पुचक । 9 

कुत्ते यस्मिंस्‌ त्वम्‌ उत्पन्नो " गजस्‌ तच न हन्यते ॥३४॥ 
कुता आह । कथम्‌ एतत्‌ । राजा कथयति । 


॥ कथा ४॥ ५ 


अस्ति कस्मिंश्चिट्‌ वनोदेणे सिंहमिथुनम्‌ । अय कटाचित्‌ सिंही 
पुचद्वयं जनयाम्‌ आस । सिंहो ऽपि नित्यं मृगादीन्‌ व्यापाद्य 
सिंद्या ददाति । अथ कदाचित्‌ तेन वने परिभमता न रकिचिट्‌ 
आसादितम्‌ । भगवान्‌ आदित्यो ऽस्तश्खिरम्‌ उपेतः । अथ 
तेन स्वगृहम्‌ आगच्छता मार्गे णृगालशिमः प्राप्रः । स च ' 
बात्छको ऽयम्‌ ' इति कृतानुकम्पेन टंष्टरामध्ये विधृत्य यत्नेन 5 
जीवन्‌ आनीय सिंद्याः समपिंतः । ततश च सिंद्याभिहितम्‌ । 
भोः कान्त ' आनीतं किंचिट्‌ भोजनं ल्या । सिंह आह । प्रिये ' 
अयनं णुगात्छशिग्य विना न किंचिद्‌ आसादितम्‌ । अयम्‌ अपि 
च ' स्वजातीयो बात्कंभ च ' इति मत्वा मया न हतः । उक्तं 
च ' यतः । 


1 


50०] 7४. (प 17.088 07 0728 61768; 
¶216 4४: कद्तद्व्ा 7586 ४ 11011688. 

स्ीविप्रलिद्धिबाल्टेषु ' प्रहतेव्यं न किचित्‌ । 

प्राणात्यये ऽपि संजाते ' विश्वस्तेषु विशेषतः ॥३५॥ 
इदानीं त्वम्‌ एनं भक्षयित्वा पथ्यं कुर । प्रातर्‌ *अन्यत्‌ रविंचिट्‌ 
आनेष्यामि । साब्रवीत्‌ । कान्त ' त्वयायम्‌ ' बात्छको ऽयम्‌ 
इति विचिन्य न व्यापादितः । तत्‌ कथम्‌ अहम्‌ एनं स्वोदरार्थे 
विनाशयामि । उक्तं च। 

अकृत्यं नेव कृत्यं स्यात्‌ ' प्राणत्यागे ऽय्‌ उपस्थिते । 

न च कृत्यं परित्याज्यम्‌ ' एष धमः सनातनः ॥३६॥ 
तस्मान्‌ ममायं तृतीयः पुचो भविष्यति ' इति । एवम्‌ उक्ा 
स्वस्तनष्ीरेण तं परां पुष्टिम्‌ उपानयत्‌ । एवं ते चयो ऽपि 
शिशवः परस्परम्‌ अज्ञातजातिविशेषा एकाचारविहारा बाल- 
काल्टं नि वांहयां चक्रुः । अथ कदाचित्‌ तच्र वने भमन्‌ अरण्य- 
गजः समायातः । तं दुष्टा तौ सिंहसुतौ प्रकुपितो हन्तुकामो 
तं प्रति प्रचत्ितो । ततस्‌ तेन णृगालसुतेनाभिहितम्‌ । अहो ' 
गजो ऽयं युष्मक्कु ल शचुः । तत्‌ तच न गन्तव्यम्‌ । एवम्‌ उक्ा 
स्वगृहं प्रति प्रधावितः । ताव्‌ अपि ज्ये्ठवान्धवभङ्गान्‌ निर 
त्साहतां गतो । साधु चेटम्‌ उच्यते । 

एकेनापि सुधीरेण ' सोत्साहेन रणं प्रति । 

सोत्साहं जायते सेन्यं ' भग्ने भङ्गम्‌ अवाश्रुयात्‌ ॥३9॥ 
तथा च। 

अत एव हि वाञ्छन्ति ' भूषा योधान्‌ महाबलान्‌ । 

शूरान्‌ धीरान्‌ कृतोत्साहान्‌ ' वजेयन्ति च कातरान्‌ ॥३४॥ 
अथ इाव्‌ अपि भातरो गृहं प्राण विहसन्तौ पितृभ्यां ज्येशधा- 
तृ चेष्टितम्‌ ऊचतुः ' यत्‌ कित्कर]यं गजं दुष्टा दूरतो ऽपि प्रनष्टः ' 


24४ 


ॐ 


9 


12 


15 


18 


21 


24 


०, ¶प् ४ ^ 2 ^ प्रा) (10४ 60607011. 5800 1. 243 

7816 1४; 1961६21 प्प-€त्‌ ४5 11010688, 316 1: एनलाः 28 जद्ाा०, ए18716-8101-४, 
इति। सो ऽपि तट्‌ आकण्ये कोपाविष्टमनाः प्रस्फुरिताधरपल्लवस्‌ 
ताब्रलोचनस्‌ चिशिखां भृकुटिं कृता तौ निभेत्सेयमानः परुषम्‌ 
उवाच । अथ सिंद्येकान्ते नीत्वा प्रबोधितो ऽसो । वत्स ' कटा- " 
चिद्‌ अपि मैवं वादीः । भवदीयभ्रातराव्‌ एतौ । अथासौ 
सान्त्वचनेन प्रभूततरकोपाविष्टस्‌ ताम्‌ अष्‌ उवाच । किम्‌ 
अहम्‌ एताभ्यां शोर्येण रूपेण विद्याभ्यासकौश्ठेन वा हीनः । ० 
येनेतो माम्‌ उपहसतः । तन्‌ मयावश्यम्‌ एतो व्यापादनीयो । 
तच्‌ छूवा तस्य जीवितम्‌ इच्छन्ती सिंह्य्‌ अन्तर्‌ विहस्य प्राह । 

भ्पूरो ऽसि कृतविद्यो ऽसि ' दशेनीयो ऽसि पुरक । ४ 

कुत्े यस्मिंस्‌ त्वम्‌ उत्पन्नो ' गजस्‌ तच न हन्यते ॥ ३९॥ 
तत्‌ सम्यक्‌ श्पृणु ' वत्स । त्वं णृगात्ीसुतो मया कृपापरया 
स्वस्तनक्षीरेण पुष्टिं नीतः । तद्‌ यावद्‌ एतो मत्पुच्रौ शिश्रुतवात्‌ 2 
त्वां भ्ुगालं न जानीतः ' तावद्‌ दुततरं गत्वा स्वजातीयानां 
मध्ये भव । नो चेत्‌ ' एताभ्यां निहतो मृत्युपथम्‌ एष्यसि । सो 
ऽपि तच्‌ इत्वा भी तभीतमनाः शनेः शनेर अपसृत्य स्वजाती- ० 
यानां मिलितः ॥ 

तस्मात्‌ त्वम्‌ अपि यावद्‌ एते सुभटास्‌ लां कुलां न 

जानन्ति ' तावट्‌ दुततरम्‌ अपस्तर । नो चेत्‌ ' विडख्वनां प्राय 
मरिष्यसि ' इति । कुत्रात्टो ऽपि तट्‌ आकण्यं सत्वरं प्रनष्टः ॥ 


अतो ऽदहं व्रवीमि । सार्थम्‌ उत्सुज्य यो दरी ' इत्यादि । धिग्‌ मूखं ' यत्‌ तया 
स्रियो ऽथं एतत्‌ कार्यम्‌ अनुष्टातुम्‌ आरब्धम्‌ । न हि स्त्रीणां कथंचिद्‌ विश्वासम्‌ 21 
उपगच्छत्‌ । सुट खल्व्‌ इदम्‌ आख्यानकम्‌ आख्यायते । 
यदथ खकुलं त्यक्तं ' जोविताधं च हारितम्‌ । 
सामां त्यजति निःलेहा' कः स्त्रीणां विश्वसेन्‌ नरः ॥ ४०॥ ॥ 
मकर आह । कथम्‌ एतत्‌ । वानरः कथयति । 


50०0४ ए. प्न ए 1088 07 08 अणणणा68 ; 244 


216 ४: णम 81856 फ16 {€ 208 ४८०८ 10४€. 


॥ कयाप॑॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिद्‌ अधिष्ठाने को ऽपि ब्राह्मणः । तस्य च प्रिया- 
तिप्राणप्रिया । सापि कुटश्वेन सह प्रतिदिनं कठहं कुवांणा न ४ 
विश्राम्यति । सो ऽपि ब्राह्मणः कलहम्‌ असहमानो भायांवा- 
छभ्यात्‌ +स्वकुटश्वं परित्यज्य बाह्यण्या सह विप्रकृष्टं देशन्तरं 
गतः । अथ महाटवीमध्ये ब्राद्यण्याभिहितम्‌ । आयेपुत्र " तृष्णा ° 
मां वाधते । तट्‌ उदट्कं क्राण्‌ अन्वेषय । अयासो तद्ठचनानन्तरं 
यावट्‌ उदकं गृहीत्वा समागच्छति ' तावत्‌ तां मृताम्‌ अपश्यत्‌ । 
अतिवल्लभतया विषादं कुवन्‌ यावट्‌ वितपति ' तावट्‌ आकाशे ° 
वाचं णोति ' तथा हि । यदि ' ब्रा्यण ' त्वं स्वकीयजी वितस्यां 
ददासि ' ततस्‌ ते जीवति बाह्मणी । तच्‌ खुत्वा बाहणेन शुची- 
भूय तिसृभिर्‌ वाचाभिः स्वजीविताधं द्चम्‌ । *वाक्समम्‌ एवं ५ 
च जीविता सा ब्राह्मणी । अथ तो जलं पीवा वनफलानि 
च भक्षयित्वा गन्तुम्‌ आख्यौ । ततः कमेण कस्यचिन्‌ नगरस्य 
प्रवेशे पुष्पवाटिकां प्रविश्य ब्राह्यणो भायाम्‌ अभिहितवान्‌ । 
भद्रे ' यावद्‌ अहं भोजनं गृहीत्वा समागच्छामि ' तावत्‌ त्वयाच 
स्थातव्यम्‌ । इत्य्‌ अभिधाय प्रायासीत्‌ । अय तस्यां पुष्यवाटि- 
कायां पङ्कुर अरघटटं खेटयमानो दिव्यगिरा गीतम्‌ उद्निरति । 5 
तच्‌ च श्रुत्वा कुसुमेषुणाभिहतया तत्सकाशं गत्वाभिहितम्‌ । भद्‌ ' 
यदि मां न कामयसे ' तन्‌ मम सक्ता बरह्महत्या तव । पङ्कुर्‌ 
अव्रवीत्‌ । किं व्याधियस्तेन मया करिष्यसि । साब्रवीत्‌ । किम्‌ 
अनेनोक्तेन । अवश्यं त्वया सह संगमः कायैः । तच्‌ छरुत्वा तथा 
कृतवान्‌ । सुरतानन्तर साबवीत्‌ । इतः प्रभृति यावज्जी वं मयात्मा 


०, वप्त ^? ^ प्राः ¶प्ए 0600. 2800 एण, 245 


816 ४: ० 8186 16 "62708 ६०6 10४९, 


भवतो दत्तः । इति ज्ञात्वा भवान्‌ अप्‌ अस्माभिः सहागच्छतु । 
सो ऽब्रवीत्‌ । एवम्‌ अस्तु । 

अथय ब्राह्यणो भोजनं गृहीत्वा समागत्य तया सह भोक्तुम्‌ » 
आख्धः । साब्रवीत्‌ । एष पङ्कुर्‌ बुभुक्षितः । तद्‌ एतस्यापि 
कियन्तम्‌ अपि मासं देहि ' इति । तथेवानुष्ठिते बाद्यण्याभि- 
हितम्‌ । ब्राह्मण ' सहायहीनस्‌ त्वं यदा सामान्तर गच्छसि ' 5 
तदा मम वचनसहायो ऽपि नास्ति । तत एनं पङ्गुं गृहीत्वा 
गच्छावः । सो ऽब्रवीत्‌ । न शक्रोभ्य्‌ आत्मानम्‌ अप्य्‌ आत्मना 
वोढुम्‌ " किं पुनर इमं पङ्कम्‌ । साब्रवीत्‌। पेटाभ्यन्तरस्यम्‌ अहं ° 
नेष्यामि । अथ तत्कृतकवचनव्या मोहितचिच्ेन तेन प्रतिपन्नम्‌ । 
तथानुष्ठिते चान्यस्मिन्‌ दिने कूपोपकण्दविश्रान्तो बाह्यणस्‌ तया 
पङ्कुपुरुषासक्तया संप्रये कूपान्तः पातितः । सुपि पङ्कं गृहीत्वा 
कस्मिंशिन्‌ नगरे प्रविष्टा । तत्र च +भृत्कचो येरसानिमित्तं राज- 
पुरूषेर इतस्‌ ततो भमद्धिस्‌ तन्मस्तकस्या पेटा दृष्टा । बलाद्‌ 
आच्छिद्य राजाये नीता । राजा च यावत्‌ ताम्‌ उद्वाटयति "७ 
तावत्‌ पङ्कं ददशे । ततः सा ब्राह्मणी विलापं कुवेती राजपुरूषा- 
नुपदम्‌ एव तच्रागता राज्ञा पृष्टा । को वृच्चान्तः ' इति । साब्र- 
वीत्‌ । ममैष भता व्याधिवाधितो दायादसमूहेर उद्वेजितो मया 
लेहव्याकुल्वितमानस्या शिरसि कृत्वा ्वत्सकाशम्‌ आनीतः । तच्‌ 
छूत्वा राजाब्रवीत्‌ । मम त्वं भगिनी । यामयं गृहीत्वा भां सह 
भोगान्‌ सुज्ञाना सुखेन तिष्ठ । धा 

अथ स ब्राह्मणो देववश्णत्‌ केनापि साधुना कूपाट्‌ उत्ता- 
रितिः परिभरमंस्‌ तट्‌ एव नगरम्‌ आयातः ' तया दुषटभायेया 
दृष्टः ' राज्ञे निवेदित च । राजन्‌ ' अयं मम भतुर्‌ वेरी समा- 


50०1 प्र. (प्र 1088 07 07८8 &ण्णणाा प &8 ; 246 
यातः । राज्ञापि वधादिष्टः सो ऽब्रवीत्‌ । देव ' अनया मम सक्तं 
किंचिट्‌ गृहीतम्‌ अस्ति । यदि त्वं धमैवत्सत्ः ' तदा दापय । 
राजाब्रवीत्‌ । भद्रे ' यत्‌ त्वयास्य सक्तं किंचिट्‌ गृहीतम्‌ अस्ति "ॐ 
तत्‌ समपेय । सा प्राह । देव ' मया न र्विचिट्‌ गृहीतम्‌ । 
ब्राह्मण आह्‌ । यन्‌ मया चिवाचिकं स्वजीविताधे तव द्चम्‌ " 
तट्‌ देहि । अथ सा राजभयात्‌ तथेव चिवाचिकम्‌ एव ' जीवितं ५ 
मया दन्नम्‌ " इति जस्यन्ती प्राणेर विमुक्ता । ततः सविस्मयं 
राजाबवीत्‌ । किम्‌ रतत्‌ ' इति । ब्राह्मणेनापि पूवेवृ्चान्तः 
सकत्रो ऽपि तस्मे निवेदितः ॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि । यदर्थे स्वकुलं त्यक्तम्‌ ' इत्यादि । वानरः पुनर अप्य्‌ आह । 
साधु चेदम्‌ उपाख्यानकं यते । 
न किं दद्यान्‌ न किं कुर्यात्‌ ' स्त्रीभिर्‌ अभ्यर्चितो नरः 12 
अनश्वा यच हेषन्ते ' शिरो <पर्वणि मुण्डितम्‌ ॥ ४१॥ 
मकरः प्राह । कथम्‌ एतत्‌ । वानरः कथयति । 


॥ कथा & ॥ 13 


अस्ति प्रख्यातबत्रपोरुषो ऽनेकनरेन्द्रवृन्दमुकुदंमरीचिजालजटि- 
ल्दीकृतपाद॑पीटः शरच्छणशा इकिरणनिमेत् यश्णः समुंद्पयेन्तायाः 
पृथिव्या भतां नन्दो नाम राजा । तस्य सवेशस््राधिगतसमस्ततचखः "७ 
सचिवो वररुचिर्‌ नाम । तस्य च प्रणयकलृहेन जाया कुपिता । 
सा चातीववल्भानेकप्रकारं परितोयमाणापि न प्रसीदति । 
रवीति च भता । भद्रे ' येन प्रकारेण तुष्यसि ' तं वद्‌ । निशितं 
करोमि । ततः कथंचित्‌ तयोक्तम्‌ । यदि शिरो मुरुडयित्वा मम 
पादयोर्‌ निपतसि ' तदा प्रसादाभिमुखी भवामि । तया चानु- 
शिते प्रसनासो । 24 


०१, (प्र ^? ^ प्र) (प्र 68060774. 5800 एप, 247 


¶ 216 शं: 72018 811 चरशक्ापा 2.8 518 ४६8 ०1 10४6, ए 7व116-5101 $. ¶ 216 11: 4.88 111 धटाः", 


अथ नन्दस्य भायां तथेव र्ट प्रसाद्यमानापि न तुष्यति । 
तेनोक्तम्‌ । भद्रे ' त्वया विना सुहूतेम्‌ अपि न जीवामि । पादयोः 
पतित्वा त्वां प्रसादयामि । साव्रवीत्‌। यदि खत्दरीनं सुखे प्रकिष्याहं ° 
तव पृष्ठे समार्ह्य त्वां धावयामि ' धावितस्‌ तु यद्य्‌ अश्ववट्‌ 
धेषसे ' तदा प्रसन्ना भवामि । तयेवानुष्ठितम्‌ । 

अथ प्रभातसमये समोपविष्टस्य राज्ञो वररूचिर आयातः । ° 
तं च दुष्टा *णजा पप्रच्छ । भो वररूचे ' किम्‌ अपवेणि मुरिडतं 
शिरस्‌ ते। सो ऽब्रवीत्‌। न किं दद्यान्‌ न किं कुयोत्‌ ' इति ॥ 


तत्‌ ' मूढ । त्वम्‌ अपि नन्द्‌ वरर्चिवत्‌ स्त्री वश्यः । ततस्‌ तद्धणितेन त्या मां प्रति 9 
वधघोपायप्रयासः प्रारब्धः ' परं स्ववाग्दोषिणेव प्रकरितः। अथवा साध्व इदम्‌ उच्यते । 
आत्मनो मुखदोषेण । बध्यन्ते शुकसारिकाः । 
बकास्‌ तच न बध्यन्ते ' मौनं सर्वार्थसाधनम्‌ ॥ ४२॥ 19 
तथाच। सुगु्रं रच्यमाणो ऽपि ' दशंयन्‌ दारुणं वपुः । 
व्याघ्रचमंप्रतिच्छन्नो ' वाक्कुति रासभो हतः ॥४३॥ 
मकर आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 15 


॥ क्या ७ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिद्‌ अधिष्ठाने शुद्धपटो नाम रजकः । तस्य च 
भ्गदेभ एको ऽस्ति । सो ऽपि घासाभावाद्‌ अतिदुबेत्तां गतः । 
तेन च रजकेनाटव्यां मता मृतव्याघ्रो दष्टः ' चिन्तितं च । 
अहो ' शेभनम्‌ आपतितम्‌ । अनेन व्याघ्रचमेणा प्रतिच्छाद्य 
रासभं राचो यवसचेषृत्सुजामि । ते च शोचरपाला व्याघ्रं मत्वा 
न निष्कासयियन्ति । तथानुष्ठिते रासभो यथेच्छं यवभक्षणं 
करोति । प्रत्यूषे रजको भूयो ऽपि स्वाश्रयं नयति । एवं च 


50०01 70. प ४ 1088 07 0 *8 © 68 ; 248 
¶&16 प्र: 4.88 17 ४६€7-8स9. 721168६0. 


गच्छति काले स पीनतनुः संजातः । कृच्छाट्‌ बन्धनस्थानम्‌ 
अपि नीयते । 

अयान्यस्मिन्‌ अहनि रासभो टूरस्यरासभीशब्टम्‌ अणृणोत्‌ । ४ 
तच्छूवणमाेशेव स्वयं शब्टायितुम्‌ आर्यः । अथ तैः छेचयेः ' 
रासभो ऽयं प्रतिच्छन्नः " इति ज्ञात्वा लगुडपाषाणशरप्रहारिर 
व्यापादितः ॥ 6 


अतो ऽहं ब्रवीमि । सुगुप्रं रच्यमाणो ऽपि । इति । अधतत्‌ तेन सह वदतो जल- 

चरेरकिनागत्याभिहितम्‌ । भो मकर , लदौया भार्यानशन उपविष्टा मृता । सो $पि 
तच्‌ कलवा व्याकुलितमनाः प्रालपत्‌ । भोः । किम्‌ इदं संजातं मे मन्दभाग्यस्य । उक्तं च । 9 

माता यस्य गृहे नासि ' भाया च प्रियवादिनी । 

अरण्यं तेन गन्तव्यं ' यथारण्यं तथा गुहम्‌ ॥ ४४॥ 
तत्‌ । मिच । चम्यताम्‌ । यत्‌ किंचिन्‌ मयपराद्वम्‌ । अहं तद्वियोगाट्‌ वैश्ानरप्रवेशं 12 
करिष्यामि । तच्‌ कूत्वा वानरः प्रहसन्‌ प्रोवाच । भोः ' ज्ञातस्‌ त्वं मया प्रथमम्‌ 
एव । *+आसीर्‌ यत्‌ स््रीवश्चः स्त्रीजितश च । सांप्रतं च प्रत्ययः संजातः । तत्‌ ' मूढ । 
आनन्दे ऽपि जति तवं विषादं गतः। तादृग्मायायां मृतायाम्‌ उत्सवः कर्तु युज्यते । उक्त च । 15 
यतः। या भायां दुष्टचरिता । सततं कलहप्रिया । 

भार्यारूपेण सा ज्ञेया ' विदग्धैर्‌ दारुणा जरा ॥४५॥ 

तस्मात्‌ सर्वैप्रयन्नेन ' नामापि परिवजंयेत्‌। 18 

स्त्रीणाम्‌ इह हि सर्वासां । य इच्छेत्‌ सुखम्‌ आत्मनः ॥ ४६॥ 

यद्‌ अन्तस्‌ तन्‌ न जिद्भायां । यज जिद्ायां न तद्‌ बहिः। 

य्‌ बहिस्‌ तन्‌ न कुर्वन्ति, विचिच्रचरिताः स्यः ॥४७॥ 21 

आस्तां तावत्‌ किम्‌ अन्येन ' *दौराव्मयेनेह योषिताम्‌ । 

विधुतं खोदरेणापि ' धरन्ति पुम्‌ अपि स्वकम्‌ ॥४८॥ 

रूतायां लेहसद्वावं ' कठोरायां च मादवम्‌ । 24 

नीरसायां रसं बालो ' बालिकायां विकल्यति ॥४९॥ 
मकर आह । भोः । अस्त्य्‌ एतत्‌ । परं किं करोमि । ममानर्थद्रयम्‌ एव संजातम्‌ । 
एकं तावद्‌ गृहमभङ्गः । अपरं मिण सहासंतोषश्‌ च । अथवा भवत्य्‌ एवं दैवोपह- ® 
तानाम्‌ । उक्तं च । यतः। 

यादृशं मम पाण्डित्यं । तादृशं दिगुणं तव । 

नाभूज्‌ जारो न भता च । किं *+नु पश्यसि नम्िके ॥ ५०॥ 80 
वानर आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 


०४, वप्र ^ ~^) वप 000४. 80०६ ण. 249 
¶ 216 ण ; 4तणालल88 61६64 ४ 28787710 णा. 


॥ क्या ८॥ 


कस्मिशिट्‌ अधिष्ठाने हालिकटम्पती प्रतिवसतः स्म । सा च 
हालिकभायौ पत्युर्‌ वृद्धभावात्‌ सदे वान्यचित्ता न कथंचिद्‌ गृहे 
स्थेयेम्‌ आत्श्ते ' केवत्टे परपुरूषरता सा । अथ केनचित्‌ 
परवित्तापहारकेण धूर्तेनोपत्ष्य प्रोक्ता सा । सुभगे ' मृतभायों 
ऽ हं त्वहशेनेन स्मरपीडितश् च । तट्‌ दीयतां मे रतिसवेस्वद- ० 
क्षिणा । ततस्‌ तयाभिहितम्‌ । भोः सुभग ' यद्य्‌ एवम्‌ ' तट्‌ 
अस्ति मे पत्युः प्रभूतधनम्‌ । स च वृद्धत्वात्‌ प्रचत्ठितुम्‌ अष्‌ 
असमथः । तत्‌ तद्‌ आदायागच्छामि ' यथा त्वया सहान्यच ° 
गत्वा रतिसुखम्‌ अनुभवामि । सो ऽब्रवीत्‌ । रोचते मद्यम्‌ 
अष्‌ एतत्‌ । प्रत्यूषे ऽ च स्याने शीध्रं समागन्तव्यम्‌ ' येन सुन्दरं 
किंचिन्‌ नगरं गत्वा त्वया सह जी वत्तोकः सफल्टीक्रियते । सापि ' 
तथा " इति प्रतिज्ञाय प्रहसितवदना स्वगृहं गल्ला राच प्रसुप्न 
भेरि सवे वि्चम्‌ आदाय प्रत्यूषसमये कथितस्थानम्‌ उपागमत्‌। 
धूर्तो ऽपि ताम्‌ अये विधाय दकिणां दिशम्‌ आधित्य प्रस्थितः । 
एवं च सप्रमोद्‌ तया सह वाासुखम्‌ अनुभवन्‌ योजनडये 
व्यतीते ऽये नदीं दष्टा धूतेश. चिन्तयाम्‌ आस । किम्‌ अहम्‌ 
अनयाधेजरत्या करिष्यामि । किं च ' कदाचिद्‌ अस्याः पृष्टतः 2 
को ऽपि समेष्यति । तन्‌ मे महानथेः स्यात्‌ । केवत्ठम्‌ अस्या 
विन्नम्‌ आदाय गद्डामि। 

इति संचिन्य ताम्‌ उवाच । प्रिये ' दुस्तरेयं महानदी । तट्‌ 
अहं द्रव्यमाचां पारे धृत्वा समागच्छामि ' यथा त्वाम्‌ एकाकिनीं 
स्वपृष्ठम्‌ आरो सुखेनोत्तारयामि । सा प्राह । सुभग ' एवं 


च; 


500 7. व्र 1088 07 08 ला कर68; 250 


¶ 816 सा: ~ तपालल७8 ६१616 ४४ 8187110 पाः. ए18106€-8017४, 


क्रियताम्‌ । इत्य्‌ उक्काशेषं वित्तम्‌ आदाय पुनर्‌ अप्य्‌ आह । 
भद्रे ' परिधानाख्छादनवस्लम्‌ अपि समपेय ' येन जलमध्ये 
निःशडूा व्रजसि । तथानुष्ठिते धूता वित्तं वस्रयुगले चादाय ° 
यथाचिन्तितिविषयं गतः । 
सापि करण्ठनिवेशितहस्तयुगत्करा सोद्वेगा नदीतीरे यावट्‌ 

उपविष्टा तिष्ठति ' तावत्‌ काचिच्‌ छ्गालिका गृहीतमांसपि- ° 
र्डिका तज्राजगाम । आगत्य च यावत्‌ पश्यति ' तावन्‌ नदीतीरे 
महान्‌ मत्यः सलिलान्‌ निष्कम्य बहिः स्थित आस्ते । तं च 
दषा सा मांसपिर्डम्‌ उत्सृज्य तं मत्यम्‌ अभिययो । अच्रान्तर ° 
आकाशात्‌ को ऽपि गृधस्‌ तं मांसपिर्डम्‌ आदायोत्पात । 
मतयो ऽपि ्ृगाल्ििकां दुद्रा नद्यां प्रविवेश । अथ सा णुगा- 
ल्किका व्य्श्रमा गुधम्‌ अवलोकयन्ती नम्रिकया सस्मितम्‌ ५ 
अभिहिता । 

गृभ्रेणापहतं मांसं ' म्यो ऽपि सलिलं गतः । 

मलत्स्यमांसपरिभरषटे ' किं +नु पश्यसि जम्बुकि ॥५१॥ ` % 
तच्‌ छूत्वा भृगात्ठिका ताम्‌ अपि पतिधनजारपरिभष्ां दुष्टा 
सोपहासम्‌ आह । 

यादृशं मम पारिइत्यं ' तादृशं गुणं तव । ` ७ 

नाभूज्‌ जारो न भतं च ' जले तिष्ठसि नम्मिके ॥५२॥ 


एवं तस्य कथयतः पुनर अन्येन जलचंरेणूागत्य निवेदितम्‌ , यड्‌ अहो ' तदीयगृहम्‌ 
अप्य अपरेण महामकरेण संगृहीतम्‌ । तच्‌ कछरूत्वासाव अतिदुःखितमनास्‌ तं गृहान्‌ 21 
निःसारयितुम्‌ उपायं चिन्तयति ख । अहो ' पश्यत मे +दे वहतकलत्वम्‌ । यत्‌ किल 

मिचं चुमिचरतां यातम्‌ । अपरं मे प्रिया मृता। 

गृहम्‌ अन्येन च व्याप्तं ' किम्‌ अब्युपि भविष्यति ॥५३॥ 24 


०, ¶प्ए ^ ^ प ¶1प्४ 6060701. 800 फ. 251 


ए 81116-80079. ¶216 1: ^€ 206 ०06५० ण5 पित. 


अथवा युक्तम्‌ इदम्‌ उच्यते। 

छिट्ेष्व्‌ अनथ बहलोभवन्ति 
इति । तत्‌ किं करोम्य्‌ अनेन सह युद्धम्‌ । किं वा सान्नैव संबोध्य गृहान्‌ निःसारयामि । 3 
किंवामेदं दानं वा करोमि। अथवसुम्‌ एव वानरमिचं पृच्छामि । उक्तं च। 

यः पृष्टा कुरूते कार्य ' प्र्टव्यान्‌ स्वहितान्‌ गन्‌ । 

न तस्य जायते विध्न ' कस्धिं्चिट्‌ अपि कमणि ॥५४॥ 65 
इति विचिन्त्य भूयो ऽपि तं जम्बृवृच्तम्‌ आरूढं कपिम्‌ अपृच्छत्‌ । भो मित्र । पश्च मे 
मन्दभाग्यताम्‌ ' यत्‌ संप्रति गृहम्‌ अपि मे बलवन्मकरेण रुद्धम्‌ । तट्‌ अहं लां पृच्छामि । 
कथय । किं करोमि । सामादीनाम्‌ उपायानां मध्ये कस्या विषयः । स आह । भोः 9 
कृतघ्न ' मया निषिच्लो ऽपि किं भूयो माम्‌ अनुसरसि । नाहं तव मूरखस्योपदे शम्‌ अपि 
दद्‌ामि। उक्तं च। यतः। 

उपदेशो न दातव्यो ' यादृशे तादृशे नरे । 12 

पश्च वानरमूर्खेण । सुगृहा निर्गृही रता ॥५५॥ 
मकर आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽत्रवीत्‌ । 


॥ कया ९॥ 15 


कस्मिंश्चिट्‌ अरण्ये वृक्षशखाकृतकुत्ायौ पक्िटम्पती प्रतिवसतः 
स्म 1 अथ कदाचिन्‌ माधे मास्य्‌ अकालकरकावृ्टिसमाहतः 
सौम्यवात्तकम्यि्ततनुः कश्चिट्‌ वानरस्‌ तट्‌ एव वृ्॒मूत्म्‌ 
उपागतः । सो ऽपि दन्तवीणां वादयन्‌ अतिदीनः संकुचितकर- 
चरणश *“चटिकया सानुकम्पम्‌ अभिहितः ' यथा । 
हस्तपादसमायुक्तो ' दृश्यसे पुरुषाकृतिः । ता 
शीतवाताहतो मूढ ' कथं न कुरुषे गृहम्‌ ॥५६॥ 
सो ऽपि तट्‌ आकण्यं व्यचिन्तयत्‌ । अहो ' आत्मसंतुष्टो जीव- 
ल्लोकः ' यद्‌ एषापि +शुद्रचटिकोत्मानं बहुमन्यते । युक्तं चूतत्‌ । : 
स्वचिच्नकत्पितो गवः ' कस्य नाम न विद्यते । 
उत्छिप टिट्िभः पादौ ' शेते भङ्गभयाट्‌ *दिवः ॥५७॥ 


5007 ४. (प 1088 07 028 &अ्णा68; 252 


व्र 216 1: 476 8716 ०8० ण5 त. ए7व716-8॥071 ४. ¶21€ =: 4261818 10४ 9€8* 


एवं विचिन्य ताम्‌ आह । 

सूचीमुखि दुराचारे ' रण्ड परिडतमानिनि । 

तूष्णीं भव करिष्यामि ' नो चेत्‌ लां निगृहाम्‌ अहम्‌ ॥५४॥ » 
एवं तेन सा निषिद्धापि यदा पुनः पुनर्‌ आश्रयकरणोपदेशेन 
तम्‌ उद्वेजयति ' तदासौ तं वृकम्‌ आरुह्य तस्याः कुत्रायं खण्डशः 
कृत्वा बभज्ञ ॥ च 


अतो ऽहं ब्रवीमि । उपदेशो न दातव्यः ' इति । तच्‌ हत्वा मकरः प्राह । भो 

मित्र ' सापराधस्युपि मे पूर्वल्लेहम्‌ अनुसृत्य हितोपदेशं देहि । वानर आह । नाहं 
ते कथयिष्यामि । यद्‌ भार्यावाक्येन भवताहं समुद्रे प्रेषितुं नीतः । यद्य अष्‌ अतीव- 9 
वल्लभा मार्या । तद्‌ अपि तद्वाक्येन मिचबान्धवाद्यः समुद्रे किं प्रचषिष्यन्ते । तच्‌ 
कूला मकरः प्राह । भद्र । यद्य्‌ एवम्‌ ' तथापि ' सख्यं साप्तपदीनम्‌ । इति विचिन्त्य 
किंचिन्‌ मे हितं समुपदिश । उक्तं च ' यतः। 1 

उपदे शम्रदातृणां ' नराणां हितम्‌ इच्छताम्‌ । 

परस्िच्र इहलोके च ' व्यसनं नोपपद्यते ॥५९॥ 
तत्‌ सर्वथा कृतागसो ऽपि मे कुर्‌ प्रसादम्‌ उपदे शदनेन । उक्तं च । 15 

उपकारिषु यः साधुः ' साधुतखे तस को गुणः । 

अपकारिषु यः साधुः ' स साधुः सद्खिर्‌ इष्यते ॥ ६०॥ 
तद्‌ आकणयं वानरः प्राह । भद्र । यद्य. एवम्‌ ' तहिं तच्र गत्वा तेन सह युं कुर्‌ । उक्तं 18 
च । यतः। | 

उत्तमं प्रणिपातेन । गूर भेदेन योजयेत्‌ । 

नीचम्‌ अल्यप्रटानेन । समशक्तिं पराक्रमेः ॥ ६१॥ 21 
मकर आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽत्रवीत्‌। 


॥ कया १० ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिद्‌ वनोदेशे महाचतुरको नाम भुगात्तः । तेन 
कदाचिद्‌ अरण्ये स्वयं मृतो गजः समासादितः । परं तस्य 
समन्तात्‌ परिभ्रमति ' कठिनां त्वचं भेत्तुं न शक्रोति । 

अथा्ावसर इतण चेतश च परिभमन्‌ कश्चित्‌ सिंहस्‌ तचरैव :" 


०7, प्न ^ ^ प्रा) (प 06070. 28300 ४. 253 
¶21€ ऊ: 1261६818 छण 1068. 
परदेशे समाययो । अय तम्‌ आगतं दुष्टा स सितितलमिलन्मौ- 
लिमरडत्ः संयोजितकरकमलत्ठः सविनयम्‌ उवाच । स्वामिन्‌ ' 
त्वदीयो ऽहं त्ागुडिकः । त्वदर्थे गजम्‌ इमं रक्षामि । तट्‌ एनं ऽ 
भरयतु स्वामी । अथ सिंहः प्राह । भोः ' नाहम्‌ अन्यहतं 
कटाचिट्‌ अपि भ्यामि । तत्‌ तवेव गजो ऽयं मया प्रसा- 
टीकृतः । तच्‌ छवा शृगालः सानन्दम्‌ आह । युक्तम्‌ इट्‌ ¢ 
स्वामिनो निजभृत्येषु । 
अथ सिंहे गते कश्चिद्‌ व्याघ्रः समाययो । तम्‌ अपि द्रा 
सो व्यचिन्तयत्‌ । एकस्‌ तावद्‌ दुरात्मा प्रणिपातेनापवाहितः । ° 
तत्‌ कथम्‌ इदानीम्‌ एनम्‌ अपवाहयिष्यामि । नूनं शुरो ऽयम्‌ ' 
न खलु भेट्‌ विना साध्यो भवति । उक्तं च । 
न यत्र शक्यते कु ' साम दानम्‌ अयापि वा। 19 
भेदस्‌ तच प्रकतेव्यो ' यतो ऽसो वशकारकः ॥६२॥ 
किं च। सवों ऽपि भेदेन बध्यते । उक्तं च । 
*अन्तःस्थेनाविरूद्धेन ' सुवृत्तेनातिचारूणा । 15 
अन्तभेदेन संप्राप्तं ' मौक्तिकेनापि बन्धनम्‌ ॥६३॥ 
एवं संप्रधाये तदभिसुखो गत्वेषदुन्रतकन्धरः ससंभ्रमम्‌ उवाच । 
माम ' कथम्‌ अचर भवान्‌ मृव्युमुखे प्रविष्टः । येनैष सिंहेन गजो 
व्यापादितः । स च माम्‌ एतद्रे नियुज्य स्वयं ल्लानाथे गतः । 
तेन गच्छता समादिष्टम्‌ । यदि कश्चिट्‌ इह व्याघ्रः समेति ' तत्‌ 
त्वया सुगुघ्रं मम्‌ावेदनीयम्‌ ' येन॒ वनम्‌ इट्‌ मया निव्याप्रं 
कतेव्यम्‌ । यतः पूवे व्याप्रेणोकेन मद्यापादितो गजः *भून्य उच्छि- 
तां नीतः । तदिनाट्‌ आरभ्य व्याघ्रान्‌ प्रति प्रकुपितो ऽस्मि। 
अथ तच्‌ दूता व्याघ्रः संचस्तस्‌ तम्‌ आह । भो भागिनेय ' देहि 


5001 7४. (प ए 1088 07 07८8 अयण 768; 264 
216 ॐ: 1861218 {0 पाः 10०68. 


मे प्राणदक्षिणाम्‌ । यतस्‌ त्वया तस्यात्र चिरायात्तस्यापि मदीया 
कापि वान्तं नाख्येया " इति । एवम्‌ अभिधाय सत्वरं पला- 
यां चक्रे । 8 

अथ गते व्याप्रे तत्र क्श्चिट्‌ इीपी प्राप । त्तम्‌ अपि 
दृष्टौ व्यचिन्तयत्‌ । दृढो ऽयं चिचरकः। तट्‌ अस्माद्‌ एवास्य 
गजचमेभेद्‌ं कारयामि । इति निश्चित्य तम्‌ उवाच । भो भगि- °. 
नीसुत ' किम्‌ इति चिद्‌ दृष्टो ऽसि ' कथं च वबुभुरित इव 
लष्यसे । तट्‌ अतिथिर्‌ असि मे। उक्तं च। 

समयाभ्यागतो ऽतिथिः ॥ 9 
तट्‌ एष गजः सिंहेन हतस्‌ तिष्ठति । अहं चास्य तदादिष्टो 
र्पात्ः । परं तथापि यावद्‌ असो न समायाति ' तावद्‌ 
अस्य गजस्य मांसं भक्षयित्वा तुभं कृता दुतं व्रज । स आह । 
माम ' यद्य्‌ एवम्‌ ' तन्‌ न कायं मे ऽस्य मांसेन ' यतः । 
जीवन्‌ नरो भदूशतानि पश्यति ॥ 

तत्‌ सवेथा तट्‌ एव भुज्यते ' यट्‌ एव परिणमति । तट्‌ अहम्‌ 
इतो ऽपयास्यामि । भृगात् आह । भो *अधीर ' विश्रब्धो भूता 
भक्षय । तस्यागमनं दूरतो ऽपि तवाहम्‌ आवेदयिष्यामि । अथ 
द्ीपिना तथानुष्ठिते भिन्नां वचं विज्ञायाभिहितं जबुकेन । भो 
भगिनीसुत ' गम्यतां गम्यताम्‌ ' एष सिंहः समायाति । तच्‌ 
छूत्वा चिचको ऽपि टरं प्रनष्टः , | 

अथ यावद्‌ असो तद्भेदकृत्वारेण मांसं भक्षयति ' तावद्‌ 
अतिसंकुद्धो ऽपरः भृगालः समाययो । अथय तम्‌ आत्मतुल्यं 
ज्ञाततपराक्रमं दुष्टा ' उत्तमं प्रणिपातेन ` इत्यादिश्चोकं पठंस्‌ 


०४, व्र प्न ^ 2 ^) वप्त 60607071. 5800६ 7४. 255 


¶ 816 =: 48८1६218 पा 068. एि716-80ा र. ¶816 प: 20 11 €. 


तदभिसुखकृतप्रयाणः स्वदष्टाभिस्‌ तं विदायें दिगन्तभाजं कृवा 
स्वयं सुखेन चिरकात्टं हस्तिमांसं बुभुजे ॥ 
एवं त्वम्‌ अपि तं निजरिपुं सजातीयं युद्धेन परिभूय दिगन्तगतं कुर्‌ । गो चेत्‌ । 3 


पञ्चाट्‌ बञ्मूलाट्‌ अस्मात्‌ त्वम्‌ अपि विनाशम्‌ अवाप्स्यसि । उक्तं च ' यतः। 
संभाव्यं गोषु संपन्नं ' संभाव्यं ब्राह्मणे तपः । 


संभाव्यं स्त्रोषु चापल्यं ' संभाव्यं ज्ञातितो भयम्‌ ॥ ६४॥ € 
श्रूयते च । यतः। 

सुभिक्षाणि विचित्राणि । शियिलाः पौरयोषितः। 

एको दोषो विदेशस्य ' स्वजातिर्‌ यद्‌ विर्ष्यति ॥ ६५॥ 9 


मकर आह । कथम्‌ एतत्‌ । वानरो ऽब्रवीत्‌ । 


॥ कथा ११॥ 


अस्ति कस्मिश्चिट्‌ अधिष्ठाने चिचाङ्गो नाम सारमेयः । तच च 
चिरकालदुभिं पतितम्‌ । अन्नाभावाच्‌ च सारमेयादयो निष्कु- 
त्छतां गन्तुम्‌ आरब्धाः । अथय चिचाङ्गः सुल्क्षामकरदस्‌ तद्नयाट्‌ 
अन्यदेश्णन्तरं गतः । तत्र च कस्मिंश्चित्‌ पुरे कस्यच गृहमेधिनो 
गृहिण्याः प्रमादेन प्रतिदिनं गृहे प्रविश्य विविधानादि भक्षयन्‌ 
परां तृ्धिं गच्छति । परं तत्रृहाट्‌ बहिर्‌ निष्कामन्‌ अन्येर्‌ मदो- 
इतसारमेयेः सवदि परिवृत्य स्वाङ्गं दंष्टाभिर्‌ विदायेते । ततस्‌ " 
तेन विचिन्तितम्‌ । वरं स्वदेशः ' यच दुभिंक्षेणापि सुखेन 
स्थीयते ' न च को ऽपि युद्धं करोति । तट्‌ वरं तट्‌ एव 
स्वनगरं जामि । इत्य्‌ अवधाये स्वस्थानं प्रति जगाम । 1 

अयासो देश्न्तरायातः स्वजनेः पृष्टः । भोः ' कथय ' कीद्ग्‌ 
देशः ' किंचेष्टो तोकः ' क आहारः ' कश च व्यवहारस्‌ तच 
इति । स आह । किं कथ्यते देशस्य तु । सुभिष्ाणि विचिच्राणि ' 
इत्याटि ॥ 


50०४ 7४. प्र 1088 0 0728 6768. 


एद16 5४01; € 81 €०८०१३16. 


सो ऽपि तदुपदेशं रुला कछतमरणनिख्चयो वानरम्‌ अनुक्ञाप्य प्राण च निजाञ्चयं 
तिन स्वगहप्रविषटेनाततायिना सह विग्रहं छत्वा दृढसत््वावष्टम्भाच्‌ च तं व्यापाद्य खाञ्चयं 
च लब्ध्वा सुखेन चिरकालम्‌ अतिष्ठत्‌ ॥ 
साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 
अकल्वा पौरुषं या ओरीः ' किं तयालसभाग्यया । 
कुरङ्गो ऽपि समश्नाति ' देवाट्‌ उपनतं तृणम्‌ ॥ ६६॥ 


समाप्तं चेदं लब्धप्रणाशं नाम चतुर्थं तन्त्रम्‌ ' यस्यायम्‌ आव्यख्ोकः। 
प्राप्नम्‌ अर्थं तु यो मोहात्‌ ' सान्तनैः प्रतिमुञ्चति । 
स एव वच्यते मूढो । मकरः कपिना यथा ॥४॥ 


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॥ अहम्‌ ॥ 


अधदम्‌ आरभ्यते ऽपरी्तितकारिलं नाम पञ्चमं तन्त्रम्‌ ' यखायम्‌ आदयश्लोकः। 
कुदृष्टं कुपरिज्ञातं । कृतं कृनिरीक्षितम्‌ । 8 
तन्‌ नंरेण न कर्तव्यं । नापितिनेह यत्‌ छतम्‌ ॥१॥ 
राजपुत्राः पृच्छन्ति । कथम्‌ एतत्‌ । विष्णुशमां कथयति । 
असि दाक्षिणात्ये जनपदे पाटलीपुचं नाम नगरम्‌ । तच च माणिभद्रौ नाम ओष्ठी 6 
प्रतिवसति स्म । तस्य धमार्थकाममोक्ाणि कुर्वतो विधिवशाद्‌ धनक्षयः संजातः । 
ततश्‌ च विभवक्षयाट्‌ अपमानपरपरया परं विषादम्‌ उपगतो राचौ चिन्तितवान्‌ । 


अहो धिग्‌ इयं द्रिद्रता। उक्तं च। यतः। 9 
शीलं शौचं च्षान्तिर्‌  द्‌ािण्यं मधुरता कुले जन्म । 
न विराजन्ति हि सवे ' वित्तविहीनस्य पुरुषस्य ॥२॥ द 
मानोवा दर्पो वा। विज्ञानं विभ्रमः सुबुद्धिर्‌ वा। 12 
सर्वे नश्यति सहसा ' विभवविहीनो यद्‌ पुरूषः ॥ ३॥ भ 
प्रतिदिनम्‌ उपेति विलयं ' वसन्तवा ताहतेव शिशिरः । 
बुद्धिर्‌ बुद्धिमताम्‌ अपि । कृटम्बभर चिन्तया सततम्‌ ॥४॥ द्र 15 
विपुलमतेर अपि नश्यति । बुद्धिः पुरुषस्य विभवहीनसख । 
घुतलवणतैलतण्डुल'वस्त्रेन्धनचिन्तया सततम्‌ ॥५॥ य 
न विभाव्यन्ते लघवो ' वित्तविहीनाः पुरो ऽपि निवसन्तः । 18 
सततं जातविनष्टाः ' पयसाम्‌ इव वुह्ुद्‌ाः पयसि ॥६॥ र 
विरस इति हसति न जनः ' कामं गन्तम्‌ अपि पतिं पयसाम्‌ । 
सर्वम्‌ अलञ्जाकरम्‌ इह । यद्‌ यत्‌ कर्वैन्ति परिपूर्णः ॥ ७॥ ह 21 


इति । एवं संप्रधायं भूयो ऽपि व्यचिन्तयत्‌ । तट्‌ अहम्‌ अनशनं कतवा प्राणान्‌ उज्छामि । 
किम्‌ अनेन व्यर्थजी वितव्यसनेन । एवं निखयं छला प्रसुघ्ः। 
अथ तस्य स्वप्रे पद्यनिधिः त्षपणकरूपी संदशेनं गत्वा प्रोवाच । भोः ओेष्ठिन्‌ । २५ 


मा लं वैराग्यं गच्छं । अहं पद्यनिधिस्‌ तव पूर्वपुरुषोपार्जिंतः । तट्‌ अनेनैव रूपेण 
1. 1 


500 ४. (प्र एएता0§ 07 248 प्त फि288; 258 


7816-8 $ : 8879€7 स 1710 {1116 6 ला, 


म्रातस्‌ तव गुहं समागमिष्यामि । तत्‌ तयाहं शिरसि लगुडप्रहारेण हन्तव्यः । येन्‌ 
कनकमयो ऽत्षयो भवामि । इति । 
अथ प्रातः संप्रवृद्धः स तं सघ्रं चिन्तयंस्‌ तिष्ठति । अहो ' खरो ऽयं सत्यो ऽसल्यो 8 
वा भविष्यति ' इति न ज्ञायते । नूनं मिथ्यानेन भाव्यम्‌ ' यत्कारणात्‌ ' अहम्‌ अहर्निशम्‌ 
एव वित्तम्‌ एव केवलं चिन्तयामि । उक्तं च ' यतः । 
व्याधितेन सशोकेन । चिन्ताग्रस्तेन जन्तुना । ¢ 
कामातेनाथ मत्तेन ' दृष्टः स्वन्नः फलोज््ितः ॥८॥ 
एतस्मिन्न अन्तरे तन्चार्यायाः कञ्चिन्‌ नापितो नखप्रचालना्थै समायातः । ततश्‌ चासौ 
यावन्‌ नखग्र्ञालनक्मं समाचरति ' तावत्‌ चपणकः सहसा प्रादुभूतः । अथ माणि- 9 
भद्रस तं समालोक्य प्रहृष्टमना आसन्नकाष्टद ण्डेन शिरस्य अताडयत्‌ । सो ऽपि सुवणमयो 
भूत्वा तत्णाद्‌ एव भूमौ निपपात । 
अथ स वणिक्‌ तं गृहमध्ये संस्थाप्य नापितं संतोष्य प्रोवाच । भद्र । न कस्यचिड्‌ 1४ 
आख्येयो ऽयम्‌ असन्रहवृत्तान्तः । नापितो ऽपि तद्वचनम्‌ अङ्गीकृत्य गुहं गत्वा चऋचिन्त- 
यत्‌ । नूनं सव ऽप्य एते नम्रकाः शिरसि काष्ठदण्डहताः काञ्चनमया भवन्ति । तद्‌ 
अहम्‌ अपि प्रातस्‌ तान्‌ प्रभूतान्‌ आमन्त्य लगुडेर हम्मि ' येन प्रभूतं हारकं भवति । 15 
इति । एवं तस्य चिन्तयतस्‌ तद्‌ दिनं निशा च कथम्‌ अपि व्यतिचक्राम । 
अथ प्रभाते समुत्थाय चपणकविहारं गलो त्तरासङ्क विधाय जिनस्य प्रदक्षिणा चयं 
दत्वा जानुभ्याम्‌ अवनीं गत्वा वक्तद्वारविन्यस्तोत्तरौयपल्लवः कताज्ञलिस्‌ तारस्वरेशैमं 18 
सरोकम्‌ अपठत्‌ । 
ते जयन्ति जिना येषां ' केवलक्लान शालिनाम्‌ । 
मनो मवामिधे बीजे ' मानंसेनोषरायितम्‌ ॥९॥ 21 
अन्यच्‌ च। सा जिद्धा या जिनं स्तौति, तच्‌ चित्तं यत्‌ तदर्पितम्‌। 
ताव एव केवलौ खाध्यौ । यौ तत्पूजाकरौ करौ ॥ १०॥ 
इति । एवम्‌ अन्यद्‌ अपि ब्धा संस्तुत्य ततः प्रधानच्तपणकम्‌ आसाद्य सितितलनिहित- 24 
जानुचरणः । नमो ऽस्तु ' वन्दे ' इत्य्‌ उत्का लब्धघर्मवृद्याशीवादः सुकृमारिकाभियरहल- 
ग्धत्रतादेशः सप्रश्रयम्‌ इदम्‌ आह । भगवन्‌ ' अव्य विहरणक्रिया समस्तसुनिसहितिनाखन्गहे . 
कर्तव्या ' इति । स आह । भोः आवक ' धर्मज्ञो ऽपि किम्‌ एवं वदसि । किं वचं 
ब्राह्मणाः ' यद्‌ आमन्त्रणं करोषि । यतो वयं सदैव तत्कालच्यया रमन्तो भक्तिभाजं 
श्रावकम्‌ अवलोक्य तस्य गृहे गच्छामः । तट्‌ गम्यताम्‌ । न भूयो ऽप्य एवं वाच्यम्‌ । तच्‌ 
छरुत्वा नापितः प्राह । भगवन्‌ । वेद्य अहम्‌ । एतत्‌ करिष्यामि । परं भवतः प्रभूतश्रावका 8 
अर्हणां कुर्वन्ति । अस्माभिस्‌ तु पुनः पुस्तकाच्छादनयोग्यपरिक्पंटानि प्रगुणीकृतानि 
सन्ति। पुस्तकानां च लेखनाय लेखकानां च वित्तं प्रदत्तम्‌ आस्ते । तत्‌ सर्वथा कालोचितं 
कर्तव्यम्‌ । इति । एवम्‌ उत्का स्वगृहं प्रति प्रसितः । 33 


०, वप्र 8.4 87 ग प्0 1.87) वप्त 078. 5800४ ए. 259 


ए वे716-8107 $. ¶21€ 1: 87द 0087166 87त सिप] 100०8. 


त्र गत्वा खदिरमयांल लगुडान्‌ सज्जीकृत्य कपारकोणेकदेशे संस्थाप्य साधंप्रह- 
रोदेशे भूयो ऽपि विहारद्वारम्‌ आित्य खितः । ततश च सर्वान्‌ क्रमेण निगेच्छतो 
गुरुप्रार्थनया स्वगृहम्‌ अनयत्‌ । ते ऽपि स्वँ कप॑टवित्तलोभेन भक्तियुक्तान्‌ अपि परिचि- 3 
तश्रावकान्‌ परित्यज्य प्रहष्टास्‌ तस्य पृष्ठतो जग्मुः । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 
एकाकी गृहसंत्यक्तः ' पाणिपात्रो दिगम्बरः । 
सो ऽपि संबाध्यते लोके ' तुष्णया पश्य कौतुकम्‌ ॥ ११॥ 6 
ततो नापितो ऽपि गृहमध्ये तान्‌ प्रवेश्य लगुडग्रहारेर अताडयत्‌ । ते ऽपि ताद्यमाना 
एके पञ्चत्वम्‌ उपगताः । अन्ये भिन्नमस्तकाः *+पफुत्कतुंम्‌ आरेभिरे । अचान्तरे तदाक्रन्द- 
शब्दम्‌ आकण पुरकोरपालपुरुषेर अभिहितम्‌ । भोः ' किम्‌ एष नगरमध्ये महान्‌ 9 
कोलाहलः । तद्‌ गम्यतां गम्यताम्‌ । इति वदन्तस्‌ ते संव याव्‌ वेगाट्‌ गत्वा पश्यन्ति । 
तावत्‌ चपणका रुधिराक्ञावितशरीरा नाषितगृहात्‌ पलायमाना दृष्टाः पुष्टाश्‌ च । 
भोः ' किम्‌ एतत्‌ । ते प्रोचुर्‌ यथावख्ितं नापितवृत्तान्तम्‌ । तैर अपि नापितो दृढबन्ध- 12 
नबञ्चो हतशेषक्तपणकेः सह धर्मांधिष्ठानं नीतः कारणिकः पुष्टश च । भोः ' किम्‌ 
एतद्‌ भवता कुछत्यम्‌ अनुष्ठितम्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । भोः । किं करोमि । एतद्‌ अभिधाय 
तेषां माणिभद्र वृत्तान्तम्‌ अकथयत्‌ । 15 
तैश च माणिभद्राकारणाय कित्‌ प्रेषितः । तेन च गत्वा माणिमद्रः समानीतः । 
तिः पुष्टः । भोः अष्ठिन्‌ ' किं त्या कञ्चित्‌ चपणको व्यापादितः । ततस्‌ तेनुपि सर्व्षपण- 
कवुत्तान्तः कथितः । अथ तिर्‌ अभिहितम्‌ । अहो । ूलायाम्‌ आ रोषवताम्‌ असौ 18 
कृपरीक्तितकारी दुरात्मा नापितः 
तथानुष्ठिते तेर अभिहितम्‌ । 
कृतं कुपरि न्नातं । कृश्ुतं कुपरीक्षितम्‌ । 21 
तन्‌ भरेण न करतेव्यं । नापितेन] यत्‌ छतम्‌ ॥ १२॥ 
अथवा साध्व इदम्‌ उच्यते। 
अपरीकितं न कर्तव्यं कर्तव्यं सुपरीक्षितम्‌ । २५ 
पञ्चाद्‌ भवति संतापो । ब्राह्मणीनकृलं यथा ॥ १३॥ 
माणिभद्रः प्राह । कथम्‌ एतत्‌ । ते प्रोचुः । 


॥ कथा १॥ ५ 


अस्ति कस्मिंश्चिट्‌ अधिष्ठाने देवमा नाम ब्राह्मणः । तस्य भायां 
पुम्‌ एकं नकुले च सुषुवे । अथय सा सुतवत्सतका सुतवन्‌ 


500 छ. प ए्याण§ऽ 07 2^ 8 प्रप्र58 ; 260 
नकुलम्‌ अपि स्तन्यदानाभ्यङ्गमनज्ननादिभिः पुपोष । परम्‌ ' 
एष टुष्टजातित्वात्‌ कदाचित्‌ सुतस्य विरूढम्‌ आचरिष्यति " इति 
न नकुलस्य विश्वसिति । अथवा साध्व्‌ इटम्‌ उच्यते । $ 

कुपुचो ऽपि भवेत्‌ पुंसां ' हृदयानन्दकारकः । 
दुविनीतः कुरूपो ऽपि ' मूख ऽपि व्यसनी खतः ॥१४॥ 

जच सा कदाचित्‌ पुं शय्यायां सुस्थितं विधाय जत्कुस्भं ° 
चादाय पतिम्‌ उवाच । भो उपाध्याय ' जलाम्‌ अहं 
यास्यामि । पु्ो ऽयं भवता नकुत्राट्‌ रशणीयः । अथ गतायां 
तस्यां ब्राह्मणो ऽपि गृहं भन्यीकृत्य स्वयम्‌ अपि कचिद्‌ भिक्षां ° 
नियेयो । 

अचान्तरे कृष्णसपों बिलान्‌ निष्क्रम्य देववशात्‌ तस्य 
बालकस्य पयेङान्तिकम्‌ आगमत्‌ । अथ नकुत्स्‌ तं स्वभाव- 
वेरिणं मत्वा स्वधातु वधशङयान्तरालत्रे संनिपत्य दुष्टसर्पेण सह 
संमामं विधाय तं खश्डशः कृवा टूरतश् चिक्षेप । तत्तो निज- 
शोयेप्रसुदितो रूधिराघुतमुखः स्वव्यापारप्रकाश्नाय मातुः संसु- ७ 
खम्‌ आजगाम । मातापि रूधिरक्जिन्नसुखम्‌ अतिसंरन्धं तम्‌ 
आगच्छन्तम्‌ अवलोक्य ' नूनं भषित ऽनेन दुरात्मना मम 
दारकः ' इति शङ्भितचित्ता कोपाट्‌ अविमृश्य तस्योपरि जल- 
कुम्भं चिप । कुम्भपातमात्रगतजी वितं तं नकुल्टं तचरैवावगणय्य ` 
यावत्‌ स्वगृहम्‌ आगच्छति ' तावट्‌ बाठकस्‌ तथेवासते ' पये- 
इान्तिके च महान्तं कृष्णसपं खण्डशः कृतं ट्टशे । अथ सोपका- 
रकपुचस्यानात्मो चितकृतवधशेकेनातेहदयात्मशिरोवसःस्यत्ादि- 
ताडनम्‌ अकरोत्‌ । एतस्मिन्‌ अवसरे ब्राह्मणो ऽपि कुतश्चिद्‌ 
भ्गृहीतनिस्रावकः परिभम्य यावट्‌ आगतः ' तावत्‌ पश्यति ' 


०४, {2 5.4 87 प 0 1.) ¶1प् ४ 10क्राद8. 5800 प्र, 261 

¶ 816 1 : 8721111128166 270 शि] 11008908. ¶ 816 आ: ए0णाः ६८628 प6-566(€8. 
पु्रशोकाभिभूता ब्राह्मणी वितपति । भो भोः ' लोभाभिभूतेन 
भवता यन्‌ न कृतं मम वचः ' तट्‌ अनुभव सांप्रतं निजटुष्कृतव्‌- 
छस्य पुचमृत्युटुःखफल्म्‌ । अथवा भवत्य्‌ एवैतद्‌ अतिलोभान्धा- 9 
नाम्‌ । उक्तं च ' यथा । 

अतिलोभो न कतेव्यो ' त्मोभं नेव परित्यजेत्‌ । 

अतिलोभाभिभूतस्य ' चक्रं मति मस्तके ॥ १५॥ 6 
ब्राद्यण आह । कणम्‌ एतत्‌ । ब्राह्मणी कथयति । 


॥ क्या २॥ 


इह कस्मिंश्विट्‌ अधिष्ठाने चत्वारो बाह्णाः परस्परं दृढसोहदाः ° 
प्रतिवसन्ति स्म । ते चातिश्यदारिद्रपहता मन्बयां चक्रिरे । अहो 
धिग्‌ अयं ट्रिदरभावः। उक्तं च। 
स्वामी इषि सुसेवितो ऽपि सहसा प्रोज्मन्ति सद्वान्धवा 19 
द्योतन्ते न गुणास्‌ त्यजन्ति तनुजाः स्फारीभवन्य्‌ आपदः । 
नायो नोचमवंश्जापि भजते नो यान्ति मिचराणि च 
न्यायारोपितविक्रमान्‌ अपि नरान्‌ येषां न हि स्याट्‌ धनम्‌ " 


॥ १६॥ शप्र 
किं च। 
प्रः सुरूपः सुभगण् च वाग्मी 18 
शस््राणि सवांणि विदां करोतु । 
अथं विना नैव कट्ाकल्ापं 
प्राप्रोति म्यो ऽ मनुष्यत्ठोके ॥१७॥ प्त %। 


तट्‌ वरं मरणम्‌ ' न च निधेनत्वम्‌ । उक्तं च । 


50० छ. (पए एव7§ 07 ^ प्र 7288; 262 

उल्िष्ठ छ णम्‌ एकम्‌ उदह सखे दाख्दद्िभारं मम 

रान्तस्‌ तावट्‌ अहं चिरान्‌ मरणजं सेवे तदीय सुखम्‌ । 

इत्य्‌ उक्तो धन वजितेन सहसा गत्वा श्मशाने शवो । 

दारिद्धान्‌ मरणं पर सुखम्‌ इति जात्वेव तुष्णीं स्थितः ॥ १४॥ ५००० 
तत्‌ सवेथाथांजेन एव यतितव्यम्‌ । उक्तं च । 

न हि तट्‌ विद्यते किंचिद्‌ " यट्‌ अर्थेन न सिध्यति । 6 

यत्तेन मतिमांस्‌ तस्माट्‌ ' अथेम्‌ एकं प्रसाधयेत्‌ ॥१९॥ 
स चाधेः पुरुषाणां षद्धिर्‌ उपायेर्‌ भवति ' तट्‌ यथा । भिष्षया ' 
नृपसेवया ' कृषिकमेणा ' विद्याजेनेन ' व्यवहारेण वणिक्कमेणा » 
च । परं सर्वेषाम्‌ अष्‌ एतेषां मध्ये वशिङ्कमेणा निर्लो 
ऽथेत्राभः । उक्तं च । 

हता भिक्षा ध्व्केर विचलति नृपाणाम्‌ अपि मनः १ 

कुषिः कष्टा विद्या गुरूुविनयवृच्यानिविषमा । 

कुसीदं दारिद्धं परकरगतायौत्मकरणं 

न मन्ये वाणिज्यात्‌ किम्‌ अपि च णुभं वतेनम्‌ अहो ॥२०॥ «५ ४ 
तच्‌ च वाणिज्यं सप्रधा वित्नागमाय स्यात्‌ ' तट्‌ यथा । क्टतु- 
त्ठामानम्‌ ' मिथ्याक्यकथनम्‌ ' निक्तेपप्रवेशः ' परिचितयाह- 
कागमः ' गोषिककमे ' गान्धिक्व्यवहारो देशन्तरभार्डनयनं च ! '* 
इति । उक्तं च । ष. 

परूणोपूर्णे माने ' परिचिततजनवज्वनं तथा नित्यम्‌ । 

मिथ्याक्रयस्य कथनं ' स्वभावरूपं किराटानाम्‌ ॥२१॥ ॐ 
अन्यच्‌ च । 

निक्षेपे गृहपतिते ' श्रेष्ठी संस्तोति देवतां नित्यम्‌ । 

निक्ेपेश्णो जरियतां ' दास्याम्य्‌ उपयाचित तुभ्यम्‌ ॥२२॥ > ५ 


०४, (प्र £ 5.^ 817 "प्0 1.1.70 वप्त तिक्र, 800६ फ. 26 


¶ 216 11; ८0 68506866 678. 


तथा । 

गोठिकक्मनियुक्तः ' श्ेष्ठी चिन्तयति चेतसा इष्टः । 

वसुधा वसुसंपरण ' प्राप्रा हि मया किम्‌ अन्येन ॥२३॥ > 
अपरम्‌ । 

पण्यानां गान्धिकं पण्यं ' किम्‌ अन्येः काञ्चनादिङकेः । 

गृह्यते हि यदट्‌ एकेन ' तत्‌ सह सेए दीयते ॥२४॥ 6 
देशन्तरभार्डानयनं विच्चवत्ताम्‌ एवाहेति । उक्तं च । 

येषां स्याट्‌ विपुलं विततं ' श्रूयन्ते ये ऽपि दूरतः । 

ते ऽर्थेर अर्थान्‌ निवध्चन्ति ' गजेर इव महागजान्‌ ॥२५॥ ° 

गुणं चिगुणं वित्तं ' कयविक्रयकोविदाः । 

प्राप्रुवन््य्‌ उद्यमाट्‌ ल्लोके ' टूरदेशणन्तर गताः ॥२६॥ 
किंच । 18 

सुभीताः परदेशेभ्यो ' बह्धात्स्याः प्रमादिनः । 

स्वदेशे निधनं यान्ति ' काकाः कापुरुषा मृगाः ॥ २७॥ 
इति । एवं संप्रधाये देशान्तरगमनं च निश्चित्य गृहं सुहृज्जनं च 1 
परित्यज्य चत्वारो ऽपि प्रस्थिताः । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । 

सत्यं परित्यजति मुञ्चति बन्धुवरभ 

शीध्रं विहाय जननीम्‌ अपि जन्मभूमिम्‌ । 18 

संत्यज्य गच्छति विदेशम्‌ अनिष्टत्ठोकं 

वित्नाकुत्टीकृतमतिः पुरुषः किम्‌ अन्यत्‌ ॥ २४॥ १७१० 
एवं च मेणा वन्तिविषयं प्राप्नाः । तच च सिप्राजले साल्वा 
रीमहाकात्देवं च प्रणम्य यावद्‌ अयतो गदन्ति ' तावद्‌ 
भैरवानन्दो नाम योगीन्द्रः संमुखो बभूव । तं च ब्राह्मणोचित- 
विधिना संभाष्य ते सर्वे तेनेव सह तदीयं मठायतनं जग्मुः । अथ 


8००र ए. वपर एणराणऽ 07 .^8प्राप288 ; ` 264 
ते योगिना पृष्टाः । कुतो भवन्तः । क वा यास्यथ । किं प्रयो- 
जनम्‌ । ततस्‌ तेर अभिहितम्‌ । वयं सिद्धयाचिकाः । तच 
यास्यामः ' यच धनतृघ्धिर्‌ मृत्युर्‌ वा भविष्यति ' इति । एष 
निश्चयः । उक्तं च । 

पतति कदाचिन्‌ नभसः ' खाति पाताठ्तो ऽपि जलम्‌ एति। 
देवम्‌ अचिन्तयं बत्वट्‌ ' बत्वान्‌ ननु पुरुषकारो ऽपि ॥२९॥ = ° 
तथा । | 
अभिमतसिद्धिर अशेषा ' भवति हि पुरुषस्य पुरुषकारेण । 
देवम्‌ इति यद्‌ अपि कथयसि ' पुरुषगुणः सो ऽप्य्‌ अद्‌- » 
छाख्यः ॥3३०॥ डः 
क्ेणस्याङ्गम्‌ अदा ' सुखम्‌ एव सुखानि नेह त्ठभ्यन्ते । 
मधुभिन्‌ *मणनायस्तेर्‌ ' आश्िष्यति बाहुभिर्‌ तष्मीम्‌॥३१॥ = 
तत्‌ कथ्यताम्‌ अस्माकं कश्चिट्‌ द्रव्यो पायः" विवरप्रवेशः ' शकि 
नीसाधनम्‌ " शमशणानसेवा ' महामांसविक्रयप्रभृतिर्‌ वा । त्वं 
*"चाद्तसि्िः श्रूयसे ' वयं चातिसाहसिकाः । उक्तं च ' यतः । 
महान्त एव महताम्‌ ' अथं साधयितुं समाः । | 
ऋते समुदराट्‌ अन्यः को ' विभति वडवानत्छम्‌ ॥३२॥ 
सो ऽपि तेषां शाणं योग्यतां विज्ञाय सिद्धवतिचतुष्टयं कृत्वा 18 
प्रत्येकम्‌ अपेयाम्‌ आस । आह च। गम्यतां हिमाचत्तोचरदिग्भागे । 
यज्र यस्य वतिः पतति ' तच तेनासंदिग्धं निधिर्‌ अवापयः। 
तत्तस्‌ तंथेव तेषां गच्छताम्‌ अयेतनस्य वर्तिः सितो पतित्ता। 
अथासो यावत्‌ तं प्रदेशं खनति ' तावत्‌ ताम्रमयी भूमिः । ततस्‌ 
तेनाभिहितम्‌ । अहो ' गृह्यतां यथेच्छ ताम्रम्‌ इदम्‌ । अथान्ये 
प्राहुः । भो मूढ ' किम्‌ अनेन ' यत्‌ प्रभूतम्‌ अपि दाखिद्धं न 


०६, (प्र £ 8.4.807 श प्0 1.1.27 वप्त 108. 58001 पए, 265 


¶216 14; ए0प ४८28 06-566 168. 


नाशयति । तट्‌ उच्िष्ठ । अयतो गच्छामः ' इति । सो ऽब्रवीत्‌ । 
यान्तु भवन्तः । नाहम्‌ अतः समेष्यामि । एवम्‌ अभिधाय 
ताम्रम्‌ आदाय प्रथमो निवृत्तः । २ 

शेषास्‌ चयो ऽप्य्‌ अयतः प्रस्थिताः । अथ किंचिन्माचं 
गत्तस्यायेसरस्य विर निपपात । सो ऽपि यावत्‌ खनति ' तावट्‌ 
रूप्यमयी भूमिः । ततः प्रहितः प्राह । भोः ' गृह्यतां यथेच्छं ९ 
रूपम्‌ । नाये गन्तव्यम्‌ । ताव्‌ ऊचतुः । भो मूखे ' पृष्ठतस्‌ 
ताम्रमयी भूमिः ' अये रूयमयी भूमिः । तन्‌ नूनम्‌ अये सुव- 
णमयी भविष्यति । तट्‌ अनेन प्रभूतेनापि न तथा दारखिद्यनाशो 9 
भवति । ततः स प्राहं । यातां भवन्तो । नाहम्‌ आगमिष्यामि । 
एवम्‌ अभिधाय रूप्यं गृहीत्वा पश्चान्‌ निवृत्तः । 


अथ तयोर्‌ अपि गच्छतोर्‌ एकस्य विर्‌ निपपात । सो ५ 
ऽपि यावत्‌ खनति ' तावत्‌ सुवणेमयी भूमिः । तां दष्टा प्रहृ 
हितीयम्‌ आह । भोः ' गृह्यतां यथेच्छं सुवणेम्‌ । नातः पर 
किंचिद्‌ उत्तमम्‌ अस्ति । सो ऽब्रवीत्‌ । मूढ ' किं न वेत्सि। 5 
प्रार्‌ तासम्‌ ' ततो रूप्यम्‌ ' ततश च सुवण प्राघ्रम्‌ । तन्‌ नूनम्‌ 
अतः परं रत्नानि भविषयन्ति । तट्‌ उचिष्ठ ' अमतो गच्छावः । 
किम्‌ अनेनापि प्रभूतेन भारभूतेन । सो ऽऋवीत्‌। गच्छतु भवान्‌ । 
अहम्‌ अचर स्थितस्‌ लां प्रतिपालयिषयामि । 

ततः सो ऽपि गच्छन्‌ एकाकी मीष्माकेकिरणसंतप्तगाचः पि- 
¦ पासाकुलितचि्तः सिद्धभूमिमागांन्‌ इतश चेतश च वभ्राम । अय 
स भरमास्यत्ठोपरि मस्तकोपरि परिभमच्‌ चक्रं रुधिरङ्किन्नकलेवर 
पुरुषम्‌ एकम्‌ अपश्यत्‌ । ततो दुततरे गत्वा तम्‌ अवोचत्‌ । भोः ' 


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5००४ ४. (प्र ए § 0 ^ € प्र प ८38 ; 266 


¶ 816 +: ए0 पः ५€8.8016-8661६68. 


भवान्‌ किम्‌ एवं शिरसि भ्रमता चक्रेण तिष्ठति । तत्‌ कथय मे " 
यदि कुचचित्‌ पानीयम्‌ अस्ति ' यतस्‌ त्ृष्णातों ऽस्मि ' इति । 

एवं तस्य वटतसत्‌ तच्‌ चकं तत्सणाट्‌ एव तन्मस्तकाट्‌ बा- 
ह णशिरसि समारुरोह । सो ऽव्रवीत्‌ । भद्‌ ' किम्‌ एतत्‌ । स 
आह । ममापीत्थम्‌ एवेतच्‌ शिरस्य्‌ आरूढम्‌ । स आह । तत्‌ 
कथय ' कटूतट्‌ अवत्तरिष्यति । महती मे वेदना । स आह । यदा 
त्वम्‌ इव कथ्िट्‌ धृतसिद्ध वतिहस्तः समागयेवम्‌ आल्रापयिष्यति" 
तदा तस्य मस्तके समारोष्यति । सो ऽजवीत्‌ । कियान्‌ कालस्‌ 
तवे वं स्थितस्य । सो ऽब्रवीत्‌ । सांप्रतं को राजा धरणीतले । ° 
चक्रधर आह । वीणावत्सराजः । पुरुष आह । रामो राजा या 
सीत्‌ ' तदाहं दास्दद पतः सिद्धवतिम्‌ आदाय त्म्‌ इव समा- 
गमम्‌ । ततो मयान्यः पुमान्‌ धृतचकमस्तको दृष्टः पृष्ट च । ५ 
ततस्‌ तवेव पृच्छत एव ममापि शिरसि तन्मस्तकाच्‌ चक्रम्‌ 
आर्रोह । परं कात्संख्यां न वेद्धि । चक्रधरः प्राह । भद्‌ ' कथम्‌ ' 
तहि ' तवैवं स्थितस्य भोजनप्राप्रिर्‌ आसीत्‌ । पुरुष आह । भद्‌ ' 
धनटेन निधानहरणभयात्‌ सिद्धानाम्‌ रएतट्‌ भयं दशितम्‌ ' येन 
कश्चिद्‌ अपि नागच्छति । अथ कथम्‌ अपि कश्चिद्‌ आयाति " 
स सुत्पिपासारहितो जरामरणवजिंतः केवलम्‌ इत्यं वेदनाम्‌ 
अनुभवति । तद्‌ इदानीम्‌ आज्ञापय माम्‌ । मोचितो ऽस्मि 
त्वया "पु्टाट्‌ अनयात्‌ । तत्‌ सांप्रतं स्वस्थानं यास्यामि । इत्य्‌ 
उच्का गतः । श 

अथ तस्मिन्‌ गते ' कथं मे सहचर चिरयति " इति तट्‌- 
न्वेषणपरस्‌ तत्पदपङ्न्यनुसारेण स स्व णेसिद्धः प्रस्थितो यावत्‌ 
विचिन्मागौन्तरं गच्छति ' तावत्‌ स रुधिरखाविततशरीरं ती््ण- ५ 


०४, ¶ प्र 8.4 885 क प्0 ए") गत 0िकि8. 5800 प, 26१ 
व 816 आ; ए0पा ४628 07686668. ¶ 216 11; 1.101-7131675. 
चक्रेण मस्तकोपरि रमता वेदना स्वसहचरं नरं ट्टशे । ततश 
च समी पविना भूत्वा सबाष्पं पृष्टः । भद्‌ ' किम्‌ एतत्‌ । सो 
।ऽन्रवीत्‌ । विधिवित्सितम्‌ । स आह । तत्‌ कथय । किं तत्‌ । ऽ 
सो ऽपि तेन पृष्टः सवै चक्रवृत्तान्तं तम्‌ अकथयत्‌ । तच्‌ छूत्वासो 
तं विगहेमाणः प्राह । भोः ' मया पुनः पुनर निषिद्धः ' परं 
बुद्धिहीनलान्‌ मद्वाक्यं न कृतवान्‌ । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ उच्यते । १ 
। वरं बुद्धिर न सा विद्या ' विद्यात्तो बुद्धिर्‌ उत्तमा । 
बुद्धिहीना विनश्यन्ति ' यया ते सिंहकारकाः ॥३३॥ 
चक्रधरः पृच्छति । कथम्‌ एतत्‌ । सुवणेसिदधः कथयति । ॥ 


॥ क्या ३॥ 


। कस्मिंश्चिद्‌ अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्यणा मेचीभावम्‌ उपागता 
निवसन्ति स्म । तेषां चयः सवेशस्तरपारगाः ' परं बुद्धिरहिताः ' 
एकस्‌ तु शस््रपराङ्युखः ' केवलं बुद्धिमान्‌ । अथ कदाचित्‌ 
तिर मिलिता मन्तम्‌ । को गुणो विद्यायाः ' यदि देशान्तरं 
गत्वा भूपतीन्‌ परितोषार्थोपाजेना न क्रियते । तत्‌ सवेथा सर्वे 
रं गच्छामः ' इति । अथ किंचिन्मागै गत्वा तेषां ज्येष्ठतरः 
प्राह । अस्माकम्‌ एकश चतुथों मूढः ' केवलं वुद्धिमान्‌ । न च 
विद्यां विना राज्ञां प्रतियहः केवत्ठरवुद्या लभ्यते । तट्‌ अस्मे 
स्वोपाजेनाविभागं न दास्यामः। तट्‌ ष निवृत्य स्वगृहं गच्छतु! 
अथ हितीयेनाभिहितम्‌ । अहो सुबुद्धे ' विद्याहीनस्‌ त्म्‌ । तट्‌ 
गच्छ गृहम्‌ । ततस्‌ तृततीयेनाभिहितम्‌ । अहो ' न युज्यते कतुम्‌ " 
एवम्‌ ' यत्तो वयं बात्कात्ठात्‌ प्रभृत्य्‌ एकच क्रीडिताः । तट्‌ 


5001 प. (प्र ए एएणा7§ 07 ए.^ प्र प्र 288 ; 268 
आगच्छतु महानुभावः । अस्मदुपाजितस्य वित्तस्य संविभागी 
भवतु । 

तथानुष्टिते तैर मागैम्‌ अतिक्रामद्धिर अटव्यां मृतसिंहा- * 
स्थीनि दुष्टानि । ततण चेकेनाभिहितम्‌ । अहो ' प्ूर्वाधीतवि- 
द्यायाः प्रत्ययः क्रियते । किंचिद्‌ एतन्‌ मृतसखखं तिष्ठति । तत्‌ 
सदभ्यस्तविद्याप्रभावेण प्रत्युज्जीवयामः । ततश चेकेनाभिहितम्‌ । १ 
अहम्‌ अस्थिसं चयं कतुं जानामि । डितीयेनाभिहितम्‌ । चमेमां- 
सरुधिर प्रयच्छामि । तृतीयेनाभिहितम्‌ । अहं सजीवनं करोमि । 
तत एकेनास्थिसं चयः कृतः ' हितीयेन ` चर्ममांसरूधिरेः संयो- ° 
जितः । तृतीयो यावज्‌ जीवितव्यं योजयति लप्र: ' तावत्‌ स 
बुद्धिमता निषिद्धः ' उक्तण च । एष सिंहः । यद्य्‌ एनं सजीवं 
करिष्यसि " तत्‌ सवान्‌ अष्‌ अस्मान्‌ व्यापादयिष्यति ' इति । ५ 
ततस्‌ तेनाभिहितम्‌ । भग्‌ मूखे ' नाहं विद्यां विफलतां 
नेष्यामि । ततश च तेनाभिहितम्‌ । तहिं ' सणं प्रतीक्षस्व ' 
यावट्‌ अहम्‌ एनं समीपतरूम्‌ आरोहामि । तथानुष्ठिते यावत्‌ 
सजीवः कृतः ' तावत्‌ चयो ऽपि ते तेनोत्याय व्यापादिताः । स 
च बुद्धिमान्‌ सिंहे स्थानान्तरगते वृ्ाट्‌ अवत्तीयं गृहं गतः ॥ 

अतो ऽहं बवीमि। वरं बुद्धिर्‌ न सा विद्या ' इति । "3 
तच्‌ त्वा चक्रधरः प्राह । अहो ' अकारणम्‌ एतत्‌ ' यतो 
देवहता बहुबुद्धयो ऽपि विनश्यन्ति ' स्वस्पधियो ऽपि विधिर 
सिता अभिनन्दन्ति । उक्तं च । + 

शत बुद्धिः शिरःस्थो ऽयं ' लबते च सहसखधीः । 
एकबुद्धिर्‌ अहं भद्रे ' कीडामि विमले जले ॥३४॥ 
सुवणेसिद्ध आह । कथम्‌ एतत्‌ । चक्रधरः कथयति । २५ 


०, ¶्प्र -8.^ 887 क प्0 87) एप 005. 500 ४. 269 


६16 ३४: 17105810 -क४, प ८त-क 1६, 5112161४. 


॥ क्या ४ ॥ 


¶ कस्मिंश्िज्‌ जलाशये शतवुद्धिसहसवुद्धिनामानो लौ मत्सो प्रति- 
वसतः स्म । तयोर एकनुद्धिर नाम मर्हुको मिचताम्‌ आज- 9 
गाम । एवं ते चयो ऽपि जलत्तीरे कियन्तम्‌ अपि काले 
सुभाषितगोष्ठीसुखम्‌ अनुभूय पुनर जत्टे प्रविशन्ति । अथ तेषां 
कटाचिट्‌ गोष्टीगतानां जात्ठहस्ता धीवरा अस्तमयवेलायां समा- ° 
याताः । तं च जलाशयं दुष्टरा ते मिथः मरोचुः । अहौ ' बहुमयो 
ऽयं हृदो दश्यते स्वस्यसत्कि त च । तत्‌ प्रभात आगमिघयामः । 
इत्य्‌ उक्ता स्वगृहं गताः । ते च तट्‌ वजपातसदुशं वचः श्युत्वा ° 
परस्परं मन्तरं चक्रुः । तच मरको ऽव्रवीत्‌ । भो भद्रौ शतवु्धि- 
सहखवुद्धी ' किम्‌ अचर * कतुं युज्यते ' पलायनम्‌ अवष्टम्भो वा । 
तच्‌ छवा सहसवुद्धिर विहस्योवाच । भो भित्र ' मा भेषीर्‌ ५ 

| वचनश्चवणएमात्रेणापि । आगमनम्‌ अपि तावत्‌ तेषां न संभा- 
व्यते । अथ भविष्यति ' तदा स्ववुद्धिप्रभावेण ताम्‌ आत्मानं च 
रस्िष्यामि ' यतो ऽहम्‌ अनेकजलगतीर्‌ जानामि । तच्‌ छूत्वा 5 
शतवुद्धिर आह । भोः ' युक्तम्‌ उक्तं सहस बुद्धिना ' यतः । 

न यचास्ति गतिर्‌ वायो ' रश्मीनां च विवस्वतः। 

तवापि हि विश्य्‌ आभु ' बुद्धिर्‌ बुद्धिमतां सदा ॥३५॥ ® 
तट्‌ वचनमाचश्रवणाज्‌ जन्मस्थानं +पित्तृपयोयागतं त्यक्तु न 
+शक्यते । इति क्रचिट्‌ अपि न गन्तव्यम्‌ । अहं तां स्ववुद्धिप्र- 
भावेण रक्िष्यामि । मर्क आह । मम तावद्‌ रकव बुद्धिः 
पत्ायनविषया । तट्‌ अहम्‌ अन्यं कंचिज्‌ जलाश्यं सभायों 
इद्येव यास्यामि । 


5०01 ४. वप्र ए एषणाण§ 07 ^ 8 प्रपि 58 ; 270 

¶816 1४: 71008810 -क ४, & 6, ¶216 आ: ए0प € दइप्ा€-86€)€ा.8, ¶&1& १: 4.58 85 81186. 

एवम्‌ उक्ता मण्डको राचिम्‌ आसाद्यान्यं जत्काश्यं गतः । 
अयान्येदयुस्‌ तेर यमर्किकराभेर मतसयवन्धिभिः प्रभात आगत्य 
जाकिर आच्छादितो हृदः । सर्वे ऽपि मत्छकूमेमणडकककेटादयो ४ 
जलचरा जाके निवध्य गृहीताः । तौ च शतवुद्धिसहस्वुद्य्‌ 
आत्मानं गतिविरशेषेर अपि रन्तौ जाले पतितौ व्यापादितौ 
च । अथापराह्ःसमये इष्टास्‌ ते धीवरा गृहं प्रति प्रस्थिताः । ® 
शतबुद्धिर गुरत्वाट्‌ एकेन शिरसि कृतः । अपरेण रज्नुबद्धः 
सहस्रवुिर नीयते । तत्र च वा पीकण्ठस्थितेन मरहूकेना] भिहितं 
पुरः स्वपत्न्याः । पश्य पश्य प्रिये । | 9 

शत वृद्धिः शिरःस्थो ऽयं ' त्ते च सहस्रधीः । 

एकबुद्धिर्‌ अहं भद्र ' क्रीडामि विमले जते ॥३६॥ 


अतो ऽहं ब्रवीमि । नैकान्तेन बुद्धिर्‌ अपि प्रमाणम्‌ "५ 
इति । सुवणेसिद्ध आह । यद्य अष्‌ एतद्‌ अस्ति ' तथापि मिच- 
वचनम्‌ अनुल्क्कनीयम्‌ । परं किं क्रियते । मया निवारितो 
ऽपि न स्थितो ऽतित्लोल्याट्‌ विद्याहंकाराच्‌ च । अथवा साध्व्‌ 
इटम्‌ उच्यते । 

साधु मातुत् गीतेन ' वारितो न मया स्थितः । 

अप्रवों ऽयं मणिर्‌ बद्धः ' संप्राप्रं गीतलक्षणम्‌ ॥३७॥ 
चक्रधर आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । 


॥ कया ५॥ 


| अस्ति कस्मिंश्चिद्‌ अधिष्ठान उद्धतो नाम गदेभः । स च दिवा 
रजकगृहे भारोद्हनं कृत्वा राच स्वेच्छया पयेटति । अथान्यदा ` 


०६, (प्र 8.4 8.7 प ्0 1.1.87 वप 108. 800४ ए. 271 


¶ 216 श; 4.88 83 8118 €, 


तस्य राजौ सोचेषु पयेटतः कटाचिच्‌ हूगातेन साधे मेची बभूव । 
तो च भ*वृतिभङ्खं कृत्वा ककेटिकालोचेषु प्रविश्य तत्फलभष्णं 
स्वेच्छया कृत्वा प्रत्यूषे स्वस्थानं व्रजतः । अथ कदाचित्‌ रसोचम- » 
ध्यस्थितेन मटोदतरासभेन भृगात्लो ऽभिहितः । भो भगिनीसुत ' 
पश्य । अती वनिमेत्ा रजनी । तट्‌ अहं गीतं करिघामि । तत्‌ 
कतमेन रागेण करोमि । स आह । माम ' किम्‌ अनेनानथेप्रचा- ® 
त्नेन । यतश चोयेकमेप्रवृत्ता वयम्‌ । चौरजरिर निभृतिर एव 
स्थातव्यम्‌ ' इति । उक्तं च । 

कासी विवजेयेच चोय ' निद्रात्ुश् चमचोरिकाम्‌ । # 

जिड्ालौस्यं च रोगाद्मो ' जीवितुं यो ऽ वाञ्डति ॥३४॥ 
*तथा त्दीयगीतं श्हनादानुवादि न मधुरम्‌ । इति दूराद्‌ अपि 
श्रुत्वोत्थाय सोचरछ्ापुरुषा बन्धं वधं च विधास्यन्ति । तट्‌ भक्षय ‡ 
तावन्‌ निभृतः । तच_ छूवा रासभ आह । भोः ' वनाश्रयतवात्‌ 
त्वं गीतरसं न वेत्सि । तेनेतट्‌ ब्रवीषि । उक्तं च । 

शरज्ज्यो त्ल्ाहते टूर ' तमसि प्रियसंनिधो । 15 

धन्यानां विशति श्रो ' गीतभकारजा सुधा ॥ ३९॥ 
प्मुगाल आह । माम ' अस्त्य्‌ एतत्‌ । परं कठोरम्‌ उन्नदसि । तत्‌ 
किं तेन स्वाथेभंशिना । रासभ आह । धिग्‌ धिग्‌ मूखे ' किम्‌ 
अहं गीतं न जानामि । तच्‌ छूयताम्‌ । तस्य भेदाः ' तद्‌ यथा । 

सप्र स्वरस्‌ चयो मामा ' मूडेनास्‌ त्र *एकविंशतिः । 

ताना एकोनपन्चाश्त्‌ ' तिस्रो माचा ठकयास्‌ चयः ॥४०॥ 

स्थानचयं यतीनां च ' षड़ आस्यानि रसा नव । 

वणाः षट्जिंशतिर्‌ भाषाश ' चत्वारिंशत्‌ ततः स्मृताः ॥४१॥ 


50०1 प, प्र एतऽ 07 24 8288 ; 72 


¶81€ 9: 4.88 85 8171867. ¶216 34 : ८0 पाः € 85५6-866€1६€18. 


पञ्चाशीत्यधिकं ह्य्‌ एतद्‌ ' गीतानां च शतं स्मृतम्‌ । 

सुवणैरचितं शुद्धं ' गीतद्केः सकठठिर्‌ वृतम्‌ ॥४२॥ ` 

नान्यट्‌ *गीतादट्‌ वरं त्कोके ' देवानाम्‌ अपि दृश्यते । ४ 

गुष्कल्ायुरवेर्‌ ईशं ' ररज्ञे रावणः पुरा ॥४३॥ 
तत्‌ कथं त्वं माम्‌ अनभिज्ञं वदसि निवारयसि च । णुगाल 
आह । माम ' यद्य्‌ एवम्‌ ' तट्‌ अह वृतिद्ारदेशस्थः शेचपात्म्‌ ° 
अ वलत्मोकयामि ' तं पुनः स्वेच्छया गीतं कुर्‌ । | 

तथानुष्ठिते गदेभ उक्कन्धरो भूता शब्टायितुम्‌ आख्धः । ततः 

छेचपात्छा रसभश्ब्दितं समाक्रये कोधाट्‌ दन्तान्‌ टन्तेर निपी- » 
डयन्तो त्गुडम्‌ उद्यम्य प्रधाविताः । समेत्य च तावत्‌ प्रता 
डितः ' यावट्‌ भूमिपृष्ठे पतितः । ततश च *सच्छिदरोटखल्ठं गलते 
बजा केचपालाः सुप्राः । रासभो ऽपि स्वजातिस्वभावगतवेद्नः 
छणेनाभ्युत्थितः । उक्तं च । 

सारमेयखराश्वस्य ' गदेभस्य विशेषतः । 

सुहूतीत्‌ परतो न स्यात्‌ ' प्रहारजनिता व्यथा ॥४४॥ 15 
तत्त च तम्‌ *एवोदूखत्ठम्‌ आदाय वृतिं चूणेयि्ा पत्ायितुम्‌ 
आण्धः। एतस्मिन्न्‌ अन्तरे णुगात्मो दूराद्‌ एव तं दृष्टा सस्मितम्‌ 
इद्म्‌ आह । 15 

साधु मातुल गीपेन ' वारितो न मया स्थितः । 

अपूवों ऽयं मणिर्‌ बद्धः ' संप्राप्रं गीतलक्षणम्‌ ॥४५॥ 
इति ॥ 1 


तट्‌ भवान्‌ अपि निवायेमाणो ऽपि मया न स्थितः । तच्‌ 
छूत्वा चक्रधर आह । भो मिच्र ' सत्यम्‌ एतत्‌ । अथवा साध्व्‌ इदम्‌ 
उच्यते । | 24 


०, (प्र ए8.^ 817 0 11870 वप्त किक्ि8. 5800६ प. 1 


¶ 216 14; ८0 ४688116 -8661६678. 216 91: {र 0-168060 62१67 


यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा ' मित्राणां न करोति यः। 
स एव निधनं याति ' यथा मन्थरकील्टिकः ॥४६॥ 
स्वणेसिद्ध आह । कथम्‌ एतत्‌ । चक्रधरः कथयति । 8 


॥ क्या ६ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिद्‌ अधिष्ठाने मन्थरको नाम कोलिकः । तस्य 
कटाचित्‌ सवांणि पटकमेकाष्ठानि भस्रानि । तततः स कुठारम्‌ ९ 
आदाय काष्ठाथे परिभमन्‌ समुद्रतटं प्राप। तच च महान्तं शिश- 
पापादपं दृष्टा चिन्तितवान्‌ । महान्‌ अयं वृक्षो दश्यते । तट्‌ 
अनेन +*कतितेन प्रभूतानि पटकर्मोँपकरणानि भविष्यन्ति । इत्य्‌ ° 
अवधाये तस्यो परि कुठारम्‌ उद्यतवान्‌ । अथ तच वृषो कश्चिट्‌ 
व्यन्तर आसीत्‌ । तेनाभिहितम्‌ । भोः ' ममा्रयो ऽयं पादपः। 
तत्‌ सवेथा रछणीयः ' यत्तो ऽहम्‌ इह समुद्रकल्लोत्संस्यशेशीत- 
लनिल॑स्पृश्यमानंशरीरः परमसुखेन तिष्ठामि । कोलि क आह । 
भोः ' तट्‌ अहं किं करोमि । दारूसामयीं विना वबुभुया पीडयते 
मम कुटश्म्‌ ' इति । तस्माद्‌ अन्यच शीध्रं गम्यताम्‌ । अहम्‌ " 
एनं कत्िष्यामि । व्यन्तरो ऽब्रवीत्‌ । भोः ' तु्टस्‌ तवाहम्‌ । 
प्राथ्येतां किंचिद्‌ अभीष्टम्‌ । रछषेनं पादपम्‌ ' इति । कोत्िक 
आह । यद्य्‌ एवम्‌ ' तहिं ' अहं गृहं गत्वा स्वमित्रं पत्नीं च पृष्रूा 
समागच्छामि । अथ ' तथा ' इति व्यन्तरेण प्रतिपन्ने कोत्ठिकः 
स्वगृहं प्रति निवृत्तो यावट्‌ अधिष्ठाने प्रविशति " तावन्‌ निज- 
सुहृदं नापितम्‌ अपश्यत्‌ ' आह च । अहो मिच ' मम कथिदट्‌ 
व्यन्तरः सिङ्धः । तत्‌ कथय ' किं प्राथेये । नापित आह । भद्‌ ' 
यद्य्‌ एवम्‌ ' तट्‌ राज्यं प्राथेयस्व ' येन त्वं राजा ' अहं मन्त्री ' 


फ 


800 छ, व प्रए ए्ताण§ 07 2^8प्त288; 274 


ाव्‌ अपीहत्लोकसुखम्‌ अनुभूय परल्ोकसुखम्‌ अनुभवावः । 
कौए्ठिक आह । भो भिर ' भवत्व्‌ एवम्‌ । परं पत्नीम्‌ अपि 
पृच्छामि । नापित आह । न हि स्वीभिः सह मन्तयितुं युज्यते । 9 
उक्तं च । 

भोजनाद्छाटनं दद्याट्‌ ' ऋतुकात्ठं विशेषतः । 

भूषणाद्यं च नारीणां ' न ताभिर्‌ मन्त्रयेत्‌ सुधीः ॥४७॥ °. 
तथा च। 

यच स्त्री यत्र कितवो ' वात्ठो यच प्रशसिता । 

तट्‌ गृहं छयम्‌ आयाति ' भागेवो हीदम्‌ अव्रवीत्‌ ॥४४॥ ° 
किंच। 

तावद्‌ एव प्रधानं स्यात्‌ ' तावदट्‌ गुरुजने रतः । 


पुरूषो योषितां यावन्‌ ' न शृणोति रहो वचः ॥४९॥ 12 


एताः स्वाथेपरा नायः ' केवत्टं स्वसुखे रताः । 

न तासां वल्लभो यस्मात्‌ ' स्वसुतो ऽपि सुखं विना ॥५०॥ 
कोलिक आह । यद्य अप्‌ एवम्‌ ' तथापि सा पतिव्रता प्रष्टव्या । 

एवं तम्‌ अभिधाय सत्वरं गत्वा पत्नीम्‌ उवाच । भद्रे ' 

अद्यास्माकं कश्चिट्‌ व्यन्तरः सिद्धः । स वाञ्छितं प्रयच्छति । तद्‌ 
अहं त्वां प्रष्टुम्‌ आगतः । तत्‌ कथय ' किम्‌ अथेये । एष तावन्‌ + 
सम सुहृन्‌ नापितः ' राज्यं प्राथ्येताम्‌ ' इति वटति । सावब्रवीत्‌। 
आयेपुच्र ' का मतिर्‌ नापितानाम्‌ । तन्‌ न काये तचः । उक्तं 
च । 

चारशेर वन्दिभिर्‌ नीचैर्‌ ' नापितैर बात्छकेर्‌ अपि। 

न मन्तो यतिभिः कायः ' साधं भिष्षुभिर्‌ एव च ॥५१॥ 


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०, प 234 8 0 ए) पए 08. 800 पछ, 27१5 
अपरम्‌ अतिङ्गेशएपरंपरेषा राज्यस्थितिः संधिविमह॑यानासन॑संच्- 
यिधीभावादिचिन्ता पुरुषस्य कदाचिद्‌ अपि न सुखं प्रयच्छति । 
तथा । ॥ 

यदर्थे भातरः पुचा " अपि वाञ्डन्ति ये निजाः । 

वधं राज्यकृते राज्ञां ' तट्‌ राज्यं दूरतस्‌ त्यजेत्‌ ॥५२॥ 
कौलिक आह । सत्यम्‌ उक्तं भवत्या । तत्‌ कथय ' किं याचे । ऽ 
साव्रवीत्‌ । तं तावद्‌ एकं पटं नित्यम्‌ एव निष्पादयसि । तेन 
सवेव्ययमुद्धिः संपद्यते । इदानीम्‌ आत्मनो ऽन्यद्‌ बाहुयुगलं 
शिरश च याचस्व ' येन पुरतः पृष्ठतश चैंकेकं पटं संपाद्यसि । ° 
ततचैकस्य मूल्येन गृहव्ययः शुध्यति ' डितीयस्य मूल्येन विशेषक 
त्यानि कुवा णस्य जातिमध्ये चछचाध्यमानस्य कातो गच्छति । सो 
ऽपि तच्‌ छूत्वा प्रहृष्टः प्राह । साधु ' पतिव्रते ' साधूक्तं भवत्या । 
एवं करिष्यामि ' इति निश्चयः । अथ कौलिको गत्वा व्यन्तरं 
प्राथेयां चक्रे । भोः ' यदि वाञ्छितं प्रयच्छसि ' तट्‌ देहि मे 
| ितीयं बाहुयुगलं शिरश, च । एवम्‌ अभिहिते तत्क्षणाद्‌ एव 
विशिरा चतुबोहुः संजातः । तत च प्रहृष्टमना यावद्‌ गृहम्‌ 
आगच्छति " तावल्‌ ल्तेकिः " राक्षसो ऽयम्‌ " इति मन्यमानेर्‌ 
लगुडपाषाणादिभिस्‌ ताडितो मृतश् च ॥ 18 

अतो ऽहं ब्रवीमि । यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा ' इति । चक्रधरः 

पुनर रवाह । सवों ऽपि जनो ऽश्रद्धेयकदाशपिशचिकायस्तो 
हास्यपदवीं याति । अथ साध्व इदम्‌ उच्यते । थ 

अनागतवतीं चिन्ताम्‌ ' असंभाव्यां करोति यः। 

स एव पाण्डुरः शेते ' सोमशमेपिता यथा ॥५३॥ 
स्वणेसिड आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । २५ 


१ च, 


5007 छ. वप्र ए ष्य5ऽ 07 ^ प्प 88 ; 276 


¶ 816 91: 81211181 0115 811.68.5168. 


॥ कया ७ ॥ 


अस्ति कस्मिंश्चिद्‌ अधिष्ठाने स्वभावकृपणो नाम ब्राह्मणः । तेन 
भिस्षाजितिः सक्तुभिर्‌ भुक्तोडरितिः कलशः संपूरितः। तं च कत्टशं ४ 
नागदन्ते ऽ वलम्ब्य तस्याधस्तात्‌ खद निधाय सततम्‌ एकदृष्चा- 
वलत्लोकयन्‌ राचो चिन्तयाम्‌ आस । सक्तुभिः परिप्रूणों ऽयं तावद्‌ 
घटो वर्तते । तट्‌ यदि दुर्भिक्षं भविष्यति ' तदा रूपकाणां शतम्‌ ° 
अस्मिन्‌ उत्पस्यते । ततश च तेनाजादयम्‌ अहं *पहीष्ये । ततः 
षण्मासे षण्मासे प्रसववशद्‌ अजायूथं भविष्यति ' तततो ऽजाभिर्‌ 
गावः । गवां प्रसवात्‌ तदपत्यविक्रयं करिष्यामि । ततो गोभिर्‌ ° 
महिष्यः ' महिषीभिर्‌ वडवाः " वडवाप्रसवतो मम प्रभूता अश्वा 
भविष्यन्ति । तेषां विक्रयात्‌ प्रभूतं सुवणे भविष्यति । सुवर्णेन 
चतुःशतं गृहं संपतते । ततश च कश्चिन्‌ मम गृहम्‌ अभ्येत्य 
प्राप्रवरां रूपाढ्यां कन्यां प्रदास्यति । तस्याः पुबो भविष्यति । 
तस्याहं सोमश्मो ' इति नाम करिथामि । ततत्‌ तस्मिज्‌ 
जानुचत्नयोग्ये संजाते ऽहं पुस्तकं गृहीत्वाश्चचलःस्थापृष्ठदेशे 
समुपविश्य] वधारयिष्यामि । एतस्मिन्‌ अन्तरे सोमशमा मां दष्टा 
जनन्या उत्सङ्काज्‌ जानुप्रचलनपे ऽश्वानां समीपवती गमि- 
ष्यति । ततो ऽहं ब्राह्मणीं कोपाद्‌ अभिधास्यामि । गृद्यतां गृद्यतां 
बाठकः । सापि गृहकमेव्ययतयास्मइचनं न श्रो्ति । ततो ऽहं 
समुत्थाय पादप्रहारेण तां ताडयिष्यामि । एवं तेन तद्यानाव- 
स्थितेन पादप्रहारस्‌ तथा सुक्तः ' यथा घटो भग्नः । घटान्तवे- ५ 
तिभिः सक्तुभिश च पार्डुरतां गतः ॥ 


०४, (प 2 28.^ 28. "0 स...) प 108. 5800 प. 27१ 


¶ 216 आ: ए0पाः ६6880656 €ा8. ¶216 ण: 40618 6८०६6. 


अतो ऽहं ्रवीभि। अनागतवतीं चिन्ताम्‌ ' इति । सुवणेसि्ध 
आह । एवम्‌ एवतत्‌ ' यतः । 
यो लौस्यात्‌ कुर्ते कमे ' नैवानथेम्‌ अपेते । 5 
विडब्रनाम्‌ अवाप्नोति ' स यथा चन्द्रभूपतिः ॥५४॥ 
चक्रधर आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽत्रवीत्‌ । 


॥ कथा ८६॥ 6 


अस्ति कस्मिंश्चिन्‌ नगरे चन्दो नाम भूपतिः । तत्पुचक्रीडाथं 
वानरयूथं तिष्ठति । तन्‌ नित्यम्‌ एवुनेकभोजनभष्यादिभिः पुष्टि 
नीयते । तस्येव कुमारस्य क्रीडां मेषयूथम्‌ अस्ति । तन्मध्याट्‌ ° 
एको जिद्धालोस्याट्‌ अहनि शं महानसे प्रविश्य यत्‌ रकविचित्‌ 
पश्यति ' तत्‌ सवे भक्षयति । तं च सूपकारा यत्‌ किचित्‌ काष्ठा- 
दिकम्‌ अये पश्यन्ति ' तेन ताडयन्ति । सो ऽपि वानरयूथ- 
पस्‌ +तट्‌ दुष्टा व्यचिन्तयत्‌ । अहो ' मेषसूपकारयोः कलहो 
ऽयं वानराणां रयाय भविष्यति " यतः स्वादट्लम्पटो ऽयं 
मेषः ' महाकोपाश च सूपकारा यथास्थानासन्नेन वस्तुना 
प्रहरन्ति । तट्‌ यदि वस्त्वन्तरभावात्‌ कदाचिद्‌ उल्मुकेन ताड- 
यिष्यन्ति ' तट्‌ ऊण प्रस्तरो ऽयं मेषः स्वल्येनापि प्रज्त्टिष्यति । 
तट्‌ दह्यमानः पुनर्‌ अश्वकुटयां समी पवतिन्यां प्रवेष्यति ' सापि 
तृणप्रा चुयज्‌ ज्वलिष्यति ' इति । ततो ऽश्वा भ्वह्िदाहम्‌ अवा- 
प्स्यन्ति । शलिहोचे पुनर एतट्‌ उक्तम्‌ ' यट्‌ वानरवसयुश्वानां 
वहिदाहदोषः प्रश्णम्यति । तन्‌ नूनम्‌ अस्माकम्‌ उपस्थितो 
मृत्युः ' इति । एवं निश्चित्य सवान्‌ वानरान्‌ आहूय प्रोवाच । 


5००४ छ. पए एवाण§ 07 ^ प्रप 268; 278 

मेषेण सूपकाराणां ' कत्डहो यो ऽ च वतेते । 

स भविष्यत्य्‌ असंदिग्धं ' वानराणां छयावहः ॥५५॥ 

तस्मात्‌ स्यात्‌ कलहो यच्र ' गृहे नित्यम्‌ अकारणः । 3 

तट्‌ गृहं जीवितं वाञ्छन्‌ ' दूरतः परिवजेयेत्‌ ॥५६॥ 
तथा च। 

"कलहान्तानि हम्याणि ' कुवाक्यान्तं च सोहृटम्‌ । ¢ 

कुराजान्तानि राष्टराणि " कुकमोन्तं यशो नृणाम्‌ ॥५७॥ | 
तन्‌ न यावत्‌ सर्वेषां छषयो भवति ' तावद्‌ गृहं परित्यज्य वनं 
*+गद्छामः । 9 

अथ तस्य तट्‌ वचनं श्रुत्वा ते "मदोद्धता विहस्य तम्‌ +ऊचुः। 

भोः ' वृद्धभावाट्‌ भवतो वेकस्यं बुद्धैः संजातम्‌ ' येनेतट्‌ 
जवीषि । न वयं राजपुत्रैः स्वहस्तप्रद्ान्‌ अमृतकल्पान्‌ भष्य- 
विशेषान्‌ परित्यज्य तच्राटव्यां कषायकटुतिक्तछाराणि वृक्षफत्ानि 
भरयिष्यामः । तच्‌ छूत्वा कल्तुषां दृष्टिं कृत्वा यूथपः प्रोवाच । 
रेरे" मूखां यूयम्‌ । नैतस्य सुखस्य परिणामं जानीथ । यस्माट्‌ 
आपातमाचमधुरम्‌ एतत्‌ मुखं परिणामे विषवट्‌ भविष्यति । 
तट्‌ अहं कुत्ृक्षयं स्वयं नावलोकयिष्यामि । सांप्रतं तट्‌ `एव 
वनं यास्यामि । उक्तं च । 18 

परहस्तगतां भाय " मिचं च विषमस्थितम्‌ । 

धन्यास्‌ तात न पश्यन्ति ' देशभङ्गं कुल्यम्‌ ॥५७॥ 
इति। एवम्‌ अभिधाय सवान्‌ परित्यज्य स यूथपो ऽटव्यां गतः । 

अथ तस्मिन्‌ गते ऽन्यतमे ऽहनि स मेषो महानसे प्रविष्टः। 

यावत्‌ सूपकारेण किंचिट्‌ अपि नासादितम्‌ ' तावद्‌ अधेदग्ध- 
ज्ल्टितकाष्टम्‌ आदाय स ताडितः। सो ऽपि तेन ताडितः सन्‌ ५ 


न 


०» ¶्प् 84 287 "ए प्0 ए) प्र 108. 8001 छ. 279 
अधेज्रत्ठच्छरीरः शब्दायमानः प्रत्यासन्रवर्तिन्याम्‌ अश्वकुट्यां 
प्रविष्टः । तत्र च त्वठतस्‌ तुणप्राचुयोत्‌ स वेनो ऽपि वहिज्वात्कराः 
समुत्थिताः ' कुट्यां च निबद्धा घोटकाः केचित्‌ स्फुटितनयनाः ° 
पञ्चत्वं गताः । केचिच्‌ च वन्धनानि चोटयित्वाधेदग्धशरीरा 
हेषायमाणः सवम्‌ अपि जनं व्याकृत्टरीचक्रुः । एतस्मिन्‌ अन्तरे 
राजा सविषादः शलिहोच्ञाज्‌ चिकित्सकान्‌ आहूय प्रोवाच । १ 
प्रोच्यताम्‌ अश्वानाम्‌ एतेषां क्थिट्‌ दाहोपश्मोपायः । ते ऽपि 
शस््राणि संचिन्य प्रोचुः । देव ' प्रोक्तम्‌ अचर विषये भगवता 
शाल्टरिहोचेण । 9 

कपीनां वसयाश्वानां ' वहिदाहससुद्ञवा । 

व्यथा विनाशम्‌ अभ्येति ' तमः सूर्योदये यया ॥५९॥ 
तत्‌ क्रियताम्‌ एतच्‌ चिकित्सितम्‌ ' यावट्‌ रोगेण ते न विन- 
श्यन्ति । सो ऽपि तच्‌ छता वानरवधम्‌ आदिष्टवान्‌ । किं 
बहुना ' सर्वे ते व्यापादिताः ' इति । यूयपतिस्‌ तु न तां 
कुत्धषेणां साक्षाट्‌ दटशे । श्युतिपरंपरया तु शुत्ा न सेहे । 
उक्तं च ' यतः । 

धषेणां मषेयेट्‌ यो ऽ ' वंशजां परनिभिताम्‌ । 

भयाट्‌ वा यदि वा लोभात्‌ ' स जेयः पुरुषाधमः ॥६०॥ 

अथ तेन वृद्धवानेरेण कुबचित्‌ पिपासाकुत्ेन भ्रमता 
पद्चिनी खण्डमरिडतं सरः समासादितम्‌ । तच च यावन्‌ निपु- 
णत्तयावत्टरोकयति ' तावत्‌ प्रविश्‌ एव पद्‌ पश्यति " न च 
निगेच्छत्‌ ' इति । ततश चिन्तयाम्‌ आस । नूनम्‌ अचान्तजेते 
दु्टमाहेण भाव्यम्‌ । तत्‌ पद्चिनीनाल्म्‌ आदाय दूरस्थो ऽपि 
जलपानं करोमि । तथानुष्ठिते तन्मध्याट्‌ रत्नमालालंकृतकण्ठो ५ 


5001 ४, पप्र द्वा5§ 07 2 8 प्र प्र 288 ; 

रासो निष्कम्य तम्‌ उवाच । भोः ' यो ऽत सलिले प्रवि- 
शति ' तं भक्षयामि ' इति । तन्‌ नास्ति धूतेतरस्‌ त्वट्‌ अन्यः ' 
यो ऽनेन विधिना पानीयं पिवति । तत्‌ तुष्टो ऽहम्‌ । प्राथेयस्व 
हदयवाज्डितम्‌ । कपिर्‌ आह । भोः ' कियती भस्षणशक्तिस्‌ 
ते । स आह । शतसह खायुतलस्षाणय्‌ अपि जलप्रविष्टानि भक्ष- 
यामि । बाह्यतः श्ृगात्टरो ऽपि मां धषेयति । वानरः प्राह । 
अस्ति मे भूपतिना सहास्थ्यन्तं वेरम्‌ । यद्य्‌ एनां रनमा्कां मे 
प्रयच्छसि ' तत्‌ सपरिवारम्‌ अपि तं भूपतिं वाक्प्रपञ्चन त्ोभ- 
यित्वा सरसि प्रवेशयामि । अथ राक्षसस्‌ तस्मे रत्नमालां 
समपेयाम्‌ आस । 

वानरो ऽपि रत्नमात्ठाविनूषित्तकण्ठे वृष्षप्रासादेषु परि 
मञ्‌ जनेर्‌ दृष्टः पृष्ट च । भो यूथप ' क भवान्‌ इयन्तं कालं 
गत्वा स्थितः । क भवतेद्ग्‌ रत्नमाला लब्धा " या दीघा सूयेम्‌ 
अपि तिरस्कुरूते । वानरः प्राह । अस्ति कुबरचिट्‌ अरण्ये धनद्‌- 
विनिमितं सुगुप्रतरं सरः । तचाधोदिते सूर्ये सूयेवारेण यः कश्चिन्‌ 
निमज्जति ' स धनदप्रसादाट्‌ इदमत्नमालाविभूषितकर्ठो नि- 
ष्कामति । अथ भूभुजा जनात्‌ तट्‌ आकण्ये स वानरः समाहूय 
पृष्टः । भो यूथपते ' सत्यम्‌ एतत्‌ । कपिर्‌ आह । स्वामिन्‌ ' एष 
प्रत्यसतया मत्करदस्थितया रत्नमात्या प्रत्ययस्‌ ते । यरि तवापि 
तया प्रयोजनम्‌ ' तन्‌ मया सह कम्‌ अपि प्रेषय ' येन 
द्शेयामि । तच्‌ छा नृपतिः प्राह । यद्य्‌ एवम्‌ " तट्‌ अहं 
सपरिजनः स्वयम्‌ एषामि ' यथा प्रभूता रत्नमाला: संपद्यन्ते । 
वानर आह । स्वामिन्‌ ' एतट्‌ एव चारू । 


280 


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अथ भूपतिः सपरिजनो रत्नमालालोभात्‌ प्रस्थितः 1 वा- ५ 


ध प्र 2342817 श प्0 सा.) प्त 08. 500 ४, 281 
नरे ऽपि राज्ञा दोलारूढेन स्वोत्सङ्गम्‌ आरोपितः म्रतिपततिपूवे 
गच्छति । अथवा साध्व्‌ इटम्‌ उच्यते । 

ल्लोभाद्‌ एव नरा मूढा ' धनविद्यान्विता अपि । ४ 

अकृ्येषु नियोज्यन्ते ' *भाम्यन्ते दुगैमेष्व्‌ अपि ॥६१॥ 
तथा च । 

इच्छति शती सहसखं ' सही ठ सम्‌ ईहते । ९ 

ल्षाधिपस्‌ ततो राज्यं ' राज्याच्‌ च स्वर्गम्‌ इहते ॥६२॥ 

जीयेन्ति जीयेतः केशा ' टन्ता जीयेन्ति जीयेतः । 

जीयेत चक्षुषी रोते ' तृष्णोका तु न जी येति ॥६३॥ ४ 
अथ प्रत्यूषे तत्‌ सरः समासाद्य वानरो राजानम्‌ उवाच । देव ' 
अचार्धोदिि सूरये प्रविष्टानां सिद्धिर्‌ भवति ' इति । तत्‌ सों 
ऽपि परिजनो वाच्यः ' येनेकहेत्ेया प्रविशति । त्वया पुनर्‌ 
मया सह प्रवेष्टव्यम्‌ ' येन पवेदृष्टस्थानम्‌ आसाद्य प्रभूतास्‌ ते 
रत्नमाला दशेयामि । अय प्रविष्टास्‌ ते सर्वे लोकाः ' भरिताश् 
च तेन राक्षसेन ' इति । 16 

अथ चिरायमारेषु तेषु राजा वानरम्‌ उवाच । भो युचा- 

धिप ' किम्‌ इति चिरयति मे परिजनः । तच्‌ छूूत्वा वानरः 
सत्वरं वृक्षम्‌ आरुह्य राजानम्‌ उवाच । भो दुष्टनरपते ' राछसे- 
नान्तःसलिलस्येन भधितस्‌ ते परिजनः । साधितं कुल क्षयका- 
रणोत्थं भवता सह वैरम्‌ । तट्‌ गम्यताम्‌ । मया त्वं स्वामी ` 
मला नाच प्रवेशितः । उक्तं च ' यतः। श 

कृते प्रतिकृतं कुयाट्‌ ' धिंसिते प्रतिहिंसितम्‌ । 

न तच दोषं पश्यामि ' यो दुष्टे दुष्टम्‌ आचरेत्‌ ॥६४॥ 
तत्‌ त्या मम कुत्क्षयो निमित: ' मया तव ' इति । ५ 


0 9 


5001 पए. पए एष्यन6 07 ^ 8 प्रप88; 28% 


¶816 9111; 4268 76606. ¶816 # : ९0 ८ €8876-86€1618. 


एतद्‌ आकण्ये राजा शेकाविष्टस्‌ त्वरितिपदं *यथायातं 
प्रतिनिवुच्चः " इति । अथ तस्मिन्‌ भूपतौ गते राक्षसः सुतृप्नो 
जल्ठान्‌ निष्कम्य सानन्दम्‌ इट्म्‌ आह । ४ 
हतः शचुः कृतं मिचं ' रत्नमाला न हारिता । 
नात्ेन पिबता तोयं ' भवता साधु वानर ॥६५॥ 


अतौ ऽहं ब्रवीमि । यो ल्ौस्यात्‌ कुरूते कमं ' इति । ° 
मुवणेसिद्धः पुनर अष्‌ आह । भोः ' प्रेषय माम्‌ । स्वगृहं 
गच्छामि । चक्रधरः प्राह । कथं माम्‌ एतदट्वस्थं मुक्का यास्यसि । 
उक्तं च । 9 

यस्‌ त्यक्ता सापदं मिचरं ' याति निष्टुरतां वहन्‌ । | 
कृत्चस्‌ तेन पापेन ' नरके गच्छति भुवम्‌ ॥६६॥ 
सुवणेसिद्धः प्राह । भोः ' सत्यम्‌ एतत्‌ " यदि गम्यस्थाने शक्ति- 
युक्तस्‌ त्यज्ति । एतच्‌ च मनुष्याणाम्‌ अगम्यस्यानम्‌ ' नास्ति 
च कटाचिट्‌ अपि शक्तिर्‌ उन्मोचयितुम्‌ । अपरम्‌ ' यथा यथा 
तव चक्रभरमणवेटनया सुखविकारं पश्यामि " तथा तथा जा- 
नामि ' "यट्‌ द्राग्‌ इतः स्थानाद्‌ गच्छामि ' मा कथंचिद्‌ अष्‌ 
अस्माकम्‌ अष्‌ अनर्थो ऽयं भविष्यति ' इति । अथ साध्व्‌ इदम्‌ 
उच्यते । ` 18 
यादृशी वदनच्छाया ' दृश्यते तव वानर । 
गृहीतो ऽसि विकालेन ' यः परेति स जीवति ॥६७॥ | 
चक्रधर आह । कथम्‌ एतत्‌ । सो ऽब्रवीत्‌ । श 


०४, (पए 23.47.235 0 1.1.70 वप्र 01015. 500४ प. 288 


¶ 216 1: 08276, (11, 2० 26, 


॥ कया ९॥ 


अस्ति कस्मिंश्चित्‌ पुरे भद्रसेनो नाम राजा । तस्य सवेतक्षणसं- 
पूणां रत्नवती नाम कन्यास्ति । तां च कश्चिद्‌ रासो हतुम्‌ ° 
इच्छति । राचाव्‌ आगत्य नित्यम्‌ एवोपभुङ्के ' परं कृताङ्गरस्षप- 
रिवेषां तां हप न शक्रोति । सा च तत्सुरतसमये रासषससांनिध्य- 
जाम्‌ अवस्थां कम्पज्वरादिभिर्‌ अनुभवति । एवम्‌ अतिक्रामति ९ 
काले रासो गृहकोणे स्थितो राजदुहितुर आत्मानम्‌ अदशेयत्‌ । 
ततः सा सखीम्‌ उवाच । सखि ' पश्य ' विकाल्समये रासो 
ऽयं नित्यम्‌ एवागत्य मां कदथेयति । तट्‌ अस्ति किंचिद्‌ अस्य 
दुरात्मनः प्रतिषेधविधानम्‌ । तच्‌ छुत्वा रासो व्यचिन्तयत्‌ । 
नूनं यथाहम्‌ ' तथान्यः कश्चिट्‌ विकालनामास्या हरणाय 
नित्यम्‌ रखवागच्छति । परं सो ऽपि हतु न शक्रोति । तत्‌ तावद्‌ 
अहम्‌ अश्वरूपं कृत्वाश्चमध्यस्थो निरीक्षे ' किंरूपः विंप्रभावश् च 
सः ' इति । 

तथानुष्ठिते निशीथसमये राज्ञो गृहे कश्चिद्‌ अश्वापहारकः 
प्रविष्टः। स च स्वान्‌ अश्वान्‌ अवलोक्य तं रासाश्व भुभतर 
दृष्टा खलीनं तन्मुखे निधाय समारूढः । एतस्मिन्‌ अन्तरे 
राक्षसश चिन्तयाम्‌ आस । नूनं स एष विकालनामा मां दुष्टं 
मत्वा कोपान्‌ निहन्तुम्‌ अभ्यागतः । तत्‌ किं करोमि । एवं 
चिन्तयन्‌ सो ऽश्वापहारकेण कषणघातेन ताडितः । अथ भयच्र- 
स्तमनाः प्रधावितुम्‌ आरब्धः । चोरो ऽपि दूरं गत्वा खल्ीना- “ 
कषेणेन तं .स्थिरीकतुम्‌ आरेभे । तट्‌ यदि वाजी भवति ' तदा 
खत्दरीनं गणयति । स तु केवत्टे भ्वेगाट्‌ वेगं गच्छति । अथ तं 


50० छ. (पए एया5ऽ 07 ^ 8 प्र प288; 284 
तयावगणितखत्टरीनाक्षेणम्‌ अवलोक्य चौरण् चिन्तयाम्‌ आस। 
अहो ' नेवंविधा वाजिनो भवन्ति । तन्‌ नूनम्‌ रतेनाश्वरूपेण 
रासन भाव्यम्‌ । तट्‌ यटि पांसुल भूतलम्‌ अवलोकयामि " 
तचात्मानं पातयामि । नान्यथा मे जीवितव्यम्‌ अस्ति ' इति । 
एवं चिन्तयत इष्टदेवताम्‌ अनुस्मरतो ऽश्वापहारकस्य सो ऽ रू- 
परासो वटवृक्षतत्े गतः ' चौरो ऽपि वटप्ररोहम्‌ आसाद्य ® 
तचैव विलस्रः। ततश च इाव्‌ अपि पृथग्भूतो लब्धजीविताश्ौ 
परमानन्दनिभेरो बभूवतुः । 

अथ त्र वटे राक्षससुहत्‌ क्श्चिट्‌ वानर आसीत्‌ । तेन 
नश्यन्तं राक्षसम्‌ अवलोक्य व्याहतम्‌ । भोः ' किम्‌ एवम्‌ अल्ी- 
कभयेन प्रणश्यसि । भ्यो ऽयं ते मानुषः । तट्‌ भध्यताम्‌ । स 
तस्य वचनं श्रुत्वा स्वरूपम्‌ आधाय शङ्भितमनाः स्षल्ितमतिर्‌ 
वृत्तः । अथ चौरस्‌ तं वानराहूतं ज्ञात्वा कोपाद्‌ उपय उपविष्ट- 
वानरस्य लब्मानलाङ्कूतं मुखे निधाय गाढतरं चवितुम्‌ आर- 
व्धवान्‌ । वानरो ऽपि राक्साभ्यधिकं मन्यमानो भयान्‌ न 
किंचिट्‌ अय्‌ उक्तवान्‌ । केवत्टं व्यथातों नितरां निमीलित- 
नयनो टनैर टन्तान्‌ निष्पीडयंस्‌ तिष्ठति । राक्षसो ऽपि तं 
तथाभूतम्‌ अवलोक्य छ्रोकम्‌ एनम्‌ अपठत्‌ । 18 
यादुश्षी वदनच्छाया ' दश्यते तव वानर । 
गृहीतो ऽसि विकालेन ' यः परेति स जीवति ॥६४॥ 


सुवणेसिद्धः पुनर अप्‌ आह । प्रेषय माम्‌ । स्वगृहम्‌ अनु- ° 
गच्छामि । त्वं पुनर अच स्थितो दुविनयवृक्षफल्म्‌ अनुद । 
चक्रधर आह । भोः ' अकारणम्‌ एतत्‌ ' नयो ऽनयो वा ' यत्तो 


न 


¦ देववशच्‌ दभागुभं नृणाम्‌ उपतिष्ठते । उक्तं च । ९५ 


० व्र प् 8.4.518 0 नए) वप्त 08. 8001६ प, 285 


¶ 216 ॐ: 8117 70817, 07609261, ्1166-976€8.8४6त 11716688. ¶21€ अपं; 076.71त006€7 871811171811. 


अन्धकः कुचन्नकण चव ' राजकन्या च चिस्तनो । 
अनयो ऽपि नयं याति" यावच्‌ छीर भजते नरम्‌ ॥६९॥ 
मुवणेसिद्ध आह । कथम्‌ एतत्‌ । चक्रधरः कथयति । ४ 


॥ कया १० ॥ 


अस्त्य्‌ उत्तरापथे मधुपुर नाम नगरम्‌ । तच मधुसेनो नाम 
राजा । तस्य कदाचित्‌ चिस्तनी कन्या जज्ञे । भथ तां चिस्तनीं ® 
जातां श्रुवा राजा कच्चुकिनम्‌ आहूय प्रोवाच । भोः ' त्यज्यताम्‌ 
इयम्‌ अरण्ये ' यथा न कश्िट्‌ एव जानाति । तच्‌ हूत्वा 
कन्चुकी प्राह । महाराज ' ज्ञायत एतत्‌ ' यट्‌ अनिष्टकारिणी ° 
चिस्तनी कन्या भवति । तट्‌ अपि ब्राह्यणा आहूय प्रवयाः ' 
येन त्टोकद्ये ऽपि विरूदता न भवति । उक्तं च ' यतः । 
पृच्छकेन सदा भाव्यं ' पुरूषेण विजानता । 19 
रा्सेन्द्रगृहीतो ऽपि ' प्रश्नान्‌ मुक्तो डिजः पुरा ॥७०॥ 
राजाह । कथम्‌ एतत्‌ । कञ्चुकी कथयति । 


॥ क्था ११॥ 15 
अस्ति कुचचिट्‌ अरण्ये चणडकमां नाम राक्षसः । एकदा तेन 
रमता कश्चिट्‌ ब्राह्मणः समासादितः । ततस्‌ तस्य स्कन्धम्‌ आर्य 
प्रोवाच । भोः ' अये गम्यताम्‌ । नाद्यणो ऽपि भयचस्तमनास्‌ " 
तम्‌ आदाय प्रस्थितः । अय तस्य कमलोदरसोदरो पादौ दुष्टा 
तम्‌ अपृच्छत्‌ । भोः ' कथम्‌ एवंविधो भवतः कोमल्टौ पादो । 
राक्षस आह । नाहम्‌ अनुद्धानः पद्यां कटाचिट्‌ अपि भूमिं" 
सपृष्णमि ' इति मे वतम्‌ अलि । ब्राह्यणो ऽप्य्‌ आत्मनो मोघ्लो- 


न ^~ ~~~ ~~~ ~~~ ~~ 


530०४ ए. गप्र ए एणाण8 07 1.48 प प्र 288 ; 286 
216 1: 0्"6.14त& 87207089. ¶ 816 ॐ: 8119 787, प्रपालक० ६, ध066-9768.8६6त्‌ 1196688, 
पायं चिन्तयन्‌ सरः प्राप्तः । . ततो राक्षसेनाभिहितः । भोः ' 
यावट्‌ अहं लानं कृत्वा देवाचेनं विधाय सरसो निःसरामि ' 
तावत्‌ त्वया नातः स्थानात्‌ कापि गन्तव्यम्‌ । तथानुष्ठिते त्रा- 
णण चिन्तयाम्‌ आस । नूनं देवताचंनविधेर्‌ ऊध्व माम्‌ एष 
भक्षयिष्यति । तट्‌ दुततरं गच्छामि ' यतो नयम्‌ अनुद्धानपादो 
मे पृष्ठतः समेष्यति ' इति । तथानुष्ठिते रासो त्रतभङ्गभयात्‌ ९ 
तत्पृष्ठतो न गतः ॥ | 
अतो ऽहं वीमि । पृच्छकेन सदा भाव्यम्‌ ' इति । अथ 
तस्य वचनं श्चुता राजा ब्राह्मणान्‌ आहूय प्रोवाच । भो बा- ° 
यणाः ' चिस्तनी मे कन्या जाता । तत्‌ किम्‌ एतस्याः प्रतिवि- 
धानम्‌ अस्ति'नवा। ते प्रोचुः। देव ' श्रूयताम्‌ । 
हीनाङ्गी वाधिकाङ्गी वा ' भवेद्‌ या कन्यकाचसा। 19 
भतुश् च स्याट्‌ विनाश्य ' स्वशीलनिधनाय च ॥७१॥ 
या पुनस्‌ चिस्लनी कन्या ' याति ल्ोचनगोचरम्‌ । 
पितरं नाश्यत्य्‌ एव ' सा दुतं नाच संशयः ॥७२॥ ४ 
तस्माद्‌ एतदशेनं परिहरतु देवः । यदि कश्चिट्‌ एनाम्‌ उडाह- 
यति " तत्‌ तस्मे टचा देशत्यागेन नियोजयितव्यः ' इति । एवं 
कृते त्लोकडयाविरूदता कृता भवति ' इति । तेषां तट्‌ वचनम्‌ 
आकण्ये राजा सवे पटहघोषणाम्‌ आज्ञापयाम्‌ आस ' यथा । 
अहो ' चिस्तनीं राजकन्यां यः परिणयति ' तस्य राजा सुवणैत्ठक्ष 
दला देशत्यागं कारयति । एवम्‌ आधोषणायां क्रियमाणायां ५ 
प्रभूतकात्लो व्यतीतः । न च कश्चित्‌ तां परिणयति । सापि 
गुप्रस्यानसंस्थिता योवनाभिसुखी संजज्ञे । 
अथ तत्रैव नगरे कञश्चिट्‌ अन्धो ऽस्ति । तस्य च मन्थरक- ५ 


०४, (प्र 34 828 पपप्0 11.1.27) वप्र 108. 500 ४. 28¶ 
16 अ: 811० 22, प्रप्परल9 8८, प्९९-४7९8816त 1106688. 
नामा य्टिमराही कुन्नः सहायो ऽस्ति । ततस्‌ तो पटहम्‌ आकण्य 
मिथो मन्येते । स्पृश्यते ऽसो पटहो यदि ' कन्यका सुवरी च 
भ्यते । सुवणेप्राघ्या सुखेन कात्रो जति । अथ कन्यकादोषेण ४ 
मृत्युर भवति ' तट्‌ अस्य दारि्योत्यङ्केशस्य पयेन्तो भवति । 
उक्तं च ' यत्तः । 
लज्जा लेहः स्वरमधुरता बुद्धयो योवन्रीः ८ 
प्राणातङ्कः पवनसमता टुःखहानिर्‌ विलासः । 
धमेः शस्तं सुरगुरुमतिः शो चम्‌ आचारचिन्ता 
पूरे सर्वे जटठरपिटरे प्राणिनां संभवन्ति ॥७३॥ पप 9 
एवं मन्बयित्वान्धेन गत्वा पटहः स्पृष्टः । आह च । अहं तां कन्यां 
परिणेष्यामि । ततस्‌ ते राजपुरूषेर गत्वा राज्ञे निवेदितम्‌ । देव 
केनचिट्‌ अन्येन पटहः स्पृष्टः । तट्‌ अचर विषये देवः प्रमाणम्‌ । "° 
राजा प्राह । भोः। 
अन्धो वा बधिरो वाथ ' कुष्टी वाप्य्‌ अन्यजो ऽपि वा। 
परिगृह्धातु तां कन्यां ' सत्सं स्याट्‌ विदेशगः ॥७४॥ 15 
अथ राजादेशनन्तरम्‌ एव ति राजपुरूषेर नदीतीरे नीत्वा 
मुवणेलष्षं॑दच्ा चिस्तनी तेनान्धेन सह विवाहिता । ततो 
यानपाचम्‌ आरोपय केवत; प्रोक्ताः । भोः ' देशान्तरं नीत्वा 5 
कचिट्‌ अधिष्ठाने सकुन्नपत्नीको ऽयम्‌ अन्धो धारणीयः । तथा- 
नुष्ठिते विदेशम्‌ आसाद्य कचिद्‌ अधिष्ठाने चयो ऽपि ते मूल्येन 
गृहम्‌ आदाय सुखेन कात्र नयन्ति स्र । केवत्म्‌ अन्धः पये ° 
सद्‌ सुप्रस्‌ तिष्ठति । गृहव्यापार कुन्नः करोति । 
एवं गच्छति काले चिस्तनी कुन्नेन सह विनष्टा " आह च । 
भोः सुभग ' यद्य्‌ अयम्‌ अन्धः कथम्‌ अपि व्यापाद्ये ' तदावां 


5001 ए. प्र ए ्य08§ 07 48 प्र ८88 ; 288 
सुखेन कात्ठं नयावः। तट्‌ अन्विष्यतां क्रापि विषम्‌ ' येन तट्‌ 
दचामुं व्यापाद्य सुखिनी भवामि । अथान्येद्युः कुन्नेन मृतः 
कृष्णसपेः कुचाप्य्‌ आसादितः । तं गृहीत्वा प्रहृष्टमनाः स्वगृहम्‌ 
अभ्येत्य ताम्‌ आह । सुभगे ' लब्धो ऽयं कृष्णसपेः । तट्‌ एनं 
खण्डशः कृत्वा चारुवस्तुभिः संस्कृत्यामुष्पे विगतनयनाय ' मत्या- 
सिषम्‌ ' इति कथयित्वा संप्रयच्छ ' येन द्राग्‌ विपद्यते " इति । ® 
एवम्‌ उक्ता भूयो ऽपि मन्यरको हटरमाग प्रति प्रस्थितः । सापि 
कृष्णसपं खरहीकृत्य सतक्रस्थाल्यां निधाय चुल्लीमस्तकम्‌ आरो ` 
स्वयं गृहव्यापारव्याकुल्छतया तम्‌ अन्धं सप्रश्रयम्‌ इदम्‌ आह । 9 
आयेपु्र ' अहम्‌ अद्य तवाभीष्टतमान्‌ मत्स्यान्‌ समानीय पचन्ती 
तिष्ठामि । तट्‌ यावद्‌ अहं गृहव्यापारान्तरं करोमि ' तावत्‌ ल्व 
दर्वीं गृहोवेतान्‌ प्रचाल्य । सो ऽपि तच्‌ छरुत्वा प्रहृष्टमनाः ५ 
सृक्रिणी परिलिहन्‌ सत्रम्‌ उत्थाय दर्वीम्‌ आदाय तान्‌ प्रचा- 
त्यितुम्‌ आरभत । अथ तान्‌ प्रचालयतो विषगभेवाष्येण 
संस्पषटं द्टिपटत्ं शनेः शनैर्‌ *अगलतकत्‌ । सो ऽपि तम्‌ एव गुणं ” 
मन्यमानो विशेषेण बाष्पयरहणम्‌ अकरोत्‌ । ततः स्यष्टदृ्टिर्‌ 
यावत्‌ पश्यति ' तावत्‌ स्थात्ीमध्ये कृष्णसपेशकल्तानि केव- 
त्कानि । ततो व्यचिन्तयत्‌ । अहो ' किम्‌ एतत्‌ । ममाये मल्सया- 5 
मिषं कथितम्‌ आसीत्‌ ' एतानि पुनः कृष्णसपेशकलानि । तत्‌ 
तावज्‌ जानामि सम्यक्‌ ' किं चिस्तन्या चेशितम्‌ इदम्‌ ' किं 
वा मङधायेष उपक्रमो मन्थरकस्य ' उतान्यस्य वा कस्यचित्‌ । ५ 
एवं स चिन्तयन्न्‌ आकारं निगृहयन््‌ अन्धवत्‌ कमे करोति । 
अचान्तरे मन्थरकः समागत्य निःशङ्कम्‌ आलिङ्गनच॒बनादिभिस्‌ 
चिस्तनीम्‌ उपभोक्तुम्‌ उपचक्रमे । अन्धो ऽपि सवेम्‌ आलोकयन्‌ 


था 


०४, प 28.^ 50 0 ए) पप 110क्रार8. 5001९ प. 289 
` 416 ॐ; छात्‌ 20, & <€. ¶व16 ‰: ए०पः ध८व७पा-९-86९६९ा-8, ८€गगृप्र०प ात्‌ 86881. 
अपि किंचिच्‌ स्वम्‌ अपश्यन्‌ कोधान्धः पूवेवत्‌ समीपं गत्वा 
मन्थरकं चरणाभ्याम्‌ आदाय शरीरबतसामथ्यांन्‌ मस्तकोपरि 
*परिभराम्य तं चिस्तनी हृदये व्यताडयत्‌ । अथ कुन्नकशरीर प्रहारेण 9 
तस्यास्‌ तृतीयस्तनो ऽन्तः प्रविष्टः ' पृष्टप्रदेश्स्तनस्यश्णत्‌ कुन्नकः 
प्राज्ञत्ठतां गतः ॥ 


अत्तो ऽहं ब्रवीमि । अन्धकः कुल्नकश च ' इति । सुवणे- १ 
सिद्धः प्राह । भोः ' सत्यम्‌ एतद्‌ अभिहितं त्वया । देवानुक्त्छतया 
सवे कल्याणं संपद्यते । परं तथापि पुरुषेण देवम्‌ अङ्कीकृत्य 
नयो न त्याज्यः ' यथा त्वया मम वाक्यम्‌ अकुवेता त्यक्तः । ° 

एवम्‌ उका +सुवणेसिद्स्‌ तम्‌ अनुज्ञाय स्वगृहं प्रति 
प्रतिनिवृत्तः ॥ इति ॥ 


समाप्तं चदम्‌ अपरीक्षितकारिता नाम पञ्चमं तन्त्रम्‌ ' यस्यायम्‌ आव्यञ्चोकः। 12 
कृद्ष्टं कृपरि ज्ञातं ' कुतं कृपरी्तितम्‌ । 
तन्‌ नरेण न कर्तव्यं ' ना पितेनेह यत्‌ छतम्‌ ॥५॥ 


एतत्समाप्तौ समाप्तं *पञ्चतन्त्रापरनामकं पञ्चाख्यानकं नीतिशास्त्रम्‌ । 15 
कथान्वितं सत्क विसूक्तयुक्तं ' श्री विष्णशमां नृपनीतिशास्त्रम्‌ । 
चकार येनेह परोपकारः ' स्वगाय जायेत बुधा वदन्ति ॥१॥ णा 
ओरीसोममन्तरिवचनेन विशीर्णवर्णम्‌ 18 
आलोक्य शास्त्रम्‌ अखिलं खलु पञ्चतन्त्रम्‌ । 
ग्रीपूणेभद्रगुरुणा गुरुणादरेण 
संशोधितं नुपतिनीतिविवेचनाय ॥२॥ १४४४ 21 
प्रत्यत्तरं प्रतिपद्‌ ' प्रतिवाक्यं प्रतिकथं प्रतिस्रोकम्‌। 
ग्रीपूणेभद्र सूरिर्‌ । विशोधयाम्‌ आस शास्त्रम्‌ इदम्‌ ॥ ३॥ ह 
यद्‌ यत्‌ किंचित्‌ चिद्‌ अपि मया नैह सम्यक्‌ प्रयुक्तौ 24 
तत्‌ चन्तव्यं निपुणधिषणैः क्षान्तिमन्तो हि सन्तः । 
*श्रीग्रीचद्धरप्रभपरिवृढः पातु मां पातकेभ्यो 
यस्याद्यापि चमति मुवने कीर्तिंगङ्गा प्रवाहः ॥ ४॥ पातत 27 


5001 पर. {ए ए्णा§ 07 ^ पर 68. 290 
१ + 41 10 


स्मार्तं वचः कचन यत्‌ समयोपयोगि 

प्रोक्तं *समस्तविदुषां तट्‌ अदूषणीयम्‌ । 

सोमस्य मन्मथविलासविशेषकस्य 8 
किं नाम लाञ्छनमृगः कुरूते न *लंच्छीम्‌ ॥५॥ २०९४ 
प्रत्यन्तरं न पुनर्‌ अस्त्य्‌ अमुना क्रमेण 

कृचापि किंचन जगत्य्‌ अपि निखयो मे। 6 
किं *+आव्यसत्कविपद्‌ात्ततबीजसुष्टिः 

>सिक्ता मया मतिजलेन जगाम वृद्धिम्‌ ॥ ६॥ २०७४ 
चत्वारोह सहस्राणि । तत्परं षट्‌ शतानि च । 9 . 
यन्थस्यास्य मया मानं । गणितं सोकसंख्यया ॥७॥ } 
*शरबाणतरणिवंषे । रविकरवदि फाल्गुने तुतीयायाम्‌ । 

जीर्णोद्धार इवासौ । प्रतिष्ठितो ऽधिष्ठितो विबुधैः ॥८॥ ' 9 


+ 37 1,088.4 २४ 


प प्ा8 18 16811166 0 (1166 व 28868 9 0108 :-- 
1. पए०त§ क]11€]1 26 70 हार्ड 2 9] 77 (6 पपत ३४, ए6लाशपाह [क्प्ल 


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2. पप्रणपड 09116 शंत 9 {धाः (*) 77 कण, ४8 एनं 10४ वप्जका९ ; ० फ०1त8 
६९ 77 ४ वलक्ष) 6 (आ09र९त्‌ फा ४ इषा), शि फला फणात8 11 (10४0 


1168111 110 ०ध्छप्ा्ला९6 28 प०{21९. 


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8. ्रणत३ कल्‌ #€ ष्टा 17 कफ 88 द्र ले/01/८€/त 01 28 1916 0168, 


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80116 


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अत्तर, 1, 125, 23. 

अगर, 5291116 85 अगुर्‌, 4715118 ^ £&4110- 
९18, 46, 5. 

अज्ञन, 7. 2 ४ #166, 81, 3 (€. १४५५४ 7, 
881, 29). 

†अनर्थप्रचालनं, 8०० ग प्रचालनं . 

†अनुद्धानः, 285, 21 ००४ ०९०९१ ? †अनु- 
द्धानपादः, 286, 5 णाप कधणोणषट 
08.66. 10 प्न 86४? 76110040 4८00४ 
88 {1181 170 श्र ए उधघान २०५ 
उध्ाण 70161 80110 ५५6, ४74 ५06 
62010109 20 2४ ५16 ध्व. 
00588 ; 07 उद्धान , एए, 2611४ 5, 
2१९8 01 प्ला18९81त्‌1.8*8 ए का78518- 
एष्रथ) 1, 228 {16 अंद्10 ९ प्रमा ^ प. 
&९1160त $07' ए716पत€ (^ पटल) '. 

अपद्वार, 806-५०07, 210, 22. 


अपवरक, 86० † कारापवरक. 


अभिग्रह, 8०० सुकृमारिकाभिग्रह. 

अभ्युपपत्ति, † 16061 ८७५७००४, 809- 
161, 164, 6. 

अवन्ञायते, 11100110८४ [0488196 7 261४९ 
१01९6, 205, 24. 

†अशोकवर्ति, ४० 95०19011, ४ 1174 ग 
इफ ९९71९88, 81, 14. एण 1४8 ‹ +अशो- 
कवतिका {. ©10 10681. ©€160{ 641.. 
811९0160 1/16181068 2819114 ९8 11168 
प्र एणा]. ५१९ 1:4९. [7]. १68 8661668 
१९ 8-€ल€ा800पा्, {0116 १11, 1. 720, 
188६ 11119, 1611078 2 86611068 
^ ए पााााशाज०्डकलशातलाः + शाश 06 
पन्था श्वृपारन्ू्ा( 70 ५6 0००1९. 
गए8 ण्णात्‌ मप ४० 8 क्ता ४ फत्‌ 
अशोकवतिंन्‌. उप ४5 86671688 17 
1णत्‌ा2 976 कीला प्त 70 € प्य 9४ 
वतिं, 1 ऽप्फ0०8९ ४! वतिम्‌ 18 2 ए]प०त० 


1 एप व०४ {11018 1४ 11010 0881016 0 8681806 छपा &०प३त०३०४8५8 "070 6 पाप पतह 
8 8, ८१181९८व्‌0/} ९०८९१११८) ०वद (91181818). 1, 228 16 7811814668 पत१त४३०810088, {11 एकाय 
58110168). 2101606, 16 68118 प्क {५९00 ६० € [गप एवाोर्ल कषरश्ा10 द ‰070& (16 पाव पञ) 
{11४४ 11४8 ११ 1द 1६58888 1296 {11671 {९6४ {पा९त्‌ 186] थत३ (€. ९. (॥००४८९, 2०. 81.) 1. 149 ; 


114 2५८, 01त 06८८ 098) 1, इष). एप ९ 566 0 &००त्‌ 8९186 77 छपा [0288386 फ ४1118 
ल्श. 


292 


7" वरति. 0 लात, 1. 7, फा. 
11100148, 11101708 706 {186 06 0९४. 
11112 ° {116 व्एकक्षा ह्वार), गा. 
8108 (01 70158). २8०, 160.,, 18 ४16 
1€्टपा्ः श्वृपार्श्छपण 9 86018, 20 
8 श्रध == ४६1४, 

{अश्चचलस्था (8० 2180 78110. 2188.), 
1101868 81816? 276, 15. ©. {परिचा. 

अस्‌, असि, ण सम्‌, †॥0 06 1056660 
(0 8610, & ७0९0, ९1816160 84 एए. 
9, 15), 188, 29 ; 140, 2. 

†अस्थ्यन्त (वैर), शणंण्ड 0 +© ग्ण 
0068, 1. 6. 10101868.016, 280, †. 

"आपद्‌, "0180108, 212, 22. 

आष्यायना, 8४7, 78, 19. 

आयुक्त, 9० 00९6181, 179, 33. 

†आसुरीवृष्टि(धः. वक्प्द्वापारद 11116166 
{118 फ०1त्‌ 18 {्रल), 86-त€ए1 817, 
1. €. 62९6881९€ 7, 84, 15. 

{उचिपिरि, पाए ६८९० (य). प्रल््ल्‌, 
कालाः 28. {. १. [प०१८ १० कगद्गा].) 
2, 402), 101, 15. 

† उत्सङ्क, 116 007 0 ४ 10४86 (4116), 
148, 15. 

{उद्धुषित » 0111101186त, 17 सततोद्धुषि- 
तगाच 94, 2, ४१ पुलकोद्ुषितशरीर 
215, 22 (एण *+उद्वुषण्‌ 7. पथा 
170६}. 

†उपघारिन्‌, ४०६7०& (व0011168 गा 
01 81806}, 55, 71. 

† ऋतुग्रहण , ५७७1118 10. 8 10८8७ तप 
108 ५06 7810. 8688010, 187, 2. 

कतुं » {6 0061, 1४ हल प्ऽ 110 ए९द्प] 268 
8६6 (गल ५16 कनु्लडछपकष् ण 
26111 10811), 157, 21 ; 158, 13; 162, 
7. ग. ©. विधातु. 

कर्मन्‌, 72०९५, †{16 6780016९ १०९८8 
11111 ४ 1719 ४8 [€र्गि6त्‌ 170 16. 


४108 62415{611668) 157, 24 ; 156, 16 ; 
162, 3. 13. 


^+ 731 61088. एर 


कल, 8661, 16106108, 181, 77. 


काकरवमै, ॐ १०1त 9 पप्रा) 1168). 
112. वका न्प वक119 1148 18181892). 
4, 21. 

†कारापवर कं, 1116 0010 0 8 0178011, 
120, 19. ©}. एका ०१६२४१४, 200९९) 
0. 11. 

किंवृत्त, ४ णत गं पपाठ पराहत) 
ध्वि्रला तिणाा1 {16 वश्यता रङ्1४, 4, 21. 

† किंचित्‌ 0" कंचित्‌, 286, 24. 

{कूतिक ण कूतिका, 80116 20811796 
1126 © ल्पाः6, 190, 15. 

क्त 11) उप, 90, 20; 281, 20. 866 6 
गिदा एदा प्रक्ाञक्चप्रम) ४० 
{116 रथ19108, 

छकालिका, 80116 10110, 192, 14. 16; 
198, 7 ; 197, 3. 

कुप्‌ 110 वि, 8प 1010086, 248, 25. 

†क्रमयोगात्‌ = क्रमात्‌, 1 ५०86 ०7 ४106, 
&12५78115 (फ क्रमयो ग 5610610186), 
122, 9. । 

† क्रिया, 1711, 218, 21 ; 221, 16. (१ 
116 व्धणतद्रापाकष11,४ असंजातक्रिय 
0९९8 {166 10 € 86086 ° असंजा- 
तप्त, 11086 01088 1186 00 $€ 
श 0प्0, 97 2४8 2 शकाश म पा 
०10.) 

{खेटति (अरघटं), ४० 8४ 1 १०४०० (२ 
एला8 ॐ) ‰1066]), 244, 18. = 4^€द्गताण््ट 
0 च 2८000, {118 8661108 {0 € # 11618. 
101011९ध्‌ ९688107. ल प्लक्् ४ 06- 
१६१ प्‌) 1116878 †0 ॥11, 0 (पाप्रर6 $ 
10 ८818808. 11116 एल) 1661 18 
86{ 17 17100 एए का ०३ पतला ५6 
इप्रुश ०४९66 9 2 1181, 06 फोक्ष, 
80 #0 इथ, ^ [10पद्टा18 ऋत 06 एलशशक् 
+ 116९]. 

{गोिककमं (708 णि णः गौशिक), 
01] 01 11868 {07 ४, 60101080, 262, 
18 ; 268, 2. 

ग्रास, †6प्लाः (150 70 प्रभ. 188.) 


कः ५ 


^+ ए एए 6७10884 एप 298 


7110प् पा, 006, 288, 7 (= 81128 
प्र, 20). 

*चतुजातक, †8 8011 ० 8101066 (श 9०6 
0681. ४610106 ०६ ए १161 8100800), 
81, 14. 

† चन्द्र मती, 0. [1., ए7द्रापू0 0" चन्द्र 
वती, 148, 4. 

चर्‌ णा] प्र, ९४३.) 1† १९९९७, तप6, 80, 
22. (116 वृश्न्ह्ाप्$11४ 198 प्रक्रा- 
मयसि, 6९त€1़ 1 116 8716 86186, 
170 ६१6 ४, 1.) 

† चरणमलित, 80119. ङग 1001-816108, 
140, 24 (ण मलिनित ४९७७प्त०ा 
84145. 158, 5), 

चिभिरिका ) 21, 4, ४7 † चिर्भिरीः 20, 20, 
४ 801 0 ९प्ठप एन. 

चुल्ली, 216-01806, 288, 8. 


† चेलकं (7 चेल 6407.) ९101, 75, 23. 


† जीवितमाचसार, 8०८ "सार . 
भद्युण्ट „ 8117 प्र, एप811, 170, 10, 


† तं, एषा ्8) 0" तत्‌, 89, 23 (१8७९ 
सूच) $ 150, 7" ; 285, 32. 

तु 70) उद्‌ 7 तु 11 अव, १९8०५९५, 
एषापि (छा), 6.8. ०८५८०0४ 77 138 
९6 0 पथाा४९६१त78*8 29118518 
एश), ]. 9), 98, 12 ; 184, गव, 

चिंशति (षटरचिंशतिर्‌) "" विंशत्‌, 271, 23. 

दाति, श» ०0०६, 3 षरमासान्तपि- 
चैकदा नदात्या (०५ 1188. °द्‌ान्या), 
199, 22 (एष (५1; हव्यद्‌ाति). 

† दुदुंर, ६, 1188. 222, 13; 288, 14. 
एन119)§ {1118 00) 06910188 {0 ॥116 
कपा, ४8 प धात्‌ & #€ 600प्रात९व 


771 8017116 0111€7 ९४868 (कुरम्ब › अगर; 
°. लुण्ठ), 0४ ०] 37 0 1९६४, एप 
2180 171 001€1' 1088. 9 दग्रा -क्ल्ड{लि) 
1०1४. 


† दुष्‌ 11 परि (© ०01}. 1188, परिद्रू- 


ह्यति), ४० ०९०0० ण गाङग ०४6, 
10816 ४0, 59, 3. 


देवमा, 9०8, 2, 9 ; 58, 19. 

देवानां प्रिय, 146४४ ० ॥© &०५8, 88 
प्ध्€ ज ४ [त08, ४1, ए एप, इपत 
(पिथा18९९179, = दा§{भृशषरदाा 11, 
874, 9०१ एण 8. ₹. देवानांप्रिय), 104, 2. 

घा ए) आ; वचनम्‌, 81010059, 165, 2 


(० ००पप७९प पन्‌ अवधाय १); सख 
पम्‌, 98816 (९018९ 7४1 आ- 


स्थाय 2), 284, 12. 

नग्रञ्वण, 86९ अवण. 

नघुष, फए70ण६ह प्ण ०द्टप्रा्णटठ तण वक्ष 
0118 01 न्न ष्‌, 227, 29, 

नम्प्‌ 11 वि ("178 1687६, गाङ का 
9 पतल: शा1851{81), 2150 10 प्क्ा], 
1188.), ए.7., = शीलविनाशं शील विश्चवं, 
शीलखण्डनं) छतवती, † १०8६०5९0 167 
©0 8814, 81006 (८919115), 287, 23. 


नास्तिक, ०9 110 898 ‹ {1616 18 1067, 
†8 वक्ष (2९९01019 ४० % &10०88 17 118. 
1011), 55, 1. 


#*निसखावकं (1188. निश्रावक), ४७ &0प्ण 
0 00116 1९6, 260, 24. 


पञ्चुष , 7९ 07 81 ड, 76, 19. 

† परोला, ‰ 870९५68 ग ९€प्ठपपाएनः (ष 
>पटोली ५१ पटोलिका), 100, 28. 

† पथ्यद्‌न, र्ध्<पा, 81, 3. 

पद्‌ ण, सम्‌, ९० संपन्न. 

† परिचा, 8116116 (1. चा, {०70९ 111€ 
परिखा; °. † अश्चचलस्था), 285, 5. 


† परि वर्तकम्‌ " परिवर्तम्‌ (षाप८णक, 
§ 995 0), (प1& ८००6, 68, 2, 


#परिश्रय, सर्शप४९ (7680102 ० #11€ पंक 79 
। 1,1.11. 11.1 प्रतिय), 66, 5. 


पाज्िक 0610010 0 0068 811, † 812 
811 ? 282, 19. 


† पुलकोद्धुषितश रीर, ६०० † उद्ुषित. 


294 


† पुष्‌ फ४" अव, ४० 61010180 (ए. 0.)-- नु). 
2108868 70 )788. 1 ४१ -82, 18. 

† प्रचालन (यत्‌ प्रचालयति तत्‌), ऽप्य 
प्र0 (15ऽणिपा९), 271, 6. 

प्रतिशब्द, 9५10, 207, 14. 

† प्रत्यादशै, (०पण्पणताणछ 6दभाण016 ० 
16880 (दर्शितः 17 € 89116 862 
81008 ५1४ प्रत्यादभै 18 1107 8 8186 
168410६ णः प्रत्यादेश, 8 फ 1४188 1# 
10 08), 208, 23. 

॥ प्रत्युत्पद्‌» धण10770& &०४? 141, 72. 

प्रदेष्ु „ ९6019 {8166 ? (80 ए), 180, 2. 

† प्रघानपुच्ायमाण, 18ए10& 10660116 (!) 
20 €5९61167६ 800, 107, 75. 

प्ररोह 2” वरप्ररोह, †४० 2677181 २००४, 
284, 6, 

प्रशास्तु, 20 00007184 110 8.8 प्न 01.667 
0 ॥16 1108? (0 ^ 0 61861; 3111, 
९1167 851९6), 180, 2. 

प्रिय, 8 देवानां प्रि. 

बाड, *{9111., 8.17, 99, 24. 

बिल, 1016, ८४.९९1, 1866 8 † 11188016 
111 2१41688, 218, 15) 1161688 171 {16 
{गान्क्यणट 1106 1४ 128 {16 पडपश्न 
2601461, 

1 बूट (एप्प वोड %१ वोडियः, 1.5४. 
11121111, 2.1)76., 1.#ा, 665, 2016); 
छप, एला, ठ (प प, एए, वूटकणै), 
184, 26, &९, 

¶† ब्रह्महृदय, &०1, 100९ (णण {116 
भाय $दक119), 110, 12. £ या 
ग्र. | 

† भगवदिदि तम्‌, २१४. &# शं &४ 2 6 
पगङ 0०6 (एण विदितम्‌, 7॥ प्78- 
86,-- ४01), 96, 6. 

भविष्यत्‌, †॥9१10& 4९०९४1७ 10708- 
0९8 (९). भविष्णु 8 † ए), 228, 24. 

मसमाङ्ख, 1119118 80068760 118 000 
1 28068, 24, 19. 


^+ एए 61.088.4 प 


भाषा, 15४06 28 रागिणी, 9 0061968 
{100 ग & 051९681 1006 (ए *©06 
068111017116 ददि), 271, 23. 

भास ? (कण नं. 068. ए भ्प्रा०र०४६०ा 4247. ; 
416: ॐ 60० ; ४ एप्रा४प्ः6), 180, 
13. 

भू, ०३8. 0" † संपरि , ८७९०४, 281, 26. 

मनुष्य, 1†४ 10481 ए७६ (भथश्पप), 
186, 8. 

† मलित, 8०० चरणमलित. 

महत्तमः, 18916 28 गुर्‌, 80 नशतल्धङ्ग 
61876, 106, 7. 

† माटपत्य (1088.718{7087081 8; फ 010, 
§ 12118), ४6 886 0 ताप ग 
1011071 0 8 11108816, 186, 4. 

† यागेशखर, 1,0"4. 0 8801066, 1. 6. & ०1 
(शुध्णनाधृङग 9 शशा व्ाल€8०ा) 1118 
ब्रह्महृदय, १. ४.) 25, 15. 

योगिन्‌, †शर710पा, ९प्00720& (866 ए 8, ए. 
योग 11), 154, 5. 

ल डक › ५ -0प०त्‌ शा ग इपर, 1684 
0 1166-0 प, &०66, 206 8101668 * 
(41४6), 81, 14. 

लल्‌ ए1\1 1 ससुट्‌, 1010, 81816 16 
0 श्न प, 87, 19. 

लुण्ठ्‌ फः#1 उद्‌ (068! 1199. उल्ल रितानाम्‌; 
५५ † दुदर); 10 8681670 {106 पश्ाङ्ज 
10 ०1067 ६0 1प०५€7 (ण 7, 372 
व००४९३ 0धङव त्र 208 168), 120, ¶. 

वंशज, 10971108, 061000६ 0 178 
111, 1001606 प्य 18 शणाङ, 
279, 714. 

वर प्ररोह, 8९९ † प्ररोह. 

† वणिजारकसार्थं (1/8. वणिज्जार कं° 974 
वणिज्यारक०), 8 (0०८ 0878 
४४0, 78, 14. वणिजारकं, १8 «८८०१ 
11101108 106, 18 ॐ) 00 शा०प§ 8408116. 
12810 ग प्ल २४810, (४ 
{18श्नाा77् लाला 119 (क्168 णिः 
8816 &००१७ 111. 8 €81188811, " 


^+ एए 61.0884 एप 


† विक्रापयिष्यति, "+. ९००६. क्री फः" वि 
(ए * क्रापयति), 68, 77. 

† विच्‌ णण प्र, ९९8.) #0 8086167:3 प 2816 
(11016), 8, 79. 

विधातु, 81 98 कतु, १. ए., 162, 21. 22. 

वैण , 91018 एप४ (प000 क 8]091119& ग 
0 1188. 0" वैन्य, 21101. ° वेन्‌. 
(108 ४७9 0 एल्‌)18 88 [1116 एर 
#16 88९68, 110 फ़ एपणड च6 श्प 
ण 116 ९0986 [010तप९९्‌ 070 1४ 1182 
एप छपा वैण्य) ;› 227, 7५. 

श्याम, *16 14180 ©प्ला©60, 180, 13. 
(एल]9्‌)8 80116 १181167 8९८ €8 ग 
1118 17 18 70{धात्‌€त्‌ 70 0प 10४888९6, 
28 {1 कोकिल 18 111611#10116 ए€96 77 
1116 8876 ©010[00प) १.) 

अवण, 506 ४8 अमण, 1 नम्र्वणः 
81661118 01£84710818. 9806116, 
108, 24. 

† वणक, 10., 102, 24 ; 108, 4; 107, 16. 

† खेतभिन्ु, 181, 22. ८८०९४ 1पण5 206 
पधा (78 कणत 18 207 क €वुप्ोरश्लणौ 
ण आेताम्बर, 214 118 17 {16 89. 
गणथादा८८भरा2 9 पणएडरमिरकृ 28 ०. 
1106त्‌, 1086 [0लाएथो त्रत 8661008 †0 
0४१९ 066 0 ण्त्‌ शा +€ 10८8 
% ४1९ ८० : गोरसवज्जनणाद ओ निय- 
यकिरियाकलावो. 

† सकृत्‌» 709 शृ€ा770 ग ०पाः शपाम 
9 श्रक्णत्‌ (कप ए असकृत्‌), 56, 12. 

† सततोद्धुषितगाच, 8० † उद्धुषित. 


295 


सत्ता 7" हित्तरतरसत्तासंशयः, 95181600, 
† 01686106, 121, 6, 


संपन्न, †8ण6७† 1708, प्ण (ल). ण 
संपन्नकरती रा, ४4}. £ ०1118011 69016४०6 
2711610 &60600), 255, &. 

संप्रहार, †2 70118 39191290 ग 
पतात संपहार, अ+. 1 संप्रघार (गः 
संप्रधारण ०" णा), 9110०8०४, 
166, 2 ; 184, 5. 

°सार, ०९७80708, 164, 12. 

1 सुकृमारि काभिग्रहलब्धत्रतादे शः, 258, 25. 
61908 08910& 16061९64 ५06 84166 
8 01010186 {0 {86 116 णण (9 
९0884) 10 1018 र0प्र. 1 +भ 
सुकृमारिकं 8 2 ए707् णिाी0 णिः 
सौकृमारक, 2१}. अभिग्रह, श्ण, एण 
श्ना, 2, एप पऽ नपुक्ि0ा 18 
९१ = प1(ला{क्ा. सुकृमारिकाभिय्रह 
18 1060908 ४ {6९0011९8 € ]016881011. 


† सुह सिका, 5206 ४8 खनिचकं, 9 .810811 
8100991, 8170811 80866, ०, 87811 
10161856, 140, 22 ; 142, 7. 

सूच, +1480. 88 (07 तं 18 एा्ावृडण 
07" तत्‌, १. *.); 89, 221 

{ सौधोत्सङ्गावलम्बित, 8०० † उत्सङ्ग. 


स्थगिका (एष्डण+ यद्या, ०८८०१४१, ^ ०88. 
ए दक्ायप६९0, 10888, 1, 114, ‹ सफर 
^^ ‰&72]0]088र ” ”), 061691-00.2, 69, 12. 

सस्तर, 1" (7 & €]नु0४11), 185, 12. 

† हले , १०९८४११७ ९४86 0 ४ लाप ०1, 
11 (70816) 81629, 148, 8. 


^+ 12111108 ^ अ (008 


+ 81216 (^) 81808 शणध्छ8 ९९01८ 8 8210त111-रछशन, 1 ॥16 पाभ रण्ण्न्‌ ग 
1116 8९८०पत फणत्‌ 18 107६, = फ लाछण्लः 6 उफापरश्न्‌ ए्णकल्‌ म ४6 86८०४त्‌ कणत 38 
81101, {16 21216 &{४1त8 62४० ८14" 1४. 


एरर : तथाकाशे = तथा + आकाशे ; तथुन्यद्‌ = तथा + अन्यु. 


00 #0 0. 46, ४6 81091] एला {7९81 8701९ फल इनक्ष 2168 8908 01 ४ ९०णए०पात्‌ 
18 0 शणष्फऽ 861 7111 7€द्श्चत 0 ४16 वृ पश्प्ि्क 9 ५06 गान 1019891 रणक्ल्‌. 
ए 1. 47 00, 1४ 8128748 ९401८ ४ 1098 ्ठणथ्‌, 17 ४06 णापर रणकन्‌ ° ५€ गान््णद 
81670 18 10118, 80त्‌ @श<ङग 0र्न' ५16 60४66 रण्या, 71 ५06 17४9 रण्क्ल गम 
॥1€ गाना 80) 18 8101011. 7) ९886 ग ९0080121018 € ` 0४४6 61068०पा७त्‌ 0 
86 {16 110201{ध््‌ 81101ए€ 88 € 86 28 00881016. 


91100168 : }. 185, 131, विद्युत्‌ + प्रभा + परल + संसिष्ट + सजल + जलद्‌ + सदृशं; 
प्रावृट्‌ + काल + प्रबल + चपल + मरीचि + विदन्‌ + निवह + संघट्‌ + गस्मीर + 
भैरव + रवं; 1. 25, प्रवर + भुजग + इन्द्र + आकार + संवे्टित + करम्‌. ५ 


0 ४06 एना ग 0९71618, 6 ४११ 11616 ४116 ९४३68 770 1110610, १०७0 ४0 2. 46, 
{16 8€0&718{10108 810पात 6 1016 62४९४, 6४4-- 


3, 5 "पूरणै° ; ¡ परिखा० ; 4, 7 श्क° ; 34, 25 गदुर्भि्तासुरी० ; 35, 3 कतौश्रयौ ; 
कापुरुषा ; 8 सत्पुरुषा ; 24 सुधासमम्‌ ; 36, " महा'विषो ; "2 कदाचनं ; 38, " शि- 
लातल०; 2 परमहर्षै०; 39, 6 शिरम्केदम्‌; 9 तद्छिरि्िटं; 2० मिध्यावादेन; ग" 
शिलातले ; 2" शसुक्ताहार०; 46, "6 °दोलासंवादिं. ¦ 


4 शि 1011701" €11818 ग10क्, 8017016 छि, 0 068 श111९1 &€ 710प्था 17 80006 
९007168, एप &०० 17. 0{0€6, 


7, 12 168 उदीरितो 154 एण ०8 070 1106 26, 
3६. 4 एदासुरी° 8त्‌ 61118, 071 1106 39, 
183, १ 
35, 14 चापत्यसमः 19 ध 
। आस 199, 19 ह षण्मासे 
40, 19 ध स 200, 1०9 -7०९, 9 1७, ० 
46, 18 ५ ग्य्राहिणीं (व9्७ ण: 6गव-कणण्ड 
50, 31 ५ आदायोपखितः 07708. 
70, चाभ्यन्तरा 217, प = मूख 
104, 16 ५ यथासौ 218, 73 » तूष्णोभूय 
128, 12 ४ यन्‌ न 228, 13 1085611 1181-8{7016 
129, 39 अथवा त वै्देवान्त ह 
| ४ ४ + 258, 21 1684 मनोभवाभिधे 
30, छ दुःखाघम्‌ 259, 1 र खदिरमयांल_ 
130, 3० ४ मैचीं 260, 6 ¢ जलकुम्भं 
142, 4 ¢ भो 276, „ . उत्यत्छति 


व ^ ९४4 स) 0 कवा^+ 1 59 


प््ए8त 0षंलपतथा इदं. = एताष्टत्‌, फत्ता दन्कृलक्ठप ग णवा०यड 86101918, ए 
तप्र ^ हा.ए8 2. [^ प्रण ^ प, 2708880 9 रकश 70 पिभणएक्षषत्‌ फ्ण्टाश्र. = एषणाशात्त्‌ 
एक प्क्ष पफाण्डाष्डि, (क्0ए0त६6, 11288801 8678, च. 8, 4, -- 10 6 0पद्ो0, 77 
47161168, 07 अपप & ©0.^ प्र र, 29 36९8९01 81661, 80801, 21288, ; 77 12194, ° 
लप्् & €0., 9 ६1. 01418 8766#, 1.6९€8€ा' 84816, 10114070, प, ©. ; 77 (द०ण्पटा+धा 
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